कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ८३ / ११४ № 83 of 114 रचना ८३ / ११४
३० अक्तूबर २०१९ 30 October 2019 ३० अक्तूबर २०१९

रोटी के लिए rotee ke lie रोटी के लिए

“बेटे तनिक मेरी बात सुनो, ये दिन तुम्हारे स्कूल जाने के हैं, सुबह-सुबह यह कचरा बीनने का काम क्यों कर रहे हो?”

कंधे पर मैला सा झोला टाँगे, घूरे से कबाड़ छाँटते बालक को देखकर उस समाजसेवी के प्रातः-भ्रमण करते हुए पैरों को जैसे ब्रेक लग गया.

“स्कूल जाकर क्या करूँगा बाबूजी?”

“स्कूल जाओगे तो पढ़-लिख कर अच्छी कमाई के साथ अच्छे इंसान भी बन सकोगे.”

“क्या वहाँ रोटी भी मिलती है?”

“हाँ हाँ, तुम्हें वहाँ किताबें, कपड़े और भोजन भी मुफ्त मिलेगा.”

“फिर तो मुझे अभी स्कूल ले चलो बाबूजी, मेरी माँ बहुत बीमार है, दो दिन से काम पर नहीं गई तो घर में रोटी नहीं बनी, मैं अपनी माँ के लिए भी रोटी ले जाऊँगा” झोला वहीँ पटकते हुए बालक ने भोलेपन से कहा.”

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“bete tanik meree baat suno, ye din tumhaare skool jaane ke hain, subah-subah yah kacharaa beenane kaa kaam kyon kar rahe ho?”

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kandhe par mailaa saa jholaa taange, ghoore se kabaad chaantate baalak ko dekhakar us samaajasewee ke praatah-bhraman karate hue pairon ko jaise brek lag gayaa

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“skool jaakar kyaa karoongaa baaboojee?”

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“skool jaaoge to pढ़-likh kar achchee kamaaee ke saath achche insaan bhee ban sakoge”

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“kyaa wahaan rotee bhee milatee hai?”

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“haan haan, tumhen wahaan kitaaben, kapade aur bhojan bhee mupht milegaa”

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“phir to mujhe abhee skool le chalo baaboojee, meree maan bahut beemaar hai, do din se kaam par naheen gaee to ghar men rotee naheen banee, main apanee maan ke lie bhee rotee le jaaoongaa” jholaa waheen patakate hue baalak ne bholepan se kahaa”

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“बेटे तनिक मेरी बात सुनो, ये दिन तुम्हारे स्कूल जाने के हैं, सुबह-सुबह यह कचरा बीनने का काम क्यों कर रहे हो?”

कंधे पर मैला सा झोला टाँगे, घूरे से कबाड़ छाँटते बालक को देखकर उस समाजसेवी के प्रातः-भ्रमण करते हुए पैरों को जैसे ब्रेक लग गया.

“स्कूल जाकर क्या करूँगा बाबूजी?”

“स्कूल जाओगे तो पढ़-लिख कर अच्छी कमाई के साथ अच्छे इंसान भी बन सकोगे.”

“क्या वहाँ रोटी भी मिलती है?”

“हाँ हाँ, तुम्हें वहाँ किताबें, कपड़े और भोजन भी मुफ्त मिलेगा.”

“फिर तो मुझे अभी स्कूल ले चलो बाबूजी, मेरी माँ बहुत बीमार है, दो दिन से काम पर नहीं गई तो घर में रोटी नहीं बनी, मैं अपनी माँ के लिए भी रोटी ले जाऊँगा” झोला वहीँ पटकते हुए बालक ने भोलेपन से कहा.”

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