लकीर lakeer लकीर
सुनो माँ...! मुझे जल्दी से उन सब नामों की सूची दे दो जिनको आरआर-पत्र भेजने हैं। स्वाति ने माँ को आवाज़ लगाते हुए कहा। रसोई में व्यस्त सुनयना ने जल्दी से हाथ धोए और अलमारी से सूची वाली कॉपी निकालकर बेटी को दे दी।
स्वाति अपने छोटे भाई की शादी में शामिल होने के लिए १५ दिन पहले ही मायके आ गई है ताकि शादी की तैयारियों में माँ का हाथ बँटा सके। रिश्तेदारों को तो माँ ने काफी पहले ही अपने जेठ को मनुहार करके कार्ड भिजवा दिये थे, केवल स्थानीय मित्र व परिचित रह गए थे जिन्हें कार्ड भेजने थे। स्वाति ने पहले चिन्हित नामों को पढ़ना शुरू किया कि कहीं गलती से कोई रिश्तेदार छूट न गया हो। आखिर पिता की अचानक मृत्यु के बाद माँ नितांत अकेली हो गई थी। चूँकि पिताजी एक बैंक में सरकारी नौकर थे, तो उनके स्थान पर उसके भाई सुभाष को नौकरी मिल गई थी, अतः घर में आर्थिक परेशानी बिलकुल नहीं थी और अब तो सुभाष की शादी हो जाने से घर में रौनक हो जाएगी साथ ही माँ को भी आराम मिल जाएगा। सोचते हुए स्वाति सारे नाम ध्यान से देखती जा रही थी। अचानक उसे कुछ याद आया तो माँ से पूछ बैठी-
“माँ, सूची में हमारे खानदान के कुलगुरु का तो नाम ही नहीं है, क्या उन्हें निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया?”
-नहीं, मैंने इसकी आवश्यकता नहीं समझी..
.“पर क्यों माँ! हमारे खानदान में तो यह पुरानी परंपरा है, किसी भी शादी में सबसे पहले उनको निमंत्रण जाता है और चाचाजी लोगों के तो सभी बच्चों की शादी में वे आते रहे हैं फिर आप...? मेरी शादी के समय तो अलग बात थी, पिताजी को गुजरे तीन महीने ही हुए थे लेकिन इस बार तो उनको बुलाना चाहिए था न! चाचाजी लोग क्या सोचेंगे?”
-वे चाहे जो सोचें बेटी, वैसे अलग होने के बाद हम लोग किसी के निजी कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते।
“लेकिन माँ, कुलगुरु को न बुलाने का क्या कारण है”?
-बेटी, यह बहुत लंबी कहानी है कभी फुर्सत में सुनाऊँगी। अभी बहुत से काम बाकी हैं।
स्वाति ने माँ के गले में बहन डालकर मनुहार करते हुए कहा-
“काम की चिंता क्यों करती हो माँ, मैं हूँ न”!
बेटी की ज़िद के आगे हार मानते हुए सुनयना ने अपनी यादों की गठरी की गाँठ खोल ही दी। खुली हवा पाकर उसमें तह करके रखे हुए उसके जीवन के पुराने पृष्ठ सहसा फड़फड़ाने लगे और उन्हें समेटते हुए उसने क्रमशः बंधन मुक्त करना शुरू किया-
-बेटी, कहानी तब की है जब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था। मैं शादी करके सपनों के हिंडोले पर सवार होकर नई-नई ससुराल आई थी। सास-ससुर, दो जेठ, उनके दो-दो बच्चे, हम दोनों, एक देवर और एक छोटी ननद, कुल मिलाकर १२ सदस्यों का साझा परिवार था। रेडीमेड वस्त्रों की एक अच्छी दुकान थी। दोनों बड़े भाई पढ़ाई में रुचि न होने से ११ वीं के बाद अपने पिता के साथ दुकान का कार्य सँभालने लगे, लेकिन तुम्हारे पिताजी की रुचि पढ़ने में थी और पढ़ाई में तेज़ भी थे तो उन्होने पढ़ाई नहीं छोड़ी। ग्रेजुएशन के बाद उनकी शहर के एक बैंक में नौकरी भी लग गई। कुछ समय बाद ससुर जी का दुकान पर जाना कम होता गया और सारा काम दोनों भाइयों ने सँभाल लिया। लगभग एक साल बाद ही देवर की शादी का कार्यक्रम तय हो गया। इस अवसर पर खानदान की परंपरा के अनुसार सबसे पहले घर का कोई सदस्य उपहार लेकर कुलगुरु को उनके शहर जाकर मनुहार के साथ विवाह में एक सप्ताह पहले आने की मनुहार करके निमंत्रण-पत्र देकर आता है। बड़े भाइयों को दुकानदारी से फुर्सत न होने से कहीं भी आने-जाने के कार्य तुम्हारे पिता ही करते थे, इस बार भी वे ही कुलगुरु को निमंत्रण पत्र दे आए। वे उनकी विद्वता का गुणगान करते नहीं अघाते थे। मैंने अपने विवाह के समय उनको देखा ज़रूर था लेकिन उनसे परिचित नहीं थी, और विवाह बाद वे शीघ्र ही चले गए थे तो मेरा ध्यान भी इतने मेहमानों में नहीं गया था। अब मैं फिर से उन्हें देखने को उत्सुक हो उठी थी।
