कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ९९ / ११४ № 99 of 114 रचना ९९ / ११४
३० सितम्बर २०२० 30 September 2020 ३० सितम्बर २०२०

प्रलय से परिणय तक pralay se parinay tak प्रलय से परिणय तक

### अध्याय 1

प्रिय पाठको

गीत, ग़ज़ल, छंद, लघुकथाएँ और कहानियों को पाठकों का अपार स्नेह मिलने के बाद उपन्यास लेखन की इच्छा मन में बलवती होती गई और लम्बे समय के बाद अंततः मेरा यह सपना भी पूर्ण हुआ और मेरा यह प्रथम उपन्यास धारावाहिक रूप में आपके सम्मुख है. यह कहानी दो अनाथ प्रेमियों के अनायास मिलने बिछुड़ने और पुनर्मिलन तक संघर्ष की है. यह उपन्यास एक बार पढने के बाद आप बार बार पढना चाहेंगे. आशा है इसे भी आप सबका स्नेह अवश्य मिलेगा।

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प्रलय से परिणय तक-  1

अध्याय १

बरसात का मौसम था और आगरा शहर में प्रतिदिन कम अधिक वर्षा होती ही रहती थी। अधिक वर्षा होती तो स्कूल की भी छुट्टी हो जाती थी। पिछले सप्ताह भी लगातार भारी वर्षा के कारण स्कूल बंद थे मगर इस सप्ताह के प्रारंभ में ही बिखरे-बिखरे बादल आसमान में सूर्य के साथ आँख मिचौली खेलने लगे थे।

शहर के एक मिशनरी स्कूल की पहली कक्षा के छात्र अमन की माँ प्रमिला ने उसे कुनकुने पानी से नहलाकर स्कूल की यूनीफोर्म में तैयार किया और गले में परिचय-पत्र लटकाकर बाहरी बरामदे में खेलने को कह दिया। फिर घड़ी पर नज़र डाली तो देखा अभी अमन की स्कूल बस आने में काफी देर है। उसके लिए दूध-नाश्ते के साथ ही रसोई के कुछ और कार्य भी हो जाएँगे, यह सोचकर वो रसोई में पहुँच गई। इधर अमन मुख्य द्वार के बाहर बाजू में बने गैराज में रखी हुई कार के आसपास ऊपर लटकते हुए चिड़ियों के घोंसले देखने में व्यस्त हो गया। ये लटकते हुए घोंसले उसके पापा ने मुख्य छत से कुछ नीचे बनी गैराज की छत के कंगूरों से जोड़कर विशेषकर चिड़ियों के लिए ही बनवाए थे। अमन को इन घोंसलों में चिड़ियों को आते जाते देखना बहुत अच्छा लगता था।

प्रमिला ने कुछ कार्य निपटाकर एक प्यार भरी नज़र कमरे में सोते हुए पति पर डाली। अभी प्रखर के उठने में काफ़ी देर है। उसका दफ्तर के लिए निकलने का समय १० बजे होता है अतः वो आराम से आठ बजे के बाद ही उठता है, तब तक अमन जा चुका होता है। फिर कुछ राहत महसूस करती हुई प्रमिला प्रखर और अपने लिए चाय-नाश्ता बनाने में जुट जाती है। प्रखर के भी कम नखरे नहीं होते, वो अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी पूरी तरह पूरी तरह प्रमिला पर निर्भर रहता है। प्रमिला को भी उसके नखरे उठाने में आनंद की ही अनुभूति होती है। उसके विचार में वो पत्नी ही कैसी जिसमें पति के प्रति समर्पण की भावना न हो। यही तो प्यार का असली रूप होता है... और वो प्यार भी कैसा जो प्रतिदान माँगे! फिर प्रमिला को तो बिना माँगे ही सब मिल जाता था... और अगर पति-पत्नी के विचार, जीवन-शैली अथवा आवश्यकताएँ कुछ अंतर न रखती हों,  आपसी नोक-झोंक ही न हो तो वैवाहिक जीवन का रस ही न निचुड़ जाए...!

अभी उसे पति के लिए नाश्ता,  फिर टिफिन के लिए खाना भी बनाना है। वो तो ठीक मगर क्या बनाना होगा यह निर्णय लेना भी कम जान खाऊ नहीं। हर सब्जी को देख परख कर वो कैसे सप्ताह भर के लिए फ्रिज में व्यवस्थित करती है यह उसके अलावा कौन समझ सकता है?

अमन के लिए क्या बनाए कि देखते ही प्यार से उससे चिपककर प्लेट में वो चीज़ और रखने की जिद करे या,  पतिदेव मनपसंद खाना खाकर प्रशंसनीय नज़रों से उसे निहारेंगे तो वो कैसे इस असीम सुख को आत्मसात करने का लोभ छोड़ सकती है।

शास्त्रों ने यों ही तो नारी के त्याग-बलिदान का इतना गुणगान नहीं किया। आज अगर महिला-वर्ग इसे पुरुषों की कुटिल चाल अथवा स्त्रियों के शोषण का नाम देता है तो यह उसकी भूल ही कहलाएगी। देने का आनंद केवल गृहिणी ही नहीं गृहस्वामी भी जानते हैं, तभी तो पत्नी और बच्चों के लिए उपहार लाते समय खुद को नज़रंदाज़ कर देते हैं!

खैर,  उसे तो अभी जाकर पतिदेव को नींद से जगाना है। यह जगाना भी पल-दो पल का कार्य नहीं बल्कि लम्बी चौड़ी रूपरेखा के अंतर्गत होता है।

प्रथम तो प्यार से जनाब के बालों में उंगलियाँ फिराते हुए कुछ मिनिट सहलाने के बाद उठने के लिए तैयार करना फिर हाँ-हूँ करते हुए जनाब जब तक आधा घंटा वाशरूम में बिताकर सोफे पर डट जाएँ, तब तक चाय बिस्किट के साथ ही टेबल पर ताजा अखबार और टी वी का रिमोट भी उपलब्ध होना चाहिए अन्यथा बात नहीं बनती।

पर इसके साथ ही उसे भी उसकी बगल में बैठकर चुस्कियाँ लेनी होती हैं। चाय भी प्रखर को अदरख वाली पतली और कड़क चाहिए तो उसे अधिक दूध वाली गाढ़ी और हरी इलायची डली हुई...वो सुबह की चाय के साथ कोई समझौता नहीं करती दोनों की पसंद से ही अलग-अलग चाय बनाती है। सुबह के समय शरीर में ऊर्जा तो होती ही है फिर भोजन बनाने तक उसकी कामवाली आ ही जाती है तो सब आराम से निपट जाता है। प्रखर के दफ्तर जाने के बाद उसे  हर काम निपटाकर नहाने धोने से १२ बजे फुर्सत मिलती है। दो बजे अमन वापस आ जाता है तब तक वो अपने घर के ही एक हिस्से में बने ब्यूटी-पार्लर के कार्य में व्यस्त हो जाती है।

वो अमन के आने के बाद एक घंटे के लिए पार्लर बंद रखती है और उसके साथ भोजन करके कुछ देर आराम करने के बाद फिर शाम तक अपने कार्य में लग जाती है। तब तक अमन भी खेलता रहता है और पार्लर बंद करने के बाद प्रखर के आने तक उसका समय अमन के होमवर्क और बातचीत के साथ ही बीतता  है। चूँकि सब्जियाँ सुबह ही बन जाती हैं अतः प्रखर के आने पर गरम रोटियाँ अथवा चावल बनाने ही शेष होते हैं।

विचारों में उलझी प्रमिला का ध्यान जब तब भंग हुआ जब खेलते हुए अमन ने जोर से उसे आवाज़ लगाई-

“मम्मी ...जल्दी आओ, देखो तो कितनी जोर से बरसात हो रही है और वो इत्ती दूर पानी की नदी भी बन गई है...”

प्रमिला चौंककर तुरंत बाहर आई तो बाहर का दृश्य देखकर उसके होश ही फाख्ता हो गए।

“अभी तो आसमान साफ था फिर यह अचानक अन्धकार कैसे छा गया? फिर वो पानी तो घर के पीछे की तरफ से ही आ रहा है। कहीं यमुना में बाढ़ तो नहीं आ गई...? बरसात के मौसम में आगरा में पड़ने वाले यमुना नदी-क्षेत्र में वैसे तो बाढ़ आसानी से नहीं आती लेकिन जब हरियाणा सीमा पर स्थित बाँध से पानी छोड़ा जाता है तो यह शहर भी भयंकर जल-प्रलय की चपेट में आ जाता है। उनकी कोलोनी पर, निचले क्षेत्र में होने से खतरा बना ही रहता है। लेकिन इस बार तो अलर्ट भी नहीं किया गया तो यह...”

वो दहशत में भरकर जोर से प्रखर को आवाजें  लगाने लगी और गैराज में खेलते हुए अमन को लपककर गोद में उठाकर अन्दर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि किसी समुद्री ज्वार की तरह उछलता हुआ पानी गैराज तक आ पहुँचा और क्षण मात्र में ही प्रमिला के घुटनों तक पहुँच गया। प्रमिला पानी के जोर के कारण अमन को लिए हुए वहाँ से निकलने में भी असमर्थ हो गई। हालात बिगड़ते देख उसने अमन को जल्दी से कार के ऊपर धकेल दिया और स्वयं कार के सहारे वहीं खड़ी होकर जोर-जोर से प्रखर को आवाजें लगाने लगी। अमन डर के मारे मम्मी-मम्मी चिल्ला रहा था। पानी अन्दर की तरफ बढ़ता गया और अमन चिल्लाते-चिल्लाते कार के ऊपर ही बेहोश हो गया।

उस दिन यमुना में अचानक आई बाढ़ ने ज्यों बगावत ही कर दी थी। वो अपने सारे तटबंध तोड़कर शायद आगरा के रहवासियों को ज़िन्दगी से रिहा करने की कसम खाकर चली थी। तूफानी बारिश भी जिद पर अड़ी हुई थी कि आज न बरसी तो कब बरसेगी...लोगों की प्रार्थनाओं का उसपर कोई असर नहीं हो रहा था। सभी लोग  घर या बाहर जहाँ भी थे, अपनों की दुश्चिंता सीने में लिए आत्म-रक्षार्थ ऊँचे स्थानों की ओर  दौड़ रहे थे। शीघ्र ही बाढ़ का पानी घरों में ५-५ फुट तक घुस गया। लोग डूबने चिल्लाने लगे। सड़क पर चौपाये अजीबो गरीब आवाजें निकालते हुए इधर उधर भागने लगे। जो बेखबर थे उन्हें बाढ़ ने बिना खबर दिए निगलना शुरू कर  दिया। उस सजे धजे बंगले के अंदरूनी शानदार शयन-कक्ष में सोए हुए अमन के पिता प्रखर को इस विपदा का आभास तक न था।

जब तक प्रमिला की चीख-पुकार उसके कानों में पड़ी तब तक पानी अन्दर घुस चुका था और उसके पलंग से कुछ इंच ही नीचे था। यह दृश्य देखते ही प्रखर के होश उड़ गए।

वो तुरंत गिरता सँभलता आसपास के सामान का सहारा लेते हुए बाहर की ओर भागा और प्रमिला को सीने तक पानी में डूबी हुई देखकर चिल्लाकर उसे दिलासा देते हुए उसकी ओर तेज़ी से बढ़ने लगा मगर दालान की सीढियों से उतरने के प्रयास में पैर फिसल जाने से वहीँ गिर पड़ा।

कहानी जारी रहेगी, आपने उपन्यास का यह भाग पढ़ा, इसके लिए हार्दिक धन्यवाद

इस भाग के लिए अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।😊

### अध्याय 2

अमन को जब होश आया तो स्वयं को एक नाव में कुछ और बच्चे और बड़े लोगों के बीच देखा तो मम्मी ...पापा...पुकारते हुए रोना शुरू कर दिया मगर सुनता कौन...वहाँ सब तो सहमे हुए थे...कुछ देर में एक ऊँचे स्थान की सूखी ज़मीन पर उन सबको उतारकर नाव वापस पलट गई।

रो रोकर अब अमन के आँसू सूख चुके थे। वो हिचकियाँ लेते हुए वहीं सब ''''लोगों के बीच बैठ गया। किसी को पता नहीं था कि उनके परिजन कहाँ हैं? कुछ बताने या राहत देने वाला कोई नहीं था। यह हादसा सुबह-सुबह ही हुआ था। बाद में और भी बहुत से लोगों को वहाँ लाया गया था। वहाँ बैठे बैठे शाम हो गई, बारिश बंद होने से पानी उतरने लगा था। अब सबको भूख-प्यास सताने लगी थी। मगर आगे क्या होगा यह सोचकर सब भयाक्रांत एक दूसरे का मुँह देखते रहे।

तभी ऊपर आसमान में घरघराहट हुई और एक हेलिकोप्टर से वहाँ भोजन के पैकेट गिराए जाने लगे। कुछ बड़े समझदार बुजुर्गों ने सबको शांत रहने का संकेत देते हुए राहत में आया भोजन बाँटना शुरू किया। यह भूख भी इतनी अजीब चीज़ होती है, कि किसी का कितना भी अजीज बिछड़ जाए, उसपर हावी होना नहीं भूलती। यह उसका धर्म-कर्म जो ठहरा...सबने बेमन से थोड़ा-थोड़ा भोजन किया और आगे की सरकारी गतिविधि और अपनों के वहाँ आने का इंतजार करने लगे। कितने लोग अपने परिजन खो चुके हैं यह कोई नहीं जानता था। कितने अबोध बच्चों के सिर  से नीली छतरी वाले ने माँ-पिता रूपी छतरी छीन ली थी इसका किसी को बोध नहीं था।

बाढ़ तो अपनी विनाश लीला दिखाकर वापस चली गई थी मगर उस काली रात के साथ बहुतों की काली रात शुरू हो चुकी थी। नन्हें अमन ने स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर दिया था।

भोजन बाद उन सबको धीरे-धीरे हेलिकोप्टर की सहायता से राहत शिविर में पहुँचाया गया। फिर अगले दिन जिन लोगों के घर सुरक्षित थे और जिनके  परिजन पहुँच गए थे उन्हें वापस भेज दिया गया बाकी कुछ बच्चों को जिन्हें कोई लेने नहीं पहुँचा, अनाथालय भेज दिया गया।

अमन के गले में परिचय पत्र देखकर व्यवस्थापकों ने उसके घर पर संपर्क करना चाहा तो पता चला कि घर सूना पड़ा था और उसके माँ-पिता लापता थे। आगरा के अनाथालय भर जाने के कारण अगले दिन उसे एक प्राइवेट बस द्वारा दो स्वयंसेवकों के साथ दिल्ली के एक “निर्मला देवी बाल आश्रम” नाम के अनाथालय में पहुँचा दिया गया।

अमन जब आश्रम में पहुँचा, उस समय दिन के दो बज चुके थे।  वो भूख से बेहाल हो रहा था। आश्रम की संचालिका शैलजा ने स्वयंसेवक को बाहरी बरामदे में रखी हुई बेंच पर बिठाकर उस बालक को रसोई में काम करती हुई १४ वर्षीय किशोरी मीनू को आवाज़ लगाकर उसके हवाले किया फिर बरामदे में आकर स्वयंसेवक से अमन की जानकारी लेकर आश्रम के रजिस्टर में दर्ज करके उसे बच्चे की देखरेख के प्रति आश्वस्त करके सम्मानपूर्वक विदा किया।

मीनू उस बालक को स्टोर से धुले हुए कपड़े और साबुन तौलिया देकर अपने निकट ही खड़ी नयना से बोली-

“नयना,  यह अमन है, आज से यह भी यहीं सबके साथ रहेगा इसे नहाने का स्थान दिखा दो  और शीघ्र ही तैयार होकर सब भोजन कक्ष में आ जाओ।”

कहानी जारी रहेगी

### अध्याय 3

नयना...!  दिल्ली के उस अभावग्रस्त अनाथालय में पलने वाली एक अबोध बालिका थी, जिसे जन्म देकर एक शिशु-अनाथाश्रम के बाहर टंगे हुए पालने में छोड़कर उसकी माँ ने यमुना में कूदकर जान दे दी थी। उसने अपनी नवजात बच्ची के साथ रखे हुए अपने सुसाइड नोट में आत्महत्या का कारण स्पष्ट लिखा था मगर उस औरत की हैसियत या पहचान गौण रही होगी अतः उसे इस अवस्था में लाने वाले उस नामी गिरामी रक्तबीज को उसी की बिरादरी के रक्तबीजों द्वारा निर्दोष करार देकर फ़ाइल बंद कर दी गई थी।

नयना नाम भी उसे शिशु अनाथालय द्वारा उसकी बड़ी-बड़ी बोलती आँखों के आधार पर दिया गया था।

वैसे तो उस आश्रम के नियमानुसार नवजात शिशुओं को किसी न किसी ज़रूरतमंद निःसंतान दम्पतियों को गोद दे दिया जाता था लेकिन जो बच्चे दो वर्ष की उम्र तक किसी की गोद नहीं जाते, उन्हें बड़े बच्चों के अनाथाश्रम में भेज दिया जाता था। नयना भी उन्हीं बच्चों में से ही थी जिन्हें इस समय सीमा तक गोद जाने का कोई अवसर नहीं मिला था। अतः उसे “निर्मला देवी बाल-आश्रम” को सौंप दिया गया था, जहाँ २ से २० वर्ष तक के बच्चों को रखा जाता था।

नयना ने जब से होश सँभाला, स्वयं को उस अनाथालय की चौखट के अन्दर ही पाया। दुबली और कुछ लम्बी काया, चेहरा प्रातः किरण जैसा उर्जावान,  नैन नक्श धारदार, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें और सुनहरी सघन केश-राशि की मालकिन थी वो... लेकिन अपनी इन खूबियों के बारे में अनजान वो भोली बालिका हमेशा एक उदासी ओढ़े हुए ही दिखती थी। आश्रम की संचालिका शैलजा को वो अन्य सभी बच्चों के समान आंटी बुलाती थी। जो मिल जाता चुपचाप खा लेना और बाकी समय हमउम्र बच्चों के साथ खेलना ही उसकी दिनचर्या थी।

छः वर्ष की होने पर वो आश्रम के निकट बने हुए अनाथालय के ही स्कूल में पढ़ने के लिए जाने लगी और माँ-पिता की परिभाषा से परिचित हुई।

नयना अब उस परिवार का हिस्सा बन चुकी थी और उस जीर्ण-शीर्ण भवन को ही अपना घर मानने लगी थी।

वैसे तो उस आश्रम में चार कमरे, एक कार्यालय, एक रसोई, एक भोजन कक्ष बना हुआ था मगर वहाँ पलने वाले ४० बच्चों के लिए वो अपर्याप्त था।

उस अनाथालय में बच्चों के लिए न तो धुले वस्त्र  उपलब्ध होते न ही सोने के लिए पर्याप्त स्थान...रात में ज़मीन पर ही मैली कुचैली चादर या दरी डाल दी जाती थी। दो कमरों में लगभग २० बालिकाएँ और दूसरी तरफ के दो कमरों में उतने ही बालक सिकुड़कर सो जाते थे। दिन में सबको  एक साथ रखा जाता था और रात में लड़कों को अपने विभाग में भेज दिया जाता था। ओढ़ने के लिए भी एक चादर में दो बच्चों को काम चलाना होता और सर्दियों में तो तीन-तीन बच्चे एक ही फटे-पुराने कम्बल से सर्दी की ठिठुरन का सामना करने को मजबूर होते थे।

खाने के नाम पर उन्हें कभी सादे पानी में नमक मिर्च का छौंक लगाकर सूखी रोटियों के साथ दिया जाता तो कभी उबले हुए आलू पानी में घोलकर दे दिये  जाते। पेट भर मिले तो यही उनके लिए छप्पन भोग और पकवान थे, अन्यथा इसके लिए भी कभी कभी तरसना पड़ता और भूखे पेट ही सोना पड़ता। ये बच्चे और किसी स्वाद से तभी परिचित होते जब किसी विशेष अवसर पर कोई दान-दाता उन्हें भोजन करवाने आ जाता। धुले हुए वस्त्र भी जब कोई निरीक्षण करने आता तभी पहनने को मिलते थे। सौंदर्य-प्रेमी नयना का बालमन अच्छा पहनने-ओढ़ने-खाने के लिए न जाने कितने ताने-बाने बुनता रहता मगर मजबूरी में वो शक्ति ही कहाँ होती है जो विरोध का स्वर निकाल सके?

छोटी सी उम्र में ही परिस्थितियों ने उसे इतना समझदार बना दिया था कि अनाथालय की सारी अनियमितताओं को वो बखूबी समझने लगी थी। वो देखा करती थी उन दान-दाताओं को, जो किसी न किसी अवसर पर नए वस्त्र, चादरें, कम्बल आदि शैलजा आंटी को सौंपकर जाते थे मगर बच्चों को उनका स्पर्श भी नसीब नहीं होता था। वो अनाथालय में काम करने वाले कर्मचारियों की बातों से यह भी जानने लगी थी कि शैलजा आंटी का उस आश्रम में रहने के बावजूद एक भरा-पूरा परिवार था और उसके परिजन मिलने के लिए आते रहते थे। मगर वे उनके साथ क्यों नहीं रहतीं यह बात कोई नहीं जानता था।

जब भी कोई भलामानस बच्चों के जन्म दिन पर स्वादिष्ट खाद्य सामग्री उन अनाथ बच्चों के लिए देकर जाता तो नयना घूम-घूम कर सभी बच्चों को खुश होकर बताती कि आज उन्हें बढ़िया भोजन खाने को मिलेगा मगर शाम होते ही शैलजा के परिजन आते और खूब जी भरकर खा-पीकर लौट जाते। उस दिन उन्हें देर तक भोजन का इंतजार करना पड़ता और जो कुछ बचा रहता वो चखने मात्र के लिए उन्हें दिया जाता था। इसी कारण जब भी कोई नया बालक/ बालिका वहाँ लाया जाता,  नयना और भी उदास हो जाती थी।

ऐसे में बरसाती मौसम में एक दिन जब एक नया बालक उस अनाथालय में लाया  गया तो उसे मीनू के साथ देखकर आश्रम के सभी बच्चे आँखों में उत्सुकता लिए दूर से देखते रहे। मगर मीनू के निकट ही खड़ी नयना कुछ क्षणों के लिए उदास हो गई फिर अगले ही पल उस सुन्दर सलोने बालक को अपनी उम्र का देखकर उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक व्याप्त हो गई।  वह बड़ा खूबसूरत, गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल, भूरी आँखों वाला, शरीर से हृष्ट-पुष्ट बालक था। नयना का मन उससे बातें करने को मचलने लगा। यों वो सभी बच्चों के साथ हिली-मिली थी लेकिन उस बालक का आकर्षण ही अलग था। वो उससे दोस्ती करने के लिए उतावली हो उठी।

१४ वर्षीय मीनू,  नवीं कक्षा की छात्रा थी। अपनी हमउम्र दो और सहेलियों के साथ स्कूल से वापस आकर रसोई के कामकाज में भी महिला कर्मचारियों का सहयोग करती थी। वो नयना को बहुत प्यार करती थी और नयना को भी मीनू बहुत अच्छी लगती थी। नयना उसे और उसकी दोनों सहेलियों को दीदी कहती थी। यह भी उसे मीनू ने ही सिखाया था। नयना अक्सर उसके आसपास ही मंडराती रहती थी।

जब मीनू दीदी ने उसे ही उस बालक की जवाबदारी सौंपी तो नयना का मन प्रसन्न हो गया। उसकी उदासी पल भर में दूर हो गई। उसने दौड़कर अमन का हाथ पकड़ लिया और लगभग खींचते हुए बाथरूम तक ले आई। अमन हक्का-बक्का सा उसके पीछे खिंचता चला गया और उसका पीछा करती हुई उसकी बीती दास्तान बाथरूम के उखड़े हुए फर्श को देखकर उसके दिमाग के टुकड़े में अपना स्थान आरक्षित करने का प्रयास करने लगी। नयना उसे जल्दी से तैयार होने के लिए कहकर सहेलियों के साथ खेलने में व्यस्त हो गई।

कहानी जारी रहेगी। इस भाग के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा🙏😊

### अध्याय 4

बाथरूम के बूँद-बूँद टपकते नल से नहाता हुआ अमन घटनाक्रम याद करके रो-रोकर सोचता जा रहा था कि क्या उसके मम्मी-पापा अब उसे लेने कभी नहीं आएँगे? मगर यह स्वीकार करना उसके लिए कठिन था। थोड़ी देर में किसी ने बाहर से जल्दी निकलने के लिए आवाज़ लगाई तो उसने अपनी दास्तान को दिमाग के कोने में चित्रांकित करके बदन पोंछकर कपड़े पहने और बाहर आ गया

कुदरत ने एक दिन के अन्दर ही उसे अर्श से गिराकर फर्श पर पटक दिया था।

नयना ने अमन से तुरंत दोस्ती कर ली और अपनी दो प्रिय सहेलियों डाली और लता से परिचय करवाते हुए अपनी टोली में शामिल कर लिया। उसकी सहेलियाँ उसे निन्नी संबोधित कर रही थीं और कुछ ही देर में अमन उन सबके लिए अमू बन चुका था।

सुबह-सुबह माँ के स्नेहिल स्पर्श के साथ उठने और मुँह धुलवाकर दूध-अंडे का नाश्ता  करने वाले अमन को अब बहुत जोर से भूख लग रही थी। उसने नयना से पूछा-

“निन्नी, हमें खाना कब मिलेगा, मुझे तो बहुत भूख लगी है, मैंने तो अभी तक नाश्ता भी नहीं किया।” कहते हुए घर की याद में उसकी रुलाई फूट पड़ी।

“नाश्ता...! अमू, हमें नहीं मालूम नाश्ता क्या होता है। खाना बनने के बाद ही हमें बुलाया जाता है। तब तक हमें नहाकर  तैयार रहना होता है। खाना खाकर हम स्कूल चले जाते हैं फिर दूसरी बार शाम के समय भोजन मिलता है। मगर आज स्कूल की छुट्टी है न... तो खाना भी देर से बनेगा। जब तक हमें बुलाया नहीं जाता,  तब तक हम खेलते ही रहते हैं।”

“निन्नी, मेरे मम्मी-पापा कहाँ हैं मुझे लेने कब आएँगे...?मायूस होकर अमन ने अपने परिचय-पत्र को सहलाते हुए पूछा।”

“पता नहीं अमू,  चलो हम मीनू दीदी से पूछते हैं।” कहते हुए उसका हाथ पकड़कर नयना उसे एक तरफ ले जाने लगी।

मीनू दीदी ने रोते हुए अमन को प्यार से समझा-बुझाकर शांत किया और उसका परिचय पत्र देखते हुए बोली-

“अमन बाबा,  आपको अपना सामान और कपड़े-किताबें रखने के लिए एक अलमारी दी जाएगी, यह परिचय पत्र आप अपनी उस अलमारी में सँभालकर रख लेना। हो सकता है, इसके सहारे आपको अपने माँ-पिता मिल जाएँ...यहाँ रहने वाले सभी बच्चे किसी न किसी तरह अपने माँ-पिता खो चुके हैं। आप भी अब रोना छोड़कर इनके साथ मिलकर रहना, खेलना, खाना और स्कूल जाना शुरू कर दो। और हाँ, भोजन तैयार हो चुका है, जल्दी से सब पहुँच जाओ”।

बच्चों के भोजन कक्ष में पहुँचते ही  एक कर्मचारी ने एक फटी-पुरानी बड़ी सी दरी बिछाकर उन्हें कतार बनाकर बैठने का इशारा किया और सबके सामने एक प्लेट में कटोरा रखते हुए आलू का पतला शोरबा परोस दिया। नयना और बच्चों ने हाथ जोड़कर आँखें मूँदकर ईश्वर का धन्यवाद किया और चुपचाप शोरबा पीने लगे।  अमन के रोटी/चावल माँगने पर कर्मचारी कुछ नरमी से बोला-

“आज सामान ख़त्म हो जाने से भोजन में यही बना है बच्चों,  सामान आ जाएगा तो शाम को सब्जी रोटी बनेगी फिर भरपेट खा लेना।”

अमन, नयना और उसकी दोनों सहेलियाँ, डाली और लता एक ही कतार में बैठे थे। नयना अमन के पास ही बैठी थी। अमन को तो ऐसा भोजन और व्यवस्था देखकर उबकाई सी आने लगी। उसकी आँखों में  आँसू देखकर नयना दुखी होकर बोली-

“अमू, जो कुछ भी है खा लो, देखो सभी बच्चे भी यही भोजन कर रहे हैं। तुम भूखे रहोगे तो मेरे साथ कैसे खेलोगे और फिर तुम नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊँगी।”

अमन को भला यह बात कैसे हज़म होती कि नयना उसके लिए भूखी रहे। उसने चुपचाप शोरबे का पात्र उठाकर होठों से लगा लिया। कुछ ही मिनटों में बच्चों ने उठकर हाथ-मुँह धो लिए और खेलने के लिए आश्रम के बाहर जहाँ उनका स्कूल लगता था,  पहुँच गए। आज स्कूल बंद था और किताबों से मुक्ति...अतः जी भरकर खेलना ही उनके सारे गम सोखने का साधन था।

बचपन पर वैसे भी खुशियाँ अथवा गम हावी नहीं हो पाते, बच्चों को समय की धारा बहाकर जहाँ  पहुँचा दे, अपना ठिया बना ही लेते हैं। अमन भी अब इस दिनचर्या का आदी हो चला था। जैसा मिल जाए खा-पहन लेना और मस्त रहना ही उसके जीने का उद्देश्य हो गया था। आश्रम के सभी बच्चे उम्र और पसंद के आधार पर तीन-चार टोलियों में बंटे हुए थे।

नयना की सहेलियाँ डाली और लता भी उसकी तरह ही माँ-पिता द्वारा जन्म समय से ही त्याग दिए जाने की वजह से आश्रम में पल रही थीं तो उनमें आपसी लगाव भी स्वाभाविक था और अमन का परिचय अब तक उसके हमउम्र कुशल, कीरत और रतन नाम के तीन लड़कों से हो चुका था। वे वहाँ इधर-उधर सड़कों पर भटकते हुए  लाए गए थे। इन सात बच्चों का अब एक ही समूह बन गया था। उनका सोना-जागना, खाना-खेलना और स्कूल जाना सब एक साथ ही होता। इन सबके साथ अमन ने अपनी अभावग्रस्त ज़िन्दगी को आपसी मेल-मिलाप से आसान बनाना सीख लिया।

अमन को आए एक सप्ताह हो चुका था। अब वो पुरानी यादों को अपने परिचय पत्र के साथ आश्रम से मिली हुई अलमारी में सहेजकर नयना और साथियों के साथ नई ज़िन्दगी शुरू कर चुका था, जिसमें सुख-सुविधाओं और सपनों का कोई स्थान न होते हुए भी अपनापन, एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण की गहराई मौजूद थी।

आश्रम कम क्षेत्रफल में बना हुआ होने के कारण उसकी चारदीवारी से बाहर खाली जमीन पर बने हुए एक पुराने हालनुमा भवन को चार-पाँच हिस्सों में बाँटकर आधी ईंट की दीवार खड़ी करके पाँच कक्षाएँ और एक छोटा सा ऑफिस बना कर जूनियर हाईस्कूल का नाम दिया गया था, जहाँ एक प्रधानाध्यापक और दो शिक्षक मिलकर सुबह पहली से पाँचवीं और दोपहर को छठी से आठवीं कक्षा तक पढ़ा दिया करते थे। उनकी उपस्थिति  भी नियमित नहीं होती थी और अक्सर गायब ही रहते थे।

बच्चे जैसे-तैसे दो तीन घंटे स्कूल में बिता देते फिर स्कूल के बंद होने के बाद देर शाम तक आसपास उनका खेलकूद चलता रहता। लंगडी, खो-खो,  कबड्डी आदि तो स्कूल के समय ही बीच की छुट्टी में खेले जाते थे फिर बाद में उन सबका पसंदीदा खेल लुका-छुपी ही होता था। बाहर तो बाहर, आश्रम के परिसर में भी स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा जाता था। कहीं कचरे का ढेर तो कहीं टूटे फूटे फर्श, ईंट-पत्थर आदि के टीले बने हुए दिखते थे। आए दिन कोई न कोई बच्चा बीमार हो जाता था और चिकित्सा की भी उचित व्यवस्था न होने के कारण कई दिन रोग के साथ जीना ही उनकी नियति हो जाती थी।

गेट पर तैनात चौकीदार की निगरानी में ही सभी बच्चे स्कूल आते जाते थे। दूसरी पाली के बच्चों की छुट्टी होने के कुछ देर बाद ही बच्चों के खेल कूद शुरू हो जाते थे।

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### अध्याय 5

उस दिन सभी बच्चे अपने अपने समूह बनाकर मनपसंद खेल खेलने में लगे हुए थे। अमन और नयना के समूह को लुका छुपी खेल बहुत प्रिय था। वे अक्सर यही खेल खेलते थे। एक बच्चा आँखें मूँदकर १०० तक गिनती गिनता तब तक बाकी बच्चे इधर उधर छिप जाते थे। नयना और अमन एक साथ स्कूल-परिसर  में फैली कँटीली झाड़ियों के पीछे एक ऐसे स्थान पर छिप जाते थे जहाँ कुछ दूर होने के कारण आसानी से किसी की नज़र नहीं पड़ती थी। इस तरह वे दोनों दाम देने से बचे रहते थे।

एक बार वहाँ से निकलते हुए अमन पकड़ा गया तो दाम उसी को देना पड़ा। इस बार भी नयना जानबूझकर वहीं छिप गई क्योंकि वो अमन के हाथों आउट होकर दाम देना चाहती थी। बरसात का मौसम अभी बीता नहीं था । शायद यह एक संयोग ही था कि अमन ने १०० तक गिनती गिनकर जैसे ही आँखें खोलीं तो अँधेरा सा दिखने लगा। बादल देखकर वो सहम गया और अपने साथ हुई दुर्घटना की याद ताजा हो गई। वो हर तरफ दौड़ दौड़ कर जोर-जोर से सबको बरसात की चेतावनी देते हुए अपने स्थान से निकलने को कहकर अंदर की तरफ भागा लेकिन अगले ही पल नयना का विचार आते ही वहीं चारदीवारी के पास एक वृक्ष के नीचे खड़ा होकर उसका इंतजार करने लगा।

बारिश शुरू हो गई थी और सभी बच्चे उसके सामने से गुजरते हुए अंदर भाग निकले मगर नयना ने दूर होने के कारण शायद उसकी आवाज़ नहीं सुनी थी तो उसे न देखकर अमन भीगता हुआ अपने छिपने के स्थान की ओर भागा तो देखा नयना बाहर आने के प्रयास में झाड़ियों के काँटों में अटककर गिर गई थी। ज़मीन कच्ची होने से पानी गिरते ही कीचड़ और फिसलन हो जाने के कारण वो उठ  नहीं पा रही थी अमन ने उसे रोते देखकर हाथ पकड़कर उठाया और चुप कराते हुए उसका गाल चूम लिया।

नयना तुरंत चुप हो गई मगर अमन को धकेलकर अपना गाल सहलाते हुए रोषपूर्वक बोली

“छिः अमू,  तुमने मेरा गाल जूठा क्यों किया?”

“गाल भी जूठा होता है क्या निन्नी,  मैं तो जब भी रोता था, मम्मी मुझे इसी तरह  प्यार से गाल चूमकर चुप कराती थी” ।

“अच्छा... मम्मी बहुत अच्छी होती है न अमू...”

“बहुत अच्छी निन्नी, पापा भी बहुत अच्छे होते हैं, मगर न जाने क्यों आज तक मुझे लेने क्यों नहीं आए? वे मुझे कैसे भूल गए,  क्या उन्होंने मुझे ढूँढा न होगा?”

कहते हुए अमन उदास हो गया। उसकी नम आँखों को देखकर अब नयना ने प्यार से उसका गाल चूमते हुए कहा-

“रो मत अमू, अब हम इसी तरह एक दूसरे को चुप करवाया करेंगे”

“फिर तुम गाल जूठा होने की शिकायत तो नहीं करोगी न...”

“नहीं, मैं मुँह धो लिया करूँगी”।

“अच्छा निन्नी, जल्दी चलो यहाँ से, बारिश तेज़ हो जाएगी”।

“जल्दी कैसे चलूँ अमू, मेरे पैर में काँटे चुभ गए हैं। कहते हुए वो फिर रोने लगी”।

अमन ने उसका हाथ पकड़ा और बोला-

“अच्छा धीरे धीरे चलो,  भीग तो गए ही हैं न,  दीदी की डांट खा लेंगे और कपड़े बदल लेंगे”।

उन दोनों को भीगते हुए अंदर जाते देखकर चौकीदार ने भी गुस्से से भरकर डाँट दिया कि आगे से इतनी दूर गए तो आंटी से शिकायत करनी पड़ेगी।

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### अध्याय 6

समय गुजरता रहा और नयना-अमन की दोस्ती प्रगाढ़ होती गई। एक दिन दोपहर के समय बच्चे छुट्टी होने से स्कूल-परिसर में खेलने में व्यस्त थे। तभी एक सज्जन ने भोजन वस्त्रों के पैकेट उठाए अपने कर्मचारी के साथ उस भवन में प्रवेश किया। नयना की नज़र जब आश्रम के बरामदे की बेंच पर शैलजा से बातें करते हुए उस सज्जन पर पड़ी तो वो दौड़कर अमन को एक तरफ ले गई और उस तरफ इशारा करते हुए बताया-

“वो देखो अमू,  वो अंकल यहाँ आते ही रहते हैं। वे बहुत अच्छे हैं,  हमें एक साथ बिठाकर अपने सामने ही भोजन करवाते हैं। कभी-कभी वे रात में भी बहुत देर तक यहीं रहते हैं। आज भी ये हमें भोजन करवाकर ही वापस जाएँगे...

वैसे तो बहुत लोग खाने पीने की चीजों के अलावा भी बहुत सारे सामान- कम्बल, अनाज, वस्त्र आदि दान में दे जाते हैं। लेकिन वे सामान केवल हमें दिखाने के लिए होते हैं। देर रात को आंटी के घर से लोग आते हैं और खाना खाने के बाद सारा सामान अपने साथ ले जाते हैं।”

“मगर निन्नी, तुम यह सब कैसे जानती हो?”

“मुझे यह सब मीनू दीदी बताती रहती हैं। वो यह भी बताती हैं कि यहाँ काम करने वालों को कई महीने वेतन नहीं दिया जाता तो अब उनकी संख्या कम हो गई है अतः उन्हें और उनकी दो और दीदी लोगों को रसोई में बहुत काम करना पड़ता है। उनका और कोई नहीं है तो शादी होने तक वो यह घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकतीं। मीनू दीदी मुझे बहुत प्यार करती है। आंटी तो अधिक समय इन्हीं अंकल के साथ बाहर जाती रहती हैं...” कहते हुए नयना अचानक उदास हो गई।

“अरे निन्नी, अब मैं हूँ न! तुम उदास मत हुआ करो। तुम्हारी वे सहेलियाँ, डाली और लता भी तो बहुत अच्छी हैं। मेरे तीनों दोस्त कुशल, कीरत और रतन भी कितने अच्छे हैं! हम सब साथ हैं तो हमें कोई परेशान नहीं कर सकेगा...चलो अब अन्दर चलें बहुत भूख लगी है।”

सभी बच्चे उछलते-कूदते हुए आश्रम के गेट से अन्दर दाखिल हुए तो अंकल यानी माणिक सेठ उन्हें रोककर प्यार से हालचाल पूछने लगे। नयना को अमन का हाथ थामे देखकर बोले-

“अरे मेरी गुड़िया, आज तो बहुत खिली-खिली लग रही हो, तुम्हारे साथ ये कौन बालक है?” सेठजी नयना को प्यार से गुड़िया कहकर ही बुलाते थे।

“ये अमन है, अंकल जी...ये आगरा से आया है।”

सेठजी जानते थे कि किसी बच्चे के उस आश्रम में आने का क्या कारण होता है अतः उसने बात बदलते हुए तुरंत कहा-

“ठीक है बेटे अमन, यहाँ आपके बहुत से दोस्त हैं, अपने को कभी अकेला न समझना...”

तभी शैलजा बोल पडीं-

“बच्चों, आज सेठजी के बेटे का जन्म दिन है, ये आप सबके लिए बहुत अच्छा भोजन और मिठाई लेकर आए हैं। जल्दी से हाथ धोकर भोजन कक्ष में चलो।”

सभी बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी भोजन कक्ष में पहुँचकर चटाई पर कतार बनाकर बैठ गए।

सेठजी और शैलजा ने बैठने के लिए कुर्सियाँ खींच लीं और सेठजी के साथ आया हुआ उनका कर्मचारी बच्चों को भोजन परोसने लगा।

इस तरह नयना और अमन हँसते-खेलते हुए बचपन की सीढ़ियाँ पार करके किशोर अवस्था में  पहुँच गए। आठवीं कक्षा में पहुँचने के साथ ही उनकी मानसिक और बौद्धिक शक्तियों का विकास होने लगा था। वे अब अपने अंदर हो रहे शारीरिक परिवर्तनों के चलते आमने-सामने होने पर शरमाने लगते थे। लुका-छिपी खेलना, एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना और गाल चूमना छूट गया था। मगर मन ही मन एक दूसरे के प्रति आकर्षण और बढ़ने लगा था।

अब वे जब भी फुरसत में होते, अपनी आगे की पढ़ाई और कैरियर की चिंता जताने लगते थे। मगर इसके साथ ही जब उन्हें पता चला कि आठवीं के बाद वहाँ के नियमानुसार लड़कों को तो अन्यत्र किसी लड़कों के ही आश्रम में भेज दिया जाता है और लड़कियों को दो किलोमीटर दूर स्थित एक सरकारी उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला में दाखिला दिला दिया जाता है। १२ वीं तक पढ़ाई पूरी होने के बाद वे बालिग हो चुकी होती हैं अतः नियमानुसार उनको आश्रम से विदा कर दिया जाता है अथवा उनके और आश्रम के संचालकों के आपसी अनुबंध के तहत विवाह होने तक आश्रम के कार्यों में सहयोग करना होता है।

उन दोनों को एक दूसरे से दूर होने के अहसास मात्र से ही अकेलेपन का डर सताने लगा। दोनों के मन के तार अनजाने में ही इतने गहरे जुड़ गए थे कि अब अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। वो पूरा साल उनके मनोमस्तिष्क में उथल-पुथल मचाता रहा। आश्रम में वैसे ही केवल एक शिक्षक के सहारे ही पढ़ाई संपन्न होती थी ऊपर से अलगाव के बोझ से लदे होने होने के कारण उनकी पढ़ाई भी ठीक तरह से नहीं हो पाई।

परीक्षाएँ सिर पर आ गई थीं मगर एक दूसरे से जुदा होने का गम उनकी एकाग्रता में बाधा बना हुआ था। स्कूल की आधी छुट्टी हो या खेलने की, ये दोनों एक तरफ बैठकर चिंतातुर अपने भविष्य की योजना पर चर्चा करते रहते। अमन कहता-

“निन्नी,  मैं जानता हूँ कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं और जुदा होकर कभी जी नहीं सकते मगर अभी हमारी उम्र इतनी नहीं कि एक साथ रहने की बात सोचें। मैं जहाँ भी जाऊँगा, बालिग होते ही तुमसे मिलने अवश्य आऊँगा फिर आगे की पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद तुम्हें दुल्हन बनाकर साथ ले जाऊँगा। तब तक तुम इसी आश्रम में मेरा इंतज़ार करना। तुम्हें हर हाल में हिम्मत से काम लेना होगा। खुद को कभी अनाथ न समझना। अपनी सहेलियों के साथ मिलकर अपनी आत्म-शक्ति के सहारे आगे बढ़ना होगा। अब परीक्षा समाप्त होने तक हम नहीं मिलेंगे और बेहतरीन परिणाम लाने का प्रयास करेंगे”।

“मैं पूरा प्रयास करूँगी अमू, मगर अपना वादा भूल मत जाना। हमारे पास तो संपर्क का भी कोई साधन नहीं... ऐसा न हो कि तुम दूर जाकर नई दुनिया बसा लो और नयना के नयन बरसते-बरसते सावन भादों बन जाएँ” कुछ शर्माते हुए नयना बोली।

“ऐसा कभी नहीं होगा निन्नी,  याद रहे, जिन गालों पर मेरे मासूम बचपन के अनगिनत चुम्बन अंकित हैं उन्हें अपने आँसुओं से धो मत डालना,  उन्हें मेरे प्यार की निशानी समझकर सहेजकर रखना। मुझे मेरी इच्छा के अनुसार मेरे आगरा के अनाथाश्रम में भेजा जाएगा ताकि मैं पुनः अपने शहर से जुड़ सकूँ। कुशल कीरत और रतन भी मेरे साथ ही रहेंगे। जिस माँ यमुना ने मुझसे मेरे माँ पिता को जुदा किया, मैं उसकी कसम खाकर कहता हूँ निन्नी, वही हमारे मिलन की साक्षी बनेगी। यह मेरा वादा और अटल इरादा है”।

परीक्षाएँ समय पर संपन्न हो गईं और परिणाम भी आ गया। नयना चूँकि शुरू से ही मेधावी थी अतः वो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई थी बाकी अमन सहित डाली, लता, कुशल, कीरत और रतन सभी द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे लेकिन उन सबके लिए यह उपलब्धि भी कम नहीं थी। वे आगे की पढ़ाई में और अधिक मेहनत करने का मन ही मन संकल्प कर चुके थे।

आखिर वो दिन भी आ गया जब सभी लड़कों को दिल्ली के लड़कों के आश्रम में भेज दिया गया। मगर अमन और उसके तीनों साथियों को आगरा के एक आश्रम में पहुँचा दिया गया। उस आश्रम में अब कुछ नए छोटे-छोटे बच्चे आ गए थे। यह चक्र वहाँ चलता ही रहता था और हर बालक-बालिका को वहाँ के नियमानुसार चलना ही उनकी नियति थी।

क्रमशः ...

### अध्याय 7

अमन के जाने के बाद नयना ने फिर से उदासी ओढ़ ली थी। डाली और लता पहले तो यह देखकर हैरान होती थीं। चूँकि बचपन कोई बोझ लेकर नहीं चलता, कौन किसके साथ अधिक रहता है, इससे किसी को कोई मतलब नहीं रहता और किसी से भी कुट्टी या बुच्ची चलती रहती है। मगर किशोरावस्था में कदम रखते ही  नयना के प्रति अमन के झुकाव से उन्हें ईर्ष्या अवश्य होने लगी थी क्योंकि अमन के कारण उन्हें नयना की उपेक्षा सहनी पड़ती थी,  लेकिन उनके मन में उन दोनों के प्रति द्वेष भाव कभी नहीं पनपा। उनसे नयना का दर्द देखा नहीं जाता था। वे उसे भरसक बहलाने का प्रयास करतीं और उसे कभी अकेली नहीं छोड़ती थीं। फिर कुछ ही समय बाद मीनू और उसकी सहायक लड़कियों,  माया और ममता के विवाह की चर्चा होने लगी तो नयना ने अपना ध्यान उस तरफ केंद्रित कर लिया। मीनू का लगाव नयना से अधिक था और अब वो दुनियादारी की बातें समझने लगी थी अतः वो अपनी अंतरंग बातें भी नयना से साझा करने लगी थी।

तीनों लड़कियों की शादी की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। आश्रम में वो कुछ ही दिन की मेहमान थीं अतः नयना, डाली और लता अधिकांश समय उनके साथ ही बनी रहती थीं। नयना ने नोट किया कि सेठजी सारे आयोजनों में आगे रहने के साथ ही विवाह की खरीदारी में भी विशेष रुचि ले रहे थे। वो अक्सर शाम के समय आश्रम आ जाते थे फिर शैलजा को कार में अपने साथ ले जाते थे। वापस आने पर देर रात तक वहीं बने रहते थे।

कुछ ही दिनों में उन लड़कियों के लिए कुछ हल्के-फुल्के गहने, कपड़े और गृहस्थी का आवश्यक सामान जुटा लिया गया। नयना मन ही मन अंदाज़ लगाती रहती कि लड़कियों के विवाह का खर्च कहाँ से आता है? आखिर एक दिन नयना ने जिज्ञासावश फिर से मीनू के पास जाकर पूछ लिया-

“दीदी, क्या आप सबके विवाह का सारा खर्च सेठजी कर रहे हैं”?

“नहीं मेरी भोली बहना, यहाँ धार्मिक प्रवृत्ति के रईस लोग लड़कियों की शादी के लिए काफी धन दान में देते रहते हैं। कुछ सहायता सरकार की तरफ से मिल जाती है जिसका विवरण रजिस्टर में दर्ज करके औपचारिक घोषणा कर दी जाती है। यह भी मैंने एक बार अचानक शैलजा आंटी की सेठजी के साथ हुई बातचीत सुन ली थी वरना हमें इसकी कोई जानकारी नहीं होती। विवाह करवाने और खर्च का सारा श्रेय सेठजी ले लेते हैं। किसी तरह की कोई पूछताछ नहीं होती बल्कि बड़े अधिकारी भी उनके साथ आकर अपने अनुमोदन के साथ सेठजी की प्रशंसा के समाचार अख़बारों में छपवाते हैं।

मैंने एक बार शैलजा आंटी से उनको अच्छे मूड में देखकर उनसे इस बारे में पूछा था तो उन्होंने यही कहा था कि इस आश्रम की लड़कियों के विवाह करवाने का दायित्व सेठजी का ही है,  वे एक नामी रईस व्यापारी होने के साथ ही इस आश्रम के मालिक और प्रबंधन समिति के प्रमुख हैं अतः दानस्वरूप आये हुए धन का लेखा-जोखा  उनके पास ही रहता है।”

“ओह, दीदी! अब एक बात और बता दीजिये कि विवाह के बाद आप लोग हमसे मिलने तो आया करेंगी न”?

“मैं यह भी नहीं जानती निन्नी,  हम १४ वर्ष तक इस आश्रम की पहली संचालिका माया देवी के सान्निध्य में पली हैं। उसके बाद यह शैलजा आंटी आईं। हमसे पहले विवाह कर चुकीं लड़कियाँ उन दिनों हमसे मिलने आती रहती थीं लेकिन बड़े मालिक की मृत्यु के बाद फिर कभी नहीं आईं। हमने कई बार शैलजा आंटी से उनसे मिलवाने के लिए याचना की मगर उन्होंने इस बारे में अनभिज्ञता जताते हुए रुखाई से यही कहा-

“उनके जीवन में झाँकने की अब किसी को कोई आवश्यकता नहीं, अपने काम से मतलब रखो।”

एक दिन सेठजी अपने साथ विवाह के इच्छुक कुछ लड़कों को ले आए। मीनू, माया और ममता को भी तैयार करवाकर बाहरी परिसर में बुलाया गया। उन लड़कों में से जिन तीन लड़कों ने एक एक लड़की को पसंद किया, उनके नाम सेठजी ने लड़कियों के नाम के साथ नोट कर लिए बाकी उनके पूरे परिचय के साथ तो सेठजी वाकिफ थे ही, अतः उन लड़कों को आश्वस्त करके आगे का कार्यक्रम तय होने के बाद सूचित करने का आश्वासन देकर सबको विदा किया।

कुछ समय बाद ही शैलजा और सेठजी ने सम्बंधित अधिकारियों को सूचित करके विवाह-समारोह आयोजित करने की अनुमति ले ली और विवाह का दिन तय कर लिया गया।

यह सब होने के बावजूद नयना उनके रिश्ते से संतुष्ट नहीं थी क्योंकि उसे उनकी जोड़ियाँ बेमेल लग रही थीं। आखिर एकांत पाते ही उसने मीनू से पूछ ही लिया-

“मीनू दीदी, आपने उस व्यक्ति को पसंद कैसे कर लिया, कहाँ आप इतनी सुंदर और कहाँ वो?  रूप रंग में तो आपके सामने वो कुछ नहीं लगता और उम्र में भी आपसे काफी बड़ा लग रहा है”।

मीनू ने उदासी भरे स्वर में जवाब दिया-

“मेरी गुड़िया, हम अनाथ लड़कियों की पसंद-नापसंद का यहाँ कोई महत्व नहीं है, न ही मुँह खोलने का अधिकार...क्योंकि अधिकार केवल इंसानों के लिए होते हैं और हमें यहाँ इंसान समझता ही कौन है?  ये सब देखना दिखाना केवल औपचारिकता है।”

“मगर सेठजी तो बहुत भले हैं,  आप उनसे मन की बात कह सकती थीं न”!

