कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ८२ / ११४ № 82 of 114 रचना ८२ / ११४
३० अक्तूबर २०१९ 30 October 2019 ३० अक्तूबर २०१९

माँ के लिए maan ke lie माँ के लिए

अपनी पत्नी व बच्चों के साथ दीपावली की ख़रीदारी के लिए कई घंटों से निकले परेश की नज़रें माल में अचानक कपड़ों के एक स्टाल पर टंगी हुई सुंदर सी साड़ी पर ठहर गईं। उसने पत्नी को आवाज़ देकर बुलाया और पूछा-

“सुधा डियर, यह साड़ी तुम्हारी माँ के ऊपर कैसी लगेगी”?

- अरे वाह! बहुत सुंदर साड़ी है, यह कलर तो ममा को बहुत पसंद है खूब फबेगा उनके ऊपर, लेकिन तुम उन्हें यह साड़ी किस अवसर पर देने वाले हो? उनसे मिले हुए भी काफी समय गुज़र गया है।

“लेकिन डियर! मैं यह साड़ी अपनी माँ के लिए खरीद रहा हूँ, बस ज़रा तय नहीं कर पा रहा था। अब जल्दी घर चलो वे इंतज़ार कर रही होंगी, उन्हें डॉक्टर के पास भी लेकर जाना है”।

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apanee patnee w bachchon ke saath deepaawalee kee kareedaaree ke lie kaee ghanton se nikale paresh kee nazaren maal men achaanak kapadon ke ek staal par tangee huee sundar see saadee par thahar gaeen usane patnee ko aawaaz dekar bulaayaa aur poochaa-

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“sudhaa diyar, yah saadee tumhaaree maan ke oopar kaisee lagegee”?

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- are waah! bahut sundar saadee hai, yah kalar to mamaa ko bahut pasand hai khoob phabegaa unake oopar, lekin tum unhen yah saadee kis awasar par dene waale ho? unase mile hue bhee kaaphee samay guzar gayaa hai

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“lekin diyar! main yah saadee apanee maan ke lie khareed rahaa hoon, bas zaraa tay naheen kar paa rahaa thaa ab jaldee ghar chalo we intazaar kar rahee hongee, unhen dॉktar ke paas bhee lekar jaanaa hai”

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अपनी पत्नी व बच्चों के साथ दीपावली की ख़रीदारी के लिए कई घंटों से निकले परेश की नज़रें माल में अचानक कपड़ों के एक स्टाल पर टंगी हुई सुंदर सी साड़ी पर ठहर गईं। उसने पत्नी को आवाज़ देकर बुलाया और पूछा-

“सुधा डियर, यह साड़ी तुम्हारी माँ के ऊपर कैसी लगेगी”?

- अरे वाह! बहुत सुंदर साड़ी है, यह कलर तो ममा को बहुत पसंद है खूब फबेगा उनके ऊपर, लेकिन तुम उन्हें यह साड़ी किस अवसर पर देने वाले हो? उनसे मिले हुए भी काफी समय गुज़र गया है।

“लेकिन डियर! मैं यह साड़ी अपनी माँ के लिए खरीद रहा हूँ, बस ज़रा तय नहीं कर पा रहा था। अब जल्दी घर चलो वे इंतज़ार कर रही होंगी, उन्हें डॉक्टर के पास भी लेकर जाना है”।

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