विवाह-कार्यक्रम में उनके आगमन के दो दिन पहले से ही घर में उत्साह की लहर दौड़ गई थी सबके चेहरे खिले-खिले थे और उनके स्वागत की तैयारियों में दोनों बड़ी बहुओं के साथ मैं भी लगी हुई थी। आखिर नियत समय पर गुरुदेव अपने ताम-झाम के साथ आ पहुँचे। मैं उनके व्यक्तिव से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। सबके साथ मैंने भी प्रणाम करके आशीर्वाद लिया। उनके आने से घर का नक्शा ही बदल गया। चूँकि दोनों बड़े भाई दुकानदारी में तथा पत्नियाँ बच्चों में व्यस्त थे, तो उनकी सेवा की ज़िम्मेदारी हम दोनों पति-पत्नी को सौंप दी गई। ऊपर की मंज़िल में सभी भाइयों के कमरे एक कतार में थे और अंत में एक बड़ा सा हालनुमा कमरा मेहमानों के लिए था। इसी कमरे में उनके रहने की व्यवस्था की गई। सुबह ५ बजे ही उनकी दिनचर्या शुरू होने के साथ ही हम दोनों को उनकी सेवा में हाजिर होना पड़ता था। खानपान से लेकर उनकी हर छोटी-बड़ी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता। तुम्हारे पिता मुझे उनकी सेवा की हिदायत देकर १० बजे अपने दफ्तर चले जाते। उनके आने तक गुरुदेव के चाय-नाश्ते, भोजन पानी और आराम का पूरा ध्यान रखना मेरे जिम्मे था। पहले दिन ही भोजन के बाद देर रात तक हम पति-पत्नी उनके हाथ पाँव दबाते रहे। जबकि पति का आगे रहकर किसी पर-पुरुष के पाँव दबवाना मुझे सर्वथा अनुचित और अंध-श्रद्धा के अलावा कुछ नहीं लगता था लेकिन पति के भक्ति-भाव के आगे मुँह खोलना उचित नहीं था, आखिर मैं उन्हें जानती ही कितना थी।
गुरुदेव घर की हर महिला को भक्तिन कहकर संबोधित करते थे। मैं जब भी उनके कमरे में जाती, वे कहते-
“भक्तिन तुममें गुरु के प्रति वो श्रद्धा नहीं है जो तुम्हारे पति में है”।
मैं डर जाती कि कहीं वे मेरी शिकायत पति से न कर दें। वे गुरुदेव की अनदेखी बिलकुल सहन नहीं कर सकते थे, यह उनकी बार बार मुझे दी गई हिदायत से स्पष्ट हो गया था, वे मुझे बहुत प्यार करते थे उनका लेकिन गुस्सा भी बहुत तेज़ था। मैं बहुत सीधी थी, उनकी कोई बात काटने या विरोध करने का साहस मुझे मुझमें बिलकुल नहीं था, वे कहते- गुरु-सेवा सबसे बड़ा पुण्य है। मैं कोई जवाब न देती, केवल सिर झुका देती।
पाँच दिन तक प्रतिदिन शाम को दो घंटे उनके प्रवचन और सत्संग का कार्यक्रम होना था उसके लिए सबसे बड़े हॉल में व्यवस्था की गई थी। इस समय केवल घर और पड़ोस की महिलाएँ ही एकत्र होती थीं, फिर मर्द देर से आकर कुछ समय शामिल होते थे। अधिकतर प्रसंग श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन पर ही आधारित होते, और हम सब आनंदित होकर सुना करतीं। इस तरह चार दिन व्यतीत हो गए। पाँचवें दिन जब सारे काम निपटाकर उनको दोपहर का भोजन देने गई तो उन्होंने खाना टेबल पर रखवा दिया और कहा-
“भक्तिन, आज हाथ पैर बहुत दर्द कर रहे हैं, अगर थोड़ी देर दबा दो तो कुछ आराम हो जाएगा”।
मैं असमंजस में पड़ गई। पति का साथ मजबूरी में देती थी। वे अपने पास बिठाकर कहते,
“सुनयना, गुरुदेव का एक पैर तुम दबाओ एक मैं दबाता हूँ। गुरु से कैसा संकोच”?
लेकिन उनकी अनुपस्थिति में... मेरी परेशानी शायद वे भाँप गए बोले
- अगर तुम्हारा मन नहीं है भक्तिन, तो कोई बात नहीं...
मैं साफ इंकार नहीं कर सकी और कुर्सी पलंग के पास खींचकर उनका पाँव दबाने लगी। कुछ देर में उन्होंने दूसरा पाँव दबाने के लिए पलंग के ऊपर दूसरी तरफ बैठने का इशारा किया। मैं चुपचाप सिमटकर ऊपर बैठकर दूसरा पाँव दबाने लगी। फिर उन्होंने सिर दबाने के लिए कहा। उनकी आँखें मुँदी हुईं देखकर मैं वहीं सरककर उनका सिर दबाने लगी। सिर दबाते हुए मेरी धड़कनें तेज़ हो गई थीं, मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि शीघ्र मुक्त हो जाऊँ। चूँकि मेरा कमरा सबके अंत में हाल से लगा हुआ होने से किसी के उस तरफ आने की कोई संभावना नहीं थी, तो मेरा डरना भी स्वाभाविक था। जब मैंने कहा- गुरुदेव अब आप भोजन करके आराम कीजिये तो वे उठकर बैठ गए। बोले अभी मन नहीं है भक्तिन और अपने बैग से एक डिबिया से लौंग-इलायची लेकर अपने मुँह में डाल ली और एक मुझे देते हुए कहा- यह मुँह में डाल लो, गुरु का प्रसाद है। लौंग इलायची मुँह में डालते ही मुझे अचानक घबराहट सी होने लगी और आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। जैसे ही मैं पलंग से नीचे उतरने लगी तो हाथ पैर लड़खड़ा गए और उन्होंने मुझे खींचकर अपने आलिंगन में ले लिया। उनका यह रूप देखकर तो मेरे होश उड़ गए, अगर चिल्लाती तो न जाने घर वाले और पति क्या सोचते, शुभ कार्य के रंग में भंग पड़ जाता वो अलग, अतः अपनी पूरी ताकत से खुद को छुड़ाकर भागी और अपने कमरे में जाकर फफककर रो पड़ी। गनीमत यह थी कि बाहर निकलते हुए मुझपर किसी की नज़र नहीं पड़ी।