“उनका भलाई का बाना कितना कृपण है, यह तुम नहीं समझ सकोगी निन्नी...इनके पिता एक देवता थे और ये उनके विपरीत एक दैत्य ही कहलाने योग्य हैं”

“मगर दीदी, मैं समझना चाहती हूँ, क्योंकि आप तीनों की शादी के बाद हमें भी इसी स्थिति का सामना करना है, फिर मैं अपने सवालों के जवाब किससे माँगूँगी दीदी”?

“अभी केवल इतना जान लो निन्नी, कि तुम्हें भेड़ की खाल में छिपे इस आश्रम के सभी मर्द भेड़ियों से सावधान रहना है, बाकी सब धीरे धीरे समझने लगोगी।”

“तो क्या सेठजी भी...”?

“हाँ निन्नी...”

नयना मीनू की बात कुछ समझी कुछ न समझी। वो उसके उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई बल्कि उसके कथन की गूढ़ता ने उसके मस्तिष्क में द्वंद्व छेड़ दिया। शायद दीदी उसे कच्ची उम्र की समझने के कारण पूरी बात बताना नहीं चाहती मगर उसने उस नीच और निरंकुश इंसान की पूरी वास्तविकता जानने का दृढ़ निश्चय कर लिया था अतः पुनः मीनू से याचना भरे स्वर में कहा-

“दीदी लगता है, आप मुझसे कुछ छिपा रही हैं मगर दीदी यह तो आप भी समझती होंगी कि बेसहारा बच्चों का बौद्धिक विकास सामान्य सर्व सुविधा भोगी बच्चों की अपेक्षा जल्दी हो जाता है, वे दुनियादारी की बातें बहुत जल्दी समझने लगते हैं। आपकी बातों ने मेरे मन में उथल-पुथल मचा दी है और मेरी जिज्ञासा आपको शांत करनी ही होगी”।

“निन्नी, तुम्हें इतनी कृतसंकल्प देखकर एक शर्त पर तुमसे अपनी निजी बातें साझा कर रही हूँ। मगर ध्यानं रहे, किसी अन्य को इसकी भनक भी नहीं लगनी चाहिए वरना सेठजी नीचता की किसी भी हद तक जा सकते हैं और मेरे जाने के बाद तुम्हारा जीना दूभर कर देंगे...बस इसी एक वजह से मैं मुँह नहीं खोलना चाहती थी।”

“अगर आप मेरी या मेरी सहेलियों की सुरक्षा के लिए इतनी चिंतित हैं और बात इतनी गंभीर है दीदी, तो आप बेफिक्र रहिये, मैं आपकी बात का पूरा ध्यान रखूँगी।”

“तो सुनो निन्नी,  मैं यह तो नहीं जानती कि इस आश्रम के कानूनी नियम कायदे क्या हैं और क्या गैर कानूनी है, मगर सेठजी और शैलजा आंटी का अधिकतर एक साथ आना-जाना और आश्रम की गतिविधियों में सेठजी का हस्तक्षेप बना रहना इस बात का संकेत करता है कि वे कोई विशेष व्यक्ति हैं। आश्रम के सभी पुरुष कर्मचारी शैलजा आंटी और इन्हीं सेठजी की शह पर युवा होती हुई लड़कियों का यौन शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं। तुमने देखा होगा कि वे जब भी बच्चों के लिए भोजन आदि लाते हैं तो देर रात तक बने रहते हैं। वो इसलिए कि सिर्फ रात का अन्धकार ही ऐसे वासना-लोलुप नर-पिशाचों के कारनामें अपने आगोश में छिपा सकता है।

१२ वीं तक शिक्षा पूर्ण होते ही लड़कियों को आश्रम छोड़ने के लिए कह दिया जाता है। फिर उनके सामने यह प्रस्ताव भी रखा जाता है कि वे चाहें तो विवाह होने तक आश्रम में रह सकती हैं। मगर रसोई अथवा आश्रम के हर कार्य में उन्हें सहयोग करना होगा और बिना संचालकों की अनुमति के आश्रम के बाहर आना जाना उनके लिए वर्जित होगा।

जब लड़कियों को विवाह होने तक रहने खाने की सुविधा उपलब्ध हो तो भला आश्रम छोड़कर वे लावारिस भटकना क्यों पसंद करेंगी? हमने भी उनकी हर शर्त मानकर आश्रम में ही रहना स्वीकार कर लिया। हमें क्या पता था कि युवा अनाथ लड़कियाँ कहीं भी रहें, उन्हें सम्मान के साथ सुरक्षा नसीब नहीं होती।

एक बार लड़कियाँ रहना स्वीकार कर लें तो फिर उनको पोल खुलने के डर से विवाह से पहले कहीं जाने नहीं दिया जाता। उनका आश्रम के गेट से बाहर निकलना निषिद्ध कर दिया जाता है। उन्हें तरह तरह के प्रलोभन देकर भावनात्मक दबाव बनाकर अपनी बात मनवाई जाती है। यौन शोषण का यह घिनौना घुन उनके तन मन को इस कदर निचोड़कर सत्वहीन कर देता है कि वे किसी तरह छुटकारा पाने के लिए विवाह प्रस्ताव आते ही बिना कुछ सोचे समझे तैयार हो जाती हैं। विवाह से पहले उन्हें गर्भवती नहीं होने दिया जाता।

हमारा भी शर्तों पर रहने की सहमति के साथ ही शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का अध्याय आरम्भ हो गया। हमसे मनमाना कार्य लेने के बावजूद अँधेरे में सेठजी द्वारा हम लड़कियों का कौमार्य कुचला जाने लगा और यह सब शैलजा आंटी की नाक के नीचे ही संपन्न होता है। मुँह खोलने पर हमें मारकर फेंक देने अथवा किसी वेश्यालय में बेच देने की धमकी दी जाती रही। हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पातीं क्योंकि उनकी पहुँच उनके कथनानुसार ऊपर तक है और हमने स्वयं यहाँ रहना स्वीकार किया है। चोरी छिपे भाग भी जाएँ तो हमें कहीं आसरा मिलने की उम्मीद नहीं होती बल्कि पकड़ लिए जाने पर नारकीय जीवन में धकेल दिए जाने का डर रहता है। एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति बन जाती है। उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब दूसरी छोटी लडकियाँ पढ़ाई समाप्त करके बालिग हो जाती हैं तब पुरानी लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है। लड़के भी अनाथ, अभावग्रस्त, कुरूप अथवा गरीब ही चुने जाते है ताकि वे विरोधी स्वर हलक से  निकालते ही हलाल कर दिए जाएँ।”

मीनू की बाते सुनकर नयना के रोंगटे खड़े हो गए। मगर अब उसका मनोबल और दृढ़ होता गया। उसने तय कर लिया कि सब्र के साथ अपना सफ़र शुरू करके ही मंजिल हासिल हो सकेगी तब तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

नियत तिथि पर आश्रम के सदस्यों और कर्मचारियों के अलावा शैलजा और सेठजी द्वारा अधिकारियों को निमंत्रण भेजकर बुलाया गया। वर पक्ष से लड़कों के अभिभावक के रूप में उनके कुछ मित्र और परिचित शामिल हुए क्योंकि तीनों  लड़के भी लड़कियों की तरह अनाथ थे। माया का विवाह वैभव के साथ, ममता का शिशुपाल के साथ और मीनू का विवाह मिलिंद के साथ गठबंधन के साथ विवाह  समारोह संपन्न हुआ और तीनों जोड़ों को पहले से जुटाए हुए गृहस्थी के आवश्यक सामान  के अलावा आभूषण वस्त्रादि देकर विदा किया गया।

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### अध्याय 8

सृष्टि निर्माण के समय विधाता ने निश्चित ही कुछ इंसानों में हैवानी हवस इतनी कूट कूट कर भर दी होगी, जो युगों से मानवता को कलंकित करते आ रहे हैं। ये ऐसे रक्तबीज होते हैं जिनके जीवाश्म सदियों तक फिर-फिर आकार लेकर अपने दुष्कर्मों से इतिहास को दोहराते रहते हैं। फिर चाहे कितने भी अवतार जन्म लेते रहें मगर इन रक्तबीजों का जड़ मूल से समापन असंभव हो जाता है, क्योंकि इनका पोषण ऊँची पहुँच वाले रक्तबीजों द्वारा ही होता आया है अतः ये रूप बदल-बदल कर हर युग के अवतारों पर भी हावी होते रहते हैं।

माणिक सेठ!! जिनका वर्चस्व “निर्मलादेवी बाल आश्रम” पर हावी था,  स्थापित रक्तबीजों की  श्रंखला की एक सुदृढ़ कड़ी थे। उन्होंने अपने पिता ज्ञानचंद, जो “निर्मलादेवी बाल आश्रम” के संस्थापक थे, की नेकनामी के बल पर ऐसे राजनेताओं के साथ जुड़कर अपनी गहरी पैठ बना ली थी, जो उसके काले कारनामों में साथ देते रहें।

“निर्मलादेवी बाल आश्रम” की स्थापना सेठ ज्ञानचंद ने अपनी मृत पत्नी के नाम पर की थी। वे दिल्ली के एक प्रसिद्ध अनाज व्यापारी थे और समाज में अपनी नेकदिली और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। वे एक समाजसेवक और अनेक सामाजिक संगठनों के सदस्य भी थे। शानदार बंगला और नौकर चाकर उसने अपनी मेहनत के बल पर हासिल किए थे। माणिक उनका इकलौता पुत्र था।

माणिक का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ था। बचपन से ही मोहल्ले के बच्चों के बीच नेतागिरी दिखाना,  मारपीट करना उसका प्रिय शगल था। लेकिन ज्ञानचंद की सज्जनता का ख्याल करते हुए लोग उसकी शिकायत न करके समझा दिया करते थे। माणिक के १० वर्ष का होने पर उसकी माँ निर्मला देवी अपनी लम्बी लाइलाज बीमारी से कम उम्र में ही चल बसी। पत्नी की मृत्यु के बाद सेठ ज्ञानचंद को अकेलापन काटने लगा। वे माणिक के पालन-पोषण का अधिकाँश भार अपने सेवकों पर डालकर स्वयं सामाजिक संस्थाओं से जुड़ गए थे और उन्हीं दिनों अनाथालय की स्थापना भी की।

माणिक का मन पढ़ाई में कम लगता था, लेकिन बुद्धि तीव्र होने से उसे कक्षाओं में पास होने जितने नंबर मिल ही जाते थे। आठवीं कक्षा पास करके हाईस्कूल में प्रवेश के साथ ही उसका पिता के स्वभाव के विरुद्ध आचरण उजागर होने लगा और वह असामाजिक गतिविधियों में लिप्त होने लगा। पड़ोस मोहल्ले और राह चलती लड़कियों को छेड़ने में उसे रस आने लगा था। पड़ोसी ज्ञानचंद को जितने आदर से देखते, माणिक को अब उतनी ही हिकारत से देखने लगे थे। ज्ञानचंद भी उसकी हरकतों से अनजान नहीं थे। वे पुत्र पर लगाम कसने के लिए खाली समय में उसे व्यापारिक गतिविधियों में शामिल करने के साथ ही सामाजिक संगठनों में ले जाने लगे। १२ पास करने के बाद उसे कॉलेज न भेजकर घर पर ही कोचिंग दिलाकर ग्रेजुएशन पूरी करवाई।

शिक्षा पूरी होते ही उन्होंने माणिक की रसिक मिजाजी देखते हुए उसका विवाह दिल्ली की ही पढ़ी लिखी सुंदर कन्या सुषमा से करवा दिया। सुन्दर और सुशील पत्नी पाकर माणिक का मन घर में रमने लगा तो ज्ञानचंद ने व्यापार का अधिकांश कार्य माणिक को सौंप दिया और स्वयं सामाजिक संगठनों और अनाथाश्रम के संचालन के सहयोग में अधिक समय बिताने लगे। पत्नी के बिना उनका मन अब घर में नहीं रमता था। ५ वर्ष के अन्तराल में माणिक एक पुत्र और एक पुत्री का पिता बन चुका था लेकिन ज्ञानचंद का स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा था। एक दिन अचानक ही हृदयाघात से उनका देहांत हो गया।

पिता की अचानक मृत्यु से आहत माणिक को कुछ समय तो अपनी मानसिक पीड़ा से उबरने में लग गया फिर उसने व्यापार के साथ ही अनाथालय के संरक्षण  का जिम्मा भी स्वयं पर ले लिया।

सेठ ज्ञानचंद द्वारा नियुक्त आश्रम की संचालिका मायादेवी ने ७-८ वर्षों तक कार्यभार संभाला फिर उसने अपनी बढ़ती उम्र के कारण आगे आश्रम की जवाबदारी में खुद को अक्षम बताकर माणिक से आश्रम छोड़ने की अनुमति माँगी। माणिक पिताजी की सदस्यता वाली सामाजिक संस्थाओं में कभी कभार जाते रहते थे, उसने अपनी समस्या संस्था के सदस्यों के सामने रखी। वहाँ उन दिनों उस संस्था में शैलजा नाम की एक नई महिला सदस्य शामिल हुई थी।  उसने इस कार्य में रुचि प्रगट की। लगभग ३५ वर्षीय शैलजा ने बताया कि वो विधवा है।  दो साल पहले ही पति के एक सड़क दुर्घटना में देहांत के बाद वो अब अपने भाई-भाभी के साथ रहती है। वो दूसरी शादी करना नहीं चाहती और अपना जीवन समाज सेवा को ही समर्पित करना चाहती है। माणिक को और क्या चाहिए था, उसने तुरंत उसे “निर्मलादेवी बाल आश्रम” की संचालक नियुक्त कर दिया। और स्वयंम संरक्षक के पद पर बना रहा।

समाज में माणिक अब  माणिक सेठ  कहलाने लगा था। कुछ समय सामान्य रूप से गुजर गया। धीरे-धीरे संस्थाओं के माध्यम से उसका परिचय राजनेताओं से भी होता गया। जिनके सहयोग से अनाथालय के लिए आर्थिक अनुदान की व्यवस्था सुचारू रूप से होने लगी।

लेकिन कहा जाता है कि इंसान का स्वभाव कुछ अपवादों को छोड़कर कभी नहीं बदलता। माणिक का भी यह स्वरूप ओढ़ा हुआ बाहरी मुखौटा था, कुछ ही समय बाद उसका वास्तविक रूप सामने आने लगा। शैलजा को  अकेली देख-जानकर उसका रसिक-मिजाज, वासना लोलुप मन अपनी पत्नी सुषमा से उचाट होकर उसपर आसक्त होने लगा। शैलजा विधवा होने के साथ युवा और सुन्दर भी थी। उसकी भी कुछ अतृप्त यौन इच्छाएँ थीं, दोनों की उम्र में भी विशेष अंतर नहीं था अतः आश्रम का कार्यभार संभालने के बाद वो भी माणिक की तरफ आकर्षित होती चली गई।

लेकिन माणिक सेठ अपने युवा होते हुए पुत्र और पुत्री से गहराई से जुड़ा हुआ था, अतः उसने अपने क्रियाकलाप की भनक भी घर में नहीं लगने दी। आश्रम में वो रात में कभी नहीं रुकता था और कभी-कभी परिवार के साथ भी वहाँ चला  जाता था तो उनपर किसी को कोई शक नहीं होता था।

कुछ ही दिनों में उसने आश्रम पर नियुक्त सारे कर्मचारियों को किसी न किसी बहाने हटाकर अपनी शर्तों पर नई नियुक्तियाँ कर लीं, ताकि उसके कुकर्मों पर पर्दा बना रहे और उसके पिता की नेकनामी का लाभ भी उसे मिलता रहे।

माणिक के १० वर्ष इसी तरह ऐशो आराम में गुजर गए। उसका अधिकांश धन शैलजा पर खर्च होने लगा था फलस्वरूप उसकी आर्थिक स्थिति डांवांडोल होने लगी। इसका असर उसके आश्रम पर भी पड़ा और वहाँ पलने वाले बच्चे कुपोषण का शिकार होने लगे। उसकी बुद्धि ने कुंठित होकर उसे अपराध की दुनिया में धकेल दिया और वो  शीघ्र और अधिक धन कमाने के रास्ते खोजने लगा था।

पिता ज्ञानचंद ने बंगले के नजदीक ही एक नई बनी सोसायटी में एक दो बेडरूम, हाल, किचन का एक फ़्लैट ले रखा था, जिसका उपयोग वे संस्थाओं के सदस्यों के साथ विचार विमर्श करने में किया करते थे। जब भी मीटिंग होती वहाँ घरेलू सेवक  को बुला लेते और सबको चाय-नाश्ता करवाकर ही विदा करते थे। माणिक ने अब उसका उपयोग अवैध शराब के भण्डारण के लिए करने का विचार किया। लेकिन इसके लिए एक-दो विश्वसनीय आदमी होने आवश्यक थे जो वहाँ रहने के साथ ही उसके कार्य में भी सहयोग करें। इस बात पर विचार करने से उसका ध्यान अपने ही घर के कर्मचारियों की ओर आकर्षित हुआ।

उसके बंगले पर तीन कर्मचारी काम पर तैनात थे। एक पुराना सेवक अभिराम, जो घर के अंदरूनी कार्य किया करता था, वो रात में काम ख़त्म करके अपने घर चला जाता था। दो कर्मचारी और थे जिन्हें ज्ञानचंद जी ने चौकीदारी और ड्राइविंग के लिए नियुक्त किया था। वे दोनों भाई थे और शादीशुदा थे। उस समय दोनों की उम्र लगभग २५ के आसपास थी। उनकी नियुक्ति ज्ञानचंद द्वारा उनकी मृत्यु के कुछ माह पूर्व ही हुई थी। यहाँ काम करते हुए उन्हें अब ७-८ वर्ष हो चुके थे। इस अन्तराल में एक की पत्नी का देहावसान हो चुका था और दूसरे की झगड़ा करके उसे छोड़कर चली गई थी।

अतः माणिक ने उन दोनों की रहने की व्यवस्था बंगले के गैराज में बने एक कमरे में कर दी थी ताकि वे दिन-रात उसके संपर्क में रहें। माणिक ने उनको विश्वास में लेकर फ़्लैट में रहने और किन्हीं गरीब कन्याओं से विवाह करवाने का लालच दिया और अपने साथ अवैध कार्य में शामिल कर लिया।

अब उस फ़्लैट को घर का रूप दे दिया गया। दोनों भाई वहाँ रहने लगे और माणिक सेठ की गतिविधियाँ भी परदे के पीछे परवान चढ़ने लगीं।

लेकिन बात यहाँ तक ही समाप्त नहीं हुई,  कुछ समय गुजरते ही, माणिक का मन शैलजा से भी भरने लगा। उसकी वासना-युक्त निगाहें आश्रम की युवा होती हुई बालिकाओं की देह टटोलने लगी थीं और वो अपनी कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति के लिए शैलजा को ही मोहरा बनाने लगा था।

कहानी जारी रहेगी...

### अध्याय 9

मीनू, माया और ममता के विवाह के साथ ही नयना को आश्रम अब जैसे काट खाने को दौड़ता था। अमन की याद को तो बड़ी मुश्किल से दिमाग के कोने में कैद कर पाई थी कि अब यह झटका भी झेलना पड़ गया। आगे जिन मुश्किलों से गुजरना पड़ेगा, उसकी कल्पना मात्र से उसका रोम रोम सिहरने लगता था। लेकिन समय तो रुकता नहीं, लड़कियों की विदाई के अगले दिन ही शैलजा ने नयना, डाली और लता को बुलाकर लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा-

“बेटियो, मेरा अन्य कार्यों से बाहर आना-जाना लगा ही रहता है तो आज से पढ़ाई के अलावा रसोई के कार्यों में भी तुम तीनों को रसोई बनाने वालियों का सहयोग करना होगा। इस तरह तुम कुछ सीख भी सकोगी।”

तीनों बालिकाएँ उस समय कुछ कहना उचित न समझकर उनके निर्देशों का पालन करते हुए रसोई में जाकर भोजन तैयार करने वाली महिलाओं की सहायता करने में जुट गईं।

इस तरफ से संतुष्ट होने के बाद शैलजा तैयार होकर बाहर चली गई। एकांत पाते ही नयना ने डाली और लता को कमरे में बुलाकर मीनू के साथ हुई अपनी बातचीत विस्तार से उनको सुनाई और कहा-

“बहनो, अब हम तीनों को ही एक दूसरे का सहारा बनना है। हमें अब हर समय सावधान रहना चाहिए। इसके लिए हम तीनों हर समय हर पल साये की तरह एक दूसरे के साथ रहेंगी ताकि आश्रम का कोई पुरुष हमारा शारीरिक अथवा मानसिक शोषण न कर सके। हाईस्कूल पास करने के बाद ही देखा जाएगा कि ऊँट किस करवट बैठता है”।

“जो हुक्म मेरे आका, ऊँट चाहे जिस करवट बैठे,  हम तो तुम्हारी आज्ञा के बिना करवट भी नहीं बदलेंगी”। लता ने मुस्कुराकर विनोद के स्वर में कहा।

“मैं इस समय गंभीर हूँ लता, जो हश्र दीदी लोगों का हुआ है, वैसा हमारे साथ हरगिज़ न होने दूँगी। अनाथों के हक़ हड़पने और बेसहारा बालाओं पर अत्याचार का यह सिलसिला अब और आगे नहीं बढ़ने पाए, हमें इसके लिए कुछ ठोस उपाय

करने होंगे। आखिर आश्रम में हमेशा अँधेरे का ही राज क्यों होता है?  इस आश्रम के सुख-सूर्य को ग्रसने वाले माणिक सेठ के सारे राज फाश न किये तो मेरा नाम भी नयना नहीं”।

“मान गए डियर निन्नी, हम इन हब्शियों के आगे कभी हथियार नहीं डालेंगी। तुम्हारा दृढ़ संकल्प हमारा पथ प्रशस्त करता रहेगा।” कहते हुए डाली ने तैश में आकर अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।

विद्यालयों का नया सत्र आरंभ होते ही तीनों लड़कियों को सेठजी और शैलजा ने साथ जाकर राजकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय में दाखिला दिलवा दिया। यही नहीं, उन्होंने दिखावे के लिए ही सही, लड़कियों के आने जाने के लिए साईकिल उपलब्ध करवाने की माँग भी रखी,  मगर उनकी इस माँग को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि साइकिल केवल ५ किलोमीटर दूरी वाले स्कूलों अथवा कोलेजों के लिए उपलब्ध करवाई जाती है। आखिरकार तीनों सखियों ने आजादी की साँस ली।

आज स्कूल का पहला दिन था, स्कूल सुबह ९ से ४ बजे तक लगता था। वे बड़े सबेरे उठकर ऊत्साहपूर्वक तैयार हुईं। उन्होंने अपने कपड़ों में से सब्से अच्छे कपड़े छांटकर पहने। आज खाली हाथ ही जाना था। दो चार दिन में जब स्कूल की तरफ से यूनिफॉर्म और कॉपी किताबें मिल जाएँगी तो पढ़ाई भी शुरू हो जाएगी।

तैयार होकर उन्होंने आश्रम के बड़े हाल में लगी हुई दीवार घड़ी पर नज़र डाली तो आठ बज चुके थे। उन्हें पैदल ही दो किलोमीटर चलना था अतः वे जल्दी से निकल पडीं। रास्ता तो वे देख ही चुकी थीं, बातों-बातों में, बाहरी दुनिया के नजारों को आत्मसात करते हुए रास्ता कैसे  कट गया, उन्हें पता ही नहीं चला।

वे सोच रही थीं कि यह बंधनमुक्त दुनिया कितनी सुन्दर है। स्कूल सरकारी होने से अनाथों को निःशुल्क पढ़ाया जाता था तथा किताबें, कॉपियाँ भी फ्री उपलब्ध करवाई जाती थीं। विद्यालय का भवन पुराना अवश्य था लेकिन सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। स्टाफ रूम, लायब्रेरी, प्रयोगशाला और बड़ा सा खेल का मैदान आदि देखकर उन्हें सुखद अनुभूति हो रही थी।

पढ़ाई शुरू हो चुकी थी। नयना ने विज्ञान विषय लिया था मगर डाली और लता ने आर्ट्स... अतः उनकी कक्षाएँ अब अलग-अलग हो गई थीं। डाली और लता की तो नई सहेलियाँ बन गई थीं  मगर नयना के मन में अमन ने बसेरा बनाया हुआ था अतः वो अंतर्मुखी हो चली थी। जहाँ खाली पीरियड्स में डाली और लता लड़कियों के स्टाफ रूम में बैठकर सखियों के साथ गप्पें लड़ाती चहकती रहती थीं वहीं नयना वो समय लायब्रेरी में यों ही कोई किताब सामने रखकर अमन  के साथ बातें करते हुए बिता देती थी।

स्वाधीन साँसों का यह सुहाना सफ़र तीनों सखियों के अनाथ जीवन का स्वर्ण काल था। वे स्कूल हमेशा मुख्य सड़क से ही जाती थीं। कभी कभी आवारा लड़के उनका पीछा करते और इशारों से रुकने या पास आने का इशारा भी करते तो वे उस तरफ से मुँह फेर लेतीं जैसे उन्हें देखा ही नहीं। सड़क के किनारों पर आम अमरूद और इमली के फल वृक्ष देखकर उनके मुँह में पानी आ जाता और  वे अक्सर  गिरे हुए फल बटोरकर अपने बस्ते में रख लेतीं फिर स्कूल की आधी छुट्टी में चटखारे लेकर खातीं।

छुट्टी में बाहर निकलते ही प्रतिदिन गेट के एक तरफ एक अधेड़ व्यक्ति बड़े से टोकरे में उबले हुए चने लेकर बैठा मिलता था। वो हर लड़की को प्यार-मनुहार से बेटी संबोधित करके बुलाकर चने का दोना हाथ में देता था। आश्रम में उन्हें भोजन  दिन में ही मिलता था अतः तीनों सखियाँ आश्रम से भूखी ही निकलती थीं। अब चने का दोना और बस्ते में बटोरकर लाई हुई इमली और कच्चे आम लेकर एक पेड़ के नीचे बैठकर खाकर तृप्त हो लेती थीं। एक बार नयना ने उस व्यक्ति से पूछा-

“बाबा, आप इतने सारे चने प्रतिदिन कहाँ से लाते हैं?”

“बेटी मुझे यहाँ एक धनवान भले मानुष ने इस कार्य के लिए पगार पर नियुक्त किया है। निकट ही उनका भवन है। स्कूल शुरू होने के बाद मैं प्रतिदिन उनके दिए हुए चने लेकर यहाँ  बैठ जाता हूँ, फिर छुट्टी होने तक आसपास के धर्मालु लोग अपने घरों से उबले हुए चने ला कर टोकरी में यह कहकर डालते जाते हैं कि ये हमारी बेटियों के लिए हैं हम खुशकिस्मत हैं कि हमें संयोग से बेटियों की दुआएँ पाने का अवसर मिला है। यह टोकरी हमेशा भरी रहती है और चने कभी कम नहीं पड़ते। बचे हुए चने मैं अपने घर ले जाता हूँ।”

नयना पापी अँधेरे के पीछे छिपे पुण्य-प्रकाश के इस पहलू से पहली बार रूबरू हुई थी, सोचा करती- “एक तरफ तो बेटियों के मान-रक्षक धर्मनिष्ठ दानी मानव और दूसरी तरफ इसी दुनिया की उन्हीं बेटियों के सम्मान के भक्षक कर्मभ्रष्ट बेपानी दानव, वाह री, दोरंगी दुनिया”!

इस तरह पाप और पुण्य रूपी दो प्रवेश-द्वारों के बीच प्रतिदिन दो किलोमीटर का सफर तय करते हुए चार साल का समय इस तरह सरक गया कि उसकी सरसराहट भी सखियों ने महसूस नहीं की। अब केवल परीक्षाएँ शेष थीं मगर  नयना के नयनों की नींद यह सोचकर उड़ी हुई थी कि १२ वीं की परीक्षा समाप्त होने तक वे बालिग तो हो चुकेंगी मगर इसके बाद क्या होगा?

वो सोचती थी कि अब तक तो उनके साथ कोई अप्रिय प्रसंग शायद इसी कारण घटित नहीं हुआ कि वे परछाई की तरह एक दूसरी के साथ चिपकी रहती थीं। आगे न जाने क्या हो... सेठजी का शालीनता का लबादा स्थाई तो नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी दानवी प्रवृत्ति वाले इंसान का स्वभाव इतनी आसानी से नहीं बदल सकता। वातावरण की यह शांति आने वाले तूफान का संकेत ही हो सकती है मगर  सेठजी क्या जानें कि हम भी सजग हैं और उजले आवरण में छिपे उसके काले कर्मों से बखूबी परिचित हो चुकी हैं।

फिर भी एक शंका तो उसके मन में बनी हुई थी कि पढ़ाई पूर्ण होने के बाद अगर अमन मिलने नहीं आया अथवा उसे आने नहीं दिया गया तो क्या होगा? उनको तो परीक्षा परिणाम के बाद यह आश्रम छोड़ना ही है।

अमन ने आने का वादा तो किया है लेकिन सेठजी की नीयत का कोई भरोसा नहीं। यह सब सोचते सोचते नयना का सिर घूमने लगता मगर कोई समाधान नहीं सूझता था।

लता उसे पुनः उदास देखकर कहती-

“निन्नी, भविष्य की चिंता तो हमें भी है इस तरह चिंतित होने से हमारे परीक्षा-परिणाम पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। हमें अब केवल पढ़ाई पर ही ध्यान देना चाहिए।”

“सही कह रही हो सखी, हमें बेहतर परिणाम के लिए खूब मेहनत करनी चाहिए। कल से तैयारी के लिए छुट्टियाँ लग जाएँगी, हमें परीक्षा होने तक अब रसोई में नहीं जाना है। आंटी को हमारी यह बात माननी ही होगी।”

“बिल्कुल निन्नी, अब तो वे कुछ अलग ही मंसूबे बना रही होंगी तो हमपर दबाव भी नहीं डालेंगी।” डाली ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा।

आखिर समय पर परीक्षाएँ संपन्न हो गईं और छुट्टियों के साथ ही उनकी वो स्वप्नीली सुन्दर दुनिया भी अब आभासी होकर मन के दायरे में दाखिल हो गई।

परीक्षा का परिणाम घोषित होने तक अब पुनः आश्रम की कैद में ही इंतजार करने को मजबूर हो गईं।

कहानी जारी रहेगी...

### अध्याय 10

छुट्टियाँ तो थीं ही, अब तीनों सखियाँ दिन भर आश्रम के कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखने लगीं, मगर तीनों एक दूसरी का साया बनी एक साथ ही हर स्थान पर कार्य करती थीं ताकि किसी पुरुष कर्मचारी को उनपर कुदृष्टि डालने का अवसर ही न मिले। रात में भी एक साथ भोजन करके बिस्तर पर अपने भविष्य की योजना पर चर्चा करती रहती थीं।

उस दिन दोपहर का खाना सेठजी के घर से आया था और सेठजी शाम तक आश्रम में ही शैलजा के साथ आश्रम के ऑफिस में, चर्चा में व्यस्त थे। तय था कि वे हमेशा की तरह भोजन करके ही जाएँगे अतः उनके लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की गई थी। रसोई की कर्मचारियों ने  अपना काम पूरा करके शैलजा से घर जाने की अनुमति लेकर घर का रुख किया। बाकी काम तीनों लड़कियों को सहेजना था। शैलजा ने डाली और लता से कहा-

“तुम दोनों ज़रा उस विभाग में जाकर लड़कों के बिस्तर लगा दो, आज वहाँ का कर्मचारी जल्दी चला गया है। यहाँ अब अधिक काम नहीं है, नयना देख लेगी।

बाद में आकर तुम तीनों भोजन कर लेना।”

डाली और लता वहाँ चली गईं तो नयना को शैलजा ने ऑफिस में आने का इशारा किया।

वहाँ नयना ने सेठजी की मौजूदगी की बात कही तो उसने कहा-

“सेठजी तुमसे ही कुछ पूछना चाहते हैं”।

नयना सोच में पड़ गई कि क्या करे। उसे अब सेठजी की उपस्थिति से ही डर लगने लगता था फिर डाली और लता को दूसरी तरफ भेजने से उसके मन में शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। शैलजा उसके मन की बात ताड़ गई और बोली-

निन्नी बेटे, सेठजी से डरने की कोई बात नहीं है, वे इस आश्रम के सञ्चालक वर्ग के प्रमुख हैं और तुम लोगों का बुरा कभी नहीं चाहेंगे। मैं भी तो साथ हूँ न...

नयना बिना किसी प्रत्युत्तर के चुपचाप उनके साथ चली गईं।

सेठजी ने उसे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और बिना भूमिका बाँधे पूछा-

गुड़िया, यह तो तुम जानती ही हो कि १८ वर्ष की यानी बालिग होने पर लड़कियों को आश्रम छोड़ना पड़ता है। लेकिन अगर वे चाहें तो हमारी शर्तों पर विवाह होने तक यहाँ रह सकती हैं। मैं जानता हूँ कि डाली और लता का प्रतिनिधित्व तुम्हीं करती हो तो बताओ इस बारे में तुमने क्या विचार किया है?

“कैसी शर्तें अंकल? हमने तो अभी कोई विचार नहीं किया, परीक्षा का परिणाम आने पर ही तय करेंगी कि क्या करना है”।

"परीक्षा का परिणाम भी दूर नहीं है, गुड़िया... शर्तें तो यही हैं कि विवाह होने तक तुम लोगों को आश्रम के कार्य संभालने के अलावा संचालक शैलजा जी की अनुमति के बिना कहीं आने-जाने की सुविधा नहीं दी जाएगी। लेकिन अगर तुम चाहो तो मैं सिर्फ तुम्हारे लिए तुम तीनों का आगे पढ़ने के लिए कॉलेज में दाखिला दिलवा सकता हूँ।"

“मेरे लिए विशेष सुविधा किसलिए अंकल?”

“तुम्हें मैं दिल से चाहता हूँ गुड़िया रानी, तुम्हें बस कभी-कभी मेरी इच्छा का ध्यान रखना होगा। मेरी बात मानोगी तो मैं तुम तीनों को कॉलेज में एडमिशन दिलाने के साथ आने-जाने के लिए स्कूटी और  मोबाइल दिलाने के अतिरिक्त अच्छा भोजन-वस्त्र भी उपलब्ध करवाता रहूँगा। यह सब सिर्फ तुम्हारी खातिर करूँगा। तुम्हारी सहेलियों को हमारे सम्बन्ध की भनक भी नहीं लगने पाएगी। और अगर तुम लोगों ने आश्रम छोड़ भी दिया तो तुम्हारा क्या हश्र हो सकता है, इसका अनुमान तुम लगा सकती हो। मैं चाहूँ तो आसानी से किसी भी लड़की को अपनी अंकशायिनी  बना सकता हूँ मगर मैं किसी के साथ ज़बरदस्ती कभी नहीं करता। मेरी बात मानने वाली यहाँ की हर लड़की विवाह के बाद सम्मान से अपनी गृहस्थी बसा लेती है।” कहते हुए सेठजी ने अपना हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखे नयना के हाथ को दबा दिया।

नयना ने इधर उधर देखा तो शैलजा वहाँ से जा चुकी थी। वो तुरंत उनका हाथ झटककर खड़ी हो गई और कठोर स्वर में बोली-

“अंकल, मैंने आपके इस रूप की कल्पना भी नहीं की थी कि लड़कियों के अनाथ और असहाय होने का आप इस तरह फायदा उठाते हैं।

हमें चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े, अपने सम्मान का सौदा यानी स्त्रीत्व का अपमान कभी स्वीकार नहीं करेंगी। याद रखिये, सिर्फ हौसलों के बल पर एक दिया भी तूफान से लड़ सकता है। आप हमारा मनोबल कभी नहीं तोड़ सकते... परीक्षा का परिणाम आते ही हम आश्रम छोड़ देंगी। अपमानित आश्रय से सम्मानित संघर्ष हमे सौ बार स्वीकार है”।

“इस समय तुम जोश में हो गुड़िया, बैठो और होश में आकर ज़रा गौर से मेरी बात पर विचार करके बताओ, कि यहाँ सुख सुविधाओं के बीच अपना कैरियर बनाना चाहती हो या सड़कों पर भीख माँगकर ज़िन्दगी ख़राब करना...”

“मैं पूरी तरह होश में हूँ अंकल, मेरा निर्णय अडिग है, आप किसी गलतफहमी में न रहिएगा।”

कहते हुए नयना कक्ष से बाहर निकल कर रसोई में पहुँच गई। तब तक डाली और लता भी लड़कों के बिस्तर ठीक करके वापस आ गई थीं। नियमानुसार उन्होंने छोटे बच्चों को भोजन परोसकर खिलाया  फिर उन्हें एक  कर्मचारी ने  परोसकर खिला दिया। शैलजा अपना भोजन बैठक में ही करती थीं। उन्होंने सेठजी और अपना भोजन वहीँ मंगा लिया था।

खाना खाकर शयन कक्ष में जाते ही नयना ने सारा किस्सा सखियों को सुनाया कि किस तरह उसने सेठजी के मंसूबों को मटियामेट कर दिया था। फिर वे देर रात तक आश्रम छोड़ने के बाद की स्थिति पर विचार विमर्श करती रहीं।

आखिर तय किया गया कि वे परीक्षा के परिणाम के बाद जिस दिन अंक सूची लेने जाएँगी, उसी दिन स्कूल से ही जानकारी लेकर बिना किसी सामान के आगरा के लिए बस पकड़ लेंगी। और वहाँ पहुँचकर किसी तरह अमन का पता लगाकर आगे योजना पर विचार करेंगी। परिणाम की सूचना तो आश्रम में ही मिल जाएगी, मगर सुरक्षा के मद्देनजर अपनी योजना की जानकारी आश्रम के किसी भी कर्मचारी अथवा शैलजा आंटी को नहीं देनी है, क्योंकि हो सकता है, सेठजी उनके लिए कोई नया जाल बिछाने की तैयारी कर चुके हों। बाकी सब परिस्थिति के अनुसार ही निर्णय लेना होगा।

उस रात तीनों को नींद ही नहीं आई। उस रात के बाद लम्बे समय तक सेठजी आश्रम नहीं पधारे। शैलजा का भी नयना के साथ व्यवहार सामान्य ही था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन नयना उस वासना लोलुप, निकृष्ट नरपशु माणिक सेठ के प्रति आँखें खुली ही रखना चाहती थी।

उधर नयना द्वारा अपमानित होकर माणिक शांति से तो बैठ नहीं सकता था सिर्फ अपने हावभाव छिपाने के लिए उसने आश्रम जाना छोड़ दिया था। वो नयना को सबक सिखाने के लिए कोई सुरक्षित मार्ग खोज रहा था। अचानक उसे एक कुत्सित विचार सूझा और अपनी सूझबूझ पर अपनी ही पीठ थपथपाते हुए उसने बलराम-जयराम को बुलाकर कहा-

“देखो बलराम, अब इस उम्र में तुम दोनों के लिए कोई कन्या तो मिलने से रही, लेकिन तुम दोनों अगर मेरी योजना में शामिल हो जाओ तो एक सुन्दर और अल्हड़ युवा लड़की तुम दोनों के लिए उपलब्ध हो सकती है।”

“मैं समझा नहीं सेठजी, आप किस लड़की की बात कर रहे हैं और यह कैसे संभव है।”

माणिक ने उनको नयना के बारे में बताकर उसके अपहरण की योजना में शामिल होने की बात कही। पहले तो बलराम डर के मारे इनकार करता रहा लेकिन जब माणिक ने अवैध कारोबार में उनको फँसाने की धमकी दी तो उनको मजबूर होकर उसकी बात माननी पड़ी और देर तक नयना के अपहरण की योजना पर चर्चा होती रही।

कुछ दिन बाद जब शैलजा को परीक्षा का परिणाम आने का समाचार मिला तो उसने नयना को बुलाकर सूचना दी और कहा-

“निन्नी, अब परिणाम तो आ चुका है, तुम तीनों को शीघ्र ही यह आश्रम छोड़ना पड़ेगा।”।

“हमने तय कर लिया है आंटी,  हम अंक सूची प्राप्त करने के लिए अगले सत्र के लिए स्कूल खुलने तक इंतज़ार करेंगी। उसके बाद आश्रम छोड़ देंगी”। नयना ने रुखाई से जवाब दिया

उनको रिज़ल्ट की सूचना तो मिली मगर आश्रम में जो समाचार पत्र आता था उसमें उसकी जानकारी नहीं थी और यहाँ कम्प्यूटर की भी व्यवस्था नहीं थी अतः उनको स्कूल जाकर ही पता लग सकता था। यह जून का महीना था और स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थीं मगर नयना जानती थी कि छुट्टियों के दिनों में स्कूलों के कार्यालय खुले रहते हैं,  जिनमें नॉन टीचिंग स्टाफ उपस्थित रहता है अतः वे स्कूल  जाकर परिणाम देख आएँगी। फिर अंकसूची स्कूल का नया सत्र आरम्भ होने पर लेने चली जाएँगी।

अगले दिन शैलजा को स्कूल के कार्यालय से सूचना मिली कि स्कूल के सूचना-पट पर परीक्षा का परिणाम लग चुका है। इस बार दिल्ली में मानसून के जल्दी आने के संकेत मिले हैं, अतः कार्यालय सप्ताहांत के बाद बंद हो जाएगा। इस बीच छात्र-छात्राएँ आकर अपना परीक्षा-परिणाम देख सकते हैं। अंकसूची तैयार होने में समय लगेगा अतः वो स्कूल खुलने के बाद ही मिल सकेगी।

शैलजा ने नयना को बुलाकर यह बात बताई तो नयना ने कल ही डाली और लता के साथ जाने की बात कह दी।

उस रात खाना खाने के बाद लता की तबियत खराब होने लगी और उल्टी दस्त के साथ बुखार आ गया।

उस समय तो शैलजा ने आश्रम में उपलब्ध बुखार की गोली खिला दी तो उसे नींद भी आ गई मगर सबेरे फिर उसे तेज़ बुखार चढ़ गया।

नयना ने लता के स्वस्थ होने तक स्कूल जाना स्थगित कर दिया और वो डाली के साथ उसकी देखरेख में लग गईं। तीन दिन बाद उसका बुखार तो उतर गया मगर कमज़ोरी होने के कारण वो पैदल स्कूल तक जाने में असमर्थ थी। परिणाम लेने जाना भी अनिवार्य था वरना स्कूल पर पूरी तरह ताला लग सकता है। नयना ने  शैलजा से लता की देखरेख के लिए एक कर्मचारी को लगाने और डाली के साथ परिणाम देखने के लिए स्कूल जाने की अनुमति माँगी।

शैलजा ने दो टूक जवाब देते हुए कहा-

“निन्नी तुम जानती ही हो कि यहाँ कर्मचारियों की कितनी कमी है, तुम डाली को लता की देखरेख में  छोड़कर अकेली भी जा सकती हो, स्कूल के रास्ते से तो परिचित हो ही...”

नयना वैसे नहीं भी जाती तो स्कूल खुलने पर अंकसूची के साथ परिणाम मालूम होना ही था और आगे पढ़ने की भी कोई योजना नहीं थी। लेकिन उत्सुकता को रोक पाना मुश्किल था। अतः उसने डाली को लता की देखभाल के लिए छोड़कर अकेली ही स्कूल जाने का निर्णय लिया। सड़क ट्राफिक वाली थी, अतः स्कूल अकेली जाने में डर की कोई बात नहीं थी, बल्कि आश्रम में लता को अकेली छोड़ने में डर बना रहता।

सुबह जल्दी ही नयना निकल पड़ी। स्कूल पहुँचकर सूचना पट पर कार्यालय के एक अधिकारी की सहायता से वो तीनों के रोल नंबर खोजने लग गई।

जब उसने प्रथम श्रेणी की सूची में तीनों के रोल नंबर देखे तो प्रसन्नता से उसकी आँखों से आँसू छलछला आए। उनकी मेहनत रंग लाई थी।

अधिकारी ने उसे बधाई देते हुए अंकसूची लेने के लिए स्कूल खुलने के बाद आने को कहा। नयना उन्हें धन्यवाद कहकर वापस जाने के लिए निकल पड़ी।

क्रमशः

### अध्याय 11

जून का तीसरा सप्ताह चल रहा था। आसमान में सुबह से ही हल्के बादल छाए हुए थे जो अब तक सघन हो चले थे। नयना ने आधी दूरी भी तय नहीं की थी कि हल्की- हल्की बूँदा-बाँदी होने लग गई। घबराकर नयना ने चाल और तेज़ कर दी। वो रिज़ल्ट वाला अखबार तो खरीद नहीं सकती थी,  अब जल्दी ही शुभ समाचार सखियों को सुनाने के लिए आतुर थी। लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। अचानक बारिश तूफानी गति से तेज़ होती गई।

नयना के पास छाता नहीं था अतः वो एक तरफ एक घने पेड़ के नीचे खड़ी होकर बारिश रुकने या कम होने का इंतज़ार करने लगी। सड़क से पैदल चलने वाले लोग गायब हो गए थे लेकिन वाहनों का आना जाना बदस्तूर था। तभी एक तरफ से तेज़ गति से आती हुई एक कार उसके निकट ही आकर रुक गई और आगे की खिड़की खोलकर माणिक ने नयना को संबोधित करके पूछा-

”अरे गुड़िया, यहाँ अकेली क्या कर रही हो”?

”अंकल मैं रिज़ल्ट देखने स्कूल गई थी। अब वापस जा रही हूँ”।

”ठीक है, वह सब बाद में बताना, अभी भीग रही हो, जल्दी से गाड़ी में बैठ जाओ,  मैं मीनू को कुछ सामान देने जा रहा हूँ,  कुछ समय लग ही जाएगा वापसी में तुम्हें आश्रम छोड़ता हुआ जाऊँगा। मैं शैलजा जी को सूचित कर देता हूँ”।

मीनू का नाम सुनते ही नयना के कान खड़े हो गए। सोचने लगी कि सेठजी ने शादी के बाद भी शायद मीनू से संबंध बनाकर रखे होंगे तभी तो उसे आश्रम में नहीं बुलाया जाता। उसे सेठजी से घिन सी आने लगी। पर इस समय वो चार साल बाद मीनू से मिल सकेगी, यह सोचकर ही रोमांचित हो उठी। उधर बारिश भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी तो  सेठजी का सामान्य व्यवहार देखकर वो बिना किसी दुविधा के चुपचाप पिछली सीट पर बैठ गई। वो नहीं जानती थी कि उसके अपमान से आहत होकर माणिक सेठ एक खूँखार दरिंदा बन चुका है और उसे फाँसने के  लिए जाल बुना जा चुका है।

कार चल पड़ी तो सेठजी ने गर्दन पीछे घुमाकर नयना से कहा-

“अब बताओ गुड़िया, तुम सबका  रिज़ल्ट कैसा रहा”?

“हम तीनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई हैं अंकल...”

“अरे वाह! फिर तो मेरी बधाई स्वीकार करो। इस ख़ुशी में अगली बार आश्रम में आने पर मिठाई बँटवाऊँगा।”

नयना कोई जवाब न देकर अपने ही विचारों में खोई रही।

कार चिकनी सड़क पर सरपट दौड़ी जा रही थी। लगभग आधे घंटे के बाद नई बनी हुई बहुमंजिला इमारतों का सिलसिला आरम्भ हो गया। कुछ आगे अन्दर की तरफ एक दो मोड़ लेकर गाड़ी एक बहुमंजिला इमारत के गेट के आगे रुकी फिर वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी ने सेठजी को गाड़ी में देखते ही गेट खोल दिया और गाड़ी अन्दर दाखिल हो गई।

सेठजी ने उतरकर पीछे का गेट खोलकर नयना को उतरने के लिए कहा। नीचे उतरकर नयना विस्मय से चारों तरफ देखती जा रही थी। वो सेठजी के पीछे एक बड़े से कक्ष में दाखिल हुई। उस कक्ष में कुछ बेंचें लगी हुई थीं जो उस समय खाली थीं।

एक कोने में एक कुर्सी पर बैठा हुआ एक व्यक्ति सामने रखी हुई मेज पर सिर रखकर ऊँघ रहा था। उनकी आहट से वो सजग होकर बैठ गया। पीछे ड्राइवर भी सामान के एक बड़े से झोले के साथ आ गया था। फिर सेठजी ने एक बंद गेट के एक तरफ का बटन दबाया तो दरवाजा खुल गया और वे तीनों अन्दर प्रविष्ट हो गए। नयना बहुमंजिला इमारतों में ऊपर नीचे जाने वाली लिफ्ट के बारे में किताबों में पढ़ चुकी थी तो सेठजी को १५ नंबर के बटन को दबाते देख वो समझ गई कि यह लिफ्ट है और उन्हें १५ वीं मंज़िल पर लेकर जा रही है। यानी मीनू दीदी इसी बिल्डिंग में पंद्रहवीं मंजिल पर रहती हैं। लिफ्ट के रुकते ही वे बाहर आ गए। वहाँ छोटी सी गैलरी में दो दरवाजे थे। सेठजी के एक दरवाजे के बाहर लगे हुए बटन को दबाते ही एक व्यक्ति ने आकर दरवाजा खोल दिया और एक तरफ हट गया।

उन तीनों के अन्दर प्रवेश के साथ ही उस व्यक्ति ने तुरंत गेट बंद कर दिया। नयना की निगाहें इधर-उधर घर का निरीक्षण करने के साथ ही मीनू को तलाश रही थीं। एक तरफ उसे अस्त व्यस्त रसोईघर दिखा मगर मीनू वहाँ नहीं थी।  सेठजी ने उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए एक कक्ष में प्रवेश किया। नयना ने सोचा, शायद मीनू अन्दर ही होगी और वो भी सेठजी के पीछे कक्ष में पहुँच गई।

लेकिन मीनू वहाँ भी नहीं थी। मगर उसके अन्दर आते ही सेठजी ने बाहर जाकर कमरे को बाहर से लॉक कर दिया। नयना समझ गई कि उसे छल से यहाँ लाया गया है, वो रो रो कर बदहवास होकर दरवाजा पीटने लगी।

थोड़ी ही देर बाद सेठजी कमरा खोलकर उसके निकट आए तो उनके मुँह से आने वाली बदबू से नयना समझ गई कि वो शराब पीकर आए हैं। वो सहमकर पीछे हटने लगी तो माणिक उसका कंधा दबाते हुए कुटिलता पूर्वक बोला -

“नयना रानी, बोलो अब क्या विचार है...तुमने सोचा होगा, तुम्हें सेठजी से आसानी से छुटकारा मिल गया, मगर मैं भी तुम्हें हासिल करने का इरादा कर चुका था। अगर तुम आश्रम में ही मेरी बात मान लेती तो पढ़ाई पूरी करने के साथ ही विवाह करके सुखी जीवन बिता देती,  मगर खैर! वहाँ न सही यहीं सही...अब तो सिर्फ मेरी इच्छा पूर्ति ही नहीं करनी बल्कि तुम्हें मेरे कर्मचारियों की भी घरवाली बनकर हम बिस्तर होने के अलावा उनके सारे कार्य करने होंगे। आश्रम में मैं मनमानी नहीं कर सकता था मगर यहाँ तुम पूरी तरह मेरी मुट्ठी में हो। अब चूँकि मेरा यह ठिकाना,  मेरी असलियत तुम जान चुकी हो तो आजीवन मेरी बंदिनी बनकर रहना पड़ेगा। यहाँ से बाहर कदम रखने का प्रयास भी न करना...वरना तुम्हारी उन दोनों चहेतियों को ऐसी जगह भेज दिया जाएगा जहाँ शरीफ इंसान  जाने के लिए सौ बार सोचते हैं।”?