शाम होने पर जब नीचे नहीं गई तो जेठानी बुलाने आ गई कि चलो सत्संग शुरू हो चुका है। मेरे मन में अब गुरुदेव के प्रति वितृष्णा का भाव पैदा हो गया था और सब ढोंग लग रहा था, बोली-
“भाभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं नीचे नहीं आ पाऊँगी”। लेकिन उन्होंने बड़े प्यार से कहा-
-“सुनयना, आज सत्संग का अंतिम दिन है, भजन-कीर्तन देर तक चलेगा। कुछ देर आराम कर लो फिर थोड़ी देर के लिए आ जाना”।
लेकिन अँधेरा घिरने के बावजूद जब मैं नीचे नहीं गई तो एक बार फिर बुलाने आईं और तैयार करवाकर साथ में ले गईं। गुरुदेव मुझे कनखियों से देखते रहे। उनकी नज़रों में पश्चाताप का कोई चिह्न नहीं था, बल्कि ढिठाई से बोले-
-आओ भक्तिन, सत्संग सुनकर तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा।
मैंने आग्नेय दृष्टि से उनको देखा और खून का घूँट पीकर चुपचाप एक कोने में बैठ गई।
“भक्तिनों, मैं अब आपको श्रीकृष्ण के जीवनकाल का एक छोटा सा रोचक प्रसंग सुना रहा हूँ। ध्यान से सुनिए”।
कहते हुए गुरुदेव ने मुझे तिरछी नज़र से एक बार देखा और कहना शुरू किया-
“एक बार श्रीकृष्ण ग्रामवासियों के साथ यमुना पार जाना चाहते थे। लेकिन नदी बाढ़ से उफन रही थी और वहाँ कोई नाविक न देखकर उन्होंने ध्यान लगाकर नदी से प्रार्थना की कि हे मैया! अगर मैंने अपने जीवन-काल में एक पत्नी के अलावा किसी स्त्री को छूआ तक न हो तो मुझे इन ग्रामवासियों के साथ उस पार जाने का रास्ता देकर उपकृत करो। उनके वचन सुनकर नदी एकदम सूख गई और रास्ता पाकर सब उस पार पहुँच गए।
तो भक्तिनों, यह बात तो सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने एकाधिक विवाह किए थे। उनकी ८ पटरानियाँ और १६००० अन्य रानियाँ थीं, लेकिन यमुना मैया ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया। इसीलिए तो रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने कहा है-
-समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।
रबि पावक सुरसरि की नाईं॥
अर्थात सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कोई दोष नहीं लगता”
बेटी! यह पौराणिक किस्सा सत्य है या कपोल कल्पना, मैं नहीं जानती, सभी भक्तिनें अंध-श्रद्धा में डूबी हुईं आँखें मूँदे उत्साह पूर्वक प्रसंग सुन रही थीं लेकिन मेरी आँखें खुल चुकी थीं, अपने क्रोध के आवेग को नहीं रोक सकी और उठकर वहाँ से अपने कमरे में चली गई।
रात भर नींद नहीं आई, मन में द्वंद्व चलता रहा कि जो इंसान महाकवियों द्वारा आदिकालीन युगपुरुषों की जीवनी पर रचे गए ग्रन्थों का सार छोड़कर अपना स्वार्थ साधने हेतु असार ग्रहण करके आसुरी आचरण का वरण कर लेते हैं, वे क्या समर्थ कहलाने लायक भी हैं? क्या अनश्वर दैवीय शक्तियों, अग्नि, सूर्य, सरिता यानी जल, जिनके बिना जीवन ही संभव नहीं, से इस नश्वर संसारी पुरुषों की तुलना की जा सकती है? समर्थ तो वही हो सकते हैं न, जो अपने गुणों की सुगंध चतुर्दिश फैलाते रहते हैं और उनको कुपित करने के दोषी भी मानव ही तो हैं, जो कुदरत को छेड़कर अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करते हैं। ऐसे असुरों ने सद-ग्रन्थों को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
मैंने इस घटना का जिक्र पति से नहीं किया, न जाने उनकी क्या प्रतिक्रिया होती, आखिर कलियुगीन परिभाषा के अनुसार वे भी तो समर्थ-पुरुष? ही थे न!...वे क्या सारे पुरुष शायद समर्थ हैं, असमर्थ तो मैं थी, एक स्त्री, जिसकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं था। उस रात मुझे ऐसा बुखार चढ़ा कि कई दिन तक बिस्तर पर पड़ी रही। विवाह कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हुई। अंदर ही अंदर एक दर्द सालता रहा। लेकिन किससे साझा करती? पति चिंतित थे कि अचानक मुझे क्या हो गया।