खुद को असहाय और घिरा हुआ देखकर नयना की आँखों में आँसू आ गए। वो गिड़गिड़ाकर बोलने लगी-

“मैंने आपका क्या बिगाड़ा है अंकल,  मैं तो आपकी बेटी समान हूँ, कृपया मुझे छोड़ दीजिए”।

“हा... हा... हा... बेटी समान हो मगर बेटी नहीं।  तुमने मेरा तिरस्कार करके अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मारी है, अब इन ज़ख्मों को सहलाने यहाँ कोई नहीं आएगा”। कहते हुए सेठजी ने उसे खींचकर पलंग पर धकेल दिया।

नयना हाथ पैर पटकती, जार-जार रोती चीखती, छटपटाती रही और वो नराधम चटखारे लेते हुए उसके तन को तार-तार करता रहा। फिर जी भर जाने के बाद उसका कसाव ढीला पड़ते ही नयना ने अपने वस्त्र सँभाले और उसे हिकारत से देखते हुए बोली-

“याद रखना पापी माणिक सेठ,  तुमने धोखे से मेरा अपहरण करके बलपूर्वक शील भंग किया है। तुम्हें रावण कहना रावण का भी अपमान ही होगा। उसने तो माँ सीता का केवल अपहरण ही किया था तो भी श्रीराम ने पूरी तरह उसका साम्राज्य नेस्तनाबूद कर दिया। मगर इस युग में भी कोई राम अवश्य अवतरित  हुआ होगा जो  मुझ जैसी अनगिनत असहाय बालाओं की पुकार सुनकर तुम्हारे पतित रक्त की एक-एक बूँद को रसातल दिखाकर रहेगा,  ताकि कोई नया रक्तबीज फिर जन्म न ले सके”।

“नहीं गुड़िया, इतनी बद्दुआ मत दो, अभी तो बरसों तुम्हें हम सबका जी बहलाना है,

चुपचाप हमारे काम करती रहोगी तो तुम्हें हम और कोई कष्ट नहीं देंगे”।

और अट्टहास करते हुए वो वहाँ से चला गया।

क्रमशः

### अध्याय 12

सेठजी के कमरे से जाने के तुरंत बाद वो व्यक्ति जिसने द्वार खोला था,  अंदर आया और नयना के निकट बैठकर उसकी पीठ सहलाते हुए सहानुभूति जताकर  पानी पिलाने लगा। नयना ने उसका हाथ झटककर गिलास गिरा दिया और उसे परे धकेल दिया।

“नयना रानी,  तुमने सेठजी की बात नहीं सुनी...? मेरा नाम बलराम है। मैं सेठजी के बँगले पर रात की ड्यूटी पर और दिन में घर पर ही रहता हूँ। हम दो भाई हैं और दोनों सेठजी के कर्मचारी हैं। आज से तुम्हें हम दोनों भाइयों की घरवाली बनकर रहना होगा और घर के सारे कार्य भी सँभालने होंगे। दिन के भोजन की व्यवस्था हो चुकी है, जब मन करे रसोई से लेकर खा लेना।”  इतना कहकर उसने पुनः नयना को निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया।

नयना में अब चीखने-चिल्लाने अथवा विरोध करने की शक्ति भी शेष नहीं थी, वो जीवित लाश की तरह निढाल स्वयं को लुटते हुए देखती रही और बलराम उसे जी भरकर निचोड़ने के बाद उठते हुए बोला-

“देखो रानी,  मेरे जाते ही जयराम यहाँ आएगा और रात भर तुम्हारे साथ रहेगा। तुम्हारे लिए यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं है अतः अब आँसू बहाना छोड़कर ख़ुशी ख़ुशी हमारी इच्छा पूरी करते रहना ही तुम्हारे लिए एकमात्र विकल्प है।”

इतना कहकर वो कमरे से बाहर हाल में रखे हुए पलंग पर पसर कर खर्राटे भरने लगा।

नयना में अब शक्ति लेश मात्र भी शेष न थी। भूख से अलग प्राण व्याकुल हो रहे थे। मगर इस समय परिस्थितियों से समझौता करके फिर अपनी दशा पर विचार करने की बात सोचकर वो यंत्रचालित पुतली की तरह चुपचाप रसोई में पहुँच गई और पानी पीकर सारे सामान उलट पुलट कर देखने लगी। जो बैग उसके साथ ही उन पिशाचों द्वारा लाये गए थे उसमें फल, सब्जियाँ और सलाद आदि थे। बाकी सारा सामान भी इधर-उधर से झाँकता हुआ दिख रहा था। वहीँ पर कुछ तैयार भोजन भी रखा हुआ था। उसने थोडा सा खाना लेकर कमरे में जाकर नीचे बैठकर खा लिया फिर वापस रसोई में बर्तन रखकर कमरे में आकर निढाल सी सो गई।

उसका शरीर टूटा जा रहा था और आँखें मुंदी जा रही थीं। कब उसे झपकी लग गई इसका उसे तब पता चला जब बलराम ने उसे झिंझोड़कर जगा दिया और बोला-

“उठो रानी, कुछ देर में जयराम आ जाएगा,  तुम रसोई में जाकर जल्दी से भोजन तैयार करो। सामान सब वहीं मिल जाएगा।”  फिर वो हाल में टी वी चालू करके बैठ गया।”

नयना चुपचाप रसोई में पहुँच गई। लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कैसे और कहाँ से शुरुवात करे...खाना बनाना तो वो जानती थी फिर भी खुद को असहाय और अकेली पाकर दिमाग काम नहीं कर रहा था। फिर भी उसने  एक नज़र इधर-उधर डाली और खाना बनाने में जुट गई।

नए और अपरिचित स्थान पर उसे कुछ परेशानी भी आई लेकिन एक घंटे में ही उसने दाल-चावल, सब्जी-रोटी बनाकर रख दी और कमरे में चली गई।

कुछ देर में बलराम उसके पास आकर बोला-

“नयना रानी, आओ भोजन कर लो।  तुम्हें जयराम के आने से पहले खाना  खा लेना चाहिए। वरना भूखे पेट उसकी भूख कैसे शांत करोगी...?”

मगर नयना बाद में खाने की बात कहकर बैठी रही। फिर जब टी वी की आवाज़ आने लगी तो चुपचाप उठकर थोड़ा सा खाना लेकर खा लिया।

जैसे ही डोर-बेल बजी,  बलराम ने उसका कमरा बाहर से लॉक कर दिया। नयना का दिल बैठने लगा। वो मरी सी हालत में पलंग पर पड़कर आँखें बंद करके फिर उसी आँधी का सामना करने की हिम्मत जुटाने लगी। उसने गेट खुलने फिर बंद होने की आवाज़ सुनी फिर कुछ ही देर में कमरे के खुलने और किसी के आने की आहट और...

किसी ने उसे खींचकर उठाया और अपना परिचय देते हुए बोला-

“नयना रानी, तुमने मुझे पहचान तो लिया होगा,  मैं जयराम हूँ, सेठजी के साथ आश्रम में भी आता रहता था।”  कहते हुए उसने अपने मोबाइल पर म्युज़िक ऑन किया, फिर उसके साथ वही घिनौना खेल शुरू कर दिया। नयना की चीखें, रुदन, कराहें, आहें सब घुटकर उस चौखट के अन्दर कैद हो गईं और उसे तब तक रौंदा जाता रहा जब तक वो बेहोश न हो गई।

लगभग आधी रात को उसकी नींद खुली तो कमरे में जीरो बल्ब जल रहा था और वहाँ कोई नहीं था। उसे प्यास लगी थी। लेकिन उठते हुए उसका बदन बुरी तरह दर्द करने लगा। किसी तरह कमरे का द्वार खोलकर धीरे-धीरे किचन से पानी ले आई, पीकर फिर बिस्तर पर पड़ गई।

सुबह मुँह अँधेरे ही जयराम ने उसे झिंझोड़कर उठाया और बोला-

“उठो नयना रानी, बहुत आराम हो गया। जल्दी से चाय नाश्ता बनाकर मेरे लिए दिन का टिफिन तैयार करो। बलराम एक घंटे में पहुँच जाएगा।”

नयना उनके नाम से तो परिचित हो चुकी थी,  न जाने क्या सोचकर इनके माता-पिता ने इन रावणों के नाम के साथ राम का नाम चिपका दिया था। मन ही मन उसने उनके नाम के आगे राम हटाकर रावण कर दिया था। वो उन रावणों को कुछ भी जवाब देना व्यर्थ समझकर गूँगी गुड़िया की तरह चुपचाप काम में लग जाती थी।

डोर बेल बजते ही उसे कमरे में जाने को कहकर बाहर से लॉक कर दिया गया। लगभग आधे घंटे के बाद जब बलराम ने द्वार खोला तो जयराम खा-पीकर टिफिन लेकर जा चुका था।  हाल के द्वार का अन्दर से ताला लगा दिया गया था। बलराम उसे जी भरकर निचोड़ने के बाद नहाने चला गया।

नयना दिन भर मशीन की तरह काम करती रहती। जब उसका दर्द महसूस करने वाला कोई नहीं था  तो रोकर भी क्या होता। इन निर्दयी राक्षसों से राहत की कोई उम्मीद ही नहीं थी।

बलराम कभी-कभी उसे भी नाश्ते या खाने पर साथ बैठने को बोलता था मगर नयना कोई उत्तर नहीं देकर अपना काम करने लग जाती थी। अतः फिर उसने उसे बोलना छोड़ दिया। खा पीकर उसे घर के सारे कार्य सहेजने की हिदायत देकर हाल में पलंग पर सो जाता था।

उसके नींद के आगोश में जाते ही नयना  नहा धोकर, सफाई के अलावा रसोई के काम सहेजती और अपना भोजन कमरे में ही कर लेती थी। धीरे धीरे उसने पूरे घर पर खोजी दृष्टि डालनी शुरू की।  वो दो कमरे और एक हाल वाला फ़्लैट था। उसके  कमरे का द्वार खोलते ही एक गलियारा दिखता था जिसके  एक तरफ बाथरूम, दूसरी तरफ रसोई घर और उससे लगा हुआ एक और कमरा था जो बंद था जिसे उसने कभी खुलते हुए नहीं देखा। सामने ही बड़ा सा हाल था जिसके एक तरफ मुख्य द्वार था और दूसरी तरफ बड़ी सी काँच के पल्लों वाली खिड़की थी। जिसे खोलने पर काफी चौड़ा जंगला बना हुआ था। सामने का हिस्सा आड़ी सलाखों से बंद था।

हाल में एक तरफ टी। वी। रखा हुआ था। उसके सामने दो पलंग लगे हुए थे, बीच में एक बड़ी सी मेज और चार कुर्सियाँ रखी हुई थीं। हाल के चौड़े हिस्से में अलमारियाँ फिक्स थीं।

इसी तरह उसके कमरे में भी जंगले जैसी एक खिड़की और फिक्स अलमारी थी। पहले दिन ही उसे अलमारी में अपनी नाप के कपड़े बलराम ने दिखाए थे। श्रृंगार का सामान भी दीवार में एक फिक्स दर्पण के साथ दराज में उपलब्ध था। बाथरूम में भी नहाने और कपड़े धोने का सामान रखा हुआ था। उसके अपहरण के साथ ही शायद यह सारी व्यवस्थाएँ योजनाबद्ध तरीके से की गई होंगी।

रसोई का सारा सामान,  दूध आदि बलराम आते समय ले आया था। सुबह सुबह उसके सामने ही अखबार,  हॉकर द्वार के नीचे की दरार से सरकाकर डाल जाता था।

यही प्रतिदिन का क्रम था। अन्य किसी को नयना ने वहाँ आते या डोर बेल बजाते कभी नहीं देखा। रसोई के सारे कार्य भोजन पकाने से लेकर सफाई बर्तन भी उसी से करवाए जाते थे। लेकिन कपड़े उससे नहीं धुलवाए जाते थे। शायद आते-जाते धोबी के पास ले जाते होंगे।

दिन में वो हाल से अखबार लाकर रखती और खाली समय में पढ़कर दिन काट लेती थी। रातों को लुट-पिटकर थकी-हारी एकांत पाते ही अमन की याद में व्याकुल होती रहती और सोचती कि काश! उसके पास डायरी और पेन होता तो उससे ढेर सी बातें-शिकायतें करती। अपने ज़ख्म और दर्द साझा करती।

हर दूसरे-तीसरे दिन सेठजी भी दोपहर में आ जाते थे। उस दिन बलराम पहले ही उसे आगाह कर देता था कि सेठजी जब तक रहेंगे उसे कमरे में बंद कर दिया जाएगा अतः वो भोजन पानी कमरे में रख ले। हाल में और कौन आता था अथवा  क्या चर्चा होती थी इसका आभास तक उसे नहीं होने दिया जाता था क्योंकि बेल बजते ही हमेशा उसे कमरे में लॉक कर दिया जाता था। माणिक कमरा खोलकर अन्दर आता और औपचारिक चिकनी चुपड़ी बातें करते हुए एक घंटे तक नयना को निचोड़ता रहता फिर उसे शाम तक कमरे में बंद कर दिया जाता था। हाल में होने वाली गतिविधियों की उसे भनक भी नहीं लगती थी और सेठजी के जाने के बाद ही बलराम उसका कमरा खोलता था।

वो सोचती ऐसा शायद उसके भागने की शंका के कारण किया जाता होगा। लेकिन नयना इस तरह की मूर्खता तो कभी करने वाली नहीं थी। दूध से जला हुआ छाछ भी फूँककर पीता है, वो मुक्ति के ऐसे मार्ग की तलाश में थी, जिसपर कदम रखने में जोखिम बिल्कुल न हो, यानी साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

क्रमशः ...

### अध्याय 13

महानगर का जीवन भी महासमर ही होता है।  यानी आपाधापी,  भागदौड़, एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में फँसे लोग,  गाँवों और छोटे शहरों से पलायन करके बसे हुए लोग, एक तरफ साफ़ सुथरे, सजीले विशाल भवन,  अट्टालिकाएँ,  ऊँचे फ़्लैट तो दूसरी तरफ गंदगी के आगोश में पलतीं छोटी-छोटी टीन-टप्पर वाली बस्तियाँ...एक तरफ छप्पन भोग वाले राजसी स्वाद तो दूसरी तरफ रोटी को तरसते कुपोषित पेट...एक तरफ सुसज्जित नर्म शैय्याएँ, नित्य नूतन वस्त्राभूषण तो दूसरी तरफ फुटपाथी सेज पर सोते अधनंगे चिथड़ों में लिपटे लज्जित शरीर... कहीं सुगन्धित तरणतालों में तैरते लचीले बदन तो कहीं जल-बूँद को तरसते मैले कुचैले तन... अमन अपने विगत जीवन से जान चुका था कि यह अंतर कुदरती नहीं बल्कि महानगरों के महामानवों द्वारा साधित मंतर का परिणाम ही होता है।

अमन के पास समय बिताने और जानकारियाँ जुटाने का एकमात्र साथी मोबाइल ही था। रात में मित्रों से बातचीत करके अपना हालचाल बताकर उनका पूछा फिर देर तक गूगल पर सर्च कर करके  अगले दिन के कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त हो गया। सबसे पहले उसने दिल्ली के सारे रजिस्टर्ड अनाथाश्रमों के संपर्क नंबर और पते नोट किये फिर ६ महीने पुरानी तारीखों के आधार पर उन आश्रमों से जुड़े समाचार तलाश करके एक साथ आराम से पढ़ने और मनन करने के लिए सबकी लिंक सहेजता गया।  इस कार्य में ही उसे काफी समय लग गया था और  नींद उसपर हावी होने लगी थी अतः बाकी कार्यों को नई सुबह से विस्तार देने का निर्णय लेकर बिस्तर पर पसरकर निद्रा के आगोश में चला गया।

सुबह ६ बजे चिड़ियों के चहकने की आवाज़ के साथ उसकी नींद टूटी। उसने मुस्कुराते हुए मोबाइल का अलार्म बंद किया फिर फुर्ती से उठकर नित्य कर्मों से फारिग होकर तैयार हो गया।

कमरे से बाहर निकलकर उसने निकट ही गुमटी पर बन रही एक कप चाय पी। सुबह की हवा बहुत सुहानी लग रही थी,  उसकी धर्मशाला सघन इलाके में थी अतः वो सैर के लिहाज से  आगे निकलकर मुख्य सड़क पर आ गया। महानगर की ज़िंदगी दौड़ने लगी थी। हर तरह के वाहन अपने-अपने  मुकाम तक पहुँचने की कतार में थे।

अमन अपनी चिंताओं को चित्त से चिपकाए धीरे-धीरे चहलकदमी करता हुआ बढ़ रहा था। अचानक सामने से उसे कुछ साइकिल सवारों का काफिला आता हुआ दिखाई दिया। सबके साथ आगे-पीछे अखबारों का एक एक गट्ठर लदा हुआ था। अमन ने अंदाज़ लगाया कि वे सब अखबार बाँटने वाले होंगे। वो भी किसी ऐसे ही चंद घंटों के काम की तलाश में था, उसे यह काम उपयुक्त महसूस हुआ। अगर मिल जाए तो सुबह दो चार घंटों के निवेश से उसका पेट भरने का जुगाड़ हो सकता है। वो उसी दिशा में बढ़ता गया जिस दिशा से साइकिल सवार आ रहे थे।

कुछ देर बढ़ने के बाद एक उसे एक चौक पर अख़बारों से लदा हुआ वाहन दिखाई दिया। अमन निकट जाकर सारी प्रक्रिया देखने लगा। वहीं पर नीचे एक तिरपाल बिछाई गई थी। कुछ लोग अख़बारों के बण्डल उतार रहे थे। कुछ अधिकारी भी वहाँ उपस्थित थे।  अखबार बाँटने वाले बण्डल अलग-अलग कर रहे थे फिर अपने-अपने हिस्से के पैकेट लेकर निकलते जा रहे थे।

अमन ने सोचा कि इस काम के लिए तो साइकिल होना आवश्यक है। अगर काम मिल जाता है तो वो कुछ दिन पैदल भी कार्य कर सकता है।

उसने उन हॉकरों से ही इस काम के लिए जानकारी जुटाने के विचार से एक हॉकर  को अपना परिचय देकर पूछा कि उसका नाम क्या है, वो कहाँ रहता है, क्या उसे भी यह काम मिल सकता है? उस व्यक्ति ने बताया कि उसका नाम गणेश है। उनका एक संघ है। इस काम के लिए उनके संघ के प्रमुख से मिलना चाहिए। वे सब निकट की बस्ती में रहते हैं। इस समय कुछ सदस्य काम पर जा चुके हैं और कुछ जाने की जल्दी में हैं। वे लोग प्रतिदिन सुबह ४ बजे यहाँ पहुँच जाते हैं, फिर आधे घंटे बाद अख़बारों का वाहन आते ही काम में जुट जाते हैं। अगर वो कल सुबह ४ बजे वहाँ आ जाए तो संघ-प्रमुख उसे अखबार के अधिकारियों से कहकर उसे भी काम दिला सकता है।

अगले दिन अमन के अलार्म की चिड़ियों ने तीन बजे ही चहककर उसे भोर होने का संकेत दे दिया। अमन जल्दी से नित्य कर्मों से फारिग होकर ४ बजे से कुछ पहले ही अपने गंतव्य तक पहुँच गया। कुछ हॉकर  वहाँ आ चुके थे। वो गणेश के आने का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद उसे गणेश दिखाई दिया। धीरे-धीरे सदस्य भी वहाँ एकत्रित होने लगे। उसने गणेश के पास जाकर मुस्कुराकर हाथ मिलाया। गणेश ने उसका मंतव्य समझकर उसे एक कसे हुए गठीले बदन वाले युवक के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। अमन ने नमस्कार के साथ ही अपना परिचय देकर कार्य दिलाने का आग्रह किया।

दिनेश नाम के उस व्यक्ति ने उसका संक्षिप्त परिचय पूछा। अमन के अनाथ होने की बात जानकर  उसने अमन को दिलासा देकर अपने संघ में शमिल होने के लिए कहा।

अमन ने स्वीकृति देने के साथ ही उनकी ही बस्ती में एक कमरे का सुविधाजनक मकान किराये पर लेने की इच्छा भी जताई।

मेहनतकश लोग ईमानदार तो होते ही हैं, एक दूसरे के दर्द में भी साथ खड़े होते हैं।

अमन ने यह सब जिया और महसूस भी किया था। दिनेश उसे अखबार के अधिकारियों  के पास ले गया।

अमन के व्यक्तित्व, वेशभूषा और बातचीत के लहजे से प्रभावित अधिकारियों द्वारा यह पूछने पर कि पढ़ा लिखा और १२ वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बावजूद उसने यह रोज़गार क्यों चुना,  वो तो आगे पढ़ाई जारी रखकर बेहतरीन कैरियर बना सकता है तो उसने दिल्ली में विशेष उद्देश्य से आने की बात बताई और कहा कि उस कार्य के अलावा उसे अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी ही है, अतः अभी केवल गुजारे लायक रकम की ही दरकार है। अधिकारियों ने उससे कहा कि जब तक किसी नए इलाके से संपर्क/प्रचार  करके कार्य बढ़ाया जाए, तब तक उसे दिल्ली के अपने निवास के आसपास के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर अखबार बेचने का कार्य करना होगा। अमन ने अपनी सहमति दे दी।

अमन ने गूगल पर सर्च करके जानकारी जुटाई फिर आसपास के स्टेशनों के नाम  और यात्री गाड़ियों के रुकने का समय आदि नोट करके अगले दिन से ही अपना कार्य आरम्भ कर दिया। नित्य सुबह चार बजे से उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती थी। इस तरह सबके  सहयोग से उसे कार्य तो मिला ही, उनकी बस्ती में एक ठीक-ठाक घर की व्यवस्था भी हो गई। और वो धर्मशाला छोड़कर उन श्रमिकों की बस्ती में आ गया। अमन की कहानी से उन सबको अमन अपना सा लगा और वो भी शीघ्र ही उनमें घुल मिल गया। उसे अपने कार्यस्थल तक अखबार के सेंटर से दो किलोमीटर दूर जाना ही पड़ता था। कुछ दिन वो पैदल ही आना-जाना करता रहा। फिर साइकिल खरीदने, सीखने से लेकर अखबार बाँटने तक पूरा कार्य समझने में भी उसे उन सबका सहयोग मिलता रहा।

मोहल्ले में अमन अकेला था मगर उन सबके अपने परिवार थे,  अपनी समस्याएँ व प्राथमिकताएँ थीं। अमन की प्राथमिकता नयना की तलाश करना ही थी और  इस कार्य में वो किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता था अतः किसी से अपने उद्देश्य का जिक्र नहीं किया।

अखबार बेचते हुए वो जब भी फुर्सत में होता समाचार पढ़ने लगता था। दुनिया, देश, हर शहर, हर गाँव के हर गली मोहल्ले के समाचार इन अख़बारों में होते थे। लेकिन उसकी निगाहें दिल्ली के अनाथालयों के समाचार तलाशती रहती थीं। जिस अखबार में इस तरह का समाचार होता उसकी एक प्रति वो अपने पास रख लेता था और घर आकर कुछ गौर से पढ़ा करता था। अक्सर समाचार हृदय विदीर्ण करने वाले होते थे। मोबाइल पर भी सहेजी हुई लिंक्स पर इसी तरह के समाचार मिलते थे। मगर निर्मलादेवी अनाथालय के बारे में उसे अलग-अलग की वर्ड्स से सर्च करने के बावजूद अब तक कोई समाचार नहीं मिला था।

अनाथों पर तरह तरह के अत्याचार, बालिकाओं, किशोरियों, युवतियों के संचालकों द्वारा ही मान-मर्दन करने के किस्से पढ़-पढ़कर उसका दिल नयना की सलामती की दुआ माँगने लगता। न जाने वो किस जहान में खो गई है... कब और कैसे उसे खोज पाउँगा...यह सब सोच-सोच कर उसका मन निराशा से भर जाता फिर अगले ही पल स्वयं को दिलासा भी देने लगता-

“अरे, अमन तुम तो इन कुहासों की कोख में ही अपने जीवन के बचपन और कैशोर्य का अनमोल हिस्सा जी चुके हो, अब तो तुम्हारे जीवन में उजालों का फैला हुआ आसमान है...इस तरह हिम्मत हारकर क्या तुम नयना के साथ अन्याय नहीं कर रहे...? वो कहीं न कहीं तुम्हारा इंतजार कर रही होगी...अपना लक्ष्य मत भूलो...!!”  फिर वो आगे की रूपरेखा तैयार करने लगता।

गुजर-बसर तो होने ही लगी थी, वो अधिक से अधिक मेहनत करके अख़बारों से होने वाली कमाई से ही खर्च पूरा कर लेता था। अपने मकान के किराये के पैसे उसने पढ़ाई और आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए रख छोड़े थे। अखबार के अधिकारियों से भी वो अक्सर चर्चा करके इस क्षेत्र की जानकारियाँ जुटाता रहता था। वो आश्चर्य-चकित होकर सोचता रहता कि एक ही दिन में इतने समाचार कैसे एकत्र होकर छप जाते हैं?

एक दिन उसने जिज्ञासावश एक अधिकारी से चर्चा करते हुए यह सब जानना चाहा। अधिकारी उसकी वाक्पटुता और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी के भी अच्छे ज्ञान से प्रभावित हो चुके थे। उन्हें अमन में एक होनहार पत्रकार बनने की संभावना नज़र आई। उन्होंने उसे एक दिन कार्यस्थल पर आकर सारी प्रक्रिया सामने देखने का निमंत्रण देकर एक कार्ड आगे बढ़ा दिया जिसमें कार्यस्थल का पता और संपर्क नंबर नोट था।

अमन अपनी मुँहमाँगी मुराद पूरी होते देख उसी दिन अपना कार्य समाप्त करके साइकिल से ही ५ किलोमीटर का सफ़र करके वहाँ पहुँच गया। वहाँ उसका परिचय कई वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों से हुआ। उनका उत्साह और फुर्ती देखते ही बनती थी।

लगभग दो घंटे वहाँ रहकर अमन सारी प्रक्रियाएँ देखता और समझता रहा। चर्चा से उसने जान लिया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का ही आवश्यक अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों का अध्ययन, चिंतन-मनन, लेखन, अभिव्यक्ति का हुनर और जनसेवा की भावना का होना पत्रकार के लिए अति आवश्यक है। इस कार्य में भी कैरियर बनाने के लिए अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि विकल्प मौजूद हैं।

क्रमशः...

### अध्याय 14

एक दिन कुशल ने सलाह दी कि क्यों न आगरा के पर्यटन स्थलों पर जाकर भीख माँगी जाए, चूँकि ऐसे स्थानों पर आने वाले अधिकांश लोग रईस होते हैं। अतः पैसा तो अच्छा मिलेगा ही, देखने का अवसर भी मिल जाएगा। उसकी बात सुनकर रतन बोल पड़ा-

“यार कुशल, तुमने तो मेरे मन की बात कह दी...मैंने इतिहास की किताब में ताजमहल का चित्र देखकर सोचा था, यह चित्र ही इतना सुन्दर है तो सामने देखने पर कैसा होगा? तब तो यह सोचा भी न था कि एक दिन किस्मत हमें इस तरह यहीं ले आएगी।”

“क्या बात कही मित्र, अब तो देखे बिना चैन नहीं पड़ने वाला...” बस अब अमन भैया के आदेश का इंतज़ार है।” अमन की तरफ देखकर कीरत ने भी अपना सुर मिलाया। वो अमन को भैया ही कहा करता था।

ताजमहल का जिक्र छिड़ते ही अमन के नयन, नयना को याद करके अनायास गीले हो गए।

सातवीं कक्षा में आगरा का इतिहास पढ़ते हुए ताजमहल देखने के कितने सपने उन दोनों ने मिलकर संजोए थे। अब तो वो भी बड़ी हो गई होगी...उसे ज़रूर याद करती होगी। उसने उससे फिर मिलने का वादा जो किया था...उसे तो मेरी परेशानियों का अंदाज़ भी नहीं होगा। न जाने अब कब उससे मिलना होगा। एक ठंडी साँस छोड़ते हुए वो जैसे तन्द्रा से जागा-

“हाँ हाँ, किसी से जानकारी लेकर आज ही उस तरफ चले चलते हैं न...” कहते हुए अमन ने अपनी सहमति से मित्रों की माँग पर मुहर लगा दी।

फुटपाथ से उतरकर वे सड़क पर आ गए। एक तरफ आटोरिक्शा कतार में लगे हुए थे एक आदमी को वहीं खड़ा देखकर अमन ने पूछा-

“भाई सा...ताजमहल यहाँ से कितनी दूर है”?

४-५ किलोमीटर से अधिक दूर नहीं होगा। कहते हुए ऑटो रिक्शा वाले ने अन्दर बैठने का इशारा किया। मगर तब तक वे चारों आगे बढ़ चुके थे।

कुशल, कीरत और रतन उत्साहपूर्वक बातें करते हुए चल रहे थे, लेकिन  अमन के नयनों में नयना इस कदर बसी हुई थी कि वो जिस तरफ नज़र घुमाता, नयना ही नगर आती।  राह चलते  हुए अपनी ही परछाई को नयना समझकर बातें करने लगता। मित्रगण उसे खोया हुआ देख कर समझते यह घर छिन जाने के कारण ही इतना उदास है। कहीं अवसादग्रस्त न हो जाए, इस बात का पूरा ध्यान रखते और बात-बात पर कहकहे लगाते और चुटकुले सुनाने लगते थे।

चलते-चलते सहसा अमन के मन में विचार आया कि ताजमहल तो यमुना के किनारे बना हुआ है, तो क्यों न अपना सफर यमुना के घाट से शुरू किया जाए...उसने मित्रों से इस बारे में बात की तो रतन तुरंत बोल पड़ा-

“बात तो पते की कही है यार...यमुना के घाट पर ही नहा धोकर वस्त्र भी बदल लेंगे। कहीं आसपास मंदिर होगा तो दर्शन के साथ ही भिक्षार्जन से पेट-पूजा भी हो जाएगी। इससे सुहाना  सफ़र और कौनसा होगा...”

उनका आश्रम भी यमुना किनारे ही था, अतः चारों अपने जाने पहचाने आश्रम की ओर चल पड़े। आश्रम के नजदीक घाट पर नदी का पानी स्वच्छ नहीं था, अतः वहाँ से राह चलते लोगों से ताजमहल की दिशा की जानकारी लेकर किनारे-किनारे आगे बढ़ते गए। काफी दूर जाकर अपेक्षाकृत साफ़ जल और चौड़ा पाट देख वहीं रुककर सबने नहाकर  वस्त्र बदले लेकिन वहाँ सुनसान होने से भोजन मिलना संभव नहीं था अतः भूखे पेट ही उनका काफिला पूरी रफ़्तार से अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ा।

अविराम चलते हुए सिर्फ एक घंटे के अन्दर ही उन्होंने ५ किलोमीटर का रास्ता तय कर लिया और वे अब ताज नगरी की शान, ताजमहल के सामने थे।

प्रवेश द्वार पर सैलानियों को देख-देखकर उन्होंने भी हर प्रक्रिया से गुजरते हुए टोकन लेकर बाहरी द्वार से अन्दर प्रवेश कर लिया।

नज़ारा इतना नयनाभिराम था कि वे भिक्षा और भूख भूलकर ताज की छवि निहारने में खो से गए। वहाँ पर्यटकों का ख़ासा हुजूम ताजमहल देखने आया हुआ था। आसपास और भी स्मारक थे। देशी-विदेशी हर तरह के लोग थे। जो घूम फिर कर थक जाते थे, उनमें कुछ बाहरी परिसर के मार्ग के दोनों तरफ कतार में लगी हुई बेंचों पर बैठ जाते थे अथवा नजदीक ही पार्क में चले जाते थे।

अमन ने मित्रों को समझाया- “भई हम पेशेवर भिखारी नहीं हैं,  कुछ सोच समझकर ही हमें यहाँ भीख माँगनी है। विदेशी पर्यटकों के सामने बिल्कुल नहीं जाना है। हमें मज़बूरी यह कार्य करवा रही है,  ऐसा न हो कि उनकी नज़रों में हमारे देश की दागी तस्वीर अंकित हो जाए। पुलिस के जवान भी हर तरफ फैले हुए हैं, अतः हम जहाँ भीड़ कम हो वहीं अपना काम करेंगे। जहाँ कोई विस्तार से बताने को कहे तभी प्रमाण पत्र दिखाना है। अब हमें अलग हो जाना चाहिए। समय पूरा होने से आधा घंटा पहले हमें पार्क में ही एक दूसरे का इंतज़ार करना है।”

इस तरह मशविरा करने के बाद वे अलग-अलग होकर अपने काम में जुट गए।

घूमते-घूमते  अमन को बाहरी परिसर में एक बेंच पर दो युवा जोड़े थकान उतारते हुए दिखाई दिए। दोनों महिलाएँ देखने में जितनी सुंदर थीं उतने ही दोनों पुरुष भी आकर्षक व्यक्तित्व और गठीले बदन के थे। उनकी बातचीत में भी शालीनता की झलक दिखाई दे रही थी। अमन हिम्मत करके उनके पास जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

“तुम कौन हो भाई, तुम्हें क्या परेशानी है”? एक युवक ने पूछ लिया

अमन ने प्रत्युत्तर में अपनी कहानी सुनाकर सहायता के लिए हाथ फैला दिया।

“लेकिन भाई,  तुम लगते तो पढ़े लिखे हो। फिर तुम ऐसे स्थान पर इस तरह...”?

“जी साहब, मैंने १२ वीं प्रथम श्रेणी में पास की है। सर्टिफिकेट भी मेरे पास है, मगर परिस्थितितों का मारा हूँ, उम्मीद का दिया लेकर मंज़िल की तलाश में जुटा हुआ हुआ हूँ”।

हुम्म...उस व्यक्ति ने निकट बैठी हुई अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहा-

“माना, यह सचमुच मुसीबत का मारा हुआ लग रहा है, मेरे पास तो कैश नहीं है, तुम्हीं इसकी कुछ सहायता करो।”

युवती ने पर्स खोलकर टटोला और बोली-

“रोशी, मेरे पास ५०० का ही नोट है, दे दूँ”?

तभी दूसरा व्यक्ति बोल पड़ा

“अरे भाभीजी,  इसमें पूछने की क्या बात है, रोशन सेठ क्या मना करेंगे”?

“ऐ मिस्टर, बीच में टोकना बुरी बात है...”

फिर मुस्कुराते हुए युवती ने अमन की तरफ नोट बढ़ा दिया। और दूसरी युवती को संबोधित करके बोली-

“शिखा डियर, तुम भी अपना पर्स टटोल लो, ये मर्द लोग हमारा बटुआ देखकर ही खाली हाथ चलते हैं”।

शिखा ने पति की ओर देखा तो पहले वाले युवक ने,  जिसे पत्नी द्वारा रोशी संबोधित किया गया था, उसे टोका-

“लो भई, अब आपको भला वकील साहब की आज्ञा चाहिए?”

“नहीं ऐसी बात नहीं है जीजू, पर मेरे पर्स में बड़ा नोट नहीं है, मुझसे कैश जल्दी खर्च हो जाता है अतः सौरभ ही सब सँभालते हैं”।

उसका इशारा समझकर सौरभ नाम के युवक ने मुस्कुराते हुए शाही अंदाज में जेब से ५०० का नोट अमन की ओर बढ़ाकर पूछा-

“अमन भाई, तुम रहते कहाँ हो?”

अमन ने नोट लेकर अपने बैग से बचपन का परिचय-पत्र निकालकर कथित वकील साहब की ओर बढ़ाते हुए अपनी कहानी का दुखद अंश कह सुनाया।

उसकी कहानी सुनकर दोनों युवतियों का कोमल मन कराह उठा। वे अपने पतियों की ओर सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद से निहारने लगीं।

रोशन नाम के युवक ने उसकी आपबीती पर दुःख प्रगट करते हुए कहा-

“अमन भाई, लगता है आज कुदरत ने तुम्हारी सहायता करने के लिए ही शायद हमसे मिलवाया है। हमारे ये मित्रवर उज्जैन के प्रसिद्ध वकील सौरभ झाँगियानी जी हैं। इनसे तुम्हें उचित सलाह भी मुफ्त मिल जाएगी”।

सौरभ ने परिचय-पत्र पर दृष्टि गड़ाते हुए कुछ विचार करने के बाद कहा-

“अमन भाई, तुम्हें सीधे जिला-कोर्ट जाकर अपने घर पर अवैध कब्जे के विरुद्ध अर्जी दखिल कर देनी चहिये। संविधान में गरीब, अनाथ अथवा प्राकृतिक आपदा-ग्रस्त को सुप्रीम कोर्ट तक मुफ्त में कानूनी सहायता देने का प्रावधान है। वैसे कानून के नए नियमों के अनुसार अगर लावारिस मकान पर कोई अवैध कब्जा कर ले तो १२ साल निवास करने के बाद वो मकान कानूनी तौर पर उसका हो जाता है। तुम्हारे कथनानुसार तुम्हारे मकान पर अवैध कब्ज़ा हुए १० वर्ष हो चुके हैं अब केवल दो वर्ष ही बाकी हैं। अगर तुम शीघ्र ही अपनी याचिका कोर्ट में दाखिल कर दोगे तो अदालत तुम्हें मुफ्त सरकारी वकील उपलब्ध करवा देगी या फिर तुम्हारे हक़ में तुरंत फैसला भी दे सकती है। हम लोग उज्जैन के हैं और आगरा घूमने के उद्देश्य से यहाँ आए हैं। कल तक वापस भी जाना है। अगर यहाँ का निवासी होता तो तुम्हें इंसाफ दिलाने में कोई कसर न छोड़ता”।

अमन ने उसकी सलाह अपने मन के संदूक में तुरंत सहेज ली और हाथ जोड़कर धन्यवाद कहकर उन सहृदय जोड़ों को मन ही मन सैकड़ों दुआएँ देता हुआ आगे बढ़ गया।अमन के पास अपने मकान का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं था। सिर्फ परिचय पत्र ही एकमात्र सबूत उसके पास था। भिक्षाटन के दौरान मिली सभी सलाहें उसके मन के संदूक में सिलसिलेवार सजी हुई थीं। उसने सलाहों के संदूक को एकाग्र होकर टटोला तो सभी उन सलाहचंद्रों के मुख से निकले नेक शब्द उसके साथ संवाद करने लगे जो उसके व्यक्तित्व और बातचीत के अंदाज़ को देखकर अविश्वसनीय नज़रों से निहारने लगते थे फिर दान स्वरूप कुछ मोटी रकम देकर अपने सामान्य ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए एकाध सलाह सौंपना न भूलते थे-

“अरे बेटे, इस तरह क्यों भटक रहे हो, हाल ही में उत्तराखंड कैबिनेट ने राजकीय अनाथ आश्रमों में पले बढ़े बच्चों को सरकारी नौकरी में पाँच प्रतिशत आरक्षण देने पर मुहर लगा दी है। तुम्हें केवल संस्था की ओर से दिया गया प्रमाणपत्र ही प्रस्तुत करना होगा।”

“अदालत अनाथों के लिए सरकारी वकील मुफ्त उपलब्ध करवाती है, तुम्हें सीधे कोर्ट जाकर अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए अर्जी देनी चाहिए। यही नहीं अनाथों को बिना केस के शीघ्र निर्णय की सुविधा भी दी जाती है।”

अमन को यह सारी जानकारी उसे उज्जैन के वकील सौरभ झांगियानी से भी मिल चुकी थी, मगर उसकी मुख्य समस्या यानी भूख मिटाने और हाथ में कुछ रकम जुटाने की थी जिसके लिए वे भिक्षुक बनकर भटक रहे थे, वो अब काफी हद तक सुलझ चुकी थी यानी अब इतनी रकम उनके पास एकत्र हो चुकी थी कि वे आगे की गतिविधि के लिए सक्रिय हो जाएँ। अमन जान गया था यह उनके सुदर्शन व्यक्तित्व, माँगने का विनम्र लहजा और पढ़े-लिखे होने के कारण ही संभव हुआ था, अतः आगे भी कोई बाधा नहीं आएगी यह सुनिश्चित करने के बाद अमन ने सबसे पहले सबके लिए स्मार्ट मोबाइल खरीद लिया। फिर रतन और कीरत को भिक्षार्जन करते रहने की हिदायत देकर स्वयं कुशल के साथ अगले कदम की रूपरेखा बनाने में जुट गया।

इसके बावजूद चारों का फोन पर संपर्क बनाए रखकर दोपहर और रात्रि में एक स्थान पर मिलना पूर्ववत था।

अब अमन ने उज्जैन के वकील सौरभ झांगियानी से मिली हुई सलाह के मुताबिक- “जिन पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क कानूनी सेवाओं की आवश्यकता है, वे लिखित रूप में एक आवेदन प्रस्तुत करके सम्बंधित प्राधिकरण या समिति से संपर्क कर निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त कर सकते हैं।”  विचार करके “डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी” से संपर्क किया और अपनी पूरी समस्या विस्तार से बताई। चूँकि वो अनाथ और बाढ़ पीड़ित होने के साथ ही धोखे का शिकार हुआ था अतः प्रतिक्रिया स्वरूप वहाँ से आश्वस्त करके कानूनी सहायता प्राप्त करने के कारण को अथारिटी के अधिकारियों द्वारा तैयार किये गए प्रपत्रों को भरकर लिखित रूप से आवेदन प्रस्तुत करने का अनुरोध किये जाने पर उसने लिखित आवेदन प्रस्तुत कर दिया।

उसके आवेदन पर “विधिक सेवा संस्थान” द्वारा उचित आवश्यक कार्यवाही शुरू करने का आश्वासन देकर उसके केस की जानकारी सम्बंधित पक्ष को भेज दी गई। आगे की कार्यवाही में अदालत द्वारा परामर्श और उसके केस का प्रतिनिधित्व करने के लिए अमन को एक वकील प्रदान किया गया।

सरकारी वकील ने जाँच के दौरान बाढ़ दुर्घटना की बंद हो चुकी फाइल फिर से खुलवाई तो पता चला कि अमन के माता पिता की उस दुर्घटना में मृत्यु के बाद उसको अनाथालय भेजने के साथ ही उसका मकान एक स्वयंसेवी संस्था को सौंप दिया गया था। एक निश्चित अवधि तक अमन के किसी परिचित अथवा रिश्तेदार का इंतज़ार करने के बाद कोई दावेदार न मिलने पर संस्था के सदस्यों की बैठक में उस मकान से होने वाली आमदनी अमन की शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च होने के बाद बाकी रकम उसका बैंक में खाता बनवाकर जमा करते रहने का निर्णय लिया गया था।

लेकिन इस निर्णय के बाद कुछ ही दिनों के अन्दर अचानक संस्था के प्रमुख ६० वर्षीय उमाप्रसाद की अचानक मृत्यु हो जाने से मामला ठन्डे बस्ते में चला गया था और नए अध्यक्ष के कार्यभार संभालने के बाद इस तरफ किसी ने ध्यान न दिया। लावारिस मकान पर न जाने कितने लोभी घात लगाए बैठे थे। अवसर मिलते ही पड़ोस के ही परिवार के बड़े बेटे ने उसपर अपना कब्जा कर लिया था।

अमन इन कानूनी उलझनों से परिचित ही नहीं था। वकील के प्रतिनिधित्व में लगातार ६ महीने तक कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते उसका दिमाग चक्करधिनी बन गया था। कुशल हमेशा साथ रहकर उसका उत्साह वर्धन करता रहता था। उसके वकील का यह पहला केस था अतः उसने तत्परता दिखाते हुए केस को अतिशीघ्र परिणाम तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी बुद्धिमता से उसे बिना परेशानी दिए सारे सबूत एकत्र करके न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिए। कुछ समय वाद-विवाद चलता रहा आखिर इस केस पर त्वरित न्याय प्रक्रिया के अंतर्गत अमन के वकील की जीत की मोहर लग गई और अमन को अपने  मकान का कब्ज़ा वापस मिल गया।

क्रमशः...

### अध्याय 15

अमन को घर वापस मिलना एक बहुत बड़ी जंग जीतने के समान था। चारों मित्र भिक्षाटन  छोड़कर व्यवस्थाओं के जोड़ तोड़ में जुट गए। अमन ने देखा कि पूरे घर की दीवारें और फिक्स किया हुआ फर्नीचर सुरक्षित था बाकी सब सामान कहाँ गया इसका कोई पता नहीं लगा। अमन ने भी उस तरफ सोचना व्यर्थ जानकर आगे बढ़ना उचित समझा।

त्वरित निर्णय लेकर उसने मकान का ऊपरी खण्ड एक महीने के अग्रिम किराए पर एक परिवार को दे दिया। उस रकम से नीचे के खंड के दो कमरों के लिए पलंग और अलमारियों की व्यवस्था कर ली। हाल में ८ वीं तक के बच्चों को ट्यूशन देने बाबत बाहरी द्वार पर नोटिस लगा दिया। भोजन के लिए टिफिन की व्यवस्था कर ली गई।

घर की समस्या हल होते ही अमन के मनोमस्तिष्क  के तहखाने से निकलकर नयना चिर परिचित मुस्कान के साथ उसके सामने उपस्थित हो गई। अमन अपनी पलकें बंद करके उसकी छवि निहारकर निहाल होता रहा। रात होते ही मन ही मन योजना बनाता हुआ स्वयं से ही बतियाने लगा।

“मुझे शीघ्र ही उससे मिलने जाना होगा। काश,  निन्नी के पास भी एक स्मार्ट मोबाइल होता तो इस समय हम आमने सामने बात कर रहे होते, अब इस दिल का क्या करूँ जो इसी क्षण उसकी आवाज़ सुनना चाहता है। क्यों न मैं आश्रम की संचालिका शैलजा को फोन करके एक बार नयना से बात करवाने का आग्रह करूँ, वो उसे जानती पहचानती हैं तो इनकार नहीं करेंगी”।

अमन ने तुरंत अपनी सोच को विश्राम देकर सर्च करके ऑन लाइन डायरेक्टरी से आश्रम का नंबर खोज निकाला और काल कर दिया।

वहाँ से शैलजा ने ही काल अटेंड किया और पूछा-

“आप कौन हैं, किससे बात करना चाहते हैं?”

“मैं अमन हूँ आंटीजी, आठवीं कक्षा तक आपके आश्रम में पलने-बढ़ने वाला अमन...! आपके आशीर्वाद से मैंने आगरा में १२ वीं तक शिक्षा पूर्ण करके अपना घर भी हासिल कर लिया है”।

“बहुत अच्छा बेटे, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं, इतने समय बाद मुझे कैसे याद किया”?

“मैं आपके आश्रम की अपनी बचपन की सहपाठी नयना से बात करना चाहता हूँ, आप ज़रा उससे बात करवा दीजिये प्लीज़...!”

“नयना! ओह अमन, मुझे खेद है कि वो अब इस आश्रम में नहीं है।”

“फिर वो कहाँ है आंटीजी, मेरी उससे वहाँ पुनः आने और तब तक वहीँ मेरा इंतजार करने की बात हुई थी। कृपया बताइए मेरा मन बेचैन हो रहा है।” शैलजा के इस अप्रत्याशित उत्तर से व्यथित होकर अमन ने पूछा।

“मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है अमन कि वो ६ महीने पहले १२ वीं का परीक्षा परिणाम ज्ञात करने स्कूल के लिए निकली थी, फिर वापस आश्रम नहीं पहुँची। हमने बहुत खोजबीन की मगर  अब तक उसका पता नहीं चला। हमने पुलिस में भी रिपोर्ट कर दी थी”।

लेकिन ऐसा कैसे हुआ आंटीजी, क्या वो अकेली ही आश्रम से निकली थी? उसकी सहेलियाँ डाली और लता तो हमेशा उसके साथ ही रहती थीं, वे उसके साथ क्यों नहीं गई थीं...? आंटीजी क्या मैं उनसे बात कर सकता हूँ”?

“नयना के लापता होने के चार माह बाद उसकी दोनों सहेलियाँ एक रात आश्रम से भाग निकलीं फिर उनका भी कोई पता नहीं चला।”

पूरी बात सुनकर अमन सकते में आ गया।  उसका तो दिल ही बैठने लगा।  क्या कहे समझ ही पा रहा था।  आँखों से आँसू झरने लगे और काँपते हुए हाथों से मोबाइल छूटकर नीचे गिर गया। उसे अपनी धड़कनें थमती सी प्रतीत होने लगीं।

लग रहा था था,  उसके कष्टों का कारवाँ इतनी आसानी से उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है।

उसने पूरी रात करवटों में गुज़र दी। न जाने उसकी निन्नी किस मुसीबत में फँसी होगी... आखिर वो गई कहाँ उसकी खोज क्यों नहीं की गई। फिर स्वयं से बतियाने लगा-

“मैं भी कितना नादान हूँ, आवश्यक नहीं कि नयना जितनी मेरे लिए महत्वपूर्ण है, आश्रम के लिए भी हो... आखिर थी तो अनाथ ही न...?मगर मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा।  होगी तो इसी जहान में, धरती या आसमान तो उसे निगल नहीं गया होगा...! न जाने कहाँ किस हाल में होगी, मुझे बहुत याद करती होगी...विधाता न जाने क्यों सारे दुःख-दर्द, संघर्ष और परेशानियाँ, गरीब और असहाय इंसानों के कोटे में आरक्षित करके रख देता है, जो समय-समय पर अपने होने का अहसास करवाने के लिए सामने चले आते हैं...”

सोच-सोचकर अमन का सिर फटा जा रहा था, उसकी सारी खुशी काफूर हो चुकी थी।

मित्रगण अपने-अपने बिस्तर पर निद्रामग्न थे मगर अमन का मन सुबह होने के इंतज़ार में छटपटा रहा था। रात भर वो आगे की योजना बनाने में उलझा रहा

जैसे ही भोर हुई, उसने बेसब्र होकर मित्रों को उठा दिया और शैलजा के साथ हुई बातचीत उन्हें सुनाकर बोला-

“भाइयो,  मुझे शीघ्र ही दिल्ली जाना होगा...”।

वे सब अमन के नयना के साथ लगाव से तो वाकिफ थे मगर उनके संबंध की गहराई से वे परिचित नहीं थे। उसकी बात सुनकर कुशल बोल पड़ा

“अमन भैया, मैं भी आपके साथ चलूँगा, अकेले जाना ठीक नहीं होगा।”

कुशल बोला-

“नहीं मित्र, मुझे तो मकान मिलने के साथ ही सम्पति का मालिक होने के कारण अनाथों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुविधा मिलेगी नहीं,  मगर तुम तीनों को अभी नौकरी का मुकाम हासिल करना ही है। तुम यहाँ कोचिंग का कार्य जारी रखते हुए नौकरी के लिए भी आवेदन का फॉर्म भर देना। मकान की देखरेख भी तुम लोगों को ही करनी है। किराए का पैसा मेरे अकाउंट में आता रहेगा। मुझे दिल्ली में न जाने कितने समय तक रहना पड़े, इसका कोई भरोसा नहीं जब तक नयना का पता नहीं लग जाता, मैं वापस नहीं आऊँगा। मेरे साथ मेरा पुख्ता परिचय है, कोई भी छोटी मोटी नौकरी मिलने में दिक्कत नहीं आएगी। रहने के लिए भी कुछ न कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी। तुम तीनों को जब तक नौकरी नहीं मिल जाती, गुजर बसर के लिए यहीं रहना है। मोबाइल पर सम्पर्क बना रहेगा”।

मित्रों को सारी बातें समझाकर अमन एक बैग में आवश्यक सामान के साथ कुछ कैश रखकर बस स्टैंड पर पहुँच गया। वो सुविधा के विचार से जाना तो ट्रेन से चाहता था मगर आरक्षण के लिए कुछ दिन इंतजार करना पड़ सकता था और उसके लिए हर पल कीमती था। उसके बस में होता तो वो तुरंत दिल्ली पहुँच जाता और नयना की खोज में जुट जाता, मगर...परिस्थितियाँ  इंसान को इतना बेबस बना देती हैं कि वो चाह की राह से काँटे चुनते-चुनते तन-मन ज़ख़्मी कर बैठता है।

आगरा से दिल्ली बसें जाती ही रहती थीं, अमन ने पूछताछ करके सबसे पहले प्रस्थान करने वाली बस का टिकट खरीदा और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।

दिल्ली पहुँचकर अमन ने चारों तरफ सरसरी नज़र दौड़ाई। इस शहर से वो  अनजान ही था। अपने जीवन का जो हिस्सा उसने यहाँ गुजारा था, वो पिंजरे में कैद पंछी के समान ही था जो दाने-पानी के लिए मालिकों की मेहरबानी का मोहताज होता है। यह बात अलग थी कि उसी पिंजरे में उसे कुछ प्रेमिल-पल भी नसीब हुए थे जो अब उसके जीवन में कब पुनः प्रवेश करेंगे इसका कोई पता न होते हुए भी उसके जीने का सहारा थे। उन पलों की नायिका नयना की तलाश ही अब जीने का एकमात्र उद्देश्य था। नयना के विचार मात्र से उसे अनाथालय में उसके साथ बिताए दिनों को याद करके अधरों पर मीठी सी मुस्कान आ गई मगर अगले ही क्षण उसके गुमशुदा होने के गम ने मुस्कान को मायूसी में बदल दिया।

बस स्टैंड पर हर तरह के लोग बिखरे हुए थे। छोटे बड़े सभी भागदौड़ में लगे हुए थे। पानी की बोतलें बेचने वाले, फेरी करके चने मूँगफली समोसे आदि बेचने वाले इस तरह गतिमान थे कि देखकर लगता था जैसे ज़िन्दगी ने पंख पहन लिए हों। इसके अलावा एक तरफ खाने पीने के सामान  के तरह-तरह के स्टाल लगे हुए थे। दूसरी तरफ सजी धजी दुकानें और छोटी बड़ी गुमटियाँ भी थीं। सबसे पहले अमन ने एक गुमटी के सामने बेंच पर बैठकर चाय-समोसे का  आर्डर दिया। फिर भुगतान करते हुए गुमटी के मालिक से पूछकर आसपास की किसी ठीक-ठाक धर्मशाला का पता नोट किया, जहाँ वो ढंग का कमरा मिलने तक रह सके। फिर एक ऑटो रिक्शा से वहाँ पहुँचकर धर्मशाला के मालिक से एक कमरे के लिए निवेदन किया। मालिक ने उसकी पूरी जानकारी अता-पता मोबाईल नंबर आदि रजिस्टर में दर्ज करके अग्रिम भुगतान लेकर एक कमरा खुलवाकर उसकी चाबी उसे सौंप दी। शाम हो चुकी थी। सुबह से निकला अमन नहा-धोकर भोजन करने के साथ ही शहर से परिचित होने के लिए निकल पड़ा।

क्रमशः...

### अध्याय 16

महानगर का जीवन भी महासमर ही होता है।  यानी आपाधापी,  भागदौड़, एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में फँसे लोग,  गाँवों और छोटे शहरों से पलायन करके बसे हुए लोग, एक तरफ साफ़ सुथरे, सजीले विशाल भवन,  अट्टालिकाएँ,  ऊँचे फ़्लैट तो दूसरी तरफ गंदगी के आगोश में पलतीं छोटी-छोटी टीन-टप्पर वाली बस्तियाँ...एक तरफ छप्पन भोग वाले राजसी स्वाद तो दूसरी तरफ रोटी को तरसते कुपोषित पेट...एक तरफ सुसज्जित नर्म शैय्याएँ, नित्य नूतन वस्त्राभूषण तो दूसरी तरफ फुटपाथी सेज पर सोते अधनंगे चिथड़ों में लिपटे लज्जित शरीर... कहीं सुगन्धित तरणतालों में तैरते लचीले बदन तो कहीं जल-बूँद को तरसते मैले कुचैले तन... अमन अपने विगत जीवन से जान चुका था कि यह अंतर कुदरती नहीं बल्कि महानगरों के महामानवों द्वारा साधित मंतर का परिणाम ही होता है।

अमन के पास समय बिताने और जानकारियाँ जुटाने का एकमात्र साथी मोबाइल ही था। रात में मित्रों से बातचीत करके अपना हालचाल बताकर उनका पूछा फिर देर तक गूगल पर सर्च कर करके  अगले दिन के कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त हो गया। सबसे पहले उसने दिल्ली के सारे रजिस्टर्ड अनाथाश्रमों के संपर्क नंबर और पते नोट किये फिर ६ महीने पुरानी तारीखों के आधार पर उन आश्रमों से जुड़े समाचार तलाश करके एक साथ आराम से पढ़ने और मनन करने के लिए सबकी लिंक सहेजता गया।  इस कार्य में ही उसे काफी समय लग गया था और  नींद उसपर हावी होने लगी थी अतः बाकी कार्यों को नई सुबह से विस्तार देने का निर्णय लेकर बिस्तर पर पसरकर निद्रा के आगोश में चला गया।

सुबह ६ बजे चिड़ियों के चहकने की आवाज़ के साथ उसकी नींद टूटी। उसने मुस्कुराते हुए मोबाइल का अलार्म बंद किया फिर फुर्ती से उठकर नित्य कर्मों से फारिग होकर तैयार हो गया।

कमरे से बाहर निकलकर उसने निकट ही गुमटी पर बन रही एक कप चाय पी। सुबह की हवा बहुत सुहानी लग रही थी,  उसकी धर्मशाला सघन इलाके में थी अतः वो सैर के लिहाज से  आगे निकलकर मुख्य सड़क पर आ गया। महानगर की ज़िंदगी दौड़ने लगी थी। हर तरह के वाहन अपने-अपने  मुकाम तक पहुँचने की कतार में थे।

अमन अपनी चिंताओं को चित्त से चिपकाए धीरे-धीरे चहलकदमी करता हुआ बढ़ रहा था। अचानक सामने से उसे कुछ साइकिल सवारों का काफिला आता हुआ दिखाई दिया। सबके साथ आगे-पीछे अखबारों का एक एक गट्ठर लदा हुआ था। अमन ने अंदाज़ लगाया कि वे सब अखबार बाँटने वाले होंगे। वो भी किसी ऐसे ही चंद घंटों के काम की तलाश में था, उसे यह काम उपयुक्त महसूस हुआ। अगर मिल जाए तो सुबह दो चार घंटों के निवेश से उसका पेट भरने का जुगाड़ हो सकता है। वो उसी दिशा में बढ़ता गया जिस दिशा से साइकिल सवार आ रहे थे।

कुछ देर बढ़ने के बाद एक उसे एक चौक पर अख़बारों से लदा हुआ वाहन दिखाई दिया। अमन निकट जाकर सारी प्रक्रिया देखने लगा। वहीं पर नीचे एक तिरपाल बिछाई गई थी। कुछ लोग अख़बारों के बण्डल उतार रहे थे। कुछ अधिकारी भी वहाँ उपस्थित थे।  अखबार बाँटने वाले बण्डल अलग-अलग कर रहे थे फिर अपने-अपने हिस्से के पैकेट लेकर निकलते जा रहे थे।

अमन ने सोचा कि इस काम के लिए तो साइकिल होना आवश्यक है। अगर काम मिल जाता है तो वो कुछ दिन पैदल भी कार्य कर सकता है।

उसने उन हॉकरों से ही इस काम के लिए जानकारी जुटाने के विचार से एक हॉकर  को अपना परिचय देकर पूछा कि उसका नाम क्या है, वो कहाँ रहता है, क्या उसे भी यह काम मिल सकता है? उस व्यक्ति ने बताया कि उसका नाम गणेश है। उनका एक संघ है। इस काम के लिए उनके संघ के प्रमुख से मिलना चाहिए। वे सब निकट की बस्ती में रहते हैं। इस समय कुछ सदस्य काम पर जा चुके हैं और कुछ जाने की जल्दी में हैं। वे लोग प्रतिदिन सुबह ४ बजे यहाँ पहुँच जाते हैं, फिर आधे घंटे बाद अख़बारों का वाहन आते ही काम में जुट जाते हैं। अगर वो कल सुबह ४ बजे वहाँ आ जाए तो संघ-प्रमुख उसे अखबार के अधिकारियों से कहकर उसे भी काम दिला सकता है।

अगले दिन अमन के अलार्म की चिड़ियों ने तीन बजे ही चहककर उसे भोर होने का संकेत दे दिया। अमन जल्दी से नित्य कर्मों से फारिग होकर ४ बजे से कुछ पहले ही अपने गंतव्य तक पहुँच गया। कुछ हॉकर  वहाँ आ चुके थे। वो गणेश के आने का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद उसे गणेश दिखाई दिया। धीरे-धीरे सदस्य भी वहाँ एकत्रित होने लगे। उसने गणेश के पास जाकर मुस्कुराकर हाथ मिलाया। गणेश ने उसका मंतव्य समझकर उसे एक कसे हुए गठीले बदन वाले युवक के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। अमन ने नमस्कार के साथ ही अपना परिचय देकर कार्य दिलाने का आग्रह किया।

दिनेश नाम के उस व्यक्ति ने उसका संक्षिप्त परिचय पूछा। अमन के अनाथ होने की बात जानकर  उसने अमन को दिलासा देकर अपने संघ में शमिल होने के लिए कहा।

अमन ने स्वीकृति देने के साथ ही उनकी ही बस्ती में एक कमरे का सुविधाजनक मकान किराये पर लेने की इच्छा भी जताई।

मेहनतकश लोग ईमानदार तो होते ही हैं, एक दूसरे के दर्द में भी साथ खड़े होते हैं।

अमन ने यह सब जिया और महसूस भी किया था। दिनेश उसे अखबार के अधिकारियों  के पास ले गया।

अमन के व्यक्तित्व, वेशभूषा और बातचीत के लहजे से प्रभावित अधिकारियों द्वारा यह पूछने पर कि पढ़ा लिखा और १२ वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बावजूद उसने यह रोज़गार क्यों चुना,  वो तो आगे पढ़ाई जारी रखकर बेहतरीन कैरियर बना सकता है तो उसने दिल्ली में विशेष उद्देश्य से आने की बात बताई और कहा कि उस कार्य के अलावा उसे अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी ही है, अतः अभी केवल गुजारे लायक रकम की ही दरकार है। अधिकारियों ने उससे कहा कि जब तक किसी नए इलाके से संपर्क/प्रचार  करके कार्य बढ़ाया जाए, तब तक उसे दिल्ली के अपने निवास के आसपास के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर अखबार बेचने का कार्य करना होगा। अमन ने अपनी सहमति दे दी।

अमन ने गूगल पर सर्च करके जानकारी जुटाई फिर आसपास के स्टेशनों के नाम  और यात्री गाड़ियों के रुकने का समय आदि नोट करके अगले दिन से ही अपना कार्य आरम्भ कर दिया। नित्य सुबह चार बजे से उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती थी। इस तरह सबके  सहयोग से उसे कार्य तो मिला ही, उनकी बस्ती में एक ठीक-ठाक घर की व्यवस्था भी हो गई। और वो धर्मशाला छोड़कर उन श्रमिकों की बस्ती में आ गया। अमन की कहानी से उन सबको अमन अपना सा लगा और वो भी शीघ्र ही उनमें घुल मिल गया। उसे अपने कार्यस्थल तक अखबार के सेंटर से दो किलोमीटर दूर जाना ही पड़ता था। कुछ दिन वो पैदल ही आना-जाना करता रहा। फिर साइकिल खरीदने, सीखने से लेकर अखबार बाँटने तक पूरा कार्य समझने में भी उसे उन सबका सहयोग मिलता रहा।

मोहल्ले में अमन अकेला था मगर उन सबके अपने परिवार थे,  अपनी समस्याएँ व प्राथमिकताएँ थीं। अमन की प्राथमिकता नयना की तलाश करना ही थी और  इस कार्य में वो किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता था अतः किसी से अपने उद्देश्य का जिक्र नहीं किया।

अखबार बेचते हुए वो जब भी फुर्सत में होता समाचार पढ़ने लगता था। दुनिया, देश, हर शहर, हर गाँव के हर गली मोहल्ले के समाचार इन अख़बारों में होते थे। लेकिन उसकी निगाहें दिल्ली के अनाथालयों के समाचार तलाशती रहती थीं। जिस अखबार में इस तरह का समाचार होता उसकी एक प्रति वो अपने पास रख लेता था और घर आकर कुछ गौर से पढ़ा करता था। अक्सर समाचार हृदय विदीर्ण करने वाले होते थे। मोबाइल पर भी सहेजी हुई लिंक्स पर इसी तरह के समाचार मिलते थे। मगर निर्मलादेवी अनाथालय के बारे में उसे अलग-अलग की वर्ड्स से सर्च करने के बावजूद अब तक कोई समाचार नहीं मिला था।

अनाथों पर तरह तरह के अत्याचार, बालिकाओं, किशोरियों, युवतियों के संचालकों द्वारा ही मान-मर्दन करने के किस्से पढ़-पढ़कर उसका दिल नयना की सलामती की दुआ माँगने लगता। न जाने वो किस जहान में खो गई है... कब और कैसे उसे खोज पाउँगा...यह सब सोच-सोच कर उसका मन निराशा से भर जाता फिर अगले ही पल स्वयं को दिलासा भी देने लगता-

“अरे, अमन तुम तो इन कुहासों की कोख में ही अपने जीवन के बचपन और कैशोर्य का अनमोल हिस्सा जी चुके हो, अब तो तुम्हारे जीवन में उजालों का फैला हुआ आसमान है...इस तरह हिम्मत हारकर क्या तुम नयना के साथ अन्याय नहीं कर रहे...? वो कहीं न कहीं तुम्हारा इंतजार कर रही होगी...अपना लक्ष्य मत भूलो...!!”  फिर वो आगे की रूपरेखा तैयार करने लगता।

गुजर-बसर तो होने ही लगी थी, वो अधिक से अधिक मेहनत करके अख़बारों से होने वाली कमाई से ही खर्च पूरा कर लेता था। अपने मकान के किराये के पैसे उसने पढ़ाई और आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए रख छोड़े थे। अखबार के अधिकारियों से भी वो अक्सर चर्चा करके इस क्षेत्र की जानकारियाँ जुटाता रहता था। वो आश्चर्य-चकित होकर सोचता रहता कि एक ही दिन में इतने समाचार कैसे एकत्र होकर छप जाते हैं?

एक दिन उसने जिज्ञासावश एक अधिकारी से चर्चा करते हुए यह सब जानना चाहा। अधिकारी उसकी वाक्पटुता और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी के भी अच्छे ज्ञान से प्रभावित हो चुके थे। उन्हें अमन में एक होनहार पत्रकार बनने की संभावना नज़र आई। उन्होंने उसे एक दिन कार्यस्थल पर आकर सारी प्रक्रिया सामने देखने का निमंत्रण देकर एक कार्ड आगे बढ़ा दिया जिसमें कार्यस्थल का पता और संपर्क नंबर नोट था।

अमन अपनी मुँहमाँगी मुराद पूरी होते देख उसी दिन अपना कार्य समाप्त करके साइकिल से ही ५ किलोमीटर का सफ़र करके वहाँ पहुँच गया। वहाँ उसका परिचय कई वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों से हुआ। उनका उत्साह और फुर्ती देखते ही बनती थी।

लगभग दो घंटे वहाँ रहकर अमन सारी प्रक्रियाएँ देखता और समझता रहा। चर्चा से उसने जान लिया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का ही आवश्यक अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों का अध्ययन, चिंतन-मनन, लेखन, अभिव्यक्ति का हुनर और जनसेवा की भावना का होना पत्रकार के लिए अति आवश्यक है। इस कार्य में भी कैरियर बनाने के लिए अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि विकल्प मौजूद हैं।

क्रमशः...

### अध्याय 17

अनाथालय की सवाली ज़िन्दगी जीते जीते अमन के सीने में न जाने कितने सवाल दफन होते गए थे। उनके जवाब खोजने के लिए उसे पत्रकारिता का पेशा ही बेहतरीन, सहज और रुचिकर प्रतीत हुआ। उसने तय कर लिया कि नयना की तलाश के साथ ही उसे इस दिशा में भी कदम बढ़ाना चाहिए। इसके लिए उसने अपनी सीमित आय के बारे में अखबार के अधिकारियों को बताकर सहयोग और मार्गदर्शन के लिए अनुरोध किया। अधिकारियों ने उसे १२ वीं के बाद किये जा सकने वाले कुछ ऐसे कोर्सों के बारे में बताया जो अखबार बाँटने का कार्य जारी रखते हुए वो अपने घर पर अध्ययन-रत रहकर भी कर सकता है। इसके साथ ही उसे दिल्ली की नई सोसायटी की बहुमंजिला इमारतों में अखबार बाँटने का कार्य सौंप दिया ताकि एक निश्चित अवधि में उसका कार्य पूरा हो जाया करे।

जानकारी हसिल होते ही अमन ने अपने अध्ययन के लिए कंप्यूटर सहित आवश्यक सामग्री एकत्र करके उन अधिकारियों के मार्गदर्शन में फॉर्म भरकर अपना अध्ययन आरम्भ कर दिया। उसने सुबह १० बजे तक अखबार बाँटना, फिर भोजन, आराम के बाद दोपहर से शाम ढलने तक का समय नयना की तलाश के लिए और रात में अध्ययन के लिए तय कर लिया।

उधर आगरा से कुशल का फोन आया कि उन तीनों को नौकरी के लिए आवेदन पत्रों पर आरक्षित कोटे में इंटरव्यू के बाद सरकारी नौकरी मिल गई है, और वे कम किराये वाले सरकारी आवास में रहने की व्यवस्था कर सकते हैं, अतः अमन को यहाँ आकर मकान के निचले खंड को भी किराये पर चढ़ा देना चाहिए। लेकिन अमन ने सिलसिलेवार कुशल के साथ अपने क्रियाकलाप की जानकारी साझा करते हुए कहा कि उसने पत्रकारिता का डिप्लोमा कोर्स करने के लिए फॉर्म भर दिया है। इस अवधि में वो नयना की तलाश और पढ़ाई एक साथ जारी रखेगा। अगर आवश्यकता हुई तो उसे लोन भी मिल जाएगा लेकिन जब तक उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता,  उनको अभी वहीं रहकर नौकरी करते रहना चाहिए ताकि मकान की देखरेख होती रहे।

अब अमन प्रतिदिन भूख-प्यास भूलकर अथक भटकता रहता। ६ महीने तक उसने एक-एक करके दिल्ली के लगभग सारे अधिकृत, अनधिकृत अनाथालय,  नारी निकेतन खँगाल लिए लेकिन उसे नयना का किसी तरह का कोई सुराग नहीं मिला। अब न चाहते हुए भी एक बारगी  उसके जेहन में वेश्यालयों के खतरनाक दृश्य दृष्टिगोचर होने लगे। वो अपनी निरपराध मासूम नयना के साथ नियति के इस कदर क्रूर अन्याय की कल्पना तक नहीं कर सकता था लेकिन मन को कठोर बनाकर तलाश जारी रखनी ही थी, क्योंकि अब तलाश का अंतिम चरण इसी प्रवेशद्वार से गुजरकर ही पूर्ण हो सकता था, अतः वो अपना रूटीन बदलकर देर रात को दिल्ली के रेड लाइट एरिया सहित इसी तरह के बदनाम बाजारों का रास्ता तय करने लगा।

इन स्थलों पर उसके साथ एक समस्या यह भी थी कि इतने साल के बाद नयना को पहचानेगा कैसे? अनाथालय अथवा नारी निकेतन तो सबका पूरा ब्यौरा रखते हैं लेकिन यहाँ वो सब सही जानकारी तो मिलेगी नहीं,  अतः उसने  जाँच का नया तरीका ईजाद कर लिया, जिसके अनुसार अगर नयना कहीं होगी भी तो अपना नाम सुनकर उसे एकदम पहचान लेगी। वो किसी भी अड्डे पर जाकर संचालिका को मुँहमाँगी रकम चुका देता फिर अन्दर जाते ही मेकअप से लिपी-पुती कामुक हावभाव प्रदर्शित करती हुई युवती के सामने हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठकर कहता-

“हे देवि, मैं इस मार्ग का अनुगामी नहीं हूँ... अपनी प्रियतमा की तलाश में भटक रहा हूँ। क्या तुम मेरी नयना को जानती हो?”

जब सामने से आश्चर्य मिश्रित नज़रें उसे घूरने लगतीं तो चुपचाप सर झुकाए क्षमा माँगकर वहाँ से निकल जाता। इसी तरह दीवानों की तरह भटकते हुए उसे ६ महीने बीत गए।

अब उसका मन इन स्थलों पर नियमित आने का मन नहीं होता था। वहाँ मजबूरी और शोषण की शिकार औरतों पर होते हुए अत्याचार के अहसास मात्र से ही उसका कलेजा काँपने लगता था और उसका मन फिर अपने अध्ययन पर एकाग्र नहीं हो पाता था। अतः अब सप्ताह में एक ही दिन आने का तय करके उसने अपने अध्ययन पर ध्यान देना शुरू किया। इस तरह लगभग ६ महीने और बीत गए। एक दिन उस बदनाम बाजार की एक कोठरी में एक युवती से यही सवाल दोहराया तो सामने वाली युवती ने बेताबी से उसे झिंझोड़कर पूछ लिया-

“कौन नयना, किस नयना की बात कर रहे हो,  तुम कौन हो, बोलो?”

उसके प्रतिप्रश्न से अमन को उम्मीद की किरण दिखाई दी, वो उसके मुँह से ही आगे सुनने के लिए तुरंत बोल पड़ा –

“मैं अमन हूँ...”

“नयना!!...अमन!!...आह, कहीं यह सपना तो नहीं...क्या तुम “निर्मलादेवी बाल आश्रम” वाले अमन हो...?”

“हाँ हाँ, जल्दी बताओ देवि! क्या तुम नयना के बारे में कोई जानकारी रखती हो, वो कहाँ है, कैसी है?”

यह सुनते ही उस युवती की आँखों से अश्रुधार फूट पड़ी और हिचकियाँ लेते हुए रोते रोते बोली-।

“अमन भैया, मैं नयना की बदनसीब सखी डाली हूँ।”  कहते हुए वो युवती ज़ार ज़ार रोने लगी।

“अरे, पहले चुप हो जाओ डाली बहन,  मुझे बताओ, तुम यहाँ क्यों और कैसे आई,  नयना और तुम्हारी वो सखी लता कहाँ है?  मेरी शैलजा आंटी से बात हुई थी उन्होंने नयना के लापता होने और उसके ६ महीने बाद तुम दोनों के आश्रम से भाग जाने की बात बताकर और कोई जानकारी नहीं होने की बात कही।”

“अमन भैया,  नयना का तो कोई पता नहीं चला और लता ने इन्हीं अँधेरों में मौत को गले लगाकर अपने कष्टों को विराम दे दिया। लेकिन मैं उन जालिमों को सबक सिखाने के लिए यह बदतर ज़िन्दगी उस घड़ी के इंतजार में जीती रही हूँ, जब यहाँ से किसी तरह निकलकर अपनी दास्तान तुम तक न पहुँचा देती। अगर मैं भी मौत को गले लगा लेती तो मानवता को कलंकित करने वाले उन भेड़ की खाल में छिपे भेड़ियों के व्यभिचार के किस्से किसी तहखाने में दम तोड़ देते। लगता है उन पापियों के पाप के घड़े भर गए होंगे तभी कुदरत ने तुम्हें यहाँ पहुँचा दिया है। अमन भैया, अब नयना की तलाश के साथ मेरा भविष्य भी तुम्हारे ऊपर ही निर्भर है, क्या तुम मुझे नीता आंटी से छुड़ाकर अपने साथ ले जाओगे?”

“बिलकुल! अब तो यह मेरा पहला कर्तव्य है लेकिन यह सब कैसे हुआ डाली बहन, मुझे सब विस्तार से बताओ।”

अमन के मुँह से सहानुभूति के बोल सुनते ही डाली के नयनों से अश्रुधार बहने लगी उसकी आँखों के सामने विगत का कालिमा से लिपा पुता दृश्य जीवंत हो गया। अश्रु पोंछकर उसने अमन को पानी देकर दो घूँट स्वयं भी पिए, फिर अमन के अनाथालय छोड़ने के बाद वहाँ तक पहुँचने की सारी दास्तान विस्तार से सुनाई-

“नयना के लापता  होने के बाद सेठजी का हमारे साथ शारीरिक शोषण के साथ ही अमानवीय व्यवहार आरम्भ हो गया था। उनकी बातों से हमें स्पष्ट पता चल गया था कि नयना को उसी ने गायब किया या करवाया है। वे हमेशा धमकी देते थे कि अगर उसकी किसी बात का विरोध किया तो हमें भी नयना के पास भेज देगा, जहाँ हर दिन हमारा जिस्म शिकारी कुत्तों की तरह नोचा जाएगा। शैलजा आंटी को भी उनके हर दुष्कृत्य की जानकारी रहती थी, मगर सब कुछ जानकर भी अनजान बनी रहती थीं।

हम कुछ दिन चुपचाप अत्याचार सहती रहीं। फिर हमने अपने बचाव और नयना का समाचार तुम  तक पहुँचाने के विचार से आश्रम से भाग निकलने की योजना बनाई क्योंकि नयना के लापता होने से हम समझ गई थीं कि बालिग होने के बाद मुक्त करना केवल दिखावा था।

एक दिन अवसर देखकर आधी रात को चौकीदार को ऊँघते देखकर हम आश्रम की दीवार के टूटे हुए हिस्से तक पहुँच गईं। वहाँ से कुछ प्रयास के बाद हम नीचे कूदने में सफल हो गईं। अब हमें आगरा पहुँचने के लिए सुबह तक इंतज़ार करना था अतः सुरक्षित स्थान तक पहुँचने के लिए हमने स्कूल जाने वाले रास्ते की विपरीत दिशा में दौड़ना शुरू किया क्योंकि उस रास्ते से ही नयना लापता हुई थी अतः हमारे लिए भी पकड़ी जाने का जोखिम था।

रास्ता सुनसान था और अनजान भी...बदहवासी में आगे दौड़ते हुए देखकर हमें गश्ती पुलिस के दो आदमियों ने रोक लिया और पूछताछ शुरू कर दी। हमने कुछ भी न बताते हुए स्टेशन तक पहुँचने में सहायता माँगी तो वे हमें चौकी तक ले गए और उनके पूछताछ के कठोर लहजे से हमने सारी सच्चाई बयान कर दी। लेकिन सेठजी का नाम सुनकर उन्होंने उनको नामी समाजसेवक करार देकर हमपर ही सेठजी पर गलत इलज़ाम लगाने का आरोप मढ़ दिया और हमें अन्दर ले जाकर हमारे साथ घंटों दुष्कृत्य करते रहे फिर वहीँ कमरे में बंद कर दिया। हम डर के मारे आगे की सोचकर काँपती रहीं, सुबह होते ही उन्होंने सेठजी को बुलवाकर हमें फिर से उन्हें सौंप दिया।”

कहते-कहते डाली फिर से रोने लगी। अमन ने उसे धैर्य बँधाते हुए उसकी पीठ पर हाथ फेरा और पानी का गिलास आगे बढाया। दो घूँट पीकर भर्राए गले से वो फिर कहने लगी-

“हमें तीन दिन तक आश्रम के एक कमरे में कैद करके रखा गया। रात में सेठजी आते और गालियों की बौछार और मारपीट के साथ ज़बरदस्ती अपनी हवस पूरी करते रहे। फिर चौथे दिन एक महिला को साथ में ले आए और उसके सामने प्यार जताते हुए यह कहकर कि ये नारी-निकेतन की संचालिका नीता देवी हैं। तुम दोनों को अपने आश्रम में ले जाएँगी।  वहाँ तुम्हें विवाह होने तक गृह-उद्योग में पारंगत किया जाएगा, हमें उस महिला के हवाले कर दिया। फिर आंटी हमें यहाँ लेकर आ गईं। आगे भैया...जो हुआ मैं बयान नहीं कर सकती।”  डाली फिर अपनी नम होती हुई आँखें पोंछने लगी।

डाली की दर्द भरी दास्तान से अमन की आँखों में खून उतर आया। कैसा नादान था वो...जो अब तक शैलजा आंटी और सेठजी को देवदूत समझता रहा। अनाथों का सहारा मानता रहा...उसने उसी समय नीता देवी से डाली को अपनी बहन बताकर मुँहमाँगी रकम लेकर उसके सुपुर्द करने का निवेदन किया। काफी अनुनय-विनय के बाद नीता देवी ने उसकी बात मान ली। लेकिन अमन के पास कैश रकम  नहीं थी अतः अगले दिन रकम के साथ आने का वायदा करके डाली को सांत्वना देकर वापस घर आ गया।

अमन चाहता तो पुलिस तक जा सकता था मगर इस तरह बात सेठजी तक जाती और डाली के साथ ही उसकी अपनी और नयना की जान को भी खतरा उत्पन्न हो जाता...

अतः जब तक नयना का पता नहीं चल जाता, तब तक सेठजी पर हाथ डालना ठीक न समझकर उसने  डाली को सुरक्षित आगरा पहुँचाने का निर्णय लिया।

अगले दिन रात को अमन कुछ जल्दी ही घर से निकल पड़ा। वायदे के मुताबिक उस वेश्यालय की संचालिका को कैश रकम देकर डाली को लेकर सीधे आगरा जाने वाली बसों के नियत स्टॉप पर पहुँच गया। वो उसे कमरे पर ले जाकर किसी को उसके बारे में बताना नहीं चाहता था। उसने टिकट लेकर डाली को बस में बिठा दिया और बताया कि उसने मित्रों से बात कर ली है,  आगरा पहुँचते ही कुशल उसे लेने बस स्टॉप पर पहुँच जाएगा। वहाँ अपना घर होने से उसे कोई परेशानी नहीं आएगी। डाली सजल नेत्रों से अमन को दुवाएँ देते हुए निहारती रही और अमन उसे विदा करके वापस घर आ गया।

क्रमशः

### अध्याय 18

नयना उन तीन गिद्धों के चंगुल से छूटने को छटपटाती रहती थी। उसका शारीरिक शोषण होता रहा। वे तीनों गर्भनिरोधकों का प्रयोग करते थे अतः एक तरफ से वो अवश्य बेफिक्र थी कि उसकी कोख में कभी उन रक्तबीजों का बीज अंकुरित नहीं होगा। मगर व्याकुल मन सोचता रहता कि क्या वो इस जनम में अमन से कभी नहीं मिल पाएगी?  क्या उसे अगले जन्म में पाने के लिए मृत्यु को गले लगा लेना चाहिए...? मगर अमन तो यह जान भी नहीं पाएगा कि मैं उसके लिए प्राण त्याग चुकी हूँ। फिर दूसरे जन्म में भी दो प्रेमी वास्तव में मिलते ही हों यह निश्चित कहाँ होता है? बल्कि उसकी रूह भी प्यासी ही भटकती रहेगी। उसे इसी जन्म में अपने प्यार को पाना है...कभी तो अत्याचार के घिनौने घन छंटेंगे और प्यार के सुख-सूरज की पहली किरण उसके जीवन के अँधेरों को उजालों में बदलने उगेगी! इसके लिए उसे चाहे कितना ही अत्याचार क्यों न सहन करना पड़े, वो अपना हौसला टूटने न देगी। अमन का वो प्रथम प्रेमिल, पावन स्पर्श फिर उसकी ज़िन्दगी की धडकनों में समाकर उसके तन-मन को तृप्त करने के इंतजार में होगा। इस तरह मृत्यु का वरण करने से तो वो अमन से सदा के लिए दूर हो जाएगी।

हर दिन हर रात उसके जेहन में यही उथल पुथल मची रहती। मन ही मन बुदबुदाती रहती- “अमन अवश्य मुझसे मिलने आश्रम में गया होगा। न जाने मेरे बारे में उसे क्या सूचना दी गई होगी...वो मुझे खोजने का अवश्य प्रयास कर रहा होगा...डाली और लता भी न जाने किस हाल में होंगी, यहाँ से निकलने के लिए किसी की सहायता कैसे ली जाए...इन भाइयों से तो सहायता के लिए कुछ कहना भी खतरा मोल लेने जैसा है, आखिर बाहर कैसे निकल सकूँगी...? किसी को सूचित करूँ भी तो कैसे...? आजीवन तो इन नरपशुओं के साथ रह नहीं सकती”

उस दिन सफाई करते हुए वो हाल के द्वार तक पहुँची तो नीचे से अखबार को सरककर अन्दर आते देखकर उसके मस्तिष्क में अचानक बिजली सी कौंध गई कि अगर इसी तरीके से कोई कागज़ का पुर्जा अन्दर से सरकाकर बाहर अखबार लाने वाले व्यक्ति तक पहुँचाया जा सके तो हो सकता है वो उसकी कुछ सहायता करने के लिए कुछ प्रयास करे...लेकिन सफाई जयराम के सामने ही करनी होती थी तो वहाँ कैसे कुछ भी कर सकती है...फिर उसके पास कागज़ कलम भी तो नहीं...और वो मन मसोस कर रह जाती।

सोचते सोचते एक दिन उसे एक उपाय सूझा। सबसे पहले उसने कागज़ का कोरा टुकड़ा खोजना शुरू किया। यह काम उसका आसानी से हो गया। शीघ्र ही उसकी नज़र में रसोई में सामान सब्जी के साथ आने वाले कागज़ के पैकेट आ गए। उसने एक पैकेट छिपाकर अपनी अलमारी के कपड़ों के बीच दबाकर रख लिया। फिर श्रृंगार के सामान से काजल की पेन्सिल लिखने के लिए निकालकर नहाते समय कागज़ और कपड़ों के साथ बाथरूम में चली गई। कागज़ पर उसने संक्षेप में अपनी परेशानी लिखकर पुनः छिपाकर अल्मारी में कपड़ों के बीच दबा दिया। यहाँ तक सफलता मिलने पर उसकी बाँछें खिल गईं।

लेकिन पुर्जे को बाहर पहुँचाना टेढ़ी खीर था। अब रसोई में काम करते हुए उसका पूरा ध्यान द्वार और जयराम पर ही केन्द्रित होता था। उसके शौच के लिए जाते समय वो रसोई में काम कर रही होती थी। अगर जयराम के शौच के लिए जाते ही उसी क्षण अखबार वाला आ जाए तो उसका काम बन सकता है। इसमें जोखिम तो बहुत था, अगर पकड़ी गई तो उसका क्या हाल किया जाएगा यह उसकी कल्पना से परे था फिर भी वो हर दिन एक नई आशा के साथ उस क्षण का इंतज़ार करती जब ऐसा संयोग घटित हो जाए।

अगर इंसान के इरादे दृढ़ हों और सोच सकारात्मक हो तो कुदरत भी सदय होकर साथ देने लगती है। द्वार की दरार बहुत पतली होने से अखबार सरकाने वाले को कुछ पल तो लगते ही थे और नयना प्रतिदिन एक नन्ही सी आस में कागज़ का पुर्जा अखबार आने तक अपने कपड़ों में ही छिपाकर रखती थी फिर सफल न होने पर तुरंत अल्मारी में रख आती थी।

आखिर उसे चार महीने के लम्बे इंतजार के बाद वो अवसर मिल ही गया, जब नयना ने जयराम के शौच के लिए जाते ही अखबार सरकते देखा। उसने अविलम्ब बिजली की फुर्ती से दबे पाँव वहाँ पहुँचकर अन्दर आते अखबार पर पाँव जमा दिया और फिर पुर्जे के साथ ही वापस बाहर सरका दिया और हाँफती-काँपती वापस रसोई में पहुँचकर मन ही मन प्रार्थना करती हुई धड़कते दिल से प्रतिक्रिया देखने लगी। कुछ ही क्षणों के बाद अखबार वापस अन्दर सरकाया गया तो उसकी जान में जान आई। उसकी विनती विधाता ने स्वीकार कर ली थी। उसकी दुर्दशा की खबर ख़बरें पहुँचाने वाले के हाथ में जा चुकी थी। नयना को अब आशा की नई किरण उगने का इंतजार करना था। यह इंतजार उसकी ज़िन्दगी में नया सबेरा लेकर आएगा, इस विश्वास के साथ नयना का आत्मबल कई गुना बढ़ गया था।

डाली को गए  ५-६ महीने बीत चुके थे लेकिन अभी तक नयना का कोई पता नहीं चला था। अमन चिंतातुर मुद्रा में दिन काट रहा था, इस बीच एक दिन कुशल का फोन आया-

“अमन भैया, डाली के यहाँ रहने से आस पड़ोस के लोग हमें शंकित नज़रों से देखने लगे हैं। साथ रहते हुए मैं और डाली एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं अतः उचित यही होगा कि हम कोर्ट में विवाह कर लें। वैसे हम तीनों ने तय किया था कि तुम्हारी नयना भाभी के साथ वापसी के बाद ही हम भी किसी अनाथालय के सामूहिक विवाह आयोजन में शामिल होकर विवाह करेंगे लेकिन अब अधिक टालना उचित नहीं है। रतन और कीरत भी चाहते हैं कि वे आत्मनिर्भर हो चुके हैं अतः विवाह करके अपना घर बसा लें। इसके लिए हमें तुम्हारी सहमति और आशीर्वाद की आवश्यकता है।”

“यह तो बहुत अच्छी बात है कुशल, तुमने डाली के बारे में मेरी चिंता दूर कर दी। तुम तीनों सहर्ष विवाह करके अपना घर बसा सकते हो मगर तुम्हें डाली के साथ मेरे आने तक घर की देखरेख के लिए वहीँ रहना होगा और जिस दिन रतन और कीरत के विवाह का आयोजन निश्चित हो तुम भी वही दिन अपने लिए चुनोगे तभी मैं आयोजन में उपस्थित हो सकूँगा। मैं काम से छुट्टी नहीं ले सकता अतः वहाँ रात में नहीं रुकूँगा। सभी कार्यक्रम संपन्न होते ही उसी दिन वापस निकलना होगा।”

लगभग तीन चार महीने के बाद रतन और कीरत के विवाह की तिथि सारी औपचारिकताओं के बाद तय हो गई और कुशल ने भी वही दिन विवाह के लिए तय कर लिया। अमन उस दिन सुबह अपना काम समाप्त होते ही आगरा चला आया और तीनों मित्रों के विवाह-आयोजन में शामिल हुआ। डाली की तो रुलाई ही नहीं रुक रही थी। बार-बार नयना के मिलने की उम्मीद में  अमन का हौसला बढ़ा रही थी। रतन और कीरत ने अपने रहने की व्यवस्था कर ली थी। आखिर सबको शुभकामनाएँ देते हुए अमन ने भारी मन से सबसे शीघ्र मिलने का आश्वासन देकर विदा ली।

क्रमशः...

### अध्याय 19

उसी दिन सुबह अमन ने हमेशा की तरह उस टाउनशिप की बीस मंजिला बिल्डिंग के १५ वें माले पर स्थित फ़्लैट नंबर २ के बंद द्वार के नीचे बनी हुई पतली सी दरार से अखबार को बीच से खोलकर कुछ झुकते हुए सरकाना चाहा तो अखबार ने आधी दूरी तय करने के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया और वहीं रुक गया। अमन ने उसे डांट लगाते हुए कहा-

“अबे जल्दी जा न! जानते नहीं कि अभी कितने घरों के अखबार बाँटने बाकी हैं...”

मगर वो काफी प्रयास के बावजूद अन्दर तो नहीं घुसा बल्कि वापस बाहर आ गया। अमन ने सोचा कि शायद अन्दर कोई सामान गिरा पड़ा होगा जिससे टकराकर यह वापस आ गया। उसे इस फ़्लैट के लिए विशेष हिदायत दी गई थी कि अखबार बाहर नहीं छोड़ना है क्योंकि कि उस घर में रहने वाला रात की शिफ्ट में नौकरी करता है और उसका पेमेंट ऑन लाइन हो जाता है।

वो थोड़ा और झुककर  पुनः प्रयास करने लगा तो उसे अखबार के नीचे एक कागज़ का पुर्जा दिखाई दिया जो उसी के साथ किसी ने अन्दर से सरकाया था। अचंभित अमन कभी उस फ़्लैट के द्वार पर लगे हुए बड़े से ताले को देखता तो कभी उस पुर्जे को...अगर अन्दर कोई है तो बाहर से ताला क्यों लगाया गया है... जबकि बिल्डिंग के हर फ़्लैट के द्वार में आटोमेटिक लॉक लगा हुआ होता है। इसका मतलब कुछ गड़बड़ वाली बात हो सकती है। उसने पुर्जे को जैसे ही उठाया तो ऊपर ही वार्निंग शब्द के साथ लिखा हुआ था-

“प्लीज़...प्लीज़!  यह बाद में छुपाकर पढ़िएगा पहले अखबार सरका दीजिये।”

ये शब्द पढ़ते ही अमन एकदम डर गया कि न जाने क्या बात है। वो किसी मुसीबत में न पड़ जाए अतः उसने जल्दी से पुर्जा जेब के हवाले किया और उस फ्लोर के बाक़ी फ्लैट्स में अखबार हमेशा के क्रमानुसार द्वार के बाहर डाल दिया।

अपना काम पूरा होते ही वो शीघ्र ही घर आ गया और जेब से पुर्जा निकालकर पहले उसने उसकी लिखावट पर गौर किया। वो इबारत किसी काली कलर पेन्सिल से लिखी हुई लग रही थी, उसने पढ़ना शुरू किया –

“मैं यहाँ पर बंदिनी हूँ, आपसे सहायता की दरकार है। आप जो कोई भी सज्जन हैं, मानव ही होंगे...यहाँ मैं लगभग ढाई वर्षों से मानवता को कलंकित करने वाले तीन दानवों द्वारा दी जा रही शारीरिक और मानसिक यातना झेल्र रही हूँ। मुझे विश्वास है कि आप मेरी सहायता अवश्य करेंगे।

कृपया कहीं से एक पतली कॉपी और पेन अथवा पेन्सिल खरीदकर, जो इस दरार से अन्दर आ सके काम पर आते समय प्रतिदिन अपनी जेब में रख लिया करें। जिस दिन आज की तरह अखबार पर दबाव लगे, कॉपी-पेन तुरंत अन्दर सरका दीजियेगा। यह पुर्जा मैंने जिस तरह बाहर सरकाया है। वो अवसर पुनः कब मिलेगा, मैं नहीं जानती लेकिन इंतजार अवश्य करूँगी।  अगर आप आते रहे तो कापी पेन मिलते ही अपनी पूरी कहानी लिखकर फिर से आज की तरह आप तक पहुँचाने में भी कुछ समय लग सकता है। अपना परिचय भी अगर आपका सहयोग मिला तो बाद में ही दूँगी”।

-एक अनाथ बदनसीब बाला

इबारत पढ़ते ही अमन की छठी इन्द्रिय सक्रिय हो उठी। उसके मस्तिष्क ने तेज़ी से सोचना शुरू कर दिया...

“अन्दर है तो कोई अनाथ लड़की और खतरे में भी है, उसने वो इबारत न जाने कैसे लिखी होगी...कहीं वो नयना तो नहीं...! लेकिन इसका पता कैसे लग सकेगा...!

उसने ढाई वर्षों से वहाँ होने की बात लिखी है और नयना भी लगभग ढाई वर्ष से ही लापता है...वो नयना हो भी सकती है, नहीं भी...  अगर वो नहीं हुई तो कॉपी-पेन पहुँचाते हुए किसी के पकड़े जाने पर हो सकता है उसके साथ मैं भी खतरे में पड़ जाऊँ...आखिर अनाथों का होता ही कौन है...! मगर कुछ भी हो मैं उसकी सहायता अवश्य करूँगा। नयना के बिना मेरा कोई वजूद नहीं...वो न भी हुई तो एक निर्दोष बाला की सहायता करने का पुण्य तो मिलेगा ही...और जब तक उसका सही परिचय और दोषियों के पूरे कृत्य की विस्तृत जानकारी नहीं मिलती, पुलिस तक जाना व्यर्थ ही है।”

उसने उसी दिन एक पतली सी कॉपी और बालपेन की रिफिल खरीद ली। घर पहुँचकर उसके प्रथम पृष्ठ पर ही उसने लिखा-

“हे देवि! मेरा नाम अमन है, मैं भी एक अनाथ युवक ही हूँ और अपने जीवन के आठ वर्ष इसी शहर के निर्मलादेवी अनाथालय में व्यतीत कर चुका हूँ...उन्हीं दिनों की अपनी सहपाठी  प्रियतमा नयना की तलाश में दो वर्ष से इस शहर में भटक रहा हूँ, आपका परिचय जो भी हो मेरे लिए पूजनीय हैं। मैं हर नारी का दिल से सम्मान करता हूँ, आप अगर मेरी नयना को जानती हों तो कृपया अपनी कहानी और पूरे परिचय के साथ ही उसके बारे में भी पूरी जानकारी लिख दीजियेगा। मैं अभी इतना काबिल तो नहीं हूँ कि अमानुषों से मुकाबला कर सकूँ लेकिन आपकी सहायता के लिए हर संभव प्रयास अवश्य करूँगा। यह कॉपी फिर इसी तरह सरकने का इंतजार करता रहूँगा।”

अमन ने अपना परिचय और अनाथालय का नाम यह सोचकर जानबूझकर लिख दिया था कि अगर वो नयना हुई तो उसका नाम परिचय पढ़ते ही ख़ुशी से दीवानी हो जाएगी और उसका उत्साह भी बढ़ जाएगा। इसी उथल-पुथल में रात को वो ठीक से सो भी नहीं पाया। स्वयं दुखी होते हुए भी उसका मन किसी और को कष्ट में देखकर विचलित हो जाता था। उसके मस्तिष्क में लगातार विचारों का तूफ़ान उमड़-घुमड़ मचा रहा था। न जाने वो लड़की कौन है?  कहाँ से लाई गई होगी और दिल्ली की उस नव-निर्मित टाउनशिप की कई मंजिला बिल्डिंग की चाक चौबंद सुरक्षा के बीच एक फ़्लैट में किस तरह उसे बंदी बनाकर रखा गया होगा...! आखिर समाधान न मिलने पर अमन का मस्तिष्क  हारकर चुपचाप कुंडली मारकर नतीजा आने तक शांत बैठ गया।

अमन से दिन काटे नहीं कट रहे थे। किसी अबला पर अत्याचार हो रहा है और वो कुछ नहीं कर सकता...यह सोचकर वो विधाता को ही कोसने लगता था कि आखिर उसने अनाथों की किस्मत किस कलम से क्या सोचकर लिखी है... काम पर जाते समय वो कॉपी-पेन याद से जेब में रख लिया करता था और सोचता ही रहता कि न जाने वो दिन कब आएगा जब अखबार फिर से अन्दर जाकर बाहर वापस आने तक का सफ़र पूरा करे और वो कॉपी-पेन सरकाकर भारमुक्त हो सके।

इस तरह अखबार चुपचाप सरकता रहा और समय भी कुछ दिन आगे सरक गया। परीक्षा निकट आ चुकी थी, अमन पर पढ़ाई का लोड अधिक था। वह सोचता कि अगर ठीक से मेहनत नहीं हुई तो परिणाम मन माफिक नहीं आएगा।

रात को बाजारों में नयना को खोजना तो जिस दिन उसे पुर्जा मिला था, उसी दिन से उसने नयना के वहाँ होने की आस में बंद कर दिया था। परीक्षा में एक महीना ही शेष होने के बावजूद उसने अपने कर्तव्य को अहम् मानकर अखबार डालना नहीं छोड़ा। हर सुबह वो उस फ़्लैट में अखबार सरकाते समय आशा भरी नज़रों से द्वार को देखता फिर निराश लौटकर पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित कर देता।

आखिर एक सप्ताह बीतने पर उसकी यह मुराद पूरी हो गई और अखबार पर दबाव महसूस होते ही उसने कॉपी-पेन अन्दर सरका दिया और उसके साथ ही अखबार भी खींच लिया गया।

अब अमन को उस बाला के उत्तर का इंतजार तो था, लेकिन परीक्षा में भी कुछ दिन ही रह गए थे अतः वो स्वयं को तनावमुक्त रखने का प्रयास करते हुए तैयारी करता रहा।

क्रमशः

### अध्याय 20

अंतिम अध्याय

कॉपी खींचकर नयना बिजली की फुर्ती से वापस रसोई में पहुँच गई। उसकी धड़कन कई गुना बढ़ गई थी। जयराम वाशरूम में ही था अतः उसने कॉपी से रिफिल अलग कर ली और अपनी कुर्ती में हाथ डालकर कॉपी को ब्रा के नीचे दबा दिया और रिफिल को ऊपर से ही वहीँ फिट कर दिया। फिर जल्दी-जल्दी काम पूरा करने लगी। इस समय जयराम जल्दी में होता था अतः उसपर इतना गौर नहीं किया जाता था।

जैसे ही बेल बजी, उसे लॉक कर दिया गया। वो तो इसका इंतजार ही कर रही थी, कमरा बंद होते ही उसने कॉपी-पेन अलमारी में कपड़ों की तह में छिपा लिए। लिखने का काम तो बाथरूम में ही थोड़ा-थोड़ा करके हो सकता था, क्योंकि दिन-रात में जितनी बार उसे उन राक्षसों द्वारा रौंदा जाता, वो घिन के मारे उसी समय नहा लेती थी और इसके इस कृत्य में कोई बाधा नहीं डाली जाती थी।

हमेशा की तरह करीब आधे घंटे बाद बलराम ने कमरा खोला और नयना को खींचकर रौंदना शुरू किया। नयना एक घंटे तक शराब की गंध सहन करती हुई छटपटाती रही फिर उसके हाल में जाने के बाद कॉपी-पेन छिपाकर नहाने चली गई।

जैसे ही उसने पहला पन्ना खोला तो लिखावट से भरा हुआ देखकर उसने उत्सुकता वश पढ़ना शुरू किया। ज्यों-ज्यों वो पढ़ती गई, उसके तन-मन का पोर-पोर खिलता गया। मन ही मन वो ख़ुशी से किलक उठी और लिखना भूलकर बार-बार पढ़ती और इबारत को चूमती रही, फिर उसने नहाकर  कॉपी-पेन वापस छिपा दिया और अमन की यादों को सीने से लगाकर लेट गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अमन उसे इस तरह मिल जाएगा।

उसके मन में अचानक जिजीविषा जाग्रत हो उठी थी। उसने सोच लिया कि अब किसी भी तरह वो जल्द से जल्द अपने जीवित होने का शुभ समाचार अमन तक पहुँचाने का प्रयास करेगी।

प्रतिदिन नयना सावधानी पूर्वक अपनी कहानी अपने मस्तिष्क की परतों से कॉपी करके पन्नों  पर पेस्ट करती रहती, लिखते-लिखते अक्सर रो पड़ती फिर आँसू पोंछकर स्वयं को ही समझाती-

“अरी पगली, अब तो तेरे हँसने-मुस्कुराने के दिन निकट आ गए हैं। हिम्मत रखेगी तभी यह जंग जीतकर जालिमों से बदला ले सकेगी...” फिर वो जल्दी से आँसू पोंछ लेती।

कहानी दो दिन में ही पूरी हो गई और वो अगले दिन से उसे सीने में छिपाए अमन तक पहुँचाने का इंतजार करने लगी। लेकिन इस बार उससे एक दिन भी इंतजार नहीं हो पा रहा था

आखिर वो दिन भी आ गया जब जयराम के शौच के जाने के समय ही नयना ने अखबार सरकते देखा उसने तुरंत बेआवाज़ द्वार तक जाकर अखबार पर पाँव रख दिया। अमन के लिए यह रुकने का संकेत था, फिर उसने कॉपी सरका दी और सामान्य गति से वापस भी चली गई। जयराम अभी अन्दर ही था, लेकिन  इतनी देर में नयना की धडकनें बेकाबू होने लगी थीं कि कहीं उसकी हरकत देख न ली जाए,  मगर अब सर झटककर स्वयं को सामान्य बनाए रखा।  उसकी कहानी सही हाथों में पहुँच चुकी थी और उसे विश्वास था कि अमन तुरंत एक्शन लेकर उसे मुक्त करवा देगा।

अमन की परीक्षा निकट आ गई थी, लेकिन फ़्लैट से कॉपी मिलने तक उसे छुट्टी न लेकर इंतजार करना ही था। यहाँ अगर नयना न हुई तो भी उस अनाथ युवती की सहायता से वो पीछे नहीं हटेगा साथ ही नयना की तलाश की रूपरेखा नए सिरे से बना लेगा, यह सोचकर ही वो स्वयं को तनावमुक्त करने का प्रयास करता रहता था।

इसी गतिशील दिनचर्या में एक दिन बाद ही वो अप्रत्याशित घटना घट गई जिसका अमन को इंतजार था।

उस दिन जैसे ही उसने उस फ्लैट में अखबार सरकाया,  उसी क्षण अखबार पर दबाव के साथ ही उसकी दी हुई कॉपी उसकी बगल से बाहर सरक कर आ गई।

अमन ने बेसब्री से कॉपी खोली और अपना लिखा हुआ पहला पृष्ठ पलटाया तो अगले पृष्ठ पर लिखा था-

“मेरे प्रिय अमू, मैं तुम्हारी निन्नी हूँ, तुम्हारा परिचय पढ़कर मुझसे अधिक समय सब्र नहीं हो सकता। मेरा अहम उद्देश्य अपनी दास्तान तुम तक ही पहुँचाना था, मेरी पूरी कहानी इस कॉपी में लिखी हुई है,  अतः तुम्हें इसी वक्त कहानी पढ़कर मुझे यहाँ से निकालने का प्रयास करना होगा। इन निर्दयी मानवता के दुश्मनों को रसातल पहुँचाना ही तुम्हारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।”

-तुम्हारी निन्नी

आखिर अमन का अनुमान सही निकला, लेकिन नयना का सन्देश पाकर वो बेचैन हो उठा। अपनी प्रियतमा को इस हालत में महसूस करके मुँह से आह निकल पड़ी और वो मन ही मन बुदबुदाने लगा –

“ओ मेरी निन्नी, शुक्र है तुम जीवित तो हो...बहुत कष्ट झेले हैं तुमने, मगर यह तुम्हारे कष्टों का  अंतिम दिन है...और तुम मेरी बाहों में होगी...!!”