आखिर मैंने अपना पूरा दर्द एक डायरी में लिखकर उसे अपनी अलमारी में पुराने कपड़ों के बैग में सबसे नीचे यह सोचकर छिपा दिया कि समय आने पर पति को सौंप दूँगी। लेकिन बेटी, वो समय उनके जीवनकाल में कभी नहीं आया, और वे असमय ही काल के गाल में समा गए। अब तो मैं एक और अपराध-बोध लेकर जीने को विवश थी कि मैं उनको अपने मन की बात नहीं बता सकी।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। नियति ने मुझे पति की नज़रों में निर्दोष साबित करने की व्यवस्था भी कर दी थी। उनके जाने के बाद जब मैंने उनके सारे कपड़े गरीबों में बाँटने के लिए एकत्र किए तो वो पुराने कपड़ों का बैग भी खोला और एक बार फिर मेरे हाथ में वही डायरी थी। उदास मन से खोलकर पढ़ने लगी तो सबसे नीचे अंत में कुछ शब्द अलग लिखे हुए थे जो मेरे न होकर निश्चित ही तुम्हारे पिता के थे। नीचे तिथि भी कुछ ही महीने पहले की डाली हुई थी, लिखा था-
"सुनयना, तुमने कैसे इतना दर्द अपने सीने में समेटकर इतने साल निकाल लिए। तुम अपने दुख का साझीदार मुझे क्यों नहीं बना सकी, जबकि तुम्हारा अपराधी तो मैं था। यह तो इत्तफाक से तुम्हारी अनुपस्थिति में काम वाला लड़का पुराने कपड़े लेने आया जिसे शायद तुमने बुलाया था। मैंने सोचा मैं ही उसे कपड़े दे देता हूँ और यह बैग टटोलने पर डायरी मेरे हाथ लग गई। फिर मैंने लड़के को दूसरे दिन आने के लिए कहकर डायरी उसी जगह रखकर बैग वापस रख दिया। देखना था कि आखिर तुम कब मुझे इस लायक समझोगी। दुख केवल इस बात का है कि तुम मुझपर विश्वास नहीं कर सकी। खैर... तुमने मेरी आँखें खोल दी हैं, यह अच्छा हुआ कि तुम उस नरपशु के चंगुल से बच निकली, वरना मैं स्वयं को कभी माफ नहीं कर सकता।
मैंने तय किया है कि आज के बाद हमारे पारिवारिक विवाहोत्सव में कभी कुलगुरु को नहीं बुलाया जाएगा। इस अपंग परंपरा की लकीर पीटते हुए खुद चोट खाते रहने के बजाय मैं इसपर हमेशा के लिए लकीर खींचता हूँ, ताकि ऐसे पाप-प्रसंगों की पुनरावृत्ति कम से कम हमारे खानदान में न हो।
-तुम्हारा सुदेश, जिसे तुम अपना नहीं समझ सकी।"
-कल्पना रामानी
suno maan! mujhe jaldee se un sab naamon kee soochee de do jinako aaraaar-patr bhejane hain svaati ne maan ko aawaaz lagaate hue kahaa rasoee men wyast sunayanaa ne jaldee se haath dhoe aur alamaaree se soochee waalee kॉpee nikaalakar betee ko de dee
svaati apane chote bhaaee kee shaadee men shaamil hone ke lie 15 din pahale hee maayake aa gaee hai taaki shaadee kee taiyaariyon men maan kaa haath bantaa sake rishtedaaron ko to maan ne kaaphee pahale hee apane jeth ko manuhaar karake kaard bhijawaa diye the, kewal sthaaneey mitr w parichit rah gae the jinhen kaard bhejane the svaati ne pahale chinhit naamon ko pढ़naa shuroo kiyaa ki kaheen galatee se koee rishtedaar choot n gayaa ho aakhir pitaa kee achaanak mriityu ke baad maan nitaant akelee ho gaee thee choonki pitaajee ek baink men sarakaaree naukar the, to unake sthaan par usake bhaaee subhaash ko naukaree mil gaee thee, atah ghar men aarthik pareshaanee bilakul naheen thee aur ab to subhaash kee shaadee ho jaane se ghar men raunak ho jaaegee saath hee maan ko bhee aaraam mil jaaegaa sochate hue svaati saare naam dhyaan se dekhatee jaa rahee thee achaanak use kuch yaad aayaa to maan se pooch baithee-
“maan, soochee men hamaare khaanadaan ke kulaguru kaa to naam hee naheen hai, kyaa unhen nimantran patr naheen bhejaa gayaa?”
-naheen, mainne isakee aawashyakataa naheen samajhee
“par kyon maan! hamaare khaanadaan men to yah puraanee paranparaa hai, kisee bhee shaadee men sabase pahale unako nimantran jaataa hai aur chaachaajee logon ke to sabhee bachchon kee shaadee men we aate rahe hain phir aap? meree shaadee ke samay to alag baat thee, pitaajee ko gujare teen maheene hee hue the lekin is baar to unako bulaanaa chaahie thaa n! chaachaajee log kyaa sochenge?”
-we chaahe jo sochen betee, waise alag hone ke baad ham log kisee ke nijee kaaryon men hastakshep naheen karate
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-betee, yah bahut lanbee kahaanee hai kabhee phursat men sunaaoongee abhee bahut se kaam baakee hain
svaati ne maan ke gale men bahan daalakar manuhaar karate hue kahaa-
“kaam kee chintaa kyon karatee ho maan, main hoon n”!