कॉपी खोलकर वो नयना की कहानी में छिपी उसकी पीड़ा की परतों में कैद होता गया। पढ़-पढ़ कर रोता रहा और आँसू पोंछता रहा। लेकिन यह समय भावनाओं में बहने का नहीं था। चूँकि वो  उन सब नीच पात्रों से पूर्व परिचित था अतः जल्दी-जल्दी उसने १५ मिनिट में कहानी का सार समझ लिया। अब नयना की मुक्ति के लिए उसका दिमाग कई गुना तेज़ी से कार्य करने लगा।

उसने आगे की प्रक्रिया के लिए अखबार के अधिकारियों से ही सलाह लेने का निर्णय करके एक अधिकारी को फोन लगाकर सारी बात बताई। अधिकारी ने अपराध की गंभीरता जानकर उसे  समझाया कि ऐसे में पुलिस और मीडिया के परस्पर सामंजस्य व सहयोग से ही अपराधों पर नियंत्रण किया जा सकता है अतः उसे तुरंत प्रिंटिंग प्लांट पर पहुँचना चाहिए। यहाँ मशविरा करने के बाद एक रिपोर्टर को साथ लेकर उस एरिया के निकट के थाने में कॉपी में वर्णित प्रसंग के आधार पर अपराधियों के खिलाफ प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवानी होगी।

अमन ने अपना काम पूरा करके घर न जाकर बाहर ही नाश्ता कर लिया और एक घंटे के अन्दर प्रिंटिंग प्लांट पर पहुँच गया। वहाँ से प्रेस रिपोर्टर देव कुमार के साथ उस फ़्लैट के अंतर्गत आने वाले थाने पहुँच गया। रिपोर्ट लिखने से पहले थानाध्यक्ष ने अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए घटनाक्रम की सत्यता का सबूत माँगा तो देवकुमार ने नयना की लिखित कहानी की कॉपी प्रस्तुत करके कहा कि चूँकि पीड़िता को ताला बंद करके रखा गया है अतः उसकी लिखित तहरीर को ही आधार बनाकर माणिक सेठ और उसके कर्मचारियों  के विरुद्ध रिपोर्ट लिखी जानी चाहिए। इस तरह देवकुमार के सहयोग और मार्गदर्शन में निर्मलादेवी अनाथाश्रम के संचालक वर्ग के प्रमुख माणिक सेठ और उसके सहयोगियों- जयराम और बलराम के खिलाफ नयना के अपहरण और लम्बे समय तक बंदी बनाकर बलात्कार किये जाने की प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाकर सभी आवश्यक औपचारिकताएँ देवकुमार द्वारा ही सम्पन्न हुईं।

मामला गंभीर जानकार थानाध्यक्ष ने उच्च अधिकारियों को सूचित किया। दूसरे दिन सुबह माणिक सेठ और बलराम को सेठजी के निवास पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। फिर उनको साथ लेकर पुलिस टीम, अमन और देवकुमार सभी सोसायटी के १५ वें माले के फ़्लैट नंबर २ के बाहर थे।

बाहर के ताले की चाबी बलराम के पास ही थी उसने पुलिस अधिकारी का इशारा देखकर ताला खोला और बेल बजा दी। अन्दर से द्वार के होल से झाँककर देखने के बाद द्वार खुल गया और सामने का नज़ारा देखकर अन्दर उपस्थित जयराम के हाथों के तोते ही उड़ गए। सब लोग अन्दर आ चुके थे।

अपने मालिक को सामने पुलिस की हिरासत में देखकर जयराम ने चुपचाप अपनी गिरफ्तारी दे दी।

अमन ने बंद कमरों पर नज़र डाली मगर वे बाहर से लॉक थे अतः वो नयना को आवाजें लगाने लगा। आवाजें सुनकर नयना अपने कमरे का द्वार पीटने लगी। चाबियाँ बलराम के पास ही थीं, पुलिस अधिकारी ने उसे दोनों बंद कमरों को खोलने का आदेश दिया। कमरा खुलते ही नयना आँसुओं में तरबतर खड़ी अपने मुक्तिदूतों को निहारने लगी। अमन ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।

दूसरे कमरे का ताला खुलने पर अन्दर महँगी शराब की बोतलों का अकूत भण्डार देखकर पुलिस अधिकारी की आँखें फटी रह गईं। उसने तुरंत उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना दी और आगे की कार्रवाई तक ऊपरी आदेश के तहत फ़्लैट सील करके तीनों अपराधियों और पूछताछ के लिए नयना, अमन और देवकुमार को भी  थाने लाया गया।

थाने में अमन ने थानाध्यक्ष को बताया कि नयना उसकी बचपन की प्रेमिका है और वे अमन की परीक्षा समाप्त होते ही कोर्ट-मैरिज  कर लेंगे। थानाध्यक्ष ने दोनों को बधाई और भावी जीवन की शुभकामनाएँ दीं और आवश्यक पूछताछ के बाद नयना को उसकी इच्छानुसार देवकुमार की ही जवाबदेही पर अमन के संरक्षण में यह लिखवाकर भेज दिया कि वे कोर्ट में केस की तिथियों पर अनिवार्य रूप से उपस्थित होते रहेंगे।

बाद में केस की पूरी छानबीन करके चूँकि “निर्मलादेवी बाल-आश्रम” भी संदिग्ध गतिविधियों के लिए वर्णित था, उसे सील करके शैलजा पर माणिक सेठ की अवैध गतिविधियों में परोक्ष रूप से साथ देने का अभियोग लगाकर सभी अपराधियों के विरुद्ध कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल कर दी गई।

अगले दिन नयना की पूरी कहानी दिल्ली के प्रसिद्ध अखबार के मुखपृष्ठ पर थी।

अमन नयना को कमरे पर ले आया था और आगरा फोन लगाकर सबको खुशखबरी देते हुए उसकी बात डाली और कुशल से करवाई। रतन और कीरत को भी यह शुभ समाचार सुना दिया। नयना के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अमन के बाँहों में लेते ही वो संशय से भरी थरथराती आवाज़ में कहने लगी-

“अमू, क्या तुम मुझे इतना समय उन दुष्टों के साथ बिताने के बावजूद मुझे मन से स्वीकार कर सकोगे? मैं केवल तुम्हारी एक झलक देखने के लिए ही अपनी इस अपवित्र देह का बोझ ढोती रही हूँ।”

“कैसी बात कर रही हो निन्नी, मेरी निन्नी...! आज मेरा वजूद केवल तुम्हारे ही दम पर है। तुम्हारी जुदाई में तार-तार हो चुका दिल कैसे तुम्हें दिखाऊँ...अब इस तरह की कोई बात जुबान पर नहीं लाना...  तुम महाभारत के इस पौराणिक प्रसंग से तो परिचित होगी ही कि द्रौपदी के पाँच पति थे और उसने मजबूरी वश ही पाँच भाइयों से विवाह की स्वीकृति दी थी, लेकिन उसे महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास, जो महाभारत ग्रंथ के रचयिता और उन घटनाओं के साक्षी भी थे, जो क्रमानुसार उस युग में घटित हुईं, ने आशीर्वाद दिया था कि द्रौपदी एक-एक वर्ष के लिए सभी पांडवों के साथ रहेगी और जब वह एक भाई से दूसरे भाई के पास जाएगी, तो उसका कौमार्य पुन: वापस आ जाएगा।

लेकिन इस युग में पुराणों में वर्णित प्रसंग को प्रतीकात्मक मानकर देखा जाए तो उसके अनुसार नारी अगर मन से पवित्र है तो तन से कभी अपवित्र नहीं होती... अगर ऐसा होता तो तलाक के बाद पुनर्विवाह, विधवा विवाह, विवाह पूर्व रिश्ते में रहना और इच्छा से बनाए हुए दैहिक संबंध को कानूनी मान्यता नहीं मिली होती। डाली और कुशल का उदाहरण तो तुम्हारे सामने है ही...अपवित्र तो वे नरपशु रक्तबीज हैं जो पूजिता नारी के साथ बलात्कार करके उसके हृदय की कोमलता को खंड खंड कर देते हैं और अपने परिवार में, पत्नी की नज़रों में पवित्र बने रहते हैं।”

“मेरे अमू तुम निश्चय ही किसी महापुरुष के अवतार हो...जो मानव रूप धरकर धरती पर जन्मे हो। मैं तुम्हारा हर कदम पर साथ देने को सदैव तत्पर रहूँगी।”

“नहीं निन्नी, मैं किसी महापुरुष का अवतार नहीं, एक इंसान ही हूँ, मेरा प्रथम संकल्प तो उन  रक्तबीजों की रसिकता को रसातल दिखाना है। तुम्हारे अपराधियों के विरुद्ध ऐसा जाल बुना जा चुका है कि उन्हें चाहे जब भी सजा मिले, कठोरतम ही मिलेगी और  इसके लिए तुम्हारी कहानी बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी।

मैं अपने मकान के नीचे के खंड में अनाथाश्रम की स्थापना करके उसका कार्यभार डाली और तुम्हें सौंपकर अपने पत्रकारिता-कर्म से मानवता की सेवा करता रहूँगा। आज तुम इन रक्तबीजों का शिकार हुई हो, कल और बालाएँ भी किन्हीं रक्तबीजों का शिकार हो सकती हैं... हम अपना जीवन अपने जैसे बेसहारा लोगों के कल्याण में ही बिताएँगे।”

अमन ने परीक्षा के लिए अखबार बांटने का काम छोड़ दिया और परीक्षा समाप्त होते ही उसने अधिकारियों से आगरा जाने की अनुमति माँगी और कहा कि यह मुक़दमा तो न जाने कब तक चलता रहेगा, उसे आगरा में बहुत से कार्य सम्पन्न करने हैं अतः परीक्षा का परिणाम आने के बाद वो साक्षात्कार की औपचारिकताएँ पूर्ण करके उनके अखबार के लिए ऑन लाइन सेवाएँ देता रहेगा और कोर्ट केस की तिथियों पर वहीँ से आता रहेगा।

इसके बाद उसने अपने आने की सूचना कुशल को देकर नयना के साथ आगरा प्रस्थान किया।

उन्हें लेने के लिए डाली और कुशल स्टेशन पहुँच गए थे,

वहाँ उसने किरायेदार से मकान का ऊपरी खण्ड अनुबंध के अनुसार अग्रिम नोटिस देकर एक महीने में खाली करने का अनुरोध किया। एक सप्ताह के अन्दर कुशल ने भी अपने निवास की व्यवस्था अन्यत्र कर ली और अमन ने तीनों मित्रों की सपत्नीक उपस्थिति में नयना के साथ कोर्ट में विवाह कर लिया।

अगले ही दिन वे दोनों प्रेम के प्रतीक ताजमहल के पार्श्व में बहती ताज नगरी की जीवनरेखा, माँ यमुना की संगीतमय स्वरलहरी बिखेरती निर्मल धारा में नौका विहार करते हुए अपनी पुरानी यादों की गठरी की गाँठ खोल बैठे थे। बीते हुए पलों को तो जैसे पंख मिल गए। पलक झपकते ही एक-एक करके उनके हृदयाकाश पर घने बादलों जैसे छा गए। सहसा नयना का हाथ अपने गालपर चला गया और वो उसे सहलाने लगी तो अमन ने पूछ लिया-

“क्या हुआ निन्नी, कोई परेशानी है क्या...?”

“नहीं अमू, बस बीते पलों ने घुसपैठ करके शरारत शुरू कर दी तो वो...तुम्हारे उन बचपन में लिए गए अनगिनत चुम्बनों की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।”

अमन ने मुस्कुराते हुए उसे निकट खींचकर उसका गाल चूम लिया।

समाप्त 🙏

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

अध्याय 1

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priy paathako

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geet, gazal, chand, laghukathaaen aur kahaaniyon ko paathakon kaa apaar sneh milane ke baad upanyaas lekhan kee ichchaa man men balawatee hotee gaee aur lambe samay ke baad antatah meraa yah sapanaa bhee poorn huaa aur meraa yah pratham upanyaas dhaaraawaahik roop men aapake sammukh hai yah kahaanee do anaath premiyon ke anaayaas milane bichudane aur punarmilan tak sangharsh kee hai yah upanyaas ek baar padhane ke baad aap baar baar padhanaa chaahenge aashaa hai ise bhee aap sabakaa sneh awashy milegaa

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pralay se parinay tak- 1

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adhyaay 1

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barasaat kaa mausam thaa aur aagaraa shahar men pratidin kam adhik warshaa hotee hee rahatee thee adhik warshaa hotee to skool kee bhee chuttee ho jaatee thee pichale saptaah bhee lagaataar bhaaree warshaa ke kaaran skool band the magar is saptaah ke praaranbh men hee bikhare-bikhare baadal aasamaan men soory ke saath aankh michaulee khelane lage the

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shahar ke ek mishanaree skool kee pahalee kakshaa ke chaatr aman kee maan pramilaa ne use kunakune paanee se nahalaakar skool kee yooneephorm men taiyaar kiyaa aur gale men parichay-patr latakaakar baaharee baraamade men khelane ko kah diyaa phir ghadee par nazar daalee to dekhaa abhee aman kee skool bas aane men kaaphee der hai usake lie doodh-naashte ke saath hee rasoee ke kuch aur kaary bhee ho jaaenge, yah sochakar wo rasoee men pahunch gaee idhar aman mukhy dvaar ke baahar baajoo men bane gairaaj men rakhee huee kaar ke aasapaas oopar latakate hue chidiyon ke ghonsale dekhane men wyast ho gayaa ye latakate hue ghonsale usake paapaa ne mukhy chat se kuch neeche banee gairaaj kee chat ke kangooron se jodakar wisheshakar chidiyon ke lie hee banawaae the aman ko in ghonsalon men chidiyon ko aate jaate dekhanaa bahut achchaa lagataa thaa

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pramilaa ne kuch kaary nipataakar ek pyaar bharee nazar kamare men sote hue pati par daalee abhee prakhar ke uthane men kaafee der hai usakaa daphtar ke lie nikalane kaa samay 10 baje hotaa hai atah wo aaraam se aath baje ke baad hee uthataa hai, tab tak aman jaa chukaa hotaa hai phir kuch raahat mahasoos karatee huee pramilaa prakhar aur apane lie chaay-naashtaa banaane men jut jaatee hai prakhar ke bhee kam nakhare naheen hote, wo apane chote-chote kaaryon ke lie bhee pooree tarah pooree tarah pramilaa par nirbhar rahataa hai pramilaa ko bhee usake nakhare uthaane men aanand kee hee anubhooti hotee hai usake wichaar men wo patnee hee kaisee jisamen pati ke prati samarpan kee bhaawanaa n ho yahee to pyaar kaa asalee roop hotaa hai aur wo pyaar bhee kaisaa jo pratidaan maange! phir pramilaa ko to binaa maange hee sab mil jaataa thaa aur agar pati-patnee ke wichaar, jeewan-shailee athawaa aawashyakataaen kuch antar n rakhatee hon, aapasee nok-jhonk hee n ho to waiwaahik jeewan kaa ras hee n nichud jaae!

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abhee use pati ke lie naashtaa, phir tiphin ke lie khaanaa bhee banaanaa hai wo to theek magar kyaa banaanaa hogaa yah nirnay lenaa bhee kam jaan khaaoo naheen har sabjee ko dekh parakh kar wo kaise saptaah bhar ke lie phrij men wyawasthit karatee hai yah usake alaawaa kaun samajh sakataa hai?

aman ke lie kyaa banaae ki dekhate hee pyaar se usase chipakakar plet men wo cheez aur rakhane kee jid kare yaa, patidew manapasand khaanaa khaakar prashansaneey nazaron se use nihaarenge to wo kaise is aseem sukh ko aatmasaat karane kaa lobh chod sakatee hai

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shaastron ne yon hee to naaree ke tyaag-balidaan kaa itanaa gunagaan naheen kiyaa aaj agar mahilaa-warg ise purushon kee kutil chaal athawaa striyon ke shoshan kaa naam detaa hai to yah usakee bhool hee kahalaaegee dene kaa aanand kewal griihinee hee naheen griihasvaamee bhee jaanate hain, tabhee to patnee aur bachchon ke lie upahaar laate samay khud ko nazarandaaz kar dete hain!

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khair, use to abhee jaakar patidew ko neend se jagaanaa hai yah jagaanaa bhee pal-do pal kaa kaary naheen balki lambee chaudee rooparekhaa ke antargat hotaa hai

pratham to pyaar se janaab ke baalon men ungaliyaan phiraate hue kuch minit sahalaane ke baad uthane ke lie taiyaar karanaa phir haan-hoon karate hue janaab jab tak aadhaa ghantaa waasharoom men bitaakar sophe par dat jaaen, tab tak chaay biskit ke saath hee tebal par taajaa akhabaar aur tee wee kaa rimot bhee upalabdh honaa chaahie anyathaa baat naheen banatee

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par isake saath hee use bhee usakee bagal men baithakar chuskiyaan lenee hotee hain chaay bhee prakhar ko adarakh waalee patalee aur kadak chaahie to use adhik doodh waalee gaaढ़ee aur haree ilaayachee dalee hueewo subah kee chaay ke saath koee samajhautaa naheen karatee donon kee pasand se hee alag-alag chaay banaatee hai subah ke samay shareer men oorjaa to hotee hee hai phir bhojan banaane tak usakee kaamawaalee aa hee jaatee hai to sab aaraam se nipat jaataa hai prakhar ke daphtar jaane ke baad use har kaam nipataakar nahaane dhone se 12 baje phursat milatee hai do baje aman waapas aa jaataa hai tab tak wo apane ghar ke hee ek hisse men bane byootee-paarlar ke kaary men wyast ho jaatee hai

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wo aman ke aane ke baad ek ghante ke lie paarlar band rakhatee hai aur usake saath bhojan karake kuch der aaraam karane ke baad phir shaam tak apane kaary men lag jaatee hai tab tak aman bhee khelataa rahataa hai aur paarlar band karane ke baad prakhar ke aane tak usakaa samay aman ke homawark aur baatacheet ke saath hee beetataa hai choonki sabjiyaan subah hee ban jaatee hain atah prakhar ke aane par garam rotiyaan athawaa chaawal banaane hee shesh hote hain

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wichaaron men ulajhee pramilaa kaa dhyaan jab tab bhang huaa jab khelate hue aman ne jor se use aawaaz lagaaee-

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“mammee jaldee aao, dekho to kitanee jor se barasaat ho rahee hai aur wo ittee door paanee kee nadee bhee ban gaee hai”

pramilaa chaunkakar turant baahar aaee to baahar kaa driishy dekhakar usake hosh hee phaakhtaa ho gae

“abhee to aasamaan saaph thaa phir yah achaanak andhakaar kaise chaa gayaa? phir wo paanee to ghar ke peeche kee taraph se hee aa rahaa hai kaheen yamunaa men baaढ़ to naheen aa gaee? barasaat ke mausam men aagaraa men padane waale yamunaa nadee-kshetr men waise to baaढ़ aasaanee se naheen aatee lekin jab hariyaanaa seemaa par sthit baandh se paanee chodaa jaataa hai to yah shahar bhee bhayankar jal-pralay kee chapet men aa jaataa hai unakee kolonee par, nichale kshetr men hone se khataraa banaa hee rahataa hai lekin is baar to alart bhee naheen kiyaa gayaa to yah”

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wo dahashat men bharakar jor se prakhar ko aawaajen lagaane lagee aur gairaaj men khelate hue aman ko lapakakar god men uthaakar andar jaane ke lie mudee hee thee ki kisee samudree jvaar kee tarah uchalataa huaa paanee gairaaj tak aa pahunchaa aur kshan maatr men hee pramilaa ke ghutanon tak pahunch gayaa pramilaa paanee ke jor ke kaaran aman ko lie hue wahaan se nikalane men bhee asamarth ho gaee haalaat bigadate dekh usane aman ko jaldee se kaar ke oopar dhakel diyaa aur svayan kaar ke sahaare waheen khadee hokar jor-jor se prakhar ko aawaajen lagaane lagee aman dar ke maare mammee-mammee chillaa rahaa thaa paanee andar kee taraph bढ़taa gayaa aur aman chillaate-chillaate kaar ke oopar hee behosh ho gayaa

·

us din yamunaa men achaanak aaee baaढ़ ne jyon bagaawat hee kar dee thee wo apane saare tatabandh todakar shaayad aagaraa ke rahawaasiyon ko zindagee se rihaa karane kee kasam khaakar chalee thee toophaanee baarish bhee jid par adee huee thee ki aaj n barasee to kab barasegeelogon kee praarthanaaon kaa usapar koee asar naheen ho rahaa thaa sabhee log ghar yaa baahar jahaan bhee the, apanon kee dushchintaa seene men lie aatm-rakshaarth oonche sthaanon kee or daud rahe the sheeghr hee baaढ़ kaa paanee gharon men 5-5 phut tak ghus gayaa log doobane chillaane lage sadak par chaupaaye ajeebo gareeb aawaajen nikaalate hue idhar udhar bhaagane lage jo bekhabar the unhen baaढ़ ne binaa khabar die nigalanaa shuroo kar diyaa us saje dhaje bangale ke andaroonee shaanadaar shayan-kaksh men soe hue aman ke pitaa prakhar ko is wipadaa kaa aabhaas tak n thaa

·

jab tak pramilaa kee cheekh-pukaar usake kaanon men padee tab tak paanee andar ghus chukaa thaa aur usake palang se kuch inch hee neeche thaa yah driishy dekhate hee prakhar ke hosh ud gae

wo turant girataa sanbhalataa aasapaas ke saamaan kaa sahaaraa lete hue baahar kee or bhaagaa aur pramilaa ko seene tak paanee men doobee huee dekhakar chillaakar use dilaasaa dete hue usakee or tezee se bढ़ne lagaa magar daalaan kee seedhiyon se utarane ke prayaas men pair phisal jaane se waheen gir padaa

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kahaanee jaaree rahegee, aapane upanyaas kaa yah bhaag padh़aa, isake lie haardik dhanyawaad

is bhaag ke lie apanee pratikriyaa awashy den😊

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अध्याय 2

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aman ko jab hosh aayaa to svayan ko ek naaw men kuch aur bachche aur bade logon ke beech dekhaa to mammee paapaapukaarate hue ronaa shuroo kar diyaa magar sunataa kaunwahaan sab to sahame hue thekuch der men ek oonche sthaan kee sookhee zameen par un sabako utaarakar naaw waapas palat gaee

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ro rokar ab aman ke aansoo sookh chuke the wo hichakiyaan lete hue waheen sab ''''logon ke beech baith gayaa kisee ko pataa naheen thaa ki unake parijan kahaan hain? kuch bataane yaa raahat dene waalaa koee naheen thaa yah haadasaa subah-subah hee huaa thaa baad men aur bhee bahut se logon ko wahaan laayaa gayaa thaa wahaan baithe baithe shaam ho gaee, baarish band hone se paanee utarane lagaa thaa ab sabako bhookh-pyaas sataane lagee thee magar aage kyaa hogaa yah sochakar sab bhayaakraant ek doosare kaa munh dekhate rahe

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tabhee oopar aasamaan men gharagharaahat huee aur ek helikoptar se wahaan bhojan ke paiket giraae jaane lage kuch bade samajhadaar bujurgon ne sabako shaant rahane kaa sanket dete hue raahat men aayaa bhojan baantanaa shuroo kiyaa yah bhookh bhee itanee ajeeb cheez hotee hai, ki kisee kaa kitanaa bhee ajeej bichad jaae, usapar haawee honaa naheen bhoolatee yah usakaa dharm-karm jo thaharaashabane beman se thodaa-thodaa bhojan kiyaa aur aage kee sarakaaree gatiwidhi aur apanon ke wahaan aane kaa intajaar karane lage kitane log apane parijan kho chuke hain yah koee naheen jaanataa thaa kitane abodh bachchon ke sir se neelee chataree waale ne maan-pitaa roopee chataree cheen lee thee isakaa kisee ko bodh naheen thaa

·

baaढ़ to apanee winaash leelaa dikhaakar waapas chalee gaee thee magar us kaalee raat ke saath bahuton kee kaalee raat shuroo ho chukee thee nanhen aman ne svayan ko paristhitiyon ke hawaale kar diyaa thaa

·

bhojan baad un sabako dheere-dheere helikoptar kee sahaayataa se raahat shiwir men pahunchaayaa gayaa phir agale din jin logon ke ghar surakshit the aur jinake parijan pahunch gae the unhen waapas bhej diyaa gayaa baakee kuch bachchon ko jinhen koee lene naheen pahunchaa, anaathaalay bhej diyaa gayaa

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aman ke gale men parichay patr dekhakar wyawasthaapakon ne usake ghar par sanpark karanaa chaahaa to pataa chalaa ki ghar soonaa padaa thaa aur usake maan-pitaa laapataa the aagaraa ke anaathaalay bhar jaane ke kaaran agale din use ek praaiwet bas dvaaraa do svayansewakon ke saath dillee ke ek “nirmalaa dewee baal aashram” naam ke anaathaalay men pahunchaa diyaa gayaa

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aman jab aashram men pahunchaa, us samay din ke do baj chuke the wo bhookh se behaal ho rahaa thaa aashram kee sanchaalikaa shailajaa ne svayansewak ko baaharee baraamade men rakhee huee bench par bithaakar us baalak ko rasoee men kaam karatee huee 14 warsheey kishoree meenoo ko aawaaz lagaakar usake hawaale kiyaa phir baraamade men aakar svayansewak se aman kee jaanakaaree lekar aashram ke rajistar men darj karake use bachche kee dekharekh ke prati aashvast karake sammaanapoorvak widaa kiyaa

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meenoo us baalak ko stor se dhule hue kapade aur saabun tauliyaa dekar apane nikat hee khadee nayanaa se bolee-

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“nayanaa, yah aman hai, aaj se yah bhee yaheen sabake saath rahegaa ise nahaane kaa sthaan dikhaa do aur sheeghr hee taiyaar hokar sab bhojan kaksh men aa jaao”

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kahaanee jaaree rahegee

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अध्याय 3

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nayanaa! dillee ke us abhaawagrast anaathaalay men palane waalee ek abodh baalikaa thee, jise janm dekar ek shishu-anaathaashram ke baahar tange hue paalane men chodakar usakee maan ne yamunaa men koodakar jaan de dee thee usane apanee nawajaat bachchee ke saath rakhe hue apane susaaid not men aatmahatyaa kaa kaaran spasht likhaa thaa magar us aurat kee haisiyat yaa pahachaan gaun rahee hogee atah use is awasthaa men laane waale us naamee giraamee raktabeej ko usee kee biraadaree ke raktabeejon dvaaraa nirdosh karaar dekar faail band kar dee gaee thee

·

nayanaa naam bhee use shishu anaathaalay dvaaraa usakee badee-badee bolatee aankhon ke aadhaar par diyaa gayaa thaa

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waise to us aashram ke niyamaanusaar nawajaat shishuon ko kisee n kisee zarooratamand nihsantaan dampatiyon ko god de diyaa jaataa thaa lekin jo bachche do warsh kee umr tak kisee kee god naheen jaate, unhen bade bachchon ke anaathaashram men bhej diyaa jaataa thaa nayanaa bhee unheen bachchon men se hee thee jinhen is samay seemaa tak god jaane kaa koee awasar naheen milaa thaa atah use “nirmalaa dewee baal-aashram” ko saunp diyaa gayaa thaa, jahaan 2 se 20 warsh tak ke bachchon ko rakhaa jaataa thaa

·

nayanaa ne jab se hosh sanbhaalaa, svayan ko us anaathaalay kee chaukhat ke andar hee paayaa dubalee aur kuch lambee kaayaa, cheharaa praatah kiran jaisaa urjaawaan, nain naksh dhaaradaar, goraa rang, badee-badee bhooree aankhen aur sunaharee saghan kesh-raashi kee maalakin thee wo lekin apanee in khoobiyon ke baare men anajaan wo bholee baalikaa hameshaa ek udaasee oढ़e hue hee dikhatee thee aashram kee sanchaalikaa shailajaa ko wo any sabhee bachchon ke samaan aantee bulaatee thee jo mil jaataa chupachaap khaa lenaa aur baakee samay hamaumr bachchon ke saath khelanaa hee usakee dinacharyaa thee

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chah warsh kee hone par wo aashram ke nikat bane hue anaathaalay ke hee skool men pढ़ne ke lie jaane lagee aur maan-pitaa kee paribhaashaa se parichit huee

nayanaa ab us pariwaar kaa hissaa ban chukee thee aur us jeern-sheern bhawan ko hee apanaa ghar maanane lagee thee

waise to us aashram men chaar kamare, ek kaaryaalay, ek rasoee, ek bhojan kaksh banaa huaa thaa magar wahaan palane waale 40 bachchon ke lie wo aparyaapt thaa

us anaathaalay men bachchon ke lie n to dhule wastr upalabdh hote n hee sone ke lie paryaapt sthaanriaat men zameen par hee mailee kuchailee chaadar yaa daree daal dee jaatee thee do kamaron men lagabhag 20 baalikaaen aur doosaree taraph ke do kamaron men utane hee baalak sikudakar so jaate the din men sabako ek saath rakhaa jaataa thaa aur raat men ladakon ko apane wibhaag men bhej diyaa jaataa thaa oढ़ne ke lie bhee ek chaadar men do bachchon ko kaam chalaanaa hotaa aur sardiyon men to teen-teen bachche ek hee phate-puraane kambal se sardee kee thithuran kaa saamanaa karane ko majaboor hote the

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khaane ke naam par unhen kabhee saade paanee men namak mirch kaa chaunk lagaakar sookhee rotiyon ke saath diyaa jaataa to kabhee ubale hue aaloo paanee men gholakar de diye jaate pet bhar mile to yahee unake lie chappan bhog aur pakawaan the, anyathaa isake lie bhee kabhee kabhee tarasanaa padataa aur bhookhe pet hee sonaa padataa ye bachche aur kisee svaad se tabhee parichit hote jab kisee wishesh awasar par koee daan-daataa unhen bhojan karawaane aa jaataa dhule hue wastr bhee jab koee nireekshan karane aataa tabhee pahanane ko milate the saundary-premee nayanaa kaa baalaman achchaa pahanane-oढ़ne-khaane ke lie n jaane kitane taane-baane bunataa rahataa magar majabooree men wo shakti hee kahaan hotee hai jo wirodh kaa svar nikaal sake?

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chotee see umr men hee paristhitiyon ne use itanaa samajhadaar banaa diyaa thaa ki anaathaalay kee saaree aniyamitataaon ko wo bakhoobee samajhane lagee thee wo dekhaa karatee thee un daan-daataaon ko, jo kisee n kisee awasar par nae wastr, chaadaren, kambal aadi shailajaa aantee ko saunpakar jaate the magar bachchon ko unakaa sparsh bhee naseeb naheen hotaa thaa wo anaathaalay men kaam karane waale karmachaariyon kee baaton se yah bhee jaanane lagee thee ki shailajaa aantee kaa us aashram men rahane ke baawajood ek bharaa-pooraa pariwaar thaa aur usake parijan milane ke lie aate rahate the magar we unake saath kyon naheen rahateen yah baat koee naheen jaanataa thaa

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jab bhee koee bhalaamaanas bachchon ke janm din par svaadisht khaady saamagree un anaath bachchon ke lie dekar jaataa to nayanaa ghoom-ghoom kar sabhee bachchon ko khush hokar bataatee ki aaj unhen bढ़iyaa bhojan khaane ko milegaa magar shaam hote hee shailajaa ke parijan aate aur khoob jee bharakar khaa-peekar laut jaate us din unhen der tak bhojan kaa intajaar karanaa padataa aur jo kuch bachaa rahataa wo chakhane maatr ke lie unhen diyaa jaataa thaa isee kaaran jab bhee koee nayaa baalak/ baalikaa wahaan laayaa jaataa, nayanaa aur bhee udaas ho jaatee thee

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aise men barasaatee mausam men ek din jab ek nayaa baalak us anaathaalay men laayaa gayaa to use meenoo ke saath dekhakar aashram ke sabhee bachche aankhon men utsukataa lie door se dekhate rahe magar meenoo ke nikat hee khadee nayanaa kuch kshanon ke lie udaas ho gaee phir agale hee pal us sundar salone baalak ko apanee umr kaa dekhakar usakee aankhon men kushee kee chamak wyaapt ho gaee wah badaa khoobasoorat, goraa-chittaa, gol-matol, bhooree aankhon waalaa, shareer se hriisht-pusht baalak thaa nayanaa kaa man usase baaten karane ko machalane lagaa yon wo sabhee bachchon ke saath hilee-milee thee lekin us baalak kaa aakarshan hee alag thaa wo usase dostee karane ke lie utaawalee ho uthee

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14 warsheey meenoo, naween kakshaa kee chaatraa thee apanee hamaumr do aur saheliyon ke saath skool se waapas aakar rasoee ke kaamakaaj men bhee mahilaa karmachaariyon kaa sahayog karatee thee wo nayanaa ko bahut pyaar karatee thee aur nayanaa ko bhee meenoo bahut achchee lagatee thee nayanaa use aur usakee donon saheliyon ko deedee kahatee thee yah bhee use meenoo ne hee sikhaayaa thaa nayanaa aksar usake aasapaas hee mandaraatee rahatee thee

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jab meenoo deedee ne use hee us baalak kee jawaabadaaree saunpee to nayanaa kaa man prasann ho gayaa usakee udaasee pal bhar men door ho gaee usane daudakar aman kaa haath pakad liyaa aur lagabhag kheenchate hue baatharoom tak le aaee aman hakkaa-bakkaa saa usake peeche khinchataa chalaa gayaa aur usakaa peechaa karatee huee usakee beetee daastaan baatharoom ke ukhade hue pharsh ko dekhakar usake dimaag ke tukade men apanaa sthaan aarakshit karane kaa prayaas karane lagee nayanaa use jaldee se taiyaar hone ke lie kahakar saheliyon ke saath khelane men wyast ho gaee

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kahaanee jaaree rahegee is bhaag ke lie aapakee pratikriyaaon kaa intazaar rahegaa🙏😊

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अध्याय 4

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baatharoom ke boond-boond tapakate nal se nahaataa huaa aman ghatanaakram yaad karake ro-rokar sochataa jaa rahaa thaa ki kyaa usake mammee-paapaa ab use lene kabhee naheen aaenge? magar yah sveekaar karanaa usake lie kathin thaa thodee der men kisee ne baahar se jaldee nikalane ke lie aawaaz lagaaee to usane apanee daastaan ko dimaag ke kone men chitraankit karake badan ponchakar kapade pahane aur baahar aa gayaa

kudarat ne ek din ke andar hee use arsh se giraakar pharsh par patak diyaa thaa

·

nayanaa ne aman se turant dostee kar lee aur apanee do priy saheliyon daalee aur lataa se parichay karawaate hue apanee tolee men shaamil kar liyaa usakee saheliyaan use ninnee sanbodhit kar rahee theen aur kuch hee der men aman un sabake lie amoo ban chukaa thaa

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subah-subah maan ke snehil sparsh ke saath uthane aur munh dhulawaakar doodh-ande kaa naashtaa karane waale aman ko ab bahut jor se bhookh lag rahee thee usane nayanaa se poochaa-

“ninnee, hamen khaanaa kab milegaa, mujhe to bahut bhookh lagee hai, mainne to abhee tak naashtaa bhee naheen kiyaa” kahate hue ghar kee yaad men usakee rulaaee phoot padee

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“naashtaa! amoo, hamen naheen maaloom naashtaa kyaa hotaa hai khaanaa banane ke baad hee hamen bulaayaa jaataa hai tab tak hamen nahaakar taiyaar rahanaa hotaa hai khaanaa khaakar ham skool chale jaate hain phir doosaree baar shaam ke samay bhojan milataa hai magar aaj skool kee chuttee hai n to khaanaa bhee der se banegaa jab tak hamen bulaayaa naheen jaataa, tab tak ham khelate hee rahate hain”

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“ninnee, mere mammee-paapaa kahaan hain mujhe lene kab aaenge?maayoos hokar aman ne apane parichay-patr ko sahalaate hue poochaa”

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“pataa naheen amoo, chalo ham meenoo deedee se poochate hain” kahate hue usakaa haath pakadakar nayanaa use ek taraph le jaane lagee

meenoo deedee ne rote hue aman ko pyaar se samajhaa-bujhaakar shaant kiyaa aur usakaa parichay patr dekhate hue bolee-

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“aman baabaa, aapako apanaa saamaan aur kapade-kitaaben rakhane ke lie ek alamaaree dee jaaegee, yah parichay patr aap apanee us alamaaree men sanbhaalakar rakh lenaa ho sakataa hai, isake sahaare aapako apane maan-pitaa mil jaaenyahaan rahane waale sabhee bachche kisee n kisee tarah apane maan-pitaa kho chuke hain aap bhee ab ronaa chodakar inake saath milakar rahanaa, khelanaa, khaanaa aur skool jaanaa shuroo kar do aur haan, bhojan taiyaar ho chukaa hai, jaldee se sab pahunch jaao”

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bachchon ke bhojan kaksh men pahunchate hee ek karmachaaree ne ek phatee-puraanee badee see daree bichaakar unhen kataar banaakar baithane kaa ishaaraa kiyaa aur sabake saamane ek plet men katoraa rakhate hue aaloo kaa patalaa shorabaa paros diyaa nayanaa aur bachchon ne haath jodakar aankhen moondakar eeshvar kaa dhanyawaad kiyaa aur chupachaap shorabaa peene lage aman ke rotee/chaawal maangane par karmachaaree kuch naramee se bolaa-

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“aaj saamaan katm ho jaane se bhojan men yahee banaa hai bachchon, saamaan aa jaaegaa to shaam ko sabjee rotee banegee phir bharapet khaa lenaa”

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aman, nayanaa aur usakee donon saheliyaan, daalee aur lataa ek hee kataar men baithe the nayanaa aman ke paas hee baithee thee aman ko to aisaa bhojan aur wyawasthaa dekhakar ubakaaee see aane lagee usakee aankhon men aansoo dekhakar nayanaa dukhee hokar bolee-

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“amoo, jo kuch bhee hai khaa lo, dekho sabhee bachche bhee yahee bhojan kar rahe hain tum bhookhe rahoge to mere saath kaise kheloge aur phir tum naheen khaaoge to main bhee naheen khaaoongee”

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aman ko bhalaa yah baat kaise hazam hotee ki nayanaa usake lie bhookhee rahe usane chupachaap shorabe kaa paatr uthaakar hothon se lagaa liyaa kuch hee minaton men bachchon ne uthakar haath-munh dho lie aur khelane ke lie aashram ke baahar jahaan unakaa skool lagataa thaa, pahunch gae aaj skool band thaa aur kitaabon se muktiatah jee bharakar khelanaa hee unake saare gam sokhane kaa saadhan thaa

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bachapan par waise bhee khushiyaan athawaa gam haawee naheen ho paate, bachchon ko samay kee dhaaraa bahaakar jahaan pahunchaa de, apanaa thiyaa banaa hee lete hain aman bhee ab is dinacharyaa kaa aadee ho chalaa thaa jaisaa mil jaae khaa-pahan lenaa aur mast rahanaa hee usake jeene kaa uddeshy ho gayaa thaa aashram ke sabhee bachche umr aur pasand ke aadhaar par teen-chaar toliyon men bante hue the

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nayanaa kee saheliyaan daalee aur lataa bhee usakee tarah hee maan-pitaa dvaaraa janm samay se hee tyaag die jaane kee wajah se aashram men pal rahee theen to unamen aapasee lagaaw bhee svaabhaawik thaa aur aman kaa parichay ab tak usake hamaumr kushal, keerat aur ratan naam ke teen ladakon se ho chukaa thaa we wahaan idhar-udhar sadakon par bhatakate hue laae gae the in saat bachchon kaa ab ek hee samooh ban gayaa thaa unakaa sonaa-jaaganaa, khaanaa-khelanaa aur skool jaanaa sab ek saath hee hotaa in sabake saath aman ne apanee abhaawagrast zindagee ko aapasee mel-milaap se aasaan banaanaa seekh liyaa

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aman ko aae ek saptaah ho chukaa thaa ab wo puraanee yaadon ko apane parichay patr ke saath aashram se milee huee alamaaree men sahejakar nayanaa aur saathiyon ke saath naee zindagee shuroo kar chukaa thaa, jisamen sukh-suwidhaaon aur sapanon kaa koee sthaan n hote hue bhee apanaapan, ek doosare ke prati prem aur samarpan kee gaharaaee maujood thee

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aashram kam kshetraphal men banaa huaa hone ke kaaran usakee chaaradeewaaree se baahar khaalee jameen par bane hue ek puraane haalanumaa bhawan ko chaar-paanch hisson men baantakar aadhee eent kee deewaar khadee karake paanch kakshaaen aur ek chotaa saa ऑphis banaa kar jooniyar haaeeskool kaa naam diyaa gayaa thaa, jahaan ek pradhaanaadhyaapak aur do shikshak milakar subah pahalee se paanchaween aur dopahar ko chathee se aathaween kakshaa tak pढ़aa diyaa karate the unakee upasthiti bhee niyamit naheen hotee thee aur aksar gaayab hee rahate the

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bachche jaise-taise do teen ghante skool men bitaa dete phir skool ke band hone ke baad der shaam tak aasapaas unakaa khelakood chalataa rahataa langadee, kho-kho, kabaddee aadi to skool ke samay hee beech kee chuttee men khele jaate the phir baad men un sabakaa pasandeedaa khel lukaa-chupee hee hotaa thaa baahar to baahar, aashram ke parisar men bhee svachchataa kaa dhyaan naheen rakhaa jaataa thaa kaheen kachare kaa dher to kaheen toote phoote pharsh, eent-patthar aadi ke teele bane hue dikhate the aae din koee n koee bachchaa beemaar ho jaataa thaa aur chikitsaa kee bhee uchit wyawasthaa n hone ke kaaran kaee din rog ke saath jeenaa hee unakee niyati ho jaatee thee

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get par tainaat chaukeedaar kee nigaraanee men hee sabhee bachche skool aate jaate the doosaree paalee ke bachchon kee chuttee hone ke kuch der baad hee bachchon ke khel kood shuroo ho jaate the

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kahaanee jaaree rahegee, aapane yah bhaag pooraa pढ़aa, haardik dhanyawaad, apanee pratikriyaa awashy darj karen🙏😊

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अध्याय 5

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us din sabhee bachche apane apane samooh banaakar manapasand khel khelane men lage hue the aman aur nayanaa ke samooh ko lukaa chupee khel bahut priy thaa we aksar yahee khel khelate the ek bachchaa aankhen moondakar 100 tak ginatee ginataa tab tak baakee bachche idhar udhar chip jaate the nayanaa aur aman ek saath skool-parisar men phailee kanteelee jhaadiyon ke peeche ek aise sthaan par chip jaate the jahaan kuch door hone ke kaaran aasaanee se kisee kee nazar naheen padatee thee is tarah we donon daam dene se bache rahate the

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ek baar wahaan se nikalate hue aman pakadaa gayaa to daam usee ko denaa padaa is baar bhee nayanaa jaanaboojhakar waheen chip gaee kyonki wo aman ke haathon aaut hokar daam denaa chaahatee thee barasaat kaa mausam abhee beetaa naheen thaa shaayad yah ek sanyog hee thaa ki aman ne 100 tak ginatee ginakar jaise hee aankhen kholeen to andheraa saa dikhane lagaa baadal dekhakar wo saham gayaa aur apane saath huee durghatanaa kee yaad taajaa ho gaee wo har taraph daud daud kar jor-jor se sabako barasaat kee chetaawanee dete hue apane sthaan se nikalane ko kahakar andar kee taraph bhaagaa lekin agale hee pal nayanaa kaa wichaar aate hee waheen chaaradeewaaree ke paas ek wriiksh ke neeche khadaa hokar usakaa intajaar karane lagaa

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baarish shuroo ho gaee thee aur sabhee bachche usake saamane se gujarate hue andar bhaag nikale magar nayanaa ne door hone ke kaaran shaayad usakee aawaaz naheen sunee thee to use n dekhakar aman bheegataa huaa apane chipane ke sthaan kee or bhaagaa to dekhaa nayanaa baahar aane ke prayaas men jhaadiyon ke kaanton men atakakar gir gaee thee zameen kachchee hone se paanee girate hee keechad aur phisalan ho jaane ke kaaran wo uth naheen paa rahee thee aman ne use rote dekhakar haath pakadakar uthaayaa aur chup karaate hue usakaa gaal choom liyaa

·

nayanaa turant chup ho gaee magar aman ko dhakelakar apanaa gaal sahalaate hue roshapoorvak bolee

“chih amoo, tumane meraa gaal joothaa kyon kiyaa?”

“gaal bhee joothaa hotaa hai kyaa ninnee, main to jab bhee rotaa thaa, mammee mujhe isee tarah pyaar se gaal choomakar chup karaatee thee”

·

“achchaa mammee bahut achchee hotee hai n amoo”

“bahut achchee ninnee, paapaa bhee bahut achche hote hain, magar n jaane kyon aaj tak mujhe lene kyon naheen aae? we mujhe kaise bhool gae, kyaa unhonne mujhe dhoondhaa n hogaa?”

·

kahate hue aman udaas ho gayaa usakee nam aankhon ko dekhakar ab nayanaa ne pyaar se usakaa gaal choomate hue kahaa-

“ro mat amoo, ab ham isee tarah ek doosare ko chup karawaayaa karenge”

“phir tum gaal joothaa hone kee shikaayat to naheen karogee n”

“naheen, main munh dho liyaa karoongee”

·

“achchaa ninnee, jaldee chalo yahaan se, baarish tez ho jaaegee”

·

“jaldee kaise chaloon amoo, mere pair men kaante chubh gae hain kahate hue wo phir rone lagee”

aman ne usakaa haath pakadaa aur bolaa-

“achchaa dheere dheere chalo, bheeg to gae hee hain n, deedee kee daant khaa lenge aur kapade badal lenge”

un donon ko bheegate hue andar jaate dekhakar chaukeedaar ne bhee gusse se bharakar daant diyaa ki aage se itanee door gae to aantee se shikaayat karanee padegee

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kahaanee jaaree rahegee, is bhaag par aapakee pratikriyaa kaa intazaar rahegaa🙏😊

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अध्याय 6

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samay gujarataa rahaa aur nayanaa-aman kee dostee pragaaढ़ hotee gaee ek din dopahar ke samay bachche chuttee hone se skool-parisar men khelane men wyast the tabhee ek sajjan ne bhojan wastron ke paiket uthaae apane karmachaaree ke saath us bhawan men prawesh kiyaa nayanaa kee nazar jab aashram ke baraamade kee bench par shailajaa se baaten karate hue us sajjan par padee to wo daudakar aman ko ek taraph le gaee aur us taraph ishaaraa karate hue bataayaa-

·

“wo dekho amoo, wo ankal yahaan aate hee rahate hain we bahut achche hain, hamen ek saath bithaakar apane saamane hee bhojan karawaate hain kabhee-kabhee we raat men bhee bahut der tak yaheen rahate hain aaj bhee ye hamen bhojan karawaakar hee waapas jaaenge

waise to bahut log khaane peene kee cheejon ke alaawaa bhee bahut saare saamaan- kambal, anaaj, wastr aadi daan men de jaate hain lekin we saamaan kewal hamen dikhaane ke lie hote hain der raat ko aantee ke ghar se log aate hain aur khaanaa khaane ke baad saaraa saamaan apane saath le jaate hain”

·

“magar ninnee, tum yah sab kaise jaanatee ho?”

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“mujhe yah sab meenoo deedee bataatee rahatee hain wo yah bhee bataatee hain ki yahaan kaam karane waalon ko kaee maheene wetan naheen diyaa jaataa to ab unakee sankhyaa kam ho gaee hai atah unhen aur unakee do aur deedee logon ko rasoee men bahut kaam karanaa padataa hai unakaa aur koee naheen hai to shaadee hone tak wo yah ghar chodakar kaheen jaa bhee naheen sakateen meenoo deedee mujhe bahut pyaar karatee hai aantee to adhik samay inheen ankal ke saath baahar jaatee rahatee hain” kahate hue nayanaa achaanak udaas ho gaee

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“are ninnee, ab main hoon n! tum udaas mat huaa karo tumhaaree we saheliyaan, daalee aur lataa bhee to bahut achchee hain mere teenon dost kushal, keerat aur ratan bhee kitane achche hain! ham sab saath hain to hamen koee pareshaan naheen kar sakegaachalo ab andar chalen bahut bhookh lagee hai”

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sabhee bachche uchalate-koodate hue aashram ke get se andar daakhil hue to ankal yaanee maanik seth unhen rokakar pyaar se haalachaal poochane lage nayanaa ko aman kaa haath thaame dekhakar bole-

“are meree gudiyaa, aaj to bahut khilee-khilee lag rahee ho, tumhaare saath ye kaun baalak hai?” sethajee nayanaa ko pyaar se gudiyaa kahakar hee bulaate the

“ye aman hai, ankal jeeye aagaraa se aayaa hai”

sethajee jaanate the ki kisee bachche ke us aashram men aane kaa kyaa kaaran hotaa hai atah usane baat badalate hue turant kahaa-

“theek hai bete aman, yahaan aapake bahut se dost hain, apane ko kabhee akelaa n samajhanaa”

tabhee shailajaa bol padeen-

“bachchon, aaj sethajee ke bete kaa janm din hai, ye aap sabake lie bahut achchaa bhojan aur mithaaee lekar aae hain jaldee se haath dhokar bhojan kaksh men chalo”

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sabhee bachche kushee-kushee bhojan kaksh men pahunchakar chataaee par kataar banaakar baith gae

sethajee aur shailajaa ne baithane ke lie kursiyaan kheench leen aur sethajee ke saath aayaa huaa unakaa karmachaaree bachchon ko bhojan parosane lagaa

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is tarah nayanaa aur aman hansate-khelate hue bachapan kee seeढ़iyaan paar karake kishor awasthaa men pahunch gae aathaween kakshaa men pahunchane ke saath hee unakee maanasik aur bauddhik shaktiyon kaa wikaas hone lagaa thaa we ab apane andar ho rahe shaareerik pariwartanon ke chalate aamane-saamane hone par sharamaane lagate the lukaa-chipee khelanaa, ek doosare kaa haath pakadakar chalanaa aur gaal choomanaa choot gayaa thaa magar man hee man ek doosare ke prati aakarshan aur bढ़ne lagaa thaa

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ab we jab bhee phurasat men hote, apanee aage kee pढ़aaee aur kairiyar kee chintaa jataane lagate the magar isake saath hee jab unhen pataa chalaa ki aathaween ke baad wahaan ke niyamaanusaar ladakon ko to anyatr kisee ladakon ke hee aashram men bhej diyaa jaataa hai aur ladakiyon ko do kilomeetar door sthit ek sarakaaree uchchatar maadhyamik kanyaa shaalaa men daakhilaa dilaa diyaa jaataa hai 12 ween tak pढ़aaee pooree hone ke baad we baalig ho chukee hotee hain atah niyamaanusaar unako aashram se widaa kar diyaa jaataa hai athawaa unake aur aashram ke sanchaalakon ke aapasee anubandh ke tahat wiwaah hone tak aashram ke kaaryon men sahayog karanaa hotaa hai

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un donon ko ek doosare se door hone ke ahasaas maatr se hee akelepan kaa dar sataane lagaa donon ke man ke taar anajaane men hee itane gahare jud gae the ki ab alag hone kee kalpanaa bhee naheen kar sakate the wo pooraa saal unake manomastishk men uthal-puthal machaataa rahaa aashram men waise hee kewal ek shikshak ke sahaare hee pढ़aaee sanpann hotee thee oopar se alagaaw ke bojh se lade hone hone ke kaaran unakee pढ़aaee bhee theek tarah se naheen ho paaee

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pareekshaaen sir par aa gaee theen magar ek doosare se judaa hone kaa gam unakee ekaagrataa men baadhaa banaa huaa thaa skool kee aadhee chuttee ho yaa khelane kee, ye donon ek taraph baithakar chintaatur apane bhawishy kee yojanaa par charchaa karate rahate aman kahataa-

“ninnee, main jaanataa hoon ki ham ek doosare ke lie bane hain aur judaa hokar kabhee jee naheen sakate magar abhee hamaaree umr itanee naheen ki ek saath rahane kee baat sochen main jahaan bhee jaaoongaa, baalig hote hee tumase milane awashy aaoongaa phir aage kee pढ़aaee pooree karake apane pairon par khadaa hone ke baad tumhen dulhan banaakar saath le jaaoongaa tab tak tum isee aashram men meraa intazaar karanaa tumhen har haal men himmat se kaam lenaa hogaa khud ko kabhee anaath n samajhanaa apanee saheliyon ke saath milakar apanee aatm-shakti ke sahaare aage bढ़naa hogaa ab pareekshaa samaapt hone tak ham naheen milenge aur behatareen parinaam laane kaa prayaas karenge”

“main pooraa prayaas karoongee amoo, magar apanaa waadaa bhool mat jaanaa hamaare paas to sanpark kaa bhee koee saadhan naheen aisaa n ho ki tum door jaakar naee duniyaa basaa lo aur nayanaa ke nayan barasate-barasate saawan bhaadon ban jaaen” kuch sharmaate hue nayanaa bolee

“aisaa kabhee naheen hogaa ninnee, yaad rahe, jin gaalon par mere maasoom bachapan ke anaginat chumban ankit hain unhen apane aansuon se dho mat daalanaa, unhen mere pyaar kee nishaanee samajhakar sahejakar rakhanaa mujhe meree ichchaa ke anusaar mere aagaraa ke anaathaashram men bhejaa jaaegaa taaki main punah apane shahar se jud sakoon kushal keerat aur ratan bhee mere saath hee rahenge jis maan yamunaa ne mujhase mere maan pitaa ko judaa kiyaa, main usakee kasam khaakar kahataa hoon ninnee, wahee hamaare milan kee saakshee banegee yah meraa waadaa aur atal iraadaa hai”

pareekshaaen samay par sanpann ho gaeen aur parinaam bhee aa gayaa nayanaa choonki shuroo se hee medhaawee thee atah wo pratham shrenee men utteern huee thee baakee aman sahit daalee, lataa, kushal, keerat aur ratan sabhee dviteey shrenee men utteern hue the lekin un sabake lie yah upalabdhi bhee kam naheen thee we aage kee pढ़aaee men aur adhik mehanat karane kaa man hee man sankalp kar chuke the

aakhir wo din bhee aa gayaa jab sabhee ladakon ko dillee ke ladakon ke aashram men bhej diyaa gayaa magar aman aur usake teenon saathiyon ko aagaraa ke ek aashram men pahunchaa diyaa gayaa us aashram men ab kuch nae chote-chote bachche aa gae the yah chakr wahaan chalataa hee rahataa thaa aur har baalak-baalikaa ko wahaan ke niyamaanusaar chalanaa hee unakee niyati thee

kramashah

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अध्याय 7

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aman ke jaane ke baad nayanaa ne phir se udaasee oढ़ lee thee daalee aur lataa pahale to yah dekhakar hairaan hotee theen choonki bachapan koee bojh lekar naheen chalataa, kaun kisake saath adhik rahataa hai, isase kisee ko koee matalab naheen rahataa aur kisee se bhee kuttee yaa buchchee chalatee rahatee hai magar kishoraawasthaa men kadam rakhate hee nayanaa ke prati aman ke jhukaaw se unhen eershyaa awashy hone lagee thee kyonki aman ke kaaran unhen nayanaa kee upekshaa sahanee padatee thee, lekin unake man men un donon ke prati dvesh bhaaw kabhee naheen panapaa unase nayanaa kaa dard dekhaa naheen jaataa thaa we use bharasak bahalaane kaa prayaas karateen aur use kabhee akelee naheen chodatee theen phir kuch hee samay baad meenoo aur usakee sahaayak ladakiyon, maayaa aur mamataa ke wiwaah kee charchaa hone lagee to nayanaa ne apanaa dhyaan us taraph kendrit kar liyaa meenoo kaa lagaaw nayanaa se adhik thaa aur ab wo duniyaadaaree kee baaten samajhane lagee thee atah wo apanee antarang baaten bhee nayanaa se saajhaa karane lagee thee

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teenon ladakiyon kee shaadee kee taiyaariyaan shuroo ho chukee theen aashram men wo kuch hee din kee mehamaan theen atah nayanaa, daalee aur lataa adhikaansh samay unake saath hee banee rahatee theen nayanaa ne not kiyaa ki sethajee saare aayojanon men aage rahane ke saath hee wiwaah kee khareedaaree men bhee wishesh ruchi le rahe the wo aksar shaam ke samay aashram aa jaate the phir shailajaa ko kaar men apane saath le jaate the waapas aane par der raat tak waheen bane rahate the

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kuch hee dinon men un ladakiyon ke lie kuch halke-phulke gahane, kapade aur griihasthee kaa aawashyak saamaan jutaa liyaa gayaa nayanaa man hee man andaaz lagaatee rahatee ki ladakiyon ke wiwaah kaa kharch kahaan se aataa hai? aakhir ek din nayanaa ne jijnaasaawash phir se meenoo ke paas jaakar pooch liyaa-

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“deedee, kyaa aap sabake wiwaah kaa saaraa kharch sethajee kar rahe hain”?

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“naheen meree bholee bahanaa, yahaan dhaarmik pravriitti ke raees log ladakiyon kee shaadee ke lie kaaphee dhan daan men dete rahate hain kuch sahaayataa sarakaar kee taraph se mil jaatee hai jisakaa wiwaran rajistar men darj karake aupachaarik ghoshanaa kar dee jaatee hai yah bhee mainne ek baar achaanak shailajaa aantee kee sethajee ke saath huee baatacheet sun lee thee waranaa hamen isakee koee jaanakaaree naheen hotee wiwaah karawaane aur kharch kaa saaraa shrey sethajee le lete hain kisee tarah kee koee poochataach naheen hotee balki bade adhikaaree bhee unake saath aakar apane anumodan ke saath sethajee kee prashansaa ke samaachaar akabaaron men chapawaate hain

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mainne ek baar shailajaa aantee se unako achche mood men dekhakar unase is baare men poochaa thaa to unhonne yahee kahaa thaa ki is aashram kee ladakiyon ke wiwaah karawaane kaa daayitv sethajee kaa hee hai, we ek naamee raees wyaapaaree hone ke saath hee is aashram ke maalik aur prabandhan samiti ke pramukh hain atah daanasvaroop aaye hue dhan kaa lekhaa-jokhaa unake paas hee rahataa hai”

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“oh, deedee! ab ek baat aur bataa deejiye ki wiwaah ke baad aap log hamase milane to aayaa karengee n”?

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“main yah bhee naheen jaanatee ninnee, ham 14 warsh tak is aashram kee pahalee sanchaalikaa maayaa dewee ke saannidhy men palee hain usake baad yah shailajaa aantee aaeen hamase pahale wiwaah kar chukeen ladakiyaan un dinon hamase milane aatee rahatee theen lekin bade maalik kee mriityu ke baad phir kabhee naheen aaeen hamane kaee baar shailajaa aantee se unase milawaane ke lie yaachanaa kee magar unhonne is baare men anabhijnataa jataate hue rukhaaee se yahee kahaa-

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“unake jeewan men jhaankane kee ab kisee ko koee aawashyakataa naheen, apane kaam se matalab rakho”

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ek din sethajee apane saath wiwaah ke ichchuk kuch ladakon ko le aae meenoo, maayaa aur mamataa ko bhee taiyaar karawaakar baaharee parisar men bulaayaa gayaa un ladakon men se jin teen ladakon ne ek ek ladakee ko pasand kiyaa, unake naam sethajee ne ladakiyon ke naam ke saath not kar lie baakee unake poore parichay ke saath to sethajee waakiph the hee, atah un ladakon ko aashvast karake aage kaa kaaryakram tay hone ke baad soochit karane kaa aashvaasan dekar sabako widaa kiyaa

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kuch samay baad hee shailajaa aur sethajee ne sambandhit adhikaariyon ko soochit karake wiwaah-samaaroh aayojit karane kee anumati le lee aur wiwaah kaa din tay kar liyaa gayaa

yah sab hone ke baawajood nayanaa unake rishte se santusht naheen thee kyonki use unakee jodiyaan bemel lag rahee theen aakhir ekaant paate hee usane meenoo se pooch hee liyaa-

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“meenoo deedee, aapane us wyakti ko pasand kaise kar liyaa, kahaan aap itanee sundar aur kahaan wo? roop rang men to aapake saamane wo kuch naheen lagataa aur umr men bhee aapase kaaphee badaa lag rahaa hai”

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meenoo ne udaasee bhare svar men jawaab diyaa-

“meree gudiyaa, ham anaath ladakiyon kee pasand-naapasand kaa yahaan koee mahatv naheen hai, n hee munh kholane kaa adhikaarkyonki adhikaar kewal insaanon ke lie hote hain aur hamen yahaan insaan samajhataa hee kaun hai? ye sab dekhanaa dikhaanaa kewal aupachaarikataa hai”

“magar sethajee to bahut bhale hain, aap unase man kee baat kah sakatee theen n”!

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“unakaa bhalaaee kaa baanaa kitanaa kriipan hai, yah tum naheen samajh sakogee ninneeinake pitaa ek dewataa the aur ye unake wipareet ek daity hee kahalaane yogy hain”

“magar deedee, main samajhanaa chaahatee hoon, kyonki aap teenon kee shaadee ke baad hamen bhee isee sthiti kaa saamanaa karanaa hai, phir main apane sawaalon ke jawaab kisase maangoongee deedee”?

“abhee kewal itanaa jaan lo ninnee, ki tumhen bhed kee khaal men chipe is aashram ke sabhee mard bhediyon se saawadhaan rahanaa hai, baakee sab dheere dheere samajhane lagogee”

“to kyaa sethajee bhee”?

“haan ninnee”

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nayanaa meenoo kee baat kuch samajhee kuch n samajhee wo usake uttar se santusht naheen huee balki usake kathan kee gooढ़taa ne usake mastishk men dvandv ched diyaa shaayad deedee use kachchee umr kee samajhane ke kaaran pooree baat bataanaa naheen chaahatee magar usane us neech aur nirankush insaan kee pooree waastawikataa jaanane kaa driiढ़ nishchay kar liyaa thaa atah punah meenoo se yaachanaa bhare svar men kahaa-

“deedee lagataa hai, aap mujhase kuch chipaa rahee hain magar deedee yah to aap bhee samajhatee hongee ki besahaaraa bachchon kaa bauddhik wikaas saamaany sarv suwidhaa bhogee bachchon kee apekshaa jaldee ho jaataa hai, we duniyaadaaree kee baaten bahut jaldee samajhane lagate hain aapakee baaton ne mere man men uthal-puthal machaa dee hai aur meree jijnaasaa aapako shaant karanee hee hogee”

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“ninnee, tumhen itanee kriitasankalp dekhakar ek shart par tumase apanee nijee baaten saajhaa kar rahee hoon magar dhyaanan rahe, kisee any ko isakee bhanak bhee naheen laganee chaahie waranaa sethajee neechataa kee kisee bhee had tak jaa sakate hain aur mere jaane ke baad tumhaaraa jeenaa doobhar kar dengebas isee ek wajah se main munh naheen kholanaa chaahatee thee”

“agar aap meree yaa meree saheliyon kee surakshaa ke lie itanee chintit hain aur baat itanee ganbheer hai deedee, to aap bephikr rahiye, main aapakee baat kaa pooraa dhyaan rakhoongee”

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“to suno ninnee, main yah to naheen jaanatee ki is aashram ke kaanoonee niyam kaayade kyaa hain aur kyaa gair kaanoonee hai, magar sethajee aur shailajaa aantee kaa adhikatar ek saath aanaa-jaanaa aur aashram kee gatiwidhiyon men sethajee kaa hastakshep banaa rahanaa is baat kaa sanket karataa hai ki we koee wishesh wyakti hain aashram ke sabhee purush karmachaaree shailajaa aantee aur inheen sethajee kee shah par yuwaa hotee huee ladakiyon kaa yaun shoshan karanaa apanaa adhikaar samajhate hain tumane dekhaa hogaa ki we jab bhee bachchon ke lie bhojan aadi laate hain to der raat tak bane rahate hain wo isalie ki sirph raat kaa andhakaar hee aise waasanaa-lolup nar-pishaachon ke kaaranaamen apane aagosh men chipaa sakataa hai

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12 ween tak shikshaa poorn hote hee ladakiyon ko aashram chodane ke lie kah diyaa jaataa hai phir unake saamane yah prastaaw bhee rakhaa jaataa hai ki we chaahen to wiwaah hone tak aashram men rah sakatee hain magar rasoee athawaa aashram ke har kaary men unhen sahayog karanaa hogaa aur binaa sanchaalakon kee anumati ke aashram ke baahar aanaa jaanaa unake lie warjit hogaa

jab ladakiyon ko wiwaah hone tak rahane khaane kee suwidhaa upalabdh ho to bhalaa aashram chodakar we laawaaris bhatakanaa kyon pasand karengee? hamane bhee unakee har shart maanakar aashram men hee rahanaa sveekaar kar liyaa hamen kyaa pataa thaa ki yuwaa anaath ladakiyaan kaheen bhee rahen, unhen sammaan ke saath surakshaa naseeb naheen hotee

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ek baar ladakiyaan rahanaa sveekaar kar len to phir unako pol khulane ke dar se wiwaah se pahale kaheen jaane naheen diyaa jaataa unakaa aashram ke get se baahar nikalanaa nishiddh kar diyaa jaataa hai unhen tarah tarah ke pralobhan dekar bhaawanaatmak dabaaw banaakar apanee baat manawaaee jaatee hai yaun shoshan kaa yah ghinaunaa ghun unake tan man ko is kadar nichodakar satvaheen kar detaa hai ki we kisee tarah chutakaaraa paane ke lie wiwaah prastaaw aate hee binaa kuch soche samajhe taiyaar ho jaatee hain wiwaah se pahale unhen garbhawatee naheen hone diyaa jaataa

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hamaaraa bhee sharton par rahane kee sahamati ke saath hee shaareerik aur maanasik utpeedan kaa adhyaay aarambh ho gayaa hamase manamaanaa kaary lene ke baawajood andhere men sethajee dvaaraa ham ladakiyon kaa kaumaary kuchalaa jaane lagaa aur yah sab shailajaa aantee kee naak ke neeche hee sanpann hotaa hai munh kholane par hamen maarakar phenk dene athawaa kisee weshyaalay men bech dene kee dhamakee dee jaatee rahee ham chaahakar bhee kuch naheen kar paateen kyonki unakee pahunch unake kathanaanusaar oopar tak hai aur hamane svayan yahaan rahanaa sveekaar kiyaa hai choree chipe bhaag bhee jaaen to hamen kaheen aasaraa milane kee ummeed naheen hotee balki pakad lie jaane par naarakeey jeewan men dhakel die jaane kaa dar rahataa hai ek taraph kuaan to doosaree taraph khaaee waalee sthiti ban jaatee hai unakaa koee kuch naheen bigaad sakataa jab doosaree chotee ladakiyaan pढ़aaee samaapt karake baalig ho jaatee hain tab puraanee ladakiyon kaa wiwaah kar diyaa jaataa hai ladake bhee anaath, abhaawagrast, kuroop athawaa gareeb hee chune jaate hai taaki we wirodhee svar halak se nikaalate hee halaal kar die jaaen”

meenoo kee baate sunakar nayanaa ke rongate khade ho gae magar ab usakaa manobal aur driiढ़ hotaa gayaa usane tay kar liyaa ki sabr ke saath apanaa safar shuroo karake hee manjil haasil ho sakegee tab tak intazaar karanaa padegaa

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niyat tithi par aashram ke sadasyon aur karmachaariyon ke alaawaa shailajaa aur sethajee dvaaraa adhikaariyon ko nimantran bhejakar bulaayaa gayaa war paksh se ladakon ke abhibhaawak ke roop men unake kuch mitr aur parichit shaamil hue kyonki teenon ladake bhee ladakiyon kee tarah anaath the maayaa kaa wiwaah waibhaw ke saath, mamataa kaa shishupaal ke saath aur meenoo kaa wiwaah milind ke saath gathabandhan ke saath wiwaah samaaroh sanpann huaa aur teenon jodon ko pahale se jutaae hue griihasthee ke aawashyak saamaan ke alaawaa aabhooshan wastraadi dekar widaa kiyaa gayaa

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kahaanee jaaree rahegee, aapakee pratikriyaaen apekshit hain🙏😊

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अध्याय 8

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sriishti nirmaan ke samay widhaataa ne nishchit hee kuch insaanon men haiwaanee hawas itanee koot koot kar bhar dee hogee, jo yugon se maanawataa ko kalankit karate aa rahe hain ye aise raktabeej hote hain jinake jeewaashm sadiyon tak phir-phir aakaar lekar apane dushkarmon se itihaas ko doharaate rahate hain phir chaahe kitane bhee awataar janm lete rahen magar in raktabeejon kaa jad mool se samaapan asanbhaw ho jaataa hai, kyonki inakaa poshan oonchee pahunch waale raktabeejon dvaaraa hee hotaa aayaa hai atah ye roop badal-badal kar har yug ke awataaron par bhee haawee hote rahate hain

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maanik seth!! jinakaa warchasv “nirmalaadewee baal aashram” par haawee thaa, sthaapit raktabeejon kee shrankhalaa kee ek sudriiढ़ kadee the unhonne apane pitaa jnaanachand, jo “nirmalaadewee baal aashram” ke sansthaapak the, kee nekanaamee ke bal par aise raajanetaaon ke saath judakar apanee gaharee paith banaa lee thee, jo usake kaale kaaranaamon men saath dete rahen

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“nirmalaadewee baal aashram” kee sthaapanaa seth jnaanachand ne apanee mriit patnee ke naam par kee thee we dillee ke ek prasiddh anaaj wyaapaaree the aur samaaj men apanee nekadilee aur eemaanadaaree ke lie jaane jaate the we ek samaajasewak aur anek saamaajik sangathanon ke sadasy bhee the shaanadaar bangalaa aur naukar chaakar usane apanee mehanat ke bal par haasil kie the maanik unakaa ikalautaa putr thaa

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maanik kaa paalan-poshan bade laad-pyaar se huaa thaa bachapan se hee mohalle ke bachchon ke beech netaagiree dikhaanaa, maarapeet karanaa usakaa priy shagal thaa lekin jnaanachand kee sajjanataa kaa khyaal karate hue log usakee shikaayat n karake samajhaa diyaa karate the maanik ke 10 warsh kaa hone par usakee maan nirmalaa dewee apanee lambee laailaaj beemaaree se kam umr men hee chal basee patnee kee mriityu ke baad seth jnaanachand ko akelaapan kaatane lagaa we maanik ke paalan-poshan kaa adhikaansh bhaar apane sewakon par daalakar svayan saamaajik sansthaaon se jud gae the aur unheen dinon anaathaalay kee sthaapanaa bhee kee

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maanik kaa man pढ़aaee men kam lagataa thaa, lekin buddhi teevr hone se use kakshaaon men paas hone jitane nanbar mil hee jaate the aathaween kakshaa paas karake haaeeskool men prawesh ke saath hee usakaa pitaa ke svabhaaw ke wiruddh aacharan ujaagar hone lagaa aur wah asaamaajik gatiwidhiyon men lipt hone lagaa pados mohalle aur raah chalatee ladakiyon ko chedane men use ras aane lagaa thaa padosee jnaanachand ko jitane aadar se dekhate, maanik ko ab utanee hee hikaarat se dekhane lage the jnaanachand bhee usakee harakaton se anajaan naheen the we putr par lagaam kasane ke lie khaalee samay men use wyaapaarik gatiwidhiyon men shaamil karane ke saath hee saamaajik sangathanon men le jaane lage 12 paas karane ke baad use kॉlej n bhejakar ghar par hee koching dilaakar grejueshan pooree karawaaee

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shikshaa pooree hote hee unhonne maanik kee rasik mijaajee dekhate hue usakaa wiwaah dillee kee hee pढ़ee likhee sundar kanyaa sushamaa se karawaa diyaa sundar aur susheel patnee paakar maanik kaa man ghar men ramane lagaa to jnaanachand ne wyaapaar kaa adhikaansh kaary maanik ko saunp diyaa aur svayan saamaajik sangathanon aur anaathaashram ke sanchaalan ke sahayog men adhik samay bitaane lage patnee ke binaa unakaa man ab ghar men naheen ramataa thaa 5 warsh ke antaraal men maanik ek putr aur ek putree kaa pitaa ban chukaa thaa lekin jnaanachand kaa svaasthy lagaataar girane lagaa thaa ek din achaanak hee hriidayaaghaat se unakaa dehaant ho gayaa

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pitaa kee achaanak mriityu se aahat maanik ko kuch samay to apanee maanasik peedaa se ubarane men lag gayaa phir usane wyaapaar ke saath hee anaathaalay ke sanrakshan kaa jimmaa bhee svayan par le liyaa

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seth jnaanachand dvaaraa niyukt aashram kee sanchaalikaa maayaadewee ne 7-8 warshon tak kaaryabhaar sanbhaalaa phir usane apanee bढ़tee umr ke kaaran aage aashram kee jawaabadaaree men khud ko aksham bataakar maanik se aashram chodane kee anumati maangee maanik pitaajee kee sadasyataa waalee saamaajik sansthaaon men kabhee kabhaar jaate rahate the, usane apanee samasyaa sansthaa ke sadasyon ke saamane rakhee wahaan un dinon us sansthaa men shailajaa naam kee ek naee mahilaa sadasy shaamil huee thee usane is kaary men ruchi pragat kee lagabhag 35 warsheey shailajaa ne bataayaa ki wo widhawaa hai do saal pahale hee pati ke ek sadak durghatanaa men dehaant ke baad wo ab apane bhaaee-bhaabhee ke saath rahatee hai wo doosaree shaadee karanaa naheen chaahatee aur apanaa jeewan samaaj sewaa ko hee samarpit karanaa chaahatee hai maanik ko aur kyaa chaahie thaa, usane turant use “nirmalaadewee baal aashram” kee sanchaalak niyukt kar diyaa aur svayanm sanrakshak ke pad par banaa rahaa

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samaaj men maanik ab maanik seth kahalaane lagaa thaa kuch samay saamaany roop se gujar gayaa dheere-dheere sansthaaon ke maadhyam se usakaa parichay raajanetaaon se bhee hotaa gayaa jinake sahayog se anaathaalay ke lie aarthik anudaan kee wyawasthaa suchaaroo roop se hone lagee

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lekin kahaa jaataa hai ki insaan kaa svabhaaw kuch apawaadon ko chodakar kabhee naheen badalataa maanik kaa bhee yah svaroop oढ़aa huaa baaharee mukhautaa thaa, kuch hee samay baad usakaa waastawik roop saamane aane lagaa shailajaa ko akelee dekh-jaanakar usakaa rasik-mijaaj, waasanaa lolup man apanee patnee sushamaa se uchaat hokar usapar aasakt hone lagaa shailajaa widhawaa hone ke saath yuwaa aur sundar bhee thee usakee bhee kuch atriipt yaun ichchaaen theen, donon kee umr men bhee wishesh antar naheen thaa atah aashram kaa kaaryabhaar sanbhaalane ke baad wo bhee maanik kee taraph aakarshit hotee chalee gaee

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lekin maanik seth apane yuwaa hote hue putr aur putree se gaharaaee se judaa huaa thaa, atah usane apane kriyaakalaap kee bhanak bhee ghar men naheen lagane dee aashram men wo raat men kabhee naheen rukataa thaa aur kabhee-kabhee pariwaar ke saath bhee wahaan chalaa jaataa thaa to unapar kisee ko koee shak naheen hotaa thaa

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kuch hee dinon men usane aashram par niyukt saare karmachaariyon ko kisee n kisee bahaane hataakar apanee sharton par naee niyuktiyaan kar leen, taaki usake kukarmon par pardaa banaa rahe aur usake pitaa kee nekanaamee kaa laabh bhee use milataa rahe

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maanik ke 10 warsh isee tarah aisho aaraam men gujar gae usakaa adhikaansh dhan shailajaa par kharch hone lagaa thaa phalasvaroop usakee aarthik sthiti daanvaandol hone lagee isakaa asar usake aashram par bhee padaa aur wahaan palane waale bachche kuposhan kaa shikaar hone lage usakee buddhi ne kunthit hokar use aparaadh kee duniyaa men dhakel diyaa aur wo sheeghr aur adhik dhan kamaane ke raaste khojane lagaa thaa

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pitaa jnaanachand ne bangale ke najadeek hee ek naee banee sosaayatee men ek do bedaroom, haal, kichan kaa ek flait le rakhaa thaa, jisakaa upayog we sansthaaon ke sadasyon ke saath wichaar wimarsh karane men kiyaa karate the jab bhee meeting hotee wahaan ghareloo sewak ko bulaa lete aur sabako chaay-naashtaa karawaakar hee widaa karate the maanik ne ab usakaa upayog awaidh sharaab ke bhandaaran ke lie karane kaa wichaar kiyaa lekin isake lie ek-do wishvasaneey aadamee hone aawashyak the jo wahaan rahane ke saath hee usake kaary men bhee sahayog karen is baat par wichaar karane se usakaa dhyaan apane hee ghar ke karmachaariyon kee or aakarshit huaa

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usake bangale par teen karmachaaree kaam par tainaat the ek puraanaa sewak abhiraam, jo ghar ke andaroonee kaary kiyaa karataa thaa, wo raat men kaam katm karake apane ghar chalaa jaataa thaa do karmachaaree aur the jinhen jnaanachand jee ne chaukeedaaree aur draaiwing ke lie niyukt kiyaa thaa we donon bhaaee the aur shaadeeshudaa the us samay donon kee umr lagabhag 25 ke aasapaas thee unakee niyukti jnaanachand dvaaraa unakee mriityu ke kuch maah poorv hee huee thee yahaan kaam karate hue unhen ab 7-8 warsh ho chuke the is antaraal men ek kee patnee kaa dehaawasaan ho chukaa thaa aur doosare kee jhagadaa karake use chodakar chalee gaee thee

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atah maanik ne un donon kee rahane kee wyawasthaa bangale ke gairaaj men bane ek kamare men kar dee thee taaki we din-raat usake sanpark men rahen maanik ne unako wishvaas men lekar flait men rahane aur kinheen gareeb kanyaaon se wiwaah karawaane kaa laalach diyaa aur apane saath awaidh kaary men shaamil kar liyaa

ab us flait ko ghar kaa roop de diyaa gayaa donon bhaaee wahaan rahane lage aur maanik seth kee gatiwidhiyaan bhee parade ke peeche parawaan chढ़ne lageen

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lekin baat yahaan tak hee samaapt naheen huee, kuch samay gujarate hee, maanik kaa man shailajaa se bhee bharane lagaa usakee waasanaa-yukt nigaahen aashram kee yuwaa hotee huee baalikaaon kee deh tatolane lagee theen aur wo apanee kutsit ichchaaon kee poorti ke lie shailajaa ko hee moharaa banaane lagaa thaa

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kahaanee jaaree rahegee

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अध्याय 9

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meenoo, maayaa aur mamataa ke wiwaah ke saath hee nayanaa ko aashram ab jaise kaat khaane ko daudataa thaa aman kee yaad ko to badee mushkil se dimaag ke kone men kaid kar paaee thee ki ab yah jhatakaa bhee jhelanaa pad gayaa aage jin mushkilon se gujaranaa padegaa, usakee kalpanaa maatr se usakaa rom rom siharane lagataa thaa lekin samay to rukataa naheen, ladakiyon kee widaaee ke agale din hee shailajaa ne nayanaa, daalee aur lataa ko bulaakar lagabhag aadeshaatmak svar men kahaa-

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“betiyo, meraa any kaaryon se baahar aanaa-jaanaa lagaa hee rahataa hai to aaj se pढ़aaee ke alaawaa rasoee ke kaaryon men bhee tum teenon ko rasoee banaane waaliyon kaa sahayog karanaa hogaa is tarah tum kuch seekh bhee sakogee”

teenon baalikaaen us samay kuch kahanaa uchit n samajhakar unake nirdeshon kaa paalan karate hue rasoee men jaakar bhojan taiyaar karane waalee mahilaaon kee sahaayataa karane men jut gaeen

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is taraph se santusht hone ke baad shailajaa taiyaar hokar baahar chalee gaee ekaant paate hee nayanaa ne daalee aur lataa ko kamare men bulaakar meenoo ke saath huee apanee baatacheet wistaar se unako sunaaee aur kahaa-

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“bahano, ab ham teenon ko hee ek doosare kaa sahaaraa bananaa hai hamen ab har samay saawadhaan rahanaa chaahie isake lie ham teenon har samay har pal saaye kee tarah ek doosare ke saath rahengee taaki aashram kaa koee purush hamaaraa shaareerik athawaa maanasik shoshan n kar sake haaeeskool paas karane ke baad hee dekhaa jaaegaa ki oont kis karawat baithataa hai”

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“jo hukm mere aakaa, oont chaahe jis karawat baithe, ham to tumhaaree aajnaa ke binaa karawat bhee naheen badalengee” lataa ne muskuraakar winod ke svar men kahaa

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“main is samay ganbheer hoon lataa, jo hashr deedee logon kaa huaa hai, waisaa hamaare saath haragiz n hone doongee anaathon ke haq hadapane aur besahaaraa baalaaon par atyaachaar kaa yah silasilaa ab aur aage naheen bढ़ne paae, hamen isake lie kuch thos upaay

karane honge aakhir aashram men hameshaa andhere kaa hee raaj kyon hotaa hai? is aashram ke sukh-soory ko grasane waale maanik seth ke saare raaj phaash n kiye to meraa naam bhee nayanaa naheen”

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“maan gae diyar ninnee, ham in habshiyon ke aage kabhee hathiyaar naheen daalengee tumhaaraa driiढ़ sankalp hamaaraa path prashast karataa rahegaa” kahate hue daalee ne taish men aakar apanee mutthiyaan kas leen

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widyaalayon kaa nayaa satr aaranbh hote hee teenon lad़kiyon ko sethajee aur shailajaa ne saath jaakar raajakeey uchchatar maadhyamik kanyaa widyaalay men daakhilaa dilawaa diyaa yahee naheen, unhonne dikhaawe ke lie hee sahee, ladakiyon ke aane jaane ke lie saaeekil upalabdh karawaane kee maang bhee rakhee, magar unakee is maang ko yah kahakar khaarij kar diyaa gayaa ki saaikil kewal 5 kilomeetar dooree waale skoolon athawaa kolejon ke lie upalabdh karawaaee jaatee hai aakhirakaar teenon sakhiyon ne aajaadee kee saans lee

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aaj skool kaa pahalaa din thaa, skool subah 9 se 4 baje tak lagataa thaa we bade sabere uthakar ootsaahapoorvak taiyaar hueen unhonne apane kapadon men se sabse achche kapade chaantakar pahane aaj khaalee haath hee jaanaa thaa do chaar din men jab skool kee taraph se yooniphॉrm aur kॉpee kitaaben mil jaaengee to pढ़aaee bhee shuroo ho jaaegee

taiyaar hokar unhonne aashram ke bade haal men lagee huee deewaar ghadee par nazar daalee to aath baj chuke the unhen paidal hee do kilomeetar chalanaa thaa atah we jaldee se nikal padeen raastaa to we dekh hee chukee theen, baaton-baaton men, baaharee duniyaa ke najaaron ko aatmasaat karate hue raastaa kaise kat gayaa, unhen pataa hee naheen chalaa

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we soch rahee theen ki yah bandhanamukt duniyaa kitanee sundar hai skool sarakaaree hone se anaathon ko nihshulk padh़aayaa jaataa thaa tathaa kitaaben, kॉpiyaan bhee phree upalabdh karawaaee jaatee theen widyaalay kaa bhawan puraanaa awashy thaa lekin saaree suwidhaaen upalabdh theen staaph room, laayabreree, prayogashaalaa aur bad़aa saa khel kaa maidaan aadi dekhakar unhen sukhad anubhooti ho rahee thee

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pढ़aaee shuroo ho chukee thee nayanaa ne wijnaan wishay liyaa thaa magar daalee aur lataa ne aarts atah unakee kakshaaen ab alag-alag ho gaee theen daalee aur lataa kee to naee saheliyaan ban gaee theen magar nayanaa ke man men aman ne baseraa banaayaa huaa thaa atah wo antarmukhee ho chalee thee jahaan khaalee peeriyads men daalee aur lataa lad़kiyon ke staaph room men baithakar sakhiyon ke saath gappen lad़aatee chahakatee rahatee theen waheen nayanaa wo samay laayabreree men yon hee koee kitaab saamane rakhakar aman ke saath baaten karate hue bitaa detee thee

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svaadheen saanson kaa yah suhaanaa safar teenon sakhiyon ke anaath jeewan kaa svarn kaal thaa we skool hameshaa mukhy sadak se hee jaatee theen kabhee kabhee aawaaraa ladake unakaa peechaa karate aur ishaaron se rukane yaa paas aane kaa ishaaraa bhee karate to we us taraph se munh pher leteen jaise unhen dekhaa hee naheen sadak ke kinaaron par aam amarood aur imalee ke phal wriiksh dekhakar unake munh men paanee aa jaataa aur we aksar gire hue phal batorakar apane baste men rakh leteen phir skool kee aadhee chuttee men chatakhaare lekar khaateen

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chuttee men baahar nikalate hee pratidin get ke ek taraph ek adhed wyakti bade se tokare men ubale hue chane lekar baithaa milataa thaa wo har ladakee ko pyaar-manuhaar se betee sanbodhit karake bulaakar chane kaa donaa haath men detaa thaa aashram men unhen bhojan din men hee milataa thaa atah teenon sakhiyaan aashram se bhookhee hee nikalatee theen ab chane kaa donaa aur baste men batorakar laaee huee imalee aur kachche aam lekar ek ped ke neeche baithakar khaakar triipt ho letee theen ek baar nayanaa ne us wyakti se poochaa-

“baabaa, aap itane saare chane pratidin kahaan se laate hain?”

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“betee mujhe yahaan ek dhanawaan bhale maanush ne is kaary ke lie pagaar par niyukt kiyaa hai nikat hee unakaa bhawan hai skool shuroo hone ke baad main pratidin unake die hue chane lekar yahaan baith jaataa hoon, phir chuttee hone tak aasapaas ke dharmaalu log apane gharon se ubale hue chane laa kar tokaree men yah kahakar daalate jaate hain ki ye hamaaree betiyon ke lie hain ham khushakismat hain ki hamen sanyog se betiyon kee duaaen paane kaa awasar milaa hai yah tokaree hameshaa bharee rahatee hai aur chane kabhee kam naheen padate bache hue chane main apane ghar le jaataa hoon”

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nayanaa paapee andhere ke peeche chipe puny-prakaash ke is pahaloo se pahalee baar roobaroo huee thee, sochaa karatee- “ek taraph to betiyon ke maan-rakshak dharmanishth daanee maanaw aur doosaree taraph isee duniyaa kee unheen betiyon ke sammaan ke bhakshak karmabhrasht bepaanee daanaw, waah ree, dorangee duniyaa”!

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is tarah paap aur puny roopee do prawesh-dvaaron ke beech pratidin do kilomeetar kaa saphar tay karate hue chaar saal kaa samay is tarah sarak gayaa ki usakee sarasaraahat bhee sakhiyon ne mahasoos naheen kee ab kewal pareekshaaen shesh theen magar nayanaa ke nayanon kee neend yah sochakar udee huee thee ki 12 ween kee pareekshaa samaapt hone tak we baalig to ho chukengee magar isake baad kyaa hogaa?

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wo sochatee thee ki ab tak to unake saath koee apriy prasang shaayad isee kaaran ghatit naheen huaa ki we parachaaee kee tarah ek doosaree ke saath chipakee rahatee theen aage n jaane kyaa ho sethajee kaa shaaleenataa kaa labaadaa sthaaee to naheen ho sakataa, kyonki kisee bhee daanawee pravriitti waale insaan kaa svabhaaw itanee aasaanee se naheen badal sakataa waataawaran kee yah shaanti aane waale toophaan kaa sanket hee ho sakatee hai magar sethajee kyaa jaanen ki ham bhee sajag hain aur ujale aawaran men chipe usake kaale karmon se bakhoobee parichit ho chukee hain

phir bhee ek shankaa to usake man men banee huee thee ki pढ़aaee poorn hone ke baad agar aman milane naheen aayaa athawaa use aane naheen diyaa gayaa to kyaa hogaa? unako to pareekshaa parinaam ke baad yah aashram chodanaa hee hai

aman ne aane kaa waadaa to kiyaa hai lekin sethajee kee neeyat kaa koee bharosaa naheen yah sab sochate sochate nayanaa kaa sir ghoomane lagataa magar koee samaadhaan naheen soojhataa thaa

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lataa use punah udaas dekhakar kahatee-

“ninnee, bhawishy kee chintaa to hamen bhee hai is tarah chintit hone se hamaare pareekshaa-parinaam par pratikool asar padegaa hamen ab kewal pढ़aaee par hee dhyaan denaa chaahie”

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“sahee kah rahee ho sakhee, hamen behatar parinaam ke lie khoob mehanat karanee chaahie kal se taiyaaree ke lie chuttiyaan lag jaaengee, hamen pareekshaa hone tak ab rasoee men naheen jaanaa hai aantee ko hamaaree yah baat maananee hee hogee”

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“bilkul ninnee, ab to we kuch alag hee mansoobe banaa rahee hongee to hamapar dabaaw bhee naheen daalengee” daalee ne usakee baat kaa samarthan karate hue kahaa

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aakhir samay par pareekshaaen sanpann ho gaeen aur chuttiyon ke saath hee unakee wo svapneelee sundar duniyaa bhee ab aabhaasee hokar man ke daayare men daakhil ho gaee

pareekshaa kaa parinaam ghoshit hone tak ab punah aashram kee kaid men hee intajaar karane ko majaboor ho gaeen

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kahaanee jaaree rahegee

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अध्याय 10

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chuttiyaan to theen hee, ab teenon sakhiyaan din bhar aashram ke kaaryon men svayan ko wyast rakhane lageen, magar teenon ek doosaree kaa saayaa banee ek saath hee har sthaan par kaary karatee theen taaki kisee purush karmachaaree ko unapar kudriishti daalane kaa awasar hee n mile raat men bhee ek saath bhojan karake bistar par apane bhawishy kee yojanaa par charchaa karatee rahatee theen

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us din dopahar kaa khaanaa sethajee ke ghar se aayaa thaa aur sethajee shaam tak aashram men hee shailajaa ke saath aashram ke ऑphis men, charchaa men wyast the tay thaa ki we hameshaa kee tarah bhojan karake hee jaaenge atah unake lie wishesh bhojan kee wyawasthaa kee gaee thee rasoee kee karmachaariyon ne apanaa kaam pooraa karake shailajaa se ghar jaane kee anumati lekar ghar kaa rukh kiyaa baakee kaam teenon ladakiyon ko sahejanaa thaa shailajaa ne daalee aur lataa se kahaa-

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“tum donon zaraa us wibhaag men jaakar ladakon ke bistar lagaa do, aaj wahaan kaa karmachaaree jaldee chalaa gayaa hai yahaan ab adhik kaam naheen hai, nayanaa dekh legee

baad men aakar tum teenon bhojan kar lenaa”

daalee aur lataa wahaan chalee gaeen to nayanaa ko shailajaa ne ऑphis men aane kaa ishaaraa kiyaa

wahaan nayanaa ne sethajee kee maujoodagee kee baat kahee to usane kahaa-

“sethajee tumase hee kuch poochanaa chaahate hain”

nayanaa soch men pad gaee ki kyaa kare use ab sethajee kee upasthiti se hee dar lagane lagataa thaa phir daalee aur lataa ko doosaree taraph bhejane se usake man men shankaa utpann honaa svaabhaawik hee thaa shailajaa usake man kee baat taad gaee aur bolee-

ninnee bete, sethajee se darane kee koee baat naheen hai, we is aashram ke sanchaalak warg ke pramukh hain aur tum logon kaa buraa kabhee naheen chaahenge main bhee to saath hoon n

nayanaa binaa kisee pratyuttar ke chupachaap unake saath chalee gaeen

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sethajee ne use saamane kursee par baithane kaa ishaaraa kiyaa aur binaa bhoomikaa baandhe poochaa-

gudiyaa, yah to tum jaanatee hee ho ki 18 warsh kee yaanee baalig hone par ladakiyon ko aashram chodanaa padataa hai lekin agar we chaahen to hamaaree sharton par wiwaah hone tak yahaan rah sakatee hain main jaanataa hoon ki daalee aur lataa kaa pratinidhitv tumheen karatee ho to bataao is baare men tumane kyaa wichaar kiyaa hai?

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“kaisee sharten ankal? hamane to abhee koee wichaar naheen kiyaa, pareekshaa kaa parinaam aane par hee tay karengee ki kyaa karanaa hai”

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"pareekshaa kaa parinaam bhee door naheen hai, gudiyaa sharten to yahee hain ki wiwaah hone tak tum logon ko aashram ke kaary sanbhaalane ke alaawaa sanchaalak shailajaa jee kee anumati ke binaa kaheen aane-jaane kee suwidhaa naheen dee jaaegee lekin agar tum chaaho to main sirph tumhaare lie tum teenon kaa aage pढ़ne ke lie kॉlej men daakhilaa dilawaa sakataa hoon"

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“mere lie wishesh suwidhaa kisalie ankal?”