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lekin andheraa ghirane ke baawajood jab main neeche naheen gaee to ek baar phir bulaane aaeen aur taiyaar karawaakar saath men le gaeen gurudew mujhe kanakhiyon se dekhate rahe unakee nazaron men pashchaataap kaa koee chihn naheen thaa, balki dhithaaee se bole-
-aao bhaktin, satsang sunakar tumhaaraa saaraa kasht door ho jaaegaa
mainne aagney driishti se unako dekhaa aur khoon kaa ghoont peekar chupachaap ek kone men baith gaee
“bhaktinon, main ab aapako shreekriishn ke jeewanakaal kaa ek chotaa saa rochak prasang sunaa rahaa hoon dhyaan se sunie”
kahate hue gurudew ne mujhe tirachee nazar se ek baar dekhaa aur kahanaa shuroo kiyaa-
“ek baar shreekriishn graamawaasiyon ke saath yamunaa paar jaanaa chaahate the lekin nadee baaढ़ se uphan rahee thee aur wahaan koee naawik n dekhakar unhonne dhyaan lagaakar nadee se praarthanaa kee ki he maiyaa! agar mainne apane jeewan-kaal men ek patnee ke alaawaa kisee stree ko chooaa tak n ho to mujhe in graamawaasiyon ke saath us paar jaane kaa raastaa dekar upakriit karo unake wachan sunakar nadee ekadam sookh gaee aur raastaa paakar sab us paar pahunch gae
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-samarath kahun nahin doshu gosaaeen
rabi paawak surasari kee naaeen
arthaat soory, agni aur gangaajee kee bhaanti samarth ko koee dosh naheen lagataa”
betee! yah pauraanik kissaa saty hai yaa kapol kalpanaa, main naheen jaanatee, sabhee bhaktinen andh-shraddhaa men doobee hueen aankhen moonde utsaah poorvak prasang sun rahee theen lekin meree aankhen khul chukee theen, apane krodh ke aaweg ko naheen rok sakee aur uthakar wahaan se apane kamare men chalee gaee
raat bhar neend naheen aaee, man men dvandv chalataa rahaa ki jo insaan mahaakawiyon dvaaraa aadikaaleen yugapurushon kee jeewanee par rache gae granthon kaa saar chodakar apanaa svaarth saadhane hetu asaar grahan karake aasuree aacharan kaa waran kar lete hain, we kyaa samarth kahalaane laayak bhee hain? kyaa anashvar daiweey shaktiyon, agni, soory, saritaa yaanee jal, jinake binaa jeewan hee sanbhaw naheen, se is nashvar sansaaree purushon kee tulanaa kee jaa sakatee hai? samarth to wahee ho sakate hain n, jo apane gunon kee sugandh chaturdish phailaate rahate hain aur unako kupit karane ke doshee bhee maanaw hee to hain, jo kudarat ko chedakar apanee saamarthy kaa pradarshan karate hain aise asuron ne sad-granthon ko bhee dooshit karane men koee kasar naheen chodee
mainne is ghatanaa kaa jikr pati se naheen kiyaa, n jaane unakee kyaa pratikriyaa hotee, aakhir kaliyugeen paribhaashaa ke anusaar we bhee to samarth-purush? hee the n!we kyaa saare purush shaayad samarth hain, asamarth to main thee, ek stree, jisakee wyathaa sunane waalaa koee naheen thaa us raat mujhe aisaa bukhaar chढ़aa ki kaee din tak bistar par padee rahee wiwaah kaaryakram men bhee shaamil naheen huee andar hee andar ek dard saalataa rahaa lekin kisase saajhaa karatee? pati chintit the ki achaanak mujhe kyaa ho gayaa
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lekin baat yaheen khatm naheen huee niyati ne mujhe pati kee nazaron men nirdosh saabit karane kee wyawasthaa bhee kar dee thee unake jaane ke baad jab mainne unake saare kapade gareebon men baantane ke lie ekatr kie to wo puraane kapadon kaa baig bhee kholaa aur ek baar phir mere haath men wahee daayaree thee udaas man se kholakar pढ़ne lagee to sabase neeche ant men kuch shabd alag likhe hue the jo mere n hokar nishchit hee tumhaare pitaa ke the neeche tithi bhee kuch hee maheene pahale kee daalee huee thee, likhaa thaa-
"sunayanaa, tumane kaise itanaa dard apane seene men sametakar itane saal nikaal lie tum apane dukh kaa saajheedaar mujhe kyon naheen banaa sakee, jabaki tumhaaraa aparaadhee to main thaa yah to ittaphaak se tumhaaree anupasthiti men kaam waalaa ladakaa puraane kapade lene aayaa jise shaayad tumane bulaayaa thaa mainne sochaa main hee use kapade de detaa hoon aur yah baig tatolane par daayaree mere haath lag gaee phir mainne ladake ko doosare din aane ke lie kahakar daayaree usee jagah rakhakar baig waapas rakh diyaa dekhanaa thaa ki aakhir tum kab mujhe is laayak samajhogee dukh kewal is baat kaa hai ki tum mujhapar wishvaas naheen kar sakee khair tumane meree aankhen khol dee hain, yah achchaa huaa ki tum us narapashu ke changul se bach nikalee, waranaa main svayan ko kabhee maaph naheen kar sakataa
mainne tay kiyaa hai ki aaj ke baad hamaare paariwaarik wiwaahotsaw men kabhee kulaguru ko naheen bulaayaa jaaegaa is apang paranparaa kee lakeer peetate hue khud chot khaate rahane ke bajaay main isapar hameshaa ke lie lakeer kheenchataa hoon, taaki aise paap-prasangon kee punaraavriitti kam se kam hamaare khaanadaan men n ho
-tumhaaraa sudesh, jise tum apanaa naheen samajh sakee"
-kalpanaa raamaanee
सुनो माँ...! मुझे जल्दी से उन सब नामों की सूची दे दो जिनको आरआर-पत्र भेजने हैं। स्वाति ने माँ को आवाज़ लगाते हुए कहा। रसोई में व्यस्त सुनयना ने जल्दी से हाथ धोए और अलमारी से सूची वाली कॉपी निकालकर बेटी को दे दी।
स्वाति अपने छोटे भाई की शादी में शामिल होने के लिए १५ दिन पहले ही मायके आ गई है ताकि शादी की तैयारियों में माँ का हाथ बँटा सके। रिश्तेदारों को तो माँ ने काफी पहले ही अपने जेठ को मनुहार करके कार्ड भिजवा दिये थे, केवल स्थानीय मित्र व परिचित रह गए थे जिन्हें कार्ड भेजने थे। स्वाति ने पहले चिन्हित नामों को पढ़ना शुरू किया कि कहीं गलती से कोई रिश्तेदार छूट न गया हो। आखिर पिता की अचानक मृत्यु के बाद माँ नितांत अकेली हो गई थी। चूँकि पिताजी एक बैंक में सरकारी नौकर थे, तो उनके स्थान पर उसके भाई सुभाष को नौकरी मिल गई थी, अतः घर में आर्थिक परेशानी बिलकुल नहीं थी और अब तो सुभाष की शादी हो जाने से घर में रौनक हो जाएगी साथ ही माँ को भी आराम मिल जाएगा। सोचते हुए स्वाति सारे नाम ध्यान से देखती जा रही थी। अचानक उसे कुछ याद आया तो माँ से पूछ बैठी-
“माँ, सूची में हमारे खानदान के कुलगुरु का तो नाम ही नहीं है, क्या उन्हें निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया?”
-नहीं, मैंने इसकी आवश्यकता नहीं समझी..
.“पर क्यों माँ! हमारे खानदान में तो यह पुरानी परंपरा है, किसी भी शादी में सबसे पहले उनको निमंत्रण जाता है और चाचाजी लोगों के तो सभी बच्चों की शादी में वे आते रहे हैं फिर आप...? मेरी शादी के समय तो अलग बात थी, पिताजी को गुजरे तीन महीने ही हुए थे लेकिन इस बार तो उनको बुलाना चाहिए था न! चाचाजी लोग क्या सोचेंगे?”
-वे चाहे जो सोचें बेटी, वैसे अलग होने के बाद हम लोग किसी के निजी कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते।
“लेकिन माँ, कुलगुरु को न बुलाने का क्या कारण है”?
-बेटी, यह बहुत लंबी कहानी है कभी फुर्सत में सुनाऊँगी। अभी बहुत से काम बाकी हैं।
स्वाति ने माँ के गले में बहन डालकर मनुहार करते हुए कहा-
“काम की चिंता क्यों करती हो माँ, मैं हूँ न”!
बेटी की ज़िद के आगे हार मानते हुए सुनयना ने अपनी यादों की गठरी की गाँठ खोल ही दी। खुली हवा पाकर उसमें तह करके रखे हुए उसके जीवन के पुराने पृष्ठ सहसा फड़फड़ाने लगे और उन्हें समेटते हुए उसने क्रमशः बंधन मुक्त करना शुरू किया-
-बेटी, कहानी तब की है जब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था। मैं शादी करके सपनों के हिंडोले पर सवार होकर नई-नई ससुराल आई थी। सास-ससुर, दो जेठ, उनके दो-दो बच्चे, हम दोनों, एक देवर और एक छोटी ननद, कुल मिलाकर १२ सदस्यों का साझा परिवार था। रेडीमेड वस्त्रों की एक अच्छी दुकान थी। दोनों बड़े भाई पढ़ाई में रुचि न होने से ११ वीं के बाद अपने पिता के साथ दुकान का कार्य सँभालने लगे, लेकिन तुम्हारे पिताजी की रुचि पढ़ने में थी और पढ़ाई में तेज़ भी थे तो उन्होने पढ़ाई नहीं छोड़ी। ग्रेजुएशन के बाद उनकी शहर के एक बैंक में नौकरी भी लग गई। कुछ समय बाद ससुर जी का दुकान पर जाना कम होता गया और सारा काम दोनों भाइयों ने सँभाल लिया। लगभग एक साल बाद ही देवर की शादी का कार्यक्रम तय हो गया। इस अवसर पर खानदान की परंपरा के अनुसार सबसे पहले घर का कोई सदस्य उपहार लेकर कुलगुरु को उनके शहर जाकर मनुहार के साथ विवाह में एक सप्ताह पहले आने की मनुहार करके निमंत्रण-पत्र देकर आता है। बड़े भाइयों को दुकानदारी से फुर्सत न होने से कहीं भी आने-जाने के कार्य तुम्हारे पिता ही करते थे, इस बार भी वे ही कुलगुरु को निमंत्रण पत्र दे आए। वे उनकी विद्वता का गुणगान करते नहीं अघाते थे। मैंने अपने विवाह के समय उनको देखा ज़रूर था लेकिन उनसे परिचित नहीं थी, और विवाह बाद वे शीघ्र ही चले गए थे तो मेरा ध्यान भी इतने मेहमानों में नहीं गया था। अब मैं फिर से उन्हें देखने को उत्सुक हो उठी थी।
विवाह-कार्यक्रम में उनके आगमन के दो दिन पहले से ही घर में उत्साह की लहर दौड़ गई थी सबके चेहरे खिले-खिले थे और उनके स्वागत की तैयारियों में दोनों बड़ी बहुओं के साथ मैं भी लगी हुई थी। आखिर नियत समय पर गुरुदेव अपने ताम-झाम के साथ आ पहुँचे। मैं उनके व्यक्तिव से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। सबके साथ मैंने भी प्रणाम करके आशीर्वाद लिया। उनके आने से घर का नक्शा ही बदल गया। चूँकि दोनों बड़े भाई दुकानदारी में तथा पत्नियाँ बच्चों में व्यस्त थे, तो उनकी सेवा की ज़िम्मेदारी हम दोनों पति-पत्नी को सौंप दी गई। ऊपर की मंज़िल में सभी भाइयों के कमरे एक कतार में थे और अंत में एक बड़ा सा हालनुमा कमरा मेहमानों के लिए था। इसी कमरे में उनके रहने की व्यवस्था की गई। सुबह ५ बजे ही उनकी दिनचर्या शुरू होने के साथ ही हम दोनों को उनकी सेवा में हाजिर होना पड़ता था। खानपान से लेकर उनकी हर छोटी-बड़ी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता। तुम्हारे पिता मुझे उनकी सेवा की हिदायत देकर १० बजे अपने दफ्तर चले जाते। उनके आने तक गुरुदेव के चाय-नाश्ते, भोजन पानी और आराम का पूरा ध्यान रखना मेरे जिम्मे था। पहले दिन ही भोजन के बाद देर रात तक हम पति-पत्नी उनके हाथ पाँव दबाते रहे। जबकि पति का आगे रहकर किसी पर-पुरुष के पाँव दबवाना मुझे सर्वथा अनुचित और अंध-श्रद्धा के अलावा कुछ नहीं लगता था लेकिन पति के भक्ति-भाव के आगे मुँह खोलना उचित नहीं था, आखिर मैं उन्हें जानती ही कितना थी।
गुरुदेव घर की हर महिला को भक्तिन कहकर संबोधित करते थे। मैं जब भी उनके कमरे में जाती, वे कहते-
“भक्तिन तुममें गुरु के प्रति वो श्रद्धा नहीं है जो तुम्हारे पति में है”।