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“tumhen main dil se chaahataa hoon gudiyaa raanee, tumhen bas kabhee-kabhee meree ichchaa kaa dhyaan rakhanaa hogaa meree baat maanogee to main tum teenon ko kॉlej men edamishan dilaane ke saath aane-jaane ke lie skootee aur mobaail dilaane ke atirikt achchaa bhojan-wastr bhee upalabdh karawaataa rahoongaa yah sab sirph tumhaaree khaatir karoongaa tumhaaree saheliyon ko hamaare sambandh kee bhanak bhee naheen lagane paaegee aur agar tum logon ne aashram chod bhee diyaa to tumhaaraa kyaa hashr ho sakataa hai, isakaa anumaan tum lagaa sakatee ho main chaahoon to aasaanee se kisee bhee ladakee ko apanee ankashaayinee banaa sakataa hoon magar main kisee ke saath zabaradastee kabhee naheen karataa meree baat maanane waalee yahaan kee har ladakee wiwaah ke baad sammaan se apanee griihasthee basaa letee hai” kahate hue sethajee ne apanaa haath bढ़aakar tebal par rakhe nayanaa ke haath ko dabaa diyaa

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nayanaa ne idhar udhar dekhaa to shailajaa wahaan se jaa chukee thee wo turant unakaa haath jhatakakar khadee ho gaee aur kathor svar men bolee-

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“ankal, mainne aapake is roop kee kalpanaa bhee naheen kee thee ki ladakiyon ke anaath aur asahaay hone kaa aap is tarah phaayadaa uthaate hain

hamen chaahe kitanaa hee sangharsh kyon n karanaa pade, apane sammaan kaa saudaa yaanee streetv kaa apamaan kabhee sveekaar naheen karengee yaad rakhiye, sirph hausalon ke bal par ek diyaa bhee toophaan se lad sakataa hai aap hamaaraa manobal kabhee naheen tod sakate pareekshaa kaa parinaam aate hee ham aashram chod dengee apamaanit aashray se sammaanit sangharsh hame sau baar sveekaar hai”

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“is samay tum josh men ho gudiyaa, baitho aur hosh men aakar zaraa gaur se meree baat par wichaar karake bataao, ki yahaan sukh suwidhaaon ke beech apanaa kairiyar banaanaa chaahatee ho yaa sadakon par bheekh maangakar zindagee karaab karanaa”

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“main pooree tarah hosh men hoon ankal, meraa nirnay adig hai, aap kisee galataphahamee men n rahiegaa”

kahate hue nayanaa kaksh se baahar nikal kar rasoee men pahunch gaee tab tak daalee aur lataa bhee lad़kon ke bistar theek karake waapas aa gaee theen niyamaanusaar unhonne chote bachchon ko bhojan parosakar khilaayaa phir unhen ek karmachaaree ne parosakar khilaa diyaa shailajaa apanaa bhojan baithak men hee karatee theen unhonne sethajee aur apanaa bhojan waheen mangaa liyaa thaa

khaanaa khaakar shayan kaksh men jaate hee nayanaa ne saaraa kissaa sakhiyon ko sunaayaa ki kis tarah usane sethajee ke mansoobon ko matiyaamet kar diyaa thaa phir we der raat tak aashram chodane ke baad kee sthiti par wichaar wimarsh karatee raheen

aakhir tay kiyaa gayaa ki we pareekshaa ke parinaam ke baad jis din ank soochee lene jaaengee, usee din skool se hee jaanakaaree lekar binaa kisee saamaan ke aagaraa ke lie bas pakad lengee aur wahaan pahunchakar kisee tarah aman kaa pataa lagaakar aage yojanaa par wichaar karengee parinaam kee soochanaa to aashram men hee mil jaaegee, magar surakshaa ke maddenajar apanee yojanaa kee jaanakaaree aashram ke kisee bhee karmachaaree athawaa shailajaa aantee ko naheen denee hai, kyonki ho sakataa hai, sethajee unake lie koee nayaa jaal bichaane kee taiyaaree kar chuke hon baakee sab paristhiti ke anusaar hee nirnay lenaa hogaa

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us raat teenon ko neend hee naheen aaee us raat ke baad lambe samay tak sethajee aashram naheen padhaare shailajaa kaa bhee nayanaa ke saath wyawahaar saamaany hee thaa, jaise kuch huaa hee naheen lekin nayanaa us waasanaa lolup, nikriisht narapashu maanik seth ke prati aankhen khulee hee rakhanaa chaahatee thee

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udhar nayanaa dvaaraa apamaanit hokar maanik shaanti se to baith naheen sakataa thaa sirph apane haawabhaaw chipaane ke lie usane aashram jaanaa chod diyaa thaa wo nayanaa ko sabak sikhaane ke lie koee surakshit maarg khoj rahaa thaa achaanak use ek kutsit wichaar soojhaa aur apanee soojhaboojh par apanee hee peeth thapathapaate hue usane balaraam-jayaraam ko bulaakar kahaa-

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“dekho balaraam, ab is umr men tum donon ke lie koee kanyaa to milane se rahee, lekin tum donon agar meree yojanaa men shaamil ho jaao to ek sundar aur alhad yuwaa ladakee tum donon ke lie upalabdh ho sakatee hai”

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“main samajhaa naheen sethajee, aap kis ladakee kee baat kar rahe hain aur yah kaise sanbhaw hai”

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maanik ne unako nayanaa ke baare men bataakar usake apaharan kee yojanaa men shaamil hone kee baat kahee pahale to balaraam dar ke maare inakaar karataa rahaa lekin jab maanik ne awaidh kaarobaar men unako phansaane kee dhamakee dee to unako majaboor hokar usakee baat maananee padee aur der tak nayanaa ke apaharan kee yojanaa par charchaa hotee rahee

kuch din baad jab shailajaa ko pareekshaa kaa parinaam aane kaa samaachaar milaa to usane nayanaa ko bulaakar soochanaa dee aur kahaa-

“ninnee, ab parinaam to aa chukaa hai, tum teenon ko sheeghr hee yah aashram chodanaa padegaa”

“hamane tay kar liyaa hai aantee, ham ank soochee praapt karane ke lie agale satr ke lie skool khulane tak intazaar karengee usake baad aashram chod dengee” nayanaa ne rukhaaee se jawaab diyaa

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unako rizalt kee soochanaa to milee magar aashram men jo samaachaar patr aataa thaa usamen usakee jaanakaaree naheen thee aur yahaan kampyootar kee bhee wyawasthaa naheen thee atah unako skool jaakar hee pataa lag sakataa thaa yah joon kaa maheenaa thaa aur skool kee chuttiyaan chal rahee theen magar nayanaa jaanatee thee ki chuttiyon ke dinon men skoolon ke kaaryaalay khule rahate hain, jinamen nॉn teeching staaph upasthit rahataa hai atah we skool jaakar parinaam dekh aaengee phir ankasoochee skool kaa nayaa satr aarambh hone par lene chalee jaaengee

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agale din shailajaa ko skool ke kaaryaalay se soochanaa milee ki skool ke soochanaa-pat par pareekshaa kaa parinaam lag chukaa hai is baar dillee men maanasoon ke jaldee aane ke sanket mile hain, atah kaaryaalay saptaahaant ke baad band ho jaaegaa is beech chaatr-chaatraaen aakar apanaa pareekshaa-parinaam dekh sakate hain ankasoochee taiyaar hone men samay lagegaa atah wo skool khulane ke baad hee mil sakegee

shailajaa ne nayanaa ko bulaakar yah baat bataaee to nayanaa ne kal hee daalee aur lataa ke saath jaane kee baat kah dee

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us raat khaanaa khaane ke baad lataa kee tabiyat kharaab hone lagee aur ultee dast ke saath bukhaar aa gayaa

us samay to shailajaa ne aashram men upalabdh bukhaar kee golee khilaa dee to use neend bhee aa gaee magar sabere phir use tez bukhaar chढ़ gayaa

nayanaa ne lataa ke svasth hone tak skool jaanaa sthagit kar diyaa aur wo daalee ke saath usakee dekharekh men lag gaeen teen din baad usakaa bukhaar to utar gayaa magar kamazoree hone ke kaaran wo paidal skool tak jaane men asamarth thee parinaam lene jaanaa bhee aniwaary thaa waranaa skool par pooree tarah taalaa lag sakataa hai nayanaa ne shailajaa se lataa kee dekharekh ke lie ek karmachaaree ko lagaane aur daalee ke saath parinaam dekhane ke lie skool jaane kee anumati maangee

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shailajaa ne do took jawaab dete hue kahaa-

“ninnee tum jaanatee hee ho ki yahaan karmachaariyon kee kitanee kamee hai, tum daalee ko lataa kee dekharekh men chodakar akelee bhee jaa sakatee ho, skool ke raaste se to parichit ho hee”

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nayanaa waise naheen bhee jaatee to skool khulane par ankasoochee ke saath parinaam maaloom honaa hee thaa aur aage pढ़ne kee bhee koee yojanaa naheen thee lekin utsukataa ko rok paanaa mushkil thaa atah usane daalee ko lataa kee dekhabhaal ke lie chodakar akelee hee skool jaane kaa nirnay liyaa sadak traaphik waalee thee, atah skool akelee jaane men dar kee koee baat naheen thee, balki aashram men lataa ko akelee chodane men dar banaa rahataa

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subah jaldee hee nayanaa nikal padee skool pahunchakar soochanaa pat par kaaryaalay ke ek adhikaaree kee sahaayataa se wo teenon ke rol nanbar khojane lag gaee

jab usane pratham shrenee kee soochee men teenon ke rol nanbar dekhe to prasannataa se usakee aankhon se aansoo chalachalaa aae unakee mehanat rang laaee thee

adhikaaree ne use badhaaee dete hue ankasoochee lene ke lie skool khulane ke baad aane ko kahaa nayanaa unhen dhanyawaad kahakar waapas jaane ke lie nikal padee

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kramashah

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अध्याय 11

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joon kaa teesaraa saptaah chal rahaa thaa aasamaan men subah se hee halke baadal chaae hue the jo ab tak saghan ho chale the nayanaa ne aadhee dooree bhee tay naheen kee thee ki halkee- halkee boondaa-baandee hone lag gaee ghabaraakar nayanaa ne chaal aur tez kar dee wo rizalt waalaa akhabaar to khareed naheen sakatee thee, ab jaldee hee shubh samaachaar sakhiyon ko sunaane ke lie aatur thee lekin kudarat ko shaayad kuch aur hee manjoor thaa achaanak baarish toophaanee gati se tez hotee gaee

nayanaa ke paas chaataa naheen thaa atah wo ek taraph ek ghane ped ke neeche khadee hokar baarish rukane yaa kam hone kaa intazaar karane lagee sadak se paidal chalane waale log gaayab ho gae the lekin waahanon kaa aanaa jaanaa badastoor thaa tabhee ek taraph se tez gati se aatee huee ek kaar usake nikat hee aakar ruk gaee aur aage kee khidakee kholakar maanik ne nayanaa ko sanbodhit karake poochaa-

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”are gudiyaa, yahaan akelee kyaa kar rahee ho”?

”ankal main rizalt dekhane skool gaee thee ab waapas jaa rahee hoon”

”theek hai, wah sab baad men bataanaa, abhee bheeg rahee ho, jaldee se gaadee men baith jaao, main meenoo ko kuch saamaan dene jaa rahaa hoon, kuch samay lag hee jaaegaa waapasee men tumhen aashram chodataa huaa jaaoongaa main shailajaa jee ko soochit kar detaa hoon”

meenoo kaa naam sunate hee nayanaa ke kaan khade ho gae sochane lagee ki sethajee ne shaadee ke baad bhee shaayad meenoo se sanbandh banaakar rakhe honge tabhee to use aashram men naheen bulaayaa jaataa use sethajee se ghin see aane lagee par is samay wo chaar saal baad meenoo se mil sakegee, yah sochakar hee romaanchit ho uthee udhar baarish bhee rukane kaa naam naheen le rahee thee to sethajee kaa saamaany wyawahaar dekhakar wo binaa kisee duwidhaa ke chupachaap pichalee seet par baith gaee wo naheen jaanatee thee ki usake apamaan se aahat hokar maanik seth ek khoonkhaar darindaa ban chukaa hai aur use phaansane ke lie jaal bunaa jaa chukaa hai

kaar chal padee to sethajee ne gardan peeche ghumaakar nayanaa se kahaa-

“ab bataao gudiyaa, tum sabakaa rizalt kaisaa rahaa”?

“ham teenon pratham shrenee men utteern huee hain ankal”

“are waah! phir to meree badhaaee sveekaar karo is kushee men agalee baar aashram men aane par mithaaee bantawaaoongaa”

nayanaa koee jawaab n dekar apane hee wichaaron men khoee rahee

·

kaar chikanee sadak par sarapat daudee jaa rahee thee lagabhag aadhe ghante ke baad naee banee huee bahumanjilaa imaaraton kaa silasilaa aarambh ho gayaa kuch aage andar kee taraph ek do mod lekar gaadee ek bahumanjilaa imaarat ke get ke aage rukee phir wahaan tainaat surakshaakarmee ne sethajee ko gaadee men dekhate hee get khol diyaa aur gaadee andar daakhil ho gaee

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sethajee ne utarakar peeche kaa get kholakar nayanaa ko utarane ke lie kahaa neeche utarakar nayanaa wismay se chaaron taraph dekhatee jaa rahee thee wo sethajee ke peeche ek bade se kaksh men daakhil huee us kaksh men kuch benchen lagee huee theen jo us samay khaalee theen

ek kone men ek kursee par baithaa huaa ek wyakti saamane rakhee huee mej par sir rakhakar oongh rahaa thaa unakee aahat se wo sajag hokar baith gayaa peeche draaiwar bhee saamaan ke ek bade se jhole ke saath aa gayaa thaa phir sethajee ne ek band get ke ek taraph kaa batan dabaayaa to darawaajaa khul gayaa aur we teenon andar prawisht ho gae nayanaa bahumanjilaa imaaraton men oopar neeche jaane waalee lipht ke baare men kitaabon men pढ़ chukee thee to sethajee ko 15 nanbar ke batan ko dabaate dekh wo samajh gaee ki yah lipht hai aur unhen 15 ween manzil par lekar jaa rahee hai yaanee meenoo deedee isee bilding men pandrahaween manjil par rahatee hain lipht ke rukate hee we baahar aa gae wahaan chotee see gailaree men do darawaaje the sethajee ke ek darawaaje ke baahar lage hue batan ko dabaate hee ek wyakti ne aakar darawaajaa khol diyaa aur ek taraph hat gayaa

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un teenon ke andar prawesh ke saath hee us wyakti ne turant get band kar diyaa nayanaa kee nigaahen idhar-udhar ghar kaa nireekshan karane ke saath hee meenoo ko talaash rahee theen ek taraph use ast wyast rasoeeghar dikhaa magar meenoo wahaan naheen thee sethajee ne use apane peeche aane kaa ishaaraa karate hue ek kaksh men prawesh kiyaa nayanaa ne sochaa, shaayad meenoo andar hee hogee aur wo bhee sethajee ke peeche kaksh men pahunch gaee

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lekin meenoo wahaan bhee naheen thee magar usake andar aate hee sethajee ne baahar jaakar kamare ko baahar se lॉk kar diyaa nayanaa samajh gaee ki use chal se yahaan laayaa gayaa hai, wo ro ro kar badahawaas hokar darawaajaa peetane lagee

thodee hee der baad sethajee kamaraa kholakar usake nikat aae to unake munh se aane waalee badaboo se nayanaa samajh gaee ki wo sharaab peekar aae hain wo sahamakar peeche hatane lagee to maanik usakaa kandhaa dabaate hue kutilataa poorvak bolaa -

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“nayanaa raanee, bolo ab kyaa wichaar haitumane sochaa hogaa, tumhen sethajee se aasaanee se chutakaaraa mil gayaa, magar main bhee tumhen haasil karane kaa iraadaa kar chukaa thaa agar tum aashram men hee meree baat maan letee to pढ़aaee pooree karane ke saath hee wiwaah karake sukhee jeewan bitaa detee, magar khair! wahaan n sahee yaheen saheeab to sirph meree ichchaa poorti hee naheen karanee balki tumhen mere karmachaariyon kee bhee gharawaalee banakar ham bistar hone ke alaawaa unake saare kaary karane honge aashram men main manamaanee naheen kar sakataa thaa magar yahaan tum pooree tarah meree mutthee men ho ab choonki meraa yah thikaanaa, meree asaliyat tum jaan chukee ho to aajeewan meree bandinee banakar rahanaa padegaa yahaan se baahar kadam rakhane kaa prayaas bhee n karanaawaranaa tumhaaree un donon chahetiyon ko aisee jagah bhej diyaa jaaegaa jahaan shareeph insaan jaane ke lie sau baar sochate hain”?

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khud ko asahaay aur ghiraa huaa dekhakar nayanaa kee aankhon men aansoo aa gae wo gid़gid़aakar bolane lagee-

“mainne aapakaa kyaa bigaad़aa hai ankal, main to aapakee betee samaan hoon, kriipayaa mujhe chod़ deejie”

“haa haa haa betee samaan ho magar betee naheen tumane meraa tiraskaar karake apane pairon par aap kulhaad़ee maaree hai, ab in j़khmon ko sahalaane yahaan koee naheen aaegaa” kahate hue sethajee ne use kheenchakar palang par dhakel diyaa

·

nayanaa haath pair patakatee, jaar-jaar rotee cheekhatee, chatapataatee rahee aur wo naraadham chatakhaare lete hue usake tan ko taar-taar karataa rahaa phir jee bhar jaane ke baad usakaa kasaaw dheelaa padate hee nayanaa ne apane wastr sanbhaale aur use hikaarat se dekhate hue bolee-

“yaad rakhanaa paapee maanik seth, tumane dhokhe se meraa apaharan karake balapoorvak sheel bhang kiyaa hai tumhen raawan kahanaa raawan kaa bhee apamaan hee hogaa usane to maan seetaa kaa kewal apaharan hee kiyaa thaa to bhee shreeraam ne pooree tarah usakaa saamraajy nestanaabood kar diyaa magar is yug men bhee koee raam awashy awatarit huaa hogaa jo mujh jaisee anaginat asahaay baalaaon kee pukaar sunakar tumhaare patit rakt kee ek-ek boond ko rasaatal dikhaakar rahegaa, taaki koee nayaa raktabeej phir janm n le sake”

“naheen gudiyaa, itanee badduaa mat do, abhee to barason tumhen ham sabakaa jee bahalaanaa hai,

chupachaap hamaare kaam karatee rahogee to tumhen ham aur koee kasht naheen denge”

aur attahaas karate hue wo wahaan se chalaa gayaa

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kramashah

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अध्याय 12

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sethajee ke kamare se jaane ke turant baad wo wyakti jisane dvaar kholaa thaa, andar aayaa aur nayanaa ke nikat baithakar usakee peeth sahalaate hue sahaanubhooti jataakar paanee pilaane lagaa nayanaa ne usakaa haath jhatakakar gilaas giraa diyaa aur use pare dhakel diyaa

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“nayanaa raanee, tumane sethajee kee baat naheen sunee? meraa naam balaraam hai main sethajee ke bangale par raat kee dyootee par aur din men ghar par hee rahataa hoon ham do bhaaee hain aur donon sethajee ke karmachaaree hain aaj se tumhen ham donon bhaaiyon kee gharawaalee banakar rahanaa hogaa aur ghar ke saare kaary bhee sanbhaalane honge din ke bhojan kee wyawasthaa ho chukee hai, jab man kare rasoee se lekar khaa lenaa” itanaa kahakar usane punah nayanaa ko nirvastr karanaa shuroo kar diyaa

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nayanaa men ab cheekhane-chillaane athawaa wirodh karane kee shakti bhee shesh naheen thee, wo jeewit laash kee tarah nidhaal svayan ko lutate hue dekhatee rahee aur balaraam use jee bharakar nichodane ke baad uthate hue bolaa-

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“dekho raanee, mere jaate hee jayaraam yahaan aaegaa aur raat bhar tumhaare saath rahegaa tumhaare lie yahaan se bhaagane kaa koee raastaa naheen hai atah ab aansoo bahaanaa chodakar kushee kushee hamaaree ichchaa pooree karate rahanaa hee tumhaare lie ekamaatr wikalp hai”

itanaa kahakar wo kamare se baahar haal men rakhe hue palang par pasar kar kharraate bharane lagaa

nayanaa men ab shakti lesh maatr bhee shesh n thee bhookh se alag praan wyaakul ho rahe the magar is samay paristhitiyon se samajhautaa karake phir apanee dashaa par wichaar karane kee baat sochakar wo yantrachaalit putalee kee tarah chupachaap rasoee men pahunch gaee aur paanee peekar saare saamaan ulat pulat kar dekhane lagee jo baig usake saath hee un pishaachon dvaaraa laaye gae the usamen phal, sabjiyaan aur salaad aadi the baakee saaraa saamaan bhee idhar-udhar se jhaankataa huaa dikh rahaa thaa waheen par kuch taiyaar bhojan bhee rakhaa huaa thaa usane thodaa saa khaanaa lekar kamare men jaakar neeche baithakar khaa liyaa phir waapas rasoee men bartan rakhakar kamare men aakar nidhaal see so gaee

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usakaa shareer tootaa jaa rahaa thaa aur aankhen mundee jaa rahee theen kab use jhapakee lag gaee isakaa use tab pataa chalaa jab balaraam ne use jhinjhodakar jagaa diyaa aur bolaa-

“utho raanee, kuch der men jayaraam aa jaaegaa, tum rasoee men jaakar jaldee se bhojan taiyaar karo saamaan sab waheen mil jaaegaa” phir wo haal men tee wee chaaloo karake baith gayaa”

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nayanaa chupachaap rasoee men pahunch gaee lekin use samajh men naheen aa rahaa thaa ki aakhir kaise aur kahaan se shuruwaat karekhaanaa banaanaa to wo jaanatee thee phir bhee khud ko asahaay aur akelee paakar dimaag kaam naheen kar rahaa thaa phir bhee usane ek nazar idhar-udhar daalee aur khaanaa banaane men jut gaee

nae aur aparichit sthaan par use kuch pareshaanee bhee aaee lekin ek ghante men hee usane daal-chaawal, sabjee-rotee banaakar rakh dee aur kamare men chalee gaee

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kuch der men balaraam usake paas aakar bolaa-

“nayanaa raanee, aao bhojan kar lo tumhen jayaraam ke aane se pahale khaanaa khaa lenaa chaahie waranaa bhookhe pet usakee bhookh kaise shaant karogee?”

magar nayanaa baad men khaane kee baat kahakar baithee rahee phir jab tee wee kee aawaaz aane lagee to chupachaap uthakar thodaa saa khaanaa lekar khaa liyaa

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jaise hee dor-bel bajee, balaraam ne usakaa kamaraa baahar se lॉk kar diyaa nayanaa kaa dil baithane lagaa wo maree see haalat men palang par padakar aankhen band karake phir usee aandhee kaa saamanaa karane kee himmat jutaane lagee usane get khulane phir band hone kee aawaaz sunee phir kuch hee der men kamare ke khulane aur kisee ke aane kee aahat aur

kisee ne use kheenchakar uthaayaa aur apanaa parichay dete hue bolaa-

·

“nayanaa raanee, tumane mujhe pahachaan to liyaa hogaa, main jayaraam hoon, sethajee ke saath aashram men bhee aataa rahataa thaa” kahate hue usane apane mobaail par myuzik ऑn kiyaa, phir usake saath wahee ghinaunaa khel shuroo kar diyaa nayanaa kee cheekhen, rudan, karaahen, aahen sab ghutakar us chaukhat ke andar kaid ho gaeen aur use tab tak raundaa jaataa rahaa jab tak wo behosh n ho gaee

lagabhag aadhee raat ko usakee neend khulee to kamare men jeero balb jal rahaa thaa aur wahaan koee naheen thaa use pyaas lagee thee lekin uthate hue usakaa badan buree tarah dard karane lagaa kisee tarah kamare kaa dvaar kholakar dheere-dheere kichan se paanee le aaee, peekar phir bistar par pad gaee

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subah munh andhere hee jayaraam ne use jhinjhodakar uthaayaa aur bolaa-

“utho nayanaa raanee, bahut aaraam ho gayaa jaldee se chaay naashtaa banaakar mere lie din kaa tiphin taiyaar karo balaraam ek ghante men pahunch jaaegaa”

nayanaa unake naam se to parichit ho chukee thee, n jaane kyaa sochakar inake maataa-pitaa ne in raawanon ke naam ke saath raam kaa naam chipakaa diyaa thaa man hee man usane unake naam ke aage raam hataakar raawan kar diyaa thaa wo un raawanon ko kuch bhee jawaab denaa wyarth samajhakar goongee gudiyaa kee tarah chupachaap kaam men lag jaatee thee

dor bel bajate hee use kamare men jaane ko kahakar baahar se lॉk kar diyaa gayaa lagabhag aadhe ghante ke baad jab balaraam ne dvaar kholaa to jayaraam khaa-peekar tiphin lekar jaa chukaa thaa haal ke dvaar kaa andar se taalaa lagaa diyaa gayaa thaa balaraam use jee bharakar nichodane ke baad nahaane chalaa gayaa

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nayanaa din bhar masheen kee tarah kaam karatee rahatee jab usakaa dard mahasoos karane waalaa koee naheen thaa to rokar bhee kyaa hotaa in nirdayee raakshason se raahat kee koee ummeed hee naheen thee

balaraam kabhee-kabhee use bhee naashte yaa khaane par saath baithane ko bolataa thaa magar nayanaa koee uttar naheen dekar apanaa kaam karane lag jaatee thee atah phir usane use bolanaa chod diyaa khaa peekar use ghar ke saare kaary sahejane kee hidaayat dekar haal men palang par so jaataa thaa

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usake neend ke aagosh men jaate hee nayanaa nahaa dhokar, saphaaee ke alaawaa rasoee ke kaam sahejatee aur apanaa bhojan kamare men hee kar letee thee dheere dheere usane poore ghar par khojee driishti daalanee shuroo kee wo do kamare aur ek haal waalaa flait thaa usake kamare kaa dvaar kholate hee ek galiyaaraa dikhataa thaa jisake ek taraph baatharoom, doosaree taraph rasoee ghar aur usase lagaa huaa ek aur kamaraa thaa jo band thaa jise usane kabhee khulate hue naheen dekhaa saamane hee badaa saa haal thaa jisake ek taraph mukhy dvaar thaa aur doosaree taraph badee see kaanch ke pallon waalee khidakee thee jise kholane par kaaphee chaudaa jangalaa banaa huaa thaa saamane kaa hissaa aadee salaakhon se band thaa

haal men ek taraph tee wee rakhaa huaa thaa usake saamane do palang lage hue the, beech men ek badee see mej aur chaar kursiyaan rakhee huee theen haal ke chaude hisse men alamaariyaan phiks theen

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isee tarah usake kamare men bhee jangale jaisee ek khidakee aur phiks alamaaree thee pahale din hee use alamaaree men apanee naap ke kapade balaraam ne dikhaae the shrriingaar kaa saamaan bhee deewaar men ek phiks darpan ke saath daraaj men upalabdh thaa baatharoom men bhee nahaane aur kapade dhone kaa saamaan rakhaa huaa thaa usake apaharan ke saath hee shaayad yah saaree wyawasthaaen yojanaabaddh tareeke se kee gaee hongee

rasoee kaa saaraa saamaan, doodh aadi balaraam aate samay le aayaa thaa subah subah usake saamane hee akhabaar, hॉkar dvaar ke neeche kee daraar se sarakaakar daal jaataa thaa

yahee pratidin kaa kram thaa any kisee ko nayanaa ne wahaan aate yaa dor bel bajaate kabhee naheen dekhaa rasoee ke saare kaary bhojan pakaane se lekar saphaaee bartan bhee usee se karawaae jaate the lekin kapade usase naheen dhulawaae jaate the shaayad aate-jaate dhobee ke paas le jaate honge

din men wo haal se akhabaar laakar rakhatee aur khaalee samay men pढ़kar din kaat letee thee raaton ko lut-pitakar thakee-haaree ekaant paate hee aman kee yaad men wyaakul hotee rahatee aur sochatee ki kaash! usake paas daayaree aur pen hotaa to usase dher see baaten-shikaayaten karatee apane zakhm aur dard saajhaa karatee

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har doosare-teesare din sethajee bhee dopahar men aa jaate the us din balaraam pahale hee use aagaah kar detaa thaa ki sethajee jab tak rahenge use kamare men band kar diyaa jaaegaa atah wo bhojan paanee kamare men rakh le haal men aur kaun aataa thaa athawaa kyaa charchaa hotee thee isakaa aabhaas tak use naheen hone diyaa jaataa thaa kyonki bel bajate hee hameshaa use kamare men lॉk kar diyaa jaataa thaa maanik kamaraa kholakar andar aataa aur aupachaarik chikanee chupadee baaten karate hue ek ghante tak nayanaa ko nichodataa rahataa phir use shaam tak kamare men band kar diyaa jaataa thaa haal men hone waalee gatiwidhiyon kee use bhanak bhee naheen lagatee thee aur sethajee ke jaane ke baad hee balaraam usakaa kamaraa kholataa thaa

wo sochatee aisaa shaayad usake bhaagane kee shankaa ke kaaran kiyaa jaataa hogaa lekin nayanaa is tarah kee moorkhataa to kabhee karane waalee naheen thee doodh se jalaa huaa chaach bhee phoonkakar peetaa hai, wo mukti ke aise maarg kee talaash men thee, jisapar kadam rakhane men jokhim bilkul n ho, yaanee saanp bhee mar jaae aur laathee bhee n toote

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kramashah

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अध्याय 13

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mahaanagar kaa jeewan bhee mahaasamar hee hotaa hai yaanee aapaadhaapee, bhaagadaud, ek doosare se aage nikalane kee hod men phanse log, gaanvon aur chote shaharon se palaayan karake base hue log, ek taraph saaf suthare, sajeele wishaal bhawan, attaalikaaen, oonche flait to doosaree taraph gandagee ke aagosh men palateen chotee-chotee teen-tappar waalee bastiyaanek taraph chappan bhog waale raajasee svaad to doosaree taraph rotee ko tarasate kuposhit petek taraph susajjit narm shaiyyaaen, nity nootan wastraabhooshan to doosaree taraph phutapaathee sej par sote adhanange chithadon men lipate lajjit shareer kaheen sugandhit taranataalon men tairate lacheele badan to kaheen jal-boond ko tarasate maile kuchaile tan aman apane wigat jeewan se jaan chukaa thaa ki yah antar kudaratee naheen balki mahaanagaron ke mahaamaanawon dvaaraa saadhit mantar kaa parinaam hee hotaa hai

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aman ke paas samay bitaane aur jaanakaariyaan jutaane kaa ekamaatr saathee mobaail hee thaa raat men mitron se baatacheet karake apanaa haalachaal bataakar unakaa poochaa phir der tak googal par sarch kar karake agale din ke kaaryakram kaa praaroop taiyaar karane men wyast ho gayaa sabase pahale usane dillee ke saare rajistard anaathaashramon ke sanpark nanbar aur pate not kiye phir 6 maheene puraanee taareekhon ke aadhaar par un aashramon se jude samaachaar talaash karake ek saath aaraam se pढ़ne aur manan karane ke lie sabakee link sahejataa gayaa is kaary men hee use kaaphee samay lag gayaa thaa aur neend usapar haawee hone lagee thee atah baakee kaaryon ko naee subah se wistaar dene kaa nirnay lekar bistar par pasarakar nidraa ke aagosh men chalaa gayaa

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subah 6 baje chidiyon ke chahakane kee aawaaz ke saath usakee neend tootee usane muskuraate hue mobaail kaa alaarm band kiyaa phir phurtee se uthakar nity karmon se phaarig hokar taiyaar ho gayaa

kamare se baahar nikalakar usane nikat hee gumatee par ban rahee ek kap chaay pee subah kee hawaa bahut suhaanee lag rahee thee, usakee dharmashaalaa saghan ilaake men thee atah wo sair ke lihaaj se aage nikalakar mukhy sadak par aa gayaa mahaanagar kee zindagee daudane lagee thee har tarah ke waahan apane-apane mukaam tak pahunchane kee kataar men the

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aman apanee chintaaon ko chitt se chipakaae dheere-dheere chahalakadamee karataa huaa bढ़ rahaa thaa achaanak saamane se use kuch saaikil sawaaron kaa kaaphilaa aataa huaa dikhaaee diyaa sabake saath aage-peeche akhabaaron kaa ek ek gatthar ladaa huaa thaa aman ne andaaz lagaayaa ki we sab akhabaar baantane waale honge wo bhee kisee aise hee chand ghanton ke kaam kee talaash men thaa, use yah kaam upayukt mahasoos huaa agar mil jaae to subah do chaar ghanton ke niwesh se usakaa pet bharane kaa jugaad ho sakataa hai wo usee dishaa men bढ़taa gayaa jis dishaa se saaikil sawaar aa rahe the

kuch der bढ़ne ke baad ek use ek chauk par akabaaron se ladaa huaa waahan dikhaaee diyaa aman nikat jaakar saaree prakriyaa dekhane lagaa waheen par neeche ek tirapaal bichaaee gaee thee kuch log akabaaron ke bandal utaar rahe the kuch adhikaaree bhee wahaan upasthit the akhabaar baantane waale bandal alag-alag kar rahe the phir apane-apane hisse ke paiket lekar nikalate jaa rahe the

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aman ne sochaa ki is kaam ke lie to saaikil honaa aawashyak hai agar kaam mil jaataa hai to wo kuch din paidal bhee kaary kar sakataa hai

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usane un hॉkaron se hee is kaam ke lie jaanakaaree jutaane ke wichaar se ek hॉkar ko apanaa parichay dekar poochaa ki usakaa naam kyaa hai, wo kahaan rahataa hai, kyaa use bhee yah kaam mil sakataa hai? us wyakti ne bataayaa ki usakaa naam ganesh hai unakaa ek sangh hai is kaam ke lie unake sangh ke pramukh se milanaa chaahie we sab nikat kee bastee men rahate hain is samay kuch sadasy kaam par jaa chuke hain aur kuch jaane kee jaldee men hain we log pratidin subah 4 baje yahaan pahunch jaate hain, phir aadhe ghante baad akabaaron kaa waahan aate hee kaam men jut jaate hain agar wo kal subah 4 baje wahaan aa jaae to sangh-pramukh use akhabaar ke adhikaariyon se kahakar use bhee kaam dilaa sakataa hai

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agale din aman ke alaarm kee chidiyon ne teen baje hee chahakakar use bhor hone kaa sanket de diyaa aman jaldee se nity karmon se phaarig hokar 4 baje se kuch pahale hee apane gantavy tak pahunch gayaa kuch hॉkar wahaan aa chuke the wo ganesh ke aane kaa intajaar karane lagaa kuch der baad use ganesh dikhaaee diyaa dheere-dheere sadasy bhee wahaan ekatrit hone lage usane ganesh ke paas jaakar muskuraakar haath milaayaa ganesh ne usakaa mantavy samajhakar use ek kase hue gatheele badan waale yuwak ke paas le jaakar khadaa kar diyaa aman ne namaskaar ke saath hee apanaa parichay dekar kaary dilaane kaa aagrah kiyaa

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dinesh naam ke us wyakti ne usakaa sankshipt parichay poochaa aman ke anaath hone kee baat jaanakar usane aman ko dilaasaa dekar apane sangh men shamil hone ke lie kahaa

aman ne sveekriiti dene ke saath hee unakee hee bastee men ek kamare kaa suwidhaajanak makaan kiraaye par lene kee ichchaa bhee jataaee

mehanatakash log eemaanadaar to hote hee hain, ek doosare ke dard men bhee saath khade hote hain

aman ne yah sab jiyaa aur mahasoos bhee kiyaa thaa dinesh use akhabaar ke adhikaariyon ke paas le gayaa

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aman ke wyaktitv, weshabhooshaa aur baatacheet ke lahaje se prabhaawit adhikaariyon dvaaraa yah poochane par ki pढ़aa likhaa aur 12 ween pratham shrenee men utteern karane ke baawajood usane yah rozagaar kyon chunaa, wo to aage pढ़aaee jaaree rakhakar behatareen kairiyar banaa sakataa hai to usane dillee men wishesh uddeshy se aane kee baat bataaee aur kahaa ki us kaary ke alaawaa use apanee pढ़aaee bhee jaaree rakhanee hee hai, atah abhee kewal gujaare laayak rakam kee hee darakaar hai adhikaariyon ne usase kahaa ki jab tak kisee nae ilaake se sanpark/prachaar karake kaary bढ़aayaa jaae, tab tak use dillee ke apane niwaas ke aasapaas ke chote-mote relawe steshan aur bas staind par akhabaar bechane kaa kaary karanaa hogaa aman ne apanee sahamati de dee

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aman ne googal par sarch karake jaanakaaree jutaaee phir aasapaas ke steshanon ke naam aur yaatree gaadiyon ke rukane kaa samay aadi not karake agale din se hee apanaa kaary aarambh kar diyaa nity subah chaar baje se usakee dinacharyaa aarambh ho jaatee thee is tarah sabake sahayog se use kaary to milaa hee, unakee bastee men ek theek-thaak ghar kee wyawasthaa bhee ho gaee aur wo dharmashaalaa chodakar un shramikon kee bastee men aa gayaa aman kee kahaanee se un sabako aman apanaa saa lagaa aur wo bhee sheeghr hee unamen ghul mil gayaa use apane kaaryasthal tak akhabaar ke sentar se do kilomeetar door jaanaa hee padataa thaa kuch din wo paidal hee aanaa-jaanaa karataa rahaa phir saaikil khareedane, seekhane se lekar akhabaar baantane tak pooraa kaary samajhane men bhee use un sabakaa sahayog milataa rahaa

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mohalle men aman akelaa thaa magar un sabake apane pariwaar the, apanee samasyaaen w praathamikataaen theen aman kee praathamikataa nayanaa kee talaash karanaa hee thee aur is kaary men wo kisee kaa hastakshep naheen chaahataa thaa atah kisee se apane uddeshy kaa jikr naheen kiyaa

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akhabaar bechate hue wo jab bhee phursat men hotaa samaachaar pढ़ne lagataa thaa duniyaa, desh, har shahar, har gaanv ke har galee mohalle ke samaachaar in akabaaron men hote the lekin usakee nigaahen dillee ke anaathaalayon ke samaachaar talaashatee rahatee theen jis akhabaar men is tarah kaa samaachaar hotaa usakee ek prati wo apane paas rakh letaa thaa aur ghar aakar kuch gaur se pढ़aa karataa thaa aksar samaachaar hriiday wideern karane waale hote the mobaail par bhee sahejee huee links par isee tarah ke samaachaar milate the magar nirmalaadewee anaathaalay ke baare men use alag-alag kee wards se sarch karane ke baawajood ab tak koee samaachaar naheen milaa thaa

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anaathon par tarah tarah ke atyaachaar, baalikaaon, kishoriyon, yuwatiyon ke sanchaalakon dvaaraa hee maan-mardan karane ke kisse pढ़-pढ़kar usakaa dil nayanaa kee salaamatee kee duaa maangane lagataa n jaane wo kis jahaan men kho gaee hai kab aur kaise use khoj paaungaayah sab soch-soch kar usakaa man niraashaa se bhar jaataa phir agale hee pal svayan ko dilaasaa bhee dene lagataa-

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“are, aman tum to in kuhaason kee kokh men hee apane jeewan ke bachapan aur kaishory kaa anamol hissaa jee chuke ho, ab to tumhaare jeewan men ujaalon kaa phailaa huaa aasamaan haiis tarah himmat haarakar kyaa tum nayanaa ke saath anyaay naheen kar rahe? wo kaheen n kaheen tumhaaraa intajaar kar rahee hogeeapanaa lakshy mat bhoolo!!” phir wo aage kee rooparekhaa taiyaar karane lagataa

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gujar-basar to hone hee lagee thee, wo adhik se adhik mehanat karake akabaaron se hone waalee kamaaee se hee kharch pooraa kar letaa thaa apane makaan ke kiraaye ke paise usane pढ़aaee aur aage aane waalee chunautiyon kaa saamanaa karane ke lie rakh chode the akhabaar ke adhikaariyon se bhee wo aksar charchaa karake is kshetr kee jaanakaariyaan jutaataa rahataa thaa wo aashchary-chakit hokar sochataa rahataa ki ek hee din men itane samaachaar kaise ekatr hokar chap jaate hain?

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ek din usane jijnaasaawash ek adhikaaree se charchaa karate hue yah sab jaananaa chaahaa adhikaaree usakee waakpatutaa aur hindee ke saath hee angrejee ke bhee achche jnaan se prabhaawit ho chuke the unhen aman men ek honahaar patrakaar banane kee sanbhaawanaa nazar aaee unhonne use ek din kaaryasthal par aakar saaree prakriyaa saamane dekhane kaa nimantran dekar ek kaard aage bढ़aa diyaa jisamen kaaryasthal kaa pataa aur sanpark nanbar not thaa

aman apanee munhamaangee muraad pooree hote dekh usee din apanaa kaary samaapt karake saaikil se hee 5 kilomeetar kaa safar karake wahaan pahunch gayaa wahaan usakaa parichay kaee warishth aur kanishth patrakaaron se huaa unakaa utsaah aur phurtee dekhate hee banatee thee

lagabhag do ghante wahaan rahakar aman saaree prakriyaaen dekhataa aur samajhataa rahaa charchaa se usane jaan liyaa ki patrakaaritaa lokatantr kaa hee aawashyak ang hai pratipal pariwartit honewaale jeewan aur jagat kaa darshan patrakaaritaa dvaaraa hee sanbhanv hai paristhitiyon kaa adhyayan, chintan-manan, lekhan, abhivyakti kaa hunar aur janasewaa kee bhaawanaa kaa honaa patrakaar ke lie ati aawashyak hai is kaary men bhee kairiyar banaane ke lie akhabaar, patrikaayen, rediyo, dooradarshan, web-patrakaaritaa aadi wikalp maujood hain

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kramashah

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अध्याय 14

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ek din kushal ne salaah dee ki kyon n aagaraa ke paryatan sthalon par jaakar bheekh maangee jaae, choonki aise sthaanon par aane waale adhikaansh log raees hote hain atah paisaa to achchaa milegaa hee, dekhane kaa awasar bhee mil jaaegaa usakee baat sunakar ratan bol padaa-

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“yaar kushal, tumane to mere man kee baat kah deemainne itihaas kee kitaab men taajamahal kaa chitr dekhakar sochaa thaa, yah chitr hee itanaa sundar hai to saamane dekhane par kaisaa hogaa? tab to yah sochaa bhee n thaa ki ek din kismat hamen is tarah yaheen le aaegee”

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“kyaa baat kahee mitr, ab to dekhe binaa chain naheen padane waalaa” bas ab aman bhaiyaa ke aadesh kaa intazaar hai” aman kee taraph dekhakar keerat ne bhee apanaa sur milaayaa wo aman ko bhaiyaa hee kahaa karataa thaa

taajamahal kaa jikr chidate hee aman ke nayan, nayanaa ko yaad karake anaayaas geele ho gae

saataween kakshaa men aagaraa kaa itihaas pढ़te hue taajamahal dekhane ke kitane sapane un donon ne milakar sanjoe the ab to wo bhee badee ho gaee hogeeuse zaroor yaad karatee hogee usane usase phir milane kaa waadaa jo kiyaa thaause to meree pareshaaniyon kaa andaaz bhee naheen hogaa n jaane ab kab usase milanaa hogaa ek thandee saans chodate hue wo jaise tandraa se jaagaa-

“haan haan, kisee se jaanakaaree lekar aaj hee us taraph chale chalate hain n” kahate hue aman ne apanee sahamati se mitron kee maang par muhar lagaa dee

phutapaath se utarakar we sadak par aa gae ek taraph aatorikshaa kataar men lage hue the ek aadamee ko waheen khadaa dekhakar aman ne poochaa-

“bhaaee saataajamahal yahaan se kitanee door hai”?

4-5 kilomeetar se adhik door naheen hogaa kahate hue ऑto rikshaa waale ne andar baithane kaa ishaaraa kiyaa magar tab tak we chaaron aage bढ़ chuke the

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kushal, keerat aur ratan utsaahapoorvak baaten karate hue chal rahe the, lekin aman ke nayanon men nayanaa is kadar basee huee thee ki wo jis taraph nazar ghumaataa, nayanaa hee nagar aatee raah chalate hue apanee hee parachaaee ko nayanaa samajhakar baaten karane lagataa mitragan use khoyaa huaa dekh kar samajhate yah ghar chin jaane ke kaaran hee itanaa udaas hai kaheen awasaadagrast n ho jaae, is baat kaa pooraa dhyaan rakhate aur baat-baat par kahakahe lagaate aur chutakule sunaane lagate the

chalate-chalate sahasaa aman ke man men wichaar aayaa ki taajamahal to yamunaa ke kinaare banaa huaa hai, to kyon n apanaa saphar yamunaa ke ghaat se shuroo kiyaa jaaeusane mitron se is baare men baat kee to ratan turant bol padaa-

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“baat to pate kee kahee hai yaaryamunaa ke ghaat par hee nahaa dhokar wastr bhee badal lenge kaheen aasapaas mandir hogaa to darshan ke saath hee bhikshaarjan se pet-poojaa bhee ho jaaegee isase suhaanaa safar aur kaunasaa hogaa”

unakaa aashram bhee yamunaa kinaare hee thaa, atah chaaron apane jaane pahachaane aashram kee or chal pade aashram ke najadeek ghaat par nadee kaa paanee svachch naheen thaa, atah wahaan se raah chalate logon se taajamahal kee dishaa kee jaanakaaree lekar kinaare-kinaare aage bढ़te gae kaaphee door jaakar apekshaakriit saaf jal aur chaudaa paat dekh waheen rukakar sabane nahaakar wastr badale lekin wahaan sunasaan hone se bhojan milanaa sanbhaw naheen thaa atah bhookhe pet hee unakaa kaaphilaa pooree raftaar se apane gantavy kee taraph chal padaa

awiraam chalate hue sirph ek ghante ke andar hee unhonne 5 kilomeetar kaa raastaa tay kar liyaa aur we ab taaj nagaree kee shaan, taajamahal ke saamane the

prawesh dvaar par sailaaniyon ko dekh-dekhakar unhonne bhee har prakriyaa se gujarate hue tokan lekar baaharee dvaar se andar prawesh kar liyaa

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nazaaraa itanaa nayanaabhiraam thaa ki we bhikshaa aur bhookh bhoolakar taaj kee chawi nihaarane men kho se gae wahaan paryatakon kaa kaasaa hujoom taajamahal dekhane aayaa huaa thaa aasapaas aur bhee smaarak the deshee-wideshee har tarah ke log the jo ghoom phir kar thak jaate the, unamen kuch baaharee parisar ke maarg ke donon taraph kataar men lagee huee benchon par baith jaate the athawaa najadeek hee paark men chale jaate the

aman ne mitron ko samajhaayaa- “bhaee ham peshewar bhikhaaree naheen hain, kuch soch samajhakar hee hamen yahaan bheekh maanganee hai wideshee paryatakon ke saamane bilkul naheen jaanaa hai hamen mazabooree yah kaary karawaa rahee hai, aisaa n ho ki unakee nazaron men hamaare desh kee daagee tasveer ankit ho jaae pulis ke jawaan bhee har taraph phaile hue hain, atah ham jahaan bheed kam ho waheen apanaa kaam karenge jahaan koee wistaar se bataane ko kahe tabhee pramaan patr dikhaanaa hai ab hamen alag ho jaanaa chaahie samay pooraa hone se aadhaa ghantaa pahale hamen paark men hee ek doosare kaa intazaar karanaa hai”

is tarah mashawiraa karane ke baad we alag-alag hokar apane kaam men jut gae

ghoomate-ghoomate aman ko baaharee parisar men ek bench par do yuwaa jode thakaan utaarate hue dikhaaee die donon mahilaaen dekhane men jitanee sundar theen utane hee donon purush bhee aakarshak wyaktitv aur gatheele badan ke the unakee baatacheet men bhee shaaleenataa kee jhalak dikhaaee de rahee thee aman himmat karake unake paas jaakar haath jodakar khadaa ho gayaa

“tum kaun ho bhaaee, tumhen kyaa pareshaanee hai”? ek yuwak ne pooch liyaa

aman ne pratyuttar men apanee kahaanee sunaakar sahaayataa ke lie haath phailaa diyaa

“lekin bhaaee, tum lagate to pढ़e likhe ho phir tum aise sthaan par is tarah”?

“jee saahab, mainne 12 ween pratham shrenee men paas kee hai sartiphiket bhee mere paas hai, magar paristhititon kaa maaraa hoon, ummeed kaa diyaa lekar manzil kee talaash men jutaa huaa huaa hoon”

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hummus wyakti ne nikat baithee huee apanee patnee kee or dekhate hue kahaa-

“maanaa, yah sachamuch museebat kaa maaraa huaa lag rahaa hai, mere paas to kaish naheen hai, tumheen isakee kuch sahaayataa karo”

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yuwatee ne pars kholakar tatolaa aur bolee-

“roshee, mere paas 500 kaa hee not hai, de doon”?

tabhee doosaraa wyakti bol padaa

“are bhaabheejee, isamen poochane kee kyaa baat hai, roshan seth kyaa manaa karenge”?

“ai mistar, beech men tokanaa buree baat hai”

phir muskuraate hue yuwatee ne aman kee taraph not bढ़aa diyaa aur doosaree yuwatee ko sanbodhit karake bolee-

“shikhaa diyar, tum bhee apanaa pars tatol lo, ye mard log hamaaraa batuaa dekhakar hee khaalee haath chalate hain”

shikhaa ne pati kee or dekhaa to pahale waale yuwak ne, jise patnee dvaaraa roshee sanbodhit kiyaa gayaa thaa, use tokaa-

“lo bhaee, ab aapako bhalaa wakeel saahab kee aajnaa chaahie?”

“naheen aisee baat naheen hai jeejoo, par mere pars men badaa not naheen hai, mujhase kaish jaldee kharch ho jaataa hai atah saurabh hee sab sanbhaalate hain”

usakaa ishaaraa samajhakar saurabh naam ke yuwak ne muskuraate hue shaahee andaaj men jeb se 500 kaa not aman kee or bढ़aakar poochaa-

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“aman bhaaee, tum rahate kahaan ho?”