मैं डर जाती कि कहीं वे मेरी शिकायत पति से न कर दें। वे गुरुदेव की अनदेखी बिलकुल सहन नहीं कर सकते थे, यह उनकी बार बार मुझे दी गई हिदायत से स्पष्ट हो गया था, वे मुझे बहुत प्यार करते थे उनका लेकिन गुस्सा भी बहुत तेज़ था। मैं बहुत सीधी थी, उनकी कोई बात काटने या विरोध करने का साहस मुझे मुझमें बिलकुल नहीं था, वे कहते- गुरु-सेवा सबसे बड़ा पुण्य है। मैं कोई जवाब न देती, केवल सिर झुका देती।
पाँच दिन तक प्रतिदिन शाम को दो घंटे उनके प्रवचन और सत्संग का कार्यक्रम होना था उसके लिए सबसे बड़े हॉल में व्यवस्था की गई थी। इस समय केवल घर और पड़ोस की महिलाएँ ही एकत्र होती थीं, फिर मर्द देर से आकर कुछ समय शामिल होते थे। अधिकतर प्रसंग श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन पर ही आधारित होते, और हम सब आनंदित होकर सुना करतीं। इस तरह चार दिन व्यतीत हो गए। पाँचवें दिन जब सारे काम निपटाकर उनको दोपहर का भोजन देने गई तो उन्होंने खाना टेबल पर रखवा दिया और कहा-
“भक्तिन, आज हाथ पैर बहुत दर्द कर रहे हैं, अगर थोड़ी देर दबा दो तो कुछ आराम हो जाएगा”।
मैं असमंजस में पड़ गई। पति का साथ मजबूरी में देती थी। वे अपने पास बिठाकर कहते,
“सुनयना, गुरुदेव का एक पैर तुम दबाओ एक मैं दबाता हूँ। गुरु से कैसा संकोच”?
लेकिन उनकी अनुपस्थिति में... मेरी परेशानी शायद वे भाँप गए बोले
- अगर तुम्हारा मन नहीं है भक्तिन, तो कोई बात नहीं...
मैं साफ इंकार नहीं कर सकी और कुर्सी पलंग के पास खींचकर उनका पाँव दबाने लगी। कुछ देर में उन्होंने दूसरा पाँव दबाने के लिए पलंग के ऊपर दूसरी तरफ बैठने का इशारा किया। मैं चुपचाप सिमटकर ऊपर बैठकर दूसरा पाँव दबाने लगी। फिर उन्होंने सिर दबाने के लिए कहा। उनकी आँखें मुँदी हुईं देखकर मैं वहीं सरककर उनका सिर दबाने लगी। सिर दबाते हुए मेरी धड़कनें तेज़ हो गई थीं, मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि शीघ्र मुक्त हो जाऊँ। चूँकि मेरा कमरा सबके अंत में हाल से लगा हुआ होने से किसी के उस तरफ आने की कोई संभावना नहीं थी, तो मेरा डरना भी स्वाभाविक था। जब मैंने कहा- गुरुदेव अब आप भोजन करके आराम कीजिये तो वे उठकर बैठ गए। बोले अभी मन नहीं है भक्तिन और अपने बैग से एक डिबिया से लौंग-इलायची लेकर अपने मुँह में डाल ली और एक मुझे देते हुए कहा- यह मुँह में डाल लो, गुरु का प्रसाद है। लौंग इलायची मुँह में डालते ही मुझे अचानक घबराहट सी होने लगी और आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। जैसे ही मैं पलंग से नीचे उतरने लगी तो हाथ पैर लड़खड़ा गए और उन्होंने मुझे खींचकर अपने आलिंगन में ले लिया। उनका यह रूप देखकर तो मेरे होश उड़ गए, अगर चिल्लाती तो न जाने घर वाले और पति क्या सोचते, शुभ कार्य के रंग में भंग पड़ जाता वो अलग, अतः अपनी पूरी ताकत से खुद को छुड़ाकर भागी और अपने कमरे में जाकर फफककर रो पड़ी। गनीमत यह थी कि बाहर निकलते हुए मुझपर किसी की नज़र नहीं पड़ी।
शाम होने पर जब नीचे नहीं गई तो जेठानी बुलाने आ गई कि चलो सत्संग शुरू हो चुका है। मेरे मन में अब गुरुदेव के प्रति वितृष्णा का भाव पैदा हो गया था और सब ढोंग लग रहा था, बोली-
“भाभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं नीचे नहीं आ पाऊँगी”। लेकिन उन्होंने बड़े प्यार से कहा-
-“सुनयना, आज सत्संग का अंतिम दिन है, भजन-कीर्तन देर तक चलेगा। कुछ देर आराम कर लो फिर थोड़ी देर के लिए आ जाना”।
लेकिन अँधेरा घिरने के बावजूद जब मैं नीचे नहीं गई तो एक बार फिर बुलाने आईं और तैयार करवाकर साथ में ले गईं। गुरुदेव मुझे कनखियों से देखते रहे। उनकी नज़रों में पश्चाताप का कोई चिह्न नहीं था, बल्कि ढिठाई से बोले-
-आओ भक्तिन, सत्संग सुनकर तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा।
मैंने आग्नेय दृष्टि से उनको देखा और खून का घूँट पीकर चुपचाप एक कोने में बैठ गई।
“भक्तिनों, मैं अब आपको श्रीकृष्ण के जीवनकाल का एक छोटा सा रोचक प्रसंग सुना रहा हूँ। ध्यान से सुनिए”।
कहते हुए गुरुदेव ने मुझे तिरछी नज़र से एक बार देखा और कहना शुरू किया-
“एक बार श्रीकृष्ण ग्रामवासियों के साथ यमुना पार जाना चाहते थे। लेकिन नदी बाढ़ से उफन रही थी और वहाँ कोई नाविक न देखकर उन्होंने ध्यान लगाकर नदी से प्रार्थना की कि हे मैया! अगर मैंने अपने जीवन-काल में एक पत्नी के अलावा किसी स्त्री को छूआ तक न हो तो मुझे इन ग्रामवासियों के साथ उस पार जाने का रास्ता देकर उपकृत करो। उनके वचन सुनकर नदी एकदम सूख गई और रास्ता पाकर सब उस पार पहुँच गए।
तो भक्तिनों, यह बात तो सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने एकाधिक विवाह किए थे। उनकी ८ पटरानियाँ और १६००० अन्य रानियाँ थीं, लेकिन यमुना मैया ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया। इसीलिए तो रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने कहा है-
-समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।
रबि पावक सुरसरि की नाईं॥
अर्थात सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कोई दोष नहीं लगता”
बेटी! यह पौराणिक किस्सा सत्य है या कपोल कल्पना, मैं नहीं जानती, सभी भक्तिनें अंध-श्रद्धा में डूबी हुईं आँखें मूँदे उत्साह पूर्वक प्रसंग सुन रही थीं लेकिन मेरी आँखें खुल चुकी थीं, अपने क्रोध के आवेग को नहीं रोक सकी और उठकर वहाँ से अपने कमरे में चली गई।
रात भर नींद नहीं आई, मन में द्वंद्व चलता रहा कि जो इंसान महाकवियों द्वारा आदिकालीन युगपुरुषों की जीवनी पर रचे गए ग्रन्थों का सार छोड़कर अपना स्वार्थ साधने हेतु असार ग्रहण करके आसुरी आचरण का वरण कर लेते हैं, वे क्या समर्थ कहलाने लायक भी हैं? क्या अनश्वर दैवीय शक्तियों, अग्नि, सूर्य, सरिता यानी जल, जिनके बिना जीवन ही संभव नहीं, से इस नश्वर संसारी पुरुषों की तुलना की जा सकती है? समर्थ तो वही हो सकते हैं न, जो अपने गुणों की सुगंध चतुर्दिश फैलाते रहते हैं और उनको कुपित करने के दोषी भी मानव ही तो हैं, जो कुदरत को छेड़कर अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करते हैं। ऐसे असुरों ने सद-ग्रन्थों को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
मैंने इस घटना का जिक्र पति से नहीं किया, न जाने उनकी क्या प्रतिक्रिया होती, आखिर कलियुगीन परिभाषा के अनुसार वे भी तो समर्थ-पुरुष? ही थे न!...वे क्या सारे पुरुष शायद समर्थ हैं, असमर्थ तो मैं थी, एक स्त्री, जिसकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं था। उस रात मुझे ऐसा बुखार चढ़ा कि कई दिन तक बिस्तर पर पड़ी रही। विवाह कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हुई। अंदर ही अंदर एक दर्द सालता रहा। लेकिन किससे साझा करती? पति चिंतित थे कि अचानक मुझे क्या हो गया।
आखिर मैंने अपना पूरा दर्द एक डायरी में लिखकर उसे अपनी अलमारी में पुराने कपड़ों के बैग में सबसे नीचे यह सोचकर छिपा दिया कि समय आने पर पति को सौंप दूँगी। लेकिन बेटी, वो समय उनके जीवनकाल में कभी नहीं आया, और वे असमय ही काल के गाल में समा गए। अब तो मैं एक और अपराध-बोध लेकर जीने को विवश थी कि मैं उनको अपने मन की बात नहीं बता सकी।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। नियति ने मुझे पति की नज़रों में निर्दोष साबित करने की व्यवस्था भी कर दी थी। उनके जाने के बाद जब मैंने उनके सारे कपड़े गरीबों में बाँटने के लिए एकत्र किए तो वो पुराने कपड़ों का बैग भी खोला और एक बार फिर मेरे हाथ में वही डायरी थी। उदास मन से खोलकर पढ़ने लगी तो सबसे नीचे अंत में कुछ शब्द अलग लिखे हुए थे जो मेरे न होकर निश्चित ही तुम्हारे पिता के थे। नीचे तिथि भी कुछ ही महीने पहले की डाली हुई थी, लिखा था-
"सुनयना, तुमने कैसे इतना दर्द अपने सीने में समेटकर इतने साल निकाल लिए। तुम अपने दुख का साझीदार मुझे क्यों नहीं बना सकी, जबकि तुम्हारा अपराधी तो मैं था। यह तो इत्तफाक से तुम्हारी अनुपस्थिति में काम वाला लड़का पुराने कपड़े लेने आया जिसे शायद तुमने बुलाया था। मैंने सोचा मैं ही उसे कपड़े दे देता हूँ और यह बैग टटोलने पर डायरी मेरे हाथ लग गई। फिर मैंने लड़के को दूसरे दिन आने के लिए कहकर डायरी उसी जगह रखकर बैग वापस रख दिया। देखना था कि आखिर तुम कब मुझे इस लायक समझोगी। दुख केवल इस बात का है कि तुम मुझपर विश्वास नहीं कर सकी। खैर... तुमने मेरी आँखें खोल दी हैं, यह अच्छा हुआ कि तुम उस नरपशु के चंगुल से बच निकली, वरना मैं स्वयं को कभी माफ नहीं कर सकता।
मैंने तय किया है कि आज के बाद हमारे पारिवारिक विवाहोत्सव में कभी कुलगुरु को नहीं बुलाया जाएगा। इस अपंग परंपरा की लकीर पीटते हुए खुद चोट खाते रहने के बजाय मैं इसपर हमेशा के लिए लकीर खींचता हूँ, ताकि ऐसे पाप-प्रसंगों की पुनरावृत्ति कम से कम हमारे खानदान में न हो।
-तुम्हारा सुदेश, जिसे तुम अपना नहीं समझ सकी।"
-कल्पना रामानी