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aman ne not lekar apane baig se bachapan kaa parichay-patr nikaalakar kathit wakeel saahab kee or bढ़aate hue apanee kahaanee kaa dukhad ansh kah sunaayaa

usakee kahaanee sunakar donon yuwatiyon kaa komal man karaah uthaa we apane patiyon kee or sakaaraatmak pratikriyaa kee ummeed se nihaarane lageen

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roshan naam ke yuwak ne usakee aapabeetee par duhkh pragat karate hue kahaa-

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“aman bhaaee, lagataa hai aaj kudarat ne tumhaaree sahaayataa karane ke lie hee shaayad hamase milawaayaa hai hamaare ye mitrawar ujjain ke prasiddh wakeel saurabh jhaangiyaanee jee hain inase tumhen uchit salaah bhee mupht mil jaaegee”

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saurabh ne parichay-patr par driishti gadaate hue kuch wichaar karane ke baad kahaa-

“aman bhaaee, tumhen seedhe jilaa-kort jaakar apane ghar par awaidh kabje ke wiruddh arjee dakhil kar denee chahiye sanvidhaan men gareeb, anaath athawaa praakriitik aapadaa-grast ko supreem kort tak mupht men kaanoonee sahaayataa dene kaa praawadhaan hai waise kaanoon ke nae niyamon ke anusaar agar laawaaris makaan par koee awaidh kabjaa kar le to 12 saal niwaas karane ke baad wo makaan kaanoonee taur par usakaa ho jaataa hai tumhaare kathanaanusaar tumhaare makaan par awaidh kabzaa hue 10 warsh ho chuke hain ab kewal do warsh hee baakee hain agar tum sheeghr hee apanee yaachikaa kort men daakhil kar doge to adaalat tumhen mupht sarakaaree wakeel upalabdh karawaa degee yaa phir tumhaare haq men turant phaisalaa bhee de sakatee hai ham log ujjain ke hain aur aagaraa ghoomane ke uddeshy se yahaan aae hain kal tak waapas bhee jaanaa hai agar yahaan kaa niwaasee hotaa to tumhen insaaph dilaane men koee kasar n chodataa”

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aman ne usakee salaah apane man ke sandook men turant sahej lee aur haath jodakar dhanyawaad kahakar un sahriiday jod़on ko man hee man saikad़on duaaen detaa huaa aage badh़ gayaaaman ke paas apane makaan kaa koee kaanoonee dastaawej naheen thaa sirph parichay patr hee ekamaatr saboot usake paas thaa bhikshaatan ke dauraan milee sabhee salaahen usake man ke sandook men silasilewaar sajee huee theen usane salaahon ke sandook ko ekaagr hokar tatolaa to sabhee un salaahachandron ke mukh se nikale nek shabd usake saath sanvaad karane lage jo usake wyaktitv aur baatacheet ke andaaz ko dekhakar awishvasaneey nazaron se nihaarane lagate the phir daan svaroop kuch motee rakam dekar apane saamaany jnaan kaa pradarshan karate hue ekaadh salaah saunpanaa n bhoolate the-

“are bete, is tarah kyon bhatak rahe ho, haal hee men uttaraakhand kaibinet ne raajakeey anaath aashramon men pale bढ़e bachchon ko sarakaaree naukaree men paanch pratishat aarakshan dene par muhar lagaa dee hai tumhen kewal sansthaa kee or se diyaa gayaa pramaanapatr hee prastut karanaa hogaa”

“adaalat anaathon ke lie sarakaaree wakeel mupht upalabdh karawaatee hai, tumhen seedhe kort jaakar apanaa adhikaar praapt karane ke lie arjee denee chaahie yahee naheen anaathon ko binaa kes ke sheeghr nirnay kee suwidhaa bhee dee jaatee hai”

aman ko yah saaree jaanakaaree use ujjain ke wakeel saurabh jhaangiyaanee se bhee mil chukee thee, magar usakee mukhy samasyaa yaanee bhookh mitaane aur haath men kuch rakam jutaane kee thee jisake lie we bhikshuk banakar bhatak rahe the, wo ab kaaphee had tak sulajh chukee thee yaanee ab itanee rakam unake paas ekatr ho chukee thee ki we aage kee gatiwidhi ke lie sakriy ho jaaen aman jaan gayaa thaa yah unake sudarshan wyaktitv, maangane kaa winamr lahajaa aur pढ़e-likhe hone ke kaaran hee sanbhaw huaa thaa, atah aage bhee koee baadhaa naheen aaegee yah sunishchit karane ke baad aman ne sabase pahale sabake lie smaart mobaail khareed liyaa phir ratan aur keerat ko bhikshaarjan karate rahane kee hidaayat dekar svayan kushal ke saath agale kadam kee rooparekhaa banaane men jut gayaa

isake baawajood chaaron kaa phon par sanpark banaae rakhakar dopahar aur raatri men ek sthaan par milanaa poorvawat thaa

ab aman ne ujjain ke wakeel saurabh jhaangiyaanee se milee huee salaah ke mutaabik- “jin paatr wyaktiyon ko nihshulk kaanoonee sewaaon kee aawashyakataa hai, we likhit roop men ek aawedan prastut karake sambandhit praadhikaran yaa samiti se sanpark kar nihshulk kaanoonee sahaayataa praapt kar sakate hain” wichaar karake “distrikt leegal sarvis athॉritee” se sanpark kiyaa aur apanee pooree samasyaa wistaar se bataaee choonki wo anaath aur baaढ़ peedit hone ke saath hee dhokhe kaa shikaar huaa thaa atah pratikriyaa svaroop wahaan se aashvast karake kaanoonee sahaayataa praapt karane ke kaaran ko athaaritee ke adhikaariyon dvaaraa taiyaar kiye gae prapatron ko bharakar likhit roop se aawedan prastut karane kaa anurodh kiye jaane par usane likhit aawedan prastut kar diyaa

usake aawedan par “widhik sewaa sansthaan” dvaaraa uchit aawashyak kaaryawaahee shuroo karane kaa aashvaasan dekar usake kes kee jaanakaaree sambandhit paksh ko bhej dee gaee aage kee kaaryawaahee men adaalat dvaaraa paraamarsh aur usake kes kaa pratinidhitv karane ke lie aman ko ek wakeel pradaan kiyaa gayaa

sarakaaree wakeel ne jaanch ke dauraan baaढ़ durghatanaa kee band ho chukee phaail phir se khulawaaee to pataa chalaa ki aman ke maataa pitaa kee us durghatanaa men mriityu ke baad usako anaathaalay bhejane ke saath hee usakaa makaan ek svayansewee sansthaa ko saunp diyaa gayaa thaa ek nishchit awadhi tak aman ke kisee parichit athawaa rishtedaar kaa intazaar karane ke baad koee daawedaar n milane par sansthaa ke sadasyon kee baithak men us makaan se hone waalee aamadanee aman kee shikshaa aur any aawashyakataaon par kharch hone ke baad baakee rakam usakaa baink men khaataa banawaakar jamaa karate rahane kaa nirnay liyaa gayaa thaa

lekin is nirnay ke baad kuch hee dinon ke andar achaanak sansthaa ke pramukh 60 warsheey umaaprasaad kee achaanak mriityu ho jaane se maamalaa thande baste men chalaa gayaa thaa aur nae adhyaksh ke kaaryabhaar sanbhaalane ke baad is taraph kisee ne dhyaan n diyaa laawaaris makaan par n jaane kitane lobhee ghaat lagaae baithe the awasar milate hee pados ke hee pariwaar ke bade bete ne usapar apanaa kabjaa kar liyaa thaa

aman in kaanoonee ulajhanon se parichit hee naheen thaa wakeel ke pratinidhitv men lagaataar 6 maheene tak kort ke chakkar lagaate lagaate usakaa dimaag chakkaradhinee ban gayaa thaa kushal hameshaa saath rahakar usakaa utsaah wardhan karataa rahataa thaa usake wakeel kaa yah pahalaa kes thaa atah usane tatparataa dikhaate hue kes ko atisheeghr parinaam tak pahunchaane men koee kasar naheen chodee aur apanee buddhimataa se use binaa pareshaanee die saare saboot ekatr karake nyaayaalay ke samaksh prastut kar die kuch samay waad-wiwaad chalataa rahaa aakhir is kes par tvarit nyaay prakriyaa ke antargat aman ke wakeel kee jeet kee mohar lag gaee aur aman ko apane makaan kaa kabzaa waapas mil gayaa

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kramashah

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अध्याय 15

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aman ko ghar waapas milanaa ek bahut badee jang jeetane ke samaan thaa chaaron mitr bhikshaatan chodakar wyawasthaaon ke jod tod men jut gae aman ne dekhaa ki poore ghar kee deewaaren aur phiks kiyaa huaa pharneechar surakshit thaa baakee sab saamaan kahaan gayaa isakaa koee pataa naheen lagaa aman ne bhee us taraph sochanaa wyarth jaanakar aage bढ़naa uchit samajhaa

tvarit nirnay lekar usane makaan kaa ooparee khand ek maheene ke agrim kiraae par ek pariwaar ko de diyaa us rakam se neeche ke khand ke do kamaron ke lie palang aur alamaariyon kee wyawasthaa kar lee haal men 8 ween tak ke bachchon ko tyooshan dene baabat baaharee dvaar par notis lagaa diyaa bhojan ke lie tiphin kee wyawasthaa kar lee gaee

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ghar kee samasyaa hal hote hee aman ke manomastishk ke tahakhaane se nikalakar nayanaa chir parichit muskaan ke saath usake saamane upasthit ho gaee aman apanee palaken band karake usakee chawi nihaarakar nihaal hotaa rahaa raat hote hee man hee man yojanaa banaataa huaa svayan se hee batiyaane lagaa

“mujhe sheeghr hee usase milane jaanaa hogaa kaash, ninnee ke paas bhee ek smaart mobaail hotaa to is samay ham aamane saamane baat kar rahe hote, ab is dil kaa kyaa karoon jo isee kshan usakee aawaaz sunanaa chaahataa hai kyon n main aashram kee sanchaalikaa shailajaa ko phon karake ek baar nayanaa se baat karawaane kaa aagrah karoon, wo use jaanatee pahachaanatee hain to inakaar naheen karengee”

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aman ne turant apanee soch ko wishraam dekar sarch karake ऑn laain daayarektaree se aashram kaa nanbar khoj nikaalaa aur kaal kar diyaa

wahaan se shailajaa ne hee kaal atend kiyaa aur poochaa-

“aap kaun hain, kisase baat karanaa chaahate hain?”

“main aman hoon aanteejee, aathaween kakshaa tak aapake aashram men palane-bढ़ne waalaa aman! aapake aasheervaad se mainne aagaraa men 12 ween tak shikshaa poorn karake apanaa ghar bhee haasil kar liyaa hai”

“bahut achchaa bete, meree shubhakaamanaaen tumhaare saath hain, itane samay baad mujhe kaise yaad kiyaa”?

“main aapake aashram kee apanee bachapan kee sahapaathee nayanaa se baat karanaa chaahataa hoon, aap zaraa usase baat karawaa deejiye pleez!”

“nayanaa! oh aman, mujhe khed hai ki wo ab is aashram men naheen hai”

“phir wo kahaan hai aanteejee, meree usase wahaan punah aane aur tab tak waheen meraa intajaar karane kee baat huee thee kriipayaa bataaie meraa man bechain ho rahaa hai” shailajaa ke is apratyaashit uttar se wyathit hokar aman ne poochaa

“mujhe bade dukh ke saath kahanaa pad rahaa hai aman ki wo 6 maheene pahale 12 ween kaa pareekshaa parinaam jnaat karane skool ke lie nikalee thee, phir waapas aashram naheen pahunchee hamane bahut khojabeen kee magar ab tak usakaa pataa naheen chalaa hamane pulis men bhee riport kar dee thee”

lekin aisaa kaise huaa aanteejee, kyaa wo akelee hee aashram se nikalee thee? usakee saheliyaan daalee aur lataa to hameshaa usake saath hee rahatee theen, we usake saath kyon naheen gaee theen? aanteejee kyaa main unase baat kar sakataa hoon”?

“nayanaa ke laapataa hone ke chaar maah baad usakee donon saheliyaan ek raat aashram se bhaag nikaleen phir unakaa bhee koee pataa naheen chalaa”

pooree baat sunakar aman sakate men aa gayaa usakaa to dil hee baithane lagaa kyaa kahe samajh hee paa rahaa thaa aankhon se aansoo jharane lage aur kaanpate hue haathon se mobaail chootakar neeche gir gayaa use apanee dhadakanen thamatee see prateet hone lageen

lag rahaa thaa thaa, usake kashton kaa kaarawaan itanee aasaanee se usakaa peechaa chodane waalaa naheen hai

usane pooree raat karawaton men guzar dee n jaane usakee ninnee kis museebat men phansee hogee aakhir wo gaee kahaan usakee khoj kyon naheen kee gaee phir svayan se batiyaane lagaa-

“main bhee kitanaa naadaan hoon, aawashyak naheen ki nayanaa jitanee mere lie mahatvapoorn hai, aashram ke lie bhee ho aakhir thee to anaath hee n?magar main use awashy khoj nikaaloongaa hogee to isee jahaan men, dharatee yaa aasamaan to use nigal naheen gayaa hogaa! n jaane kahaan kis haal men hogee, mujhe bahut yaad karatee hogeewidhaataa n jaane kyon saare duhkh-dard, sangharsh aur pareshaaniyaan, gareeb aur asahaay insaanon ke kote men aarakshit karake rakh detaa hai, jo samay-samay par apane hone kaa ahasaas karawaane ke lie saamane chale aate hain”

soch-sochakar aman kaa sir phataa jaa rahaa thaa, usakee saaree khushee kaaphoor ho chukee thee

mitragan apane-apane bistar par nidraamagn the magar aman kaa man subah hone ke intazaar men chatapataa rahaa thaa raat bhar wo aage kee yojanaa banaane men ulajhaa rahaa

jaise hee bhor huee, usane besabr hokar mitron ko uthaa diyaa aur shailajaa ke saath huee baatacheet unhen sunaakar bolaa-

“bhaaiyo, mujhe sheeghr hee dillee jaanaa hogaa”

we sab aman ke nayanaa ke saath lagaaw se to waakiph the magar unake sanbandh kee gaharaaee se we parichit naheen the usakee baat sunakar kushal bol padaa

“aman bhaiyaa, main bhee aapake saath chaloongaa, akele jaanaa theek naheen hogaa”

kushal bolaa-

“naheen mitr, mujhe to makaan milane ke saath hee sampati kaa maalik hone ke kaaran anaathon ke lie sarakaaree naukariyon men aarakshan suwidhaa milegee naheen, magar tum teenon ko abhee naukaree kaa mukaam haasil karanaa hee hai tum yahaan koching kaa kaary jaaree rakhate hue naukaree ke lie bhee aawedan kaa phॉrm bhar denaa makaan kee dekharekh bhee tum logon ko hee karanee hai kiraae kaa paisaa mere akaaunt men aataa rahegaa mujhe dillee men n jaane kitane samay tak rahanaa pade, isakaa koee bharosaa naheen jab tak nayanaa kaa pataa naheen lag jaataa, main waapas naheen aaoongaa mere saath meraa pukhtaa parichay hai, koee bhee chotee motee naukaree milane men dikkat naheen aaegee rahane ke lie bhee kuch n kuch wyawasthaa ho hee jaaegee tum teenon ko jab tak naukaree naheen mil jaatee, gujar basar ke lie yaheen rahanaa hai mobaail par sampark banaa rahegaa”

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mitron ko saaree baaten samajhaakar aman ek baig men aawashyak saamaan ke saath kuch kaish rakhakar bas staind par pahunch gayaa wo suwidhaa ke wichaar se jaanaa to tren se chaahataa thaa magar aarakshan ke lie kuch din intajaar karanaa pad sakataa thaa aur usake lie har pal keematee thaa usake bas men hotaa to wo turant dillee pahunch jaataa aur nayanaa kee khoj men jut jaataa, magarparisthitiyaan insaan ko itanaa bebas banaa detee hain ki wo chaah kee raah se kaante chunate-chunate tan-man zakmee kar baithataa hai

aagaraa se dillee basen jaatee hee rahatee theen, aman ne poochataach karake sabase pahale prasthaan karane waalee bas kaa tikat khareedaa aur apanee seet par jaakar baith gayaa

dillee pahunchakar aman ne chaaron taraph sarasaree nazar daudaaee is shahar se wo anajaan hee thaa apane jeewan kaa jo hissaa usane yahaan gujaaraa thaa, wo pinjare men kaid panchee ke samaan hee thaa jo daane-paanee ke lie maalikon kee meharabaanee kaa mohataaj hotaa hai yah baat alag thee ki usee pinjare men use kuch premil-pal bhee naseeb hue the jo ab usake jeewan men kab punah prawesh karenge isakaa koee pataa n hote hue bhee usake jeene kaa sahaaraa the un palon kee naayikaa nayanaa kee talaash hee ab jeene kaa ekamaatr uddeshy thaa nayanaa ke wichaar maatr se use anaathaalay men usake saath bitaae dinon ko yaad karake adharon par meethee see muskaan aa gaee magar agale hee kshan usake gumashudaa hone ke gam ne muskaan ko maayoosee men badal diyaa

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bas staind par har tarah ke log bikhare hue the chote bade sabhee bhaagadaud men lage hue the paanee kee botalen bechane waale, pheree karake chane moongaphalee samose aadi bechane waale is tarah gatimaan the ki dekhakar lagataa thaa jaise zindagee ne pankh pahan lie hon isake alaawaa ek taraph khaane peene ke saamaan ke tarah-tarah ke staal lage hue the doosaree taraph sajee dhajee dukaanen aur chotee badee gumatiyaan bhee theen sabase pahale aman ne ek gumatee ke saamane bench par baithakar chaay-samose kaa aardar diyaa phir bhugataan karate hue gumatee ke maalik se poochakar aasapaas kee kisee theek-thaak dharmashaalaa kaa pataa not kiyaa, jahaan wo dhang kaa kamaraa milane tak rah sake phir ek ऑto rikshaa se wahaan pahunchakar dharmashaalaa ke maalik se ek kamare ke lie niwedan kiyaa maalik ne usakee pooree jaanakaaree ataa-pataa mobaaeel nanbar aadi rajistar men darj karake agrim bhugataan lekar ek kamaraa khulawaakar usakee chaabee use saunp dee shaam ho chukee thee subah se nikalaa aman nahaa-dhokar bhojan karane ke saath hee shahar se parichit hone ke lie nikal padaa

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kramashah

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अध्याय 16

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mahaanagar kaa jeewan bhee mahaasamar hee hotaa hai yaanee aapaadhaapee, bhaagadaud, ek doosare se aage nikalane kee hod men phanse log, gaanvon aur chote shaharon se palaayan karake base hue log, ek taraph saaf suthare, sajeele wishaal bhawan, attaalikaaen, oonche flait to doosaree taraph gandagee ke aagosh men palateen chotee-chotee teen-tappar waalee bastiyaanek taraph chappan bhog waale raajasee svaad to doosaree taraph rotee ko tarasate kuposhit petek taraph susajjit narm shaiyyaaen, nity nootan wastraabhooshan to doosaree taraph phutapaathee sej par sote adhanange chithadon men lipate lajjit shareer kaheen sugandhit taranataalon men tairate lacheele badan to kaheen jal-boond ko tarasate maile kuchaile tan aman apane wigat jeewan se jaan chukaa thaa ki yah antar kudaratee naheen balki mahaanagaron ke mahaamaanawon dvaaraa saadhit mantar kaa parinaam hee hotaa hai

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aman ke paas samay bitaane aur jaanakaariyaan jutaane kaa ekamaatr saathee mobaail hee thaa raat men mitron se baatacheet karake apanaa haalachaal bataakar unakaa poochaa phir der tak googal par sarch kar karake agale din ke kaaryakram kaa praaroop taiyaar karane men wyast ho gayaa sabase pahale usane dillee ke saare rajistard anaathaashramon ke sanpark nanbar aur pate not kiye phir 6 maheene puraanee taareekhon ke aadhaar par un aashramon se jude samaachaar talaash karake ek saath aaraam se pढ़ne aur manan karane ke lie sabakee link sahejataa gayaa is kaary men hee use kaaphee samay lag gayaa thaa aur neend usapar haawee hone lagee thee atah baakee kaaryon ko naee subah se wistaar dene kaa nirnay lekar bistar par pasarakar nidraa ke aagosh men chalaa gayaa

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subah 6 baje chidiyon ke chahakane kee aawaaz ke saath usakee neend tootee usane muskuraate hue mobaail kaa alaarm band kiyaa phir phurtee se uthakar nity karmon se phaarig hokar taiyaar ho gayaa

kamare se baahar nikalakar usane nikat hee gumatee par ban rahee ek kap chaay pee subah kee hawaa bahut suhaanee lag rahee thee, usakee dharmashaalaa saghan ilaake men thee atah wo sair ke lihaaj se aage nikalakar mukhy sadak par aa gayaa mahaanagar kee zindagee daudane lagee thee har tarah ke waahan apane-apane mukaam tak pahunchane kee kataar men the

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aman apanee chintaaon ko chitt se chipakaae dheere-dheere chahalakadamee karataa huaa bढ़ rahaa thaa achaanak saamane se use kuch saaikil sawaaron kaa kaaphilaa aataa huaa dikhaaee diyaa sabake saath aage-peeche akhabaaron kaa ek ek gatthar ladaa huaa thaa aman ne andaaz lagaayaa ki we sab akhabaar baantane waale honge wo bhee kisee aise hee chand ghanton ke kaam kee talaash men thaa, use yah kaam upayukt mahasoos huaa agar mil jaae to subah do chaar ghanton ke niwesh se usakaa pet bharane kaa jugaad ho sakataa hai wo usee dishaa men bढ़taa gayaa jis dishaa se saaikil sawaar aa rahe the

kuch der bढ़ne ke baad ek use ek chauk par akabaaron se ladaa huaa waahan dikhaaee diyaa aman nikat jaakar saaree prakriyaa dekhane lagaa waheen par neeche ek tirapaal bichaaee gaee thee kuch log akabaaron ke bandal utaar rahe the kuch adhikaaree bhee wahaan upasthit the akhabaar baantane waale bandal alag-alag kar rahe the phir apane-apane hisse ke paiket lekar nikalate jaa rahe the

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aman ne sochaa ki is kaam ke lie to saaikil honaa aawashyak hai agar kaam mil jaataa hai to wo kuch din paidal bhee kaary kar sakataa hai

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usane un hॉkaron se hee is kaam ke lie jaanakaaree jutaane ke wichaar se ek hॉkar ko apanaa parichay dekar poochaa ki usakaa naam kyaa hai, wo kahaan rahataa hai, kyaa use bhee yah kaam mil sakataa hai? us wyakti ne bataayaa ki usakaa naam ganesh hai unakaa ek sangh hai is kaam ke lie unake sangh ke pramukh se milanaa chaahie we sab nikat kee bastee men rahate hain is samay kuch sadasy kaam par jaa chuke hain aur kuch jaane kee jaldee men hain we log pratidin subah 4 baje yahaan pahunch jaate hain, phir aadhe ghante baad akabaaron kaa waahan aate hee kaam men jut jaate hain agar wo kal subah 4 baje wahaan aa jaae to sangh-pramukh use akhabaar ke adhikaariyon se kahakar use bhee kaam dilaa sakataa hai

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agale din aman ke alaarm kee chidiyon ne teen baje hee chahakakar use bhor hone kaa sanket de diyaa aman jaldee se nity karmon se phaarig hokar 4 baje se kuch pahale hee apane gantavy tak pahunch gayaa kuch hॉkar wahaan aa chuke the wo ganesh ke aane kaa intajaar karane lagaa kuch der baad use ganesh dikhaaee diyaa dheere-dheere sadasy bhee wahaan ekatrit hone lage usane ganesh ke paas jaakar muskuraakar haath milaayaa ganesh ne usakaa mantavy samajhakar use ek kase hue gatheele badan waale yuwak ke paas le jaakar khadaa kar diyaa aman ne namaskaar ke saath hee apanaa parichay dekar kaary dilaane kaa aagrah kiyaa

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dinesh naam ke us wyakti ne usakaa sankshipt parichay poochaa aman ke anaath hone kee baat jaanakar usane aman ko dilaasaa dekar apane sangh men shamil hone ke lie kahaa

aman ne sveekriiti dene ke saath hee unakee hee bastee men ek kamare kaa suwidhaajanak makaan kiraaye par lene kee ichchaa bhee jataaee

mehanatakash log eemaanadaar to hote hee hain, ek doosare ke dard men bhee saath khade hote hain

aman ne yah sab jiyaa aur mahasoos bhee kiyaa thaa dinesh use akhabaar ke adhikaariyon ke paas le gayaa

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aman ke wyaktitv, weshabhooshaa aur baatacheet ke lahaje se prabhaawit adhikaariyon dvaaraa yah poochane par ki pढ़aa likhaa aur 12 ween pratham shrenee men utteern karane ke baawajood usane yah rozagaar kyon chunaa, wo to aage pढ़aaee jaaree rakhakar behatareen kairiyar banaa sakataa hai to usane dillee men wishesh uddeshy se aane kee baat bataaee aur kahaa ki us kaary ke alaawaa use apanee pढ़aaee bhee jaaree rakhanee hee hai, atah abhee kewal gujaare laayak rakam kee hee darakaar hai adhikaariyon ne usase kahaa ki jab tak kisee nae ilaake se sanpark/prachaar karake kaary bढ़aayaa jaae, tab tak use dillee ke apane niwaas ke aasapaas ke chote-mote relawe steshan aur bas staind par akhabaar bechane kaa kaary karanaa hogaa aman ne apanee sahamati de dee

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aman ne googal par sarch karake jaanakaaree jutaaee phir aasapaas ke steshanon ke naam aur yaatree gaadiyon ke rukane kaa samay aadi not karake agale din se hee apanaa kaary aarambh kar diyaa nity subah chaar baje se usakee dinacharyaa aarambh ho jaatee thee is tarah sabake sahayog se use kaary to milaa hee, unakee bastee men ek theek-thaak ghar kee wyawasthaa bhee ho gaee aur wo dharmashaalaa chodakar un shramikon kee bastee men aa gayaa aman kee kahaanee se un sabako aman apanaa saa lagaa aur wo bhee sheeghr hee unamen ghul mil gayaa use apane kaaryasthal tak akhabaar ke sentar se do kilomeetar door jaanaa hee padataa thaa kuch din wo paidal hee aanaa-jaanaa karataa rahaa phir saaikil khareedane, seekhane se lekar akhabaar baantane tak pooraa kaary samajhane men bhee use un sabakaa sahayog milataa rahaa

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mohalle men aman akelaa thaa magar un sabake apane pariwaar the, apanee samasyaaen w praathamikataaen theen aman kee praathamikataa nayanaa kee talaash karanaa hee thee aur is kaary men wo kisee kaa hastakshep naheen chaahataa thaa atah kisee se apane uddeshy kaa jikr naheen kiyaa

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akhabaar bechate hue wo jab bhee phursat men hotaa samaachaar pढ़ne lagataa thaa duniyaa, desh, har shahar, har gaanv ke har galee mohalle ke samaachaar in akabaaron men hote the lekin usakee nigaahen dillee ke anaathaalayon ke samaachaar talaashatee rahatee theen jis akhabaar men is tarah kaa samaachaar hotaa usakee ek prati wo apane paas rakh letaa thaa aur ghar aakar kuch gaur se pढ़aa karataa thaa aksar samaachaar hriiday wideern karane waale hote the mobaail par bhee sahejee huee links par isee tarah ke samaachaar milate the magar nirmalaadewee anaathaalay ke baare men use alag-alag kee wards se sarch karane ke baawajood ab tak koee samaachaar naheen milaa thaa

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anaathon par tarah tarah ke atyaachaar, baalikaaon, kishoriyon, yuwatiyon ke sanchaalakon dvaaraa hee maan-mardan karane ke kisse pढ़-pढ़kar usakaa dil nayanaa kee salaamatee kee duaa maangane lagataa n jaane wo kis jahaan men kho gaee hai kab aur kaise use khoj paaungaayah sab soch-soch kar usakaa man niraashaa se bhar jaataa phir agale hee pal svayan ko dilaasaa bhee dene lagataa-

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“are, aman tum to in kuhaason kee kokh men hee apane jeewan ke bachapan aur kaishory kaa anamol hissaa jee chuke ho, ab to tumhaare jeewan men ujaalon kaa phailaa huaa aasamaan haiis tarah himmat haarakar kyaa tum nayanaa ke saath anyaay naheen kar rahe? wo kaheen n kaheen tumhaaraa intajaar kar rahee hogeeapanaa lakshy mat bhoolo!!” phir wo aage kee rooparekhaa taiyaar karane lagataa

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gujar-basar to hone hee lagee thee, wo adhik se adhik mehanat karake akabaaron se hone waalee kamaaee se hee kharch pooraa kar letaa thaa apane makaan ke kiraaye ke paise usane pढ़aaee aur aage aane waalee chunautiyon kaa saamanaa karane ke lie rakh chode the akhabaar ke adhikaariyon se bhee wo aksar charchaa karake is kshetr kee jaanakaariyaan jutaataa rahataa thaa wo aashchary-chakit hokar sochataa rahataa ki ek hee din men itane samaachaar kaise ekatr hokar chap jaate hain?

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ek din usane jijnaasaawash ek adhikaaree se charchaa karate hue yah sab jaananaa chaahaa adhikaaree usakee waakpatutaa aur hindee ke saath hee angrejee ke bhee achche jnaan se prabhaawit ho chuke the unhen aman men ek honahaar patrakaar banane kee sanbhaawanaa nazar aaee unhonne use ek din kaaryasthal par aakar saaree prakriyaa saamane dekhane kaa nimantran dekar ek kaard aage bढ़aa diyaa jisamen kaaryasthal kaa pataa aur sanpark nanbar not thaa

aman apanee munhamaangee muraad pooree hote dekh usee din apanaa kaary samaapt karake saaikil se hee 5 kilomeetar kaa safar karake wahaan pahunch gayaa wahaan usakaa parichay kaee warishth aur kanishth patrakaaron se huaa unakaa utsaah aur phurtee dekhate hee banatee thee

lagabhag do ghante wahaan rahakar aman saaree prakriyaaen dekhataa aur samajhataa rahaa charchaa se usane jaan liyaa ki patrakaaritaa lokatantr kaa hee aawashyak ang hai pratipal pariwartit honewaale jeewan aur jagat kaa darshan patrakaaritaa dvaaraa hee sanbhanv hai paristhitiyon kaa adhyayan, chintan-manan, lekhan, abhivyakti kaa hunar aur janasewaa kee bhaawanaa kaa honaa patrakaar ke lie ati aawashyak hai is kaary men bhee kairiyar banaane ke lie akhabaar, patrikaayen, rediyo, dooradarshan, web-patrakaaritaa aadi wikalp maujood hain

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kramashah

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अध्याय 17

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anaathaalay kee sawaalee zindagee jeete jeete aman ke seene men n jaane kitane sawaal daphan hote gae the unake jawaab khojane ke lie use patrakaaritaa kaa peshaa hee behatareen, sahaj aur ruchikar prateet huaa usane tay kar liyaa ki nayanaa kee talaash ke saath hee use is dishaa men bhee kadam bढ़aanaa chaahie isake lie usane apanee seemit aay ke baare men akhabaar ke adhikaariyon ko bataakar sahayog aur maargadarshan ke lie anurodh kiyaa adhikaariyon ne use 12 ween ke baad kiye jaa sakane waale kuch aise korson ke baare men bataayaa jo akhabaar baantane kaa kaary jaaree rakhate hue wo apane ghar par adhyayan-rat rahakar bhee kar sakataa hai isake saath hee use dillee kee naee sosaayatee kee bahumanjilaa imaaraton men akhabaar baantane kaa kaary saunp diyaa taaki ek nishchit awadhi men usakaa kaary pooraa ho jaayaa kare

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jaanakaaree hasil hote hee aman ne apane adhyayan ke lie kanpyootar sahit aawashyak saamagree ekatr karake un adhikaariyon ke maargadarshan men phॉrm bharakar apanaa adhyayan aarambh kar diyaa usane subah 10 baje tak akhabaar baantanaa, phir bhojan, aaraam ke baad dopahar se shaam dhalane tak kaa samay nayanaa kee talaash ke lie aur raat men adhyayan ke lie tay kar liyaa

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udhar aagaraa se kushal kaa phon aayaa ki un teenon ko naukaree ke lie aawedan patron par aarakshit kote men intaravyoo ke baad sarakaaree naukaree mil gaee hai, aur we kam kiraaye waale sarakaaree aawaas men rahane kee wyawasthaa kar sakate hain, atah aman ko yahaan aakar makaan ke nichale khand ko bhee kiraaye par chढ़aa denaa chaahie lekin aman ne silasilewaar kushal ke saath apane kriyaakalaap kee jaanakaaree saajhaa karate hue kahaa ki usane patrakaaritaa kaa diplomaa kors karane ke lie phॉrm bhar diyaa hai is awadhi men wo nayanaa kee talaash aur pढ़aaee ek saath jaaree rakhegaa agar aawashyakataa huee to use lon bhee mil jaaegaa lekin jab tak usakaa uddeshy pooraa naheen ho jaataa, unako abhee waheen rahakar naukaree karate rahanaa chaahie taaki makaan kee dekharekh hotee rahe

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ab aman pratidin bhookh-pyaas bhoolakar athak bhatakataa rahataa 6 maheene tak usane ek-ek karake dillee ke lagabhag saare adhikriit, anadhikriit anaathaalay, naaree niketan khangaal lie lekin use nayanaa kaa kisee tarah kaa koee suraag naheen milaa ab n chaahate hue bhee ek baaragee usake jehan men weshyaalayon ke khataranaak driishy driishtigochar hone lage wo apanee niraparaadh maasoom nayanaa ke saath niyati ke is kadar kroor anyaay kee kalpanaa tak naheen kar sakataa thaa lekin man ko kathor banaakar talaash jaaree rakhanee hee thee, kyonki ab talaash kaa antim charan isee praweshadvaar se gujarakar hee poorn ho sakataa thaa, atah wo apanaa rooteen badalakar der raat ko dillee ke red laait eriyaa sahit isee tarah ke badanaam baajaaron kaa raastaa tay karane lagaa

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in sthalon par usake saath ek samasyaa yah bhee thee ki itane saal ke baad nayanaa ko pahachaanegaa kaise? anaathaalay athawaa naaree niketan to sabakaa pooraa byauraa rakhate hain lekin yahaan wo sab sahee jaanakaaree to milegee naheen, atah usane jaanch kaa nayaa tareekaa eejaad kar liyaa, jisake anusaar agar nayanaa kaheen hogee bhee to apanaa naam sunakar use ekadam pahachaan legee wo kisee bhee adde par jaakar sanchaalikaa ko munhamaangee rakam chukaa detaa phir andar jaate hee mekaap se lipee-putee kaamuk haawabhaaw pradarshit karatee huee yuwatee ke saamane haath jodakar ghutanon ke bal baithakar kahataa-

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“he dewi, main is maarg kaa anugaamee naheen hoon apanee priyatamaa kee talaash men bhatak rahaa hoon kyaa tum meree nayanaa ko jaanatee ho?”

jab saamane se aashchary mishrit nazaren use ghoorane lagateen to chupachaap sar jhukaae kshamaa maangakar wahaan se nikal jaataa isee tarah deewaanon kee tarah bhatakate hue use 6 maheene beet gae

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ab usakaa man in sthalon par niyamit aane kaa man naheen hotaa thaa wahaan majabooree aur shoshan kee shikaar auraton par hote hue atyaachaar ke ahasaas maatr se hee usakaa kalejaa kaanpane lagataa thaa aur usakaa man phir apane adhyayan par ekaagr naheen ho paataa thaa atah ab saptaah men ek hee din aane kaa tay karake usane apane adhyayan par dhyaan denaa shuroo kiyaa is tarah lagabhag 6 maheene aur beet gae ek din us badanaam baajaar kee ek kotharee men ek yuwatee se yahee sawaal doharaayaa to saamane waalee yuwatee ne betaabee se use jhinjhodakar pooch liyaa-

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“kaun nayanaa, kis nayanaa kee baat kar rahe ho, tum kaun ho, bolo?”

usake pratiprashn se aman ko ummeed kee kiran dikhaaee dee, wo usake munh se hee aage sunane ke lie turant bol padaa –

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“main aman hoon”

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“nayanaa!!aman!!aah, kaheen yah sapanaa to naheenkyaa tum “nirmalaadewee baal aashram” waale aman ho?”

“haan haan, jaldee bataao dewi! kyaa tum nayanaa ke baare men koee jaanakaaree rakhatee ho, wo kahaan hai, kaisee hai?”

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yah sunate hee us yuwatee kee aankhon se ashrudhaar phoot padee aur hichakiyaan lete hue rote rote bolee-

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“aman bhaiyaa, main nayanaa kee badanaseeb sakhee daalee hoon” kahate hue wo yuwatee zaar zaar rone lagee

“are, pahale chup ho jaao daalee bahan, mujhe bataao, tum yahaan kyon aur kaise aaee, nayanaa aur tumhaaree wo sakhee lataa kahaan hai? meree shailajaa aantee se baat huee thee unhonne nayanaa ke laapataa hone aur usake 6 maheene baad tum donon ke aashram se bhaag jaane kee baat bataakar aur koee jaanakaaree naheen hone kee baat kahee”

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“aman bhaiyaa, nayanaa kaa to koee pataa naheen chalaa aur lataa ne inheen andheron men maut ko gale lagaakar apane kashton ko wiraam de diyaa lekin main un jaalimon ko sabak sikhaane ke lie yah badatar zindagee us ghadee ke intajaar men jeetee rahee hoon, jab yahaan se kisee tarah nikalakar apanee daastaan tum tak n pahunchaa detee agar main bhee maut ko gale lagaa letee to maanawataa ko kalankit karane waale un bhed kee khaal men chipe bhediyon ke wyabhichaar ke kisse kisee tahakhaane men dam tod dete lagataa hai un paapiyon ke paap ke ghade bhar gae honge tabhee kudarat ne tumhen yahaan pahunchaa diyaa hai aman bhaiyaa, ab nayanaa kee talaash ke saath meraa bhawishy bhee tumhaare oopar hee nirbhar hai, kyaa tum mujhe neetaa aantee se chudaakar apane saath le jaaoge?”

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“bilakul! ab to yah meraa pahalaa kartavy hai lekin yah sab kaise huaa daalee bahan, mujhe sab wistaar se bataao”

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aman ke munh se sahaanubhooti ke bol sunate hee daalee ke nayanon se ashrudhaar bahane lagee usakee aankhon ke saamane wigat kaa kaalimaa se lipaa putaa driishy jeewant ho gayaa ashru ponchakar usane aman ko paanee dekar do ghoont svayan bhee pie, phir aman ke anaathaalay chodane ke baad wahaan tak pahunchane kee saaree daastaan wistaar se sunaaee-

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“nayanaa ke laapataa hone ke baad sethajee kaa hamaare saath shaareerik shoshan ke saath hee amaanaweey wyawahaar aarambh ho gayaa thaa unakee baaton se hamen spasht pataa chal gayaa thaa ki nayanaa ko usee ne gaayab kiyaa yaa karawaayaa hai we hameshaa dhamakee dete the ki agar usakee kisee baat kaa wirodh kiyaa to hamen bhee nayanaa ke paas bhej degaa, jahaan har din hamaaraa jism shikaaree kutton kee tarah nochaa jaaegaa shailajaa aantee ko bhee unake har dushkriity kee jaanakaaree rahatee thee, magar sab kuch jaanakar bhee anajaan banee rahatee theen

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ham kuch din chupachaap atyaachaar sahatee raheen phir hamane apane bachaaw aur nayanaa kaa samaachaar tum tak pahunchaane ke wichaar se aashram se bhaag nikalane kee yojanaa banaaee kyonki nayanaa ke laapataa hone se ham samajh gaee theen ki baalig hone ke baad mukt karanaa kewal dikhaawaa thaa

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ek din awasar dekhakar aadhee raat ko chaukeedaar ko oonghate dekhakar ham aashram kee deewaar ke toote hue hisse tak pahunch gaeen wahaan se kuch prayaas ke baad ham neeche koodane men saphal ho gaeen ab hamen aagaraa pahunchane ke lie subah tak intazaar karanaa thaa atah surakshit sthaan tak pahunchane ke lie hamane skool jaane waale raaste kee wipareet dishaa men daudanaa shuroo kiyaa kyonki us raaste se hee nayanaa laapataa huee thee atah hamaare lie bhee pakadee jaane kaa jokhim thaa

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raastaa sunasaan thaa aur anajaan bheebadahawaasee men aage daudate hue dekhakar hamen gashtee pulis ke do aadamiyon ne rok liyaa aur poochataach shuroo kar dee hamane kuch bhee n bataate hue steshan tak pahunchane men sahaayataa maangee to we hamen chaukee tak le gae aur unake poochataach ke kathor lahaje se hamane saaree sachchaaee bayaan kar dee lekin sethajee kaa naam sunakar unhonne unako naamee samaajasewak karaar dekar hamapar hee sethajee par galat ilazaam lagaane kaa aarop mढ़ diyaa aur hamen andar le jaakar hamaare saath ghanton dushkriity karate rahe phir waheen kamare men band kar diyaa ham dar ke maare aage kee sochakar kaanpatee raheen, subah hote hee unhonne sethajee ko bulawaakar hamen phir se unhen saunp diyaa”

kahate-kahate daalee phir se rone lagee aman ne use dhairy bandhaate hue usakee peeth par haath pheraa aur paanee kaa gilaas aage badhaayaa do ghoont peekar bharraae gale se wo phir kahane lagee-

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“hamen teen din tak aashram ke ek kamare men kaid karake rakhaa gayaa raat men sethajee aate aur gaaliyon kee bauchaar aur maarapeet ke saath zabaradastee apanee hawas pooree karate rahe phir chauthe din ek mahilaa ko saath men le aae aur usake saamane pyaar jataate hue yah kahakar ki ye naaree-niketan kee sanchaalikaa neetaa dewee hain tum donon ko apane aashram men le jaaengee wahaan tumhen wiwaah hone tak griih-udyog men paarangat kiyaa jaaegaa, hamen us mahilaa ke hawaale kar diyaa phir aantee hamen yahaan lekar aa gaeen aage bhaiyaajo huaa main bayaan naheen kar sakatee” daalee phir apanee nam hotee huee aankhen ponchane lagee

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daalee kee dard bharee daastaan se aman kee aankhon men khoon utar aayaa kaisaa naadaan thaa wojo ab tak shailajaa aantee aur sethajee ko dewadoot samajhataa rahaa anaathon kaa sahaaraa maanataa rahaausane usee samay neetaa dewee se daalee ko apanee bahan bataakar munhamaangee rakam lekar usake supurd karane kaa niwedan kiyaa kaaphee anunay-winay ke baad neetaa dewee ne usakee baat maan lee lekin aman ke paas kaish rakam naheen thee atah agale din rakam ke saath aane kaa waayadaa karake daalee ko saantvanaa dekar waapas ghar aa gayaa

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aman chaahataa to pulis tak jaa sakataa thaa magar is tarah baat sethajee tak jaatee aur daalee ke saath hee usakee apanee aur nayanaa kee jaan ko bhee khataraa utpann ho jaataa

atah jab tak nayanaa kaa pataa naheen chal jaataa, tab tak sethajee par haath daalanaa theek n samajhakar usane daalee ko surakshit aagaraa pahunchaane kaa nirnay liyaa

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agale din raat ko aman kuch jaldee hee ghar se nikal padaa waayade ke mutaabik us weshyaalay kee sanchaalikaa ko kaish rakam dekar daalee ko lekar seedhe aagaraa jaane waalee bason ke niyat stॉp par pahunch gayaa wo use kamare par le jaakar kisee ko usake baare men bataanaa naheen chaahataa thaa usane tikat lekar daalee ko bas men bithaa diyaa aur bataayaa ki usane mitron se baat kar lee hai, aagaraa pahunchate hee kushal use lene bas stॉp par pahunch jaaegaa wahaan apanaa ghar hone se use koee pareshaanee naheen aaegee daalee sajal netron se aman ko duwaaen dete hue nihaaratee rahee aur aman use widaa karake waapas ghar aa gayaa

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kramashah

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अध्याय 18

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nayanaa un teen giddhon ke changul se chootane ko chatapataatee rahatee thee usakaa shaareerik shoshan hotaa rahaa we teenon garbhanirodhakon kaa prayog karate the atah ek taraph se wo awashy bephikr thee ki usakee kokh men kabhee un raktabeejon kaa beej ankurit naheen hogaa magar wyaakul man sochataa rahataa ki kyaa wo is janam men aman se kabhee naheen mil paaegee? kyaa use agale janm men paane ke lie mriityu ko gale lagaa lenaa chaahie? magar aman to yah jaan bhee naheen paaegaa ki main usake lie praan tyaag chukee hoon phir doosare janm men bhee do premee waastaw men milate hee hon yah nishchit kahaan hotaa hai? balki usakee rooh bhee pyaasee hee bhatakatee rahegee use isee janm men apane pyaar ko paanaa haikabhee to atyaachaar ke ghinaune ghan chantenge aur pyaar ke sukh-sooraj kee pahalee kiran usake jeewan ke andheron ko ujaalon men badalane ugegee! isake lie use chaahe kitanaa hee atyaachaar kyon n sahan karanaa pade, wo apanaa hausalaa tootane n degee aman kaa wo pratham premil, paawan sparsh phir usakee zindagee kee dhadakanon men samaakar usake tan-man ko triipt karane ke intajaar men hogaa is tarah mriityu kaa waran karane se to wo aman se sadaa ke lie door ho jaaegee

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har din har raat usake jehan men yahee uthal puthal machee rahatee man hee man budabudaatee rahatee- “aman awashy mujhase milane aashram men gayaa hogaa n jaane mere baare men use kyaa soochanaa dee gaee hogeewo mujhe khojane kaa awashy prayaas kar rahaa hogaadaalee aur lataa bhee n jaane kis haal men hongee, yahaan se nikalane ke lie kisee kee sahaayataa kaise lee jaaein bhaaiyon se to sahaayataa ke lie kuch kahanaa bhee khataraa mol lene jaisaa hai, aakhir baahar kaise nikal sakoongee? kisee ko soochit karoon bhee to kaise? aajeewan to in narapashuon ke saath rah naheen sakatee”

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us din saphaaee karate hue wo haal ke dvaar tak pahunchee to neeche se akhabaar ko sarakakar andar aate dekhakar usake mastishk men achaanak bijalee see kaundh gaee ki agar isee tareeke se koee kaagaz kaa purjaa andar se sarakaakar baahar akhabaar laane waale wyakti tak pahunchaayaa jaa sake to ho sakataa hai wo usakee kuch sahaayataa karane ke lie kuch prayaas karelekin saphaaee jayaraam ke saamane hee karanee hotee thee to wahaan kaise kuch bhee kar sakatee haiphir usake paas kaagaz kalam bhee to naheenaur wo man masos kar rah jaatee

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sochate sochate ek din use ek upaay soojhaa sabase pahale usane kaagaz kaa koraa tukadaa khojanaa shuroo kiyaa yah kaam usakaa aasaanee se ho gayaa sheeghr hee usakee nazar men rasoee men saamaan sabjee ke saath aane waale kaagaz ke paiket aa gae usane ek paiket chipaakar apanee alamaaree ke kapadon ke beech dabaakar rakh liyaa phir shrriingaar ke saamaan se kaajal kee pensil likhane ke lie nikaalakar nahaate samay kaagaz aur kapadon ke saath baatharoom men chalee gaee kaagaz par usane sankshep men apanee pareshaanee likhakar punah chipaakar almaaree men kapadon ke beech dabaa diyaa yahaan tak saphalataa milane par usakee baanchen khil gaeen

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lekin purje ko baahar pahunchaanaa teढ़ee kheer thaa ab rasoee men kaam karate hue usakaa pooraa dhyaan dvaar aur jayaraam par hee kendrit hotaa thaa usake shauch ke lie jaate samay wo rasoee men kaam kar rahee hotee thee agar jayaraam ke shauch ke lie jaate hee usee kshan akhabaar waalaa aa jaae to usakaa kaam ban sakataa hai isamen jokhim to bahut thaa, agar pakadee gaee to usakaa kyaa haal kiyaa jaaegaa yah usakee kalpanaa se pare thaa phir bhee wo har din ek naee aashaa ke saath us kshan kaa intazaar karatee jab aisaa sanyog ghatit ho jaae

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agar insaan ke iraade driiढ़ hon aur soch sakaaraatmak ho to kudarat bhee saday hokar saath dene lagatee hai dvaar kee daraar bahut patalee hone se akhabaar sarakaane waale ko kuch pal to lagate hee the aur nayanaa pratidin ek nanhee see aas men kaagaz kaa purjaa akhabaar aane tak apane kapadon men hee chipaakar rakhatee thee phir saphal n hone par turant almaaree men rakh aatee thee

aakhir use chaar maheene ke lambe intajaar ke baad wo awasar mil hee gayaa, jab nayanaa ne jayaraam ke shauch ke lie jaate hee akhabaar sarakate dekhaa usane awilamb bijalee kee phurtee se dabe paanv wahaan pahunchakar andar aate akhabaar par paanv jamaa diyaa aur phir purje ke saath hee waapas baahar sarakaa diyaa aur haanphatee-kaanpatee waapas rasoee men pahunchakar man hee man praarthanaa karatee huee dhadakate dil se pratikriyaa dekhane lagee kuch hee kshanon ke baad akhabaar waapas andar sarakaayaa gayaa to usakee jaan men jaan aaee usakee winatee widhaataa ne sveekaar kar lee thee usakee durdashaa kee khabar kabaren pahunchaane waale ke haath men jaa chukee thee nayanaa ko ab aashaa kee naee kiran ugane kaa intajaar karanaa thaa yah intajaar usakee zindagee men nayaa saberaa lekar aaegaa, is wishvaas ke saath nayanaa kaa aatmabal kaee gunaa bढ़ gayaa thaa

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daalee ko gae 5-6 maheene beet chuke the lekin abhee tak nayanaa kaa koee pataa naheen chalaa thaa aman chintaatur mudraa men din kaat rahaa thaa, is beech ek din kushal kaa phon aayaa-

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“aman bhaiyaa, daalee ke yahaan rahane se aas pados ke log hamen shankit nazaron se dekhane lage hain saath rahate hue main aur daalee ek doosare ko pasand karane lage hain atah uchit yahee hogaa ki ham kort men wiwaah kar len waise ham teenon ne tay kiyaa thaa ki tumhaaree nayanaa bhaabhee ke saath waapasee ke baad hee ham bhee kisee anaathaalay ke saamoohik wiwaah aayojan men shaamil hokar wiwaah karenge lekin ab adhik taalanaa uchit naheen hai ratan aur keerat bhee chaahate hain ki we aatmanirbhar ho chuke hain atah wiwaah karake apanaa ghar basaa len isake lie hamen tumhaaree sahamati aur aasheervaad kee aawashyakataa hai”

“yah to bahut achchee baat hai kushal, tumane daalee ke baare men meree chintaa door kar dee tum teenon saharsh wiwaah karake apanaa ghar basaa sakate ho magar tumhen daalee ke saath mere aane tak ghar kee dekharekh ke lie waheen rahanaa hogaa aur jis din ratan aur keerat ke wiwaah kaa aayojan nishchit ho tum bhee wahee din apane lie chunoge tabhee main aayojan men upasthit ho sakoongaa main kaam se chuttee naheen le sakataa atah wahaan raat men naheen rukoongaa sabhee kaaryakram sanpann hote hee usee din waapas nikalanaa hogaa”

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lagabhag teen chaar maheene ke baad ratan aur keerat ke wiwaah kee tithi saaree aupachaarikataaon ke baad tay ho gaee aur kushal ne bhee wahee din wiwaah ke lie tay kar liyaa aman us din subah apanaa kaam samaapt hote hee aagaraa chalaa aayaa aur teenon mitron ke wiwaah-aayojan men shaamil huaa daalee kee to rulaaee hee naheen ruk rahee thee baar-baar nayanaa ke milane kee ummeed men aman kaa hausalaa bढ़aa rahee thee ratan aur keerat ne apane rahane kee wyawasthaa kar lee thee aakhir sabako shubhakaamanaaen dete hue aman ne bhaaree man se sabase sheeghr milane kaa aashvaasan dekar widaa lee

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kramashah

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अध्याय 19

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usee din subah aman ne hameshaa kee tarah us taaunaship kee bees manjilaa bilding ke 15 wen maale par sthit flait nanbar 2 ke band dvaar ke neeche banee huee patalee see daraar se akhabaar ko beech se kholakar kuch jhukate hue sarakaanaa chaahaa to akhabaar ne aadhee dooree tay karane ke baad aage bढ़ne se inakaar kar diyaa aur waheen ruk gayaa aman ne use daant lagaate hue kahaa-

“abe jaldee jaa n! jaanate naheen ki abhee kitane gharon ke akhabaar baantane baakee hain”

magar wo kaaphee prayaas ke baawajood andar to naheen ghusaa balki waapas baahar aa gayaa aman ne sochaa ki shaayad andar koee saamaan giraa padaa hogaa jisase takaraakar yah waapas aa gayaa use is flait ke lie wishesh hidaayat dee gaee thee ki akhabaar baahar naheen chodanaa hai kyonki ki us ghar men rahane waalaa raat kee shipht men naukaree karataa hai aur usakaa pement ऑn laain ho jaataa hai

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wo thodaa aur jhukakar punah prayaas karane lagaa to use akhabaar ke neeche ek kaagaz kaa purjaa dikhaaee diyaa jo usee ke saath kisee ne andar se sarakaayaa thaa achanbhit aman kabhee us flait ke dvaar par lage hue bade se taale ko dekhataa to kabhee us purje koagar andar koee hai to baahar se taalaa kyon lagaayaa gayaa hai jabaki bilding ke har flait ke dvaar men aatometik lॉk lagaa huaa hotaa hai isakaa matalab kuch gadabad waalee baat ho sakatee hai usane purje ko jaise hee uthaayaa to oopar hee waarning shabd ke saath likhaa huaa thaa-

“pleezpleez! yah baad men chupaakar pढ़iegaa pahale akhabaar sarakaa deejiye”

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ye shabd pढ़te hee aman ekadam dar gayaa ki n jaane kyaa baat hai wo kisee museebat men n pad jaae atah usane jaldee se purjaa jeb ke hawaale kiyaa aur us phlor ke baaqee phlaits men akhabaar hameshaa ke kramaanusaar dvaar ke baahar daal diyaa

apanaa kaam pooraa hote hee wo sheeghr hee ghar aa gayaa aur jeb se purjaa nikaalakar pahale usane usakee likhaawat par gaur kiyaa wo ibaarat kisee kaalee kalar pensil se likhee huee lag rahee thee, usane pढ़naa shuroo kiyaa –

“main yahaan par bandinee hoon, aapase sahaayataa kee darakaar hai aap jo koee bhee sajjan hain, maanaw hee hongeyahaan main lagabhag dhaaee warshon se maanawataa ko kalankit karane waale teen daanawon dvaaraa dee jaa rahee shaareerik aur maanasik yaatanaa jhelr rahee hoon mujhe wishvaas hai ki aap meree sahaayataa awashy karenge

kriipayaa kaheen se ek patalee kॉpee aur pen athawaa pensil khareedakar, jo is daraar se andar aa sake kaam par aate samay pratidin apanee jeb men rakh liyaa karen jis din aaj kee tarah akhabaar par dabaaw lage, kॉpee-pen turant andar sarakaa deejiyegaa yah purjaa mainne jis tarah baahar sarakaayaa hai wo awasar punah kab milegaa, main naheen jaanatee lekin intajaar awashy karoongee agar aap aate rahe to kaapee pen milate hee apanee pooree kahaanee likhakar phir se aaj kee tarah aap tak pahunchaane men bhee kuch samay lag sakataa hai apanaa parichay bhee agar aapakaa sahayog milaa to baad men hee doongee”

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-ek anaath badanaseeb baalaa

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ibaarat pढ़te hee aman kee chathee indriy sakriy ho uthee usake mastishk ne tezee se sochanaa shuroo kar diyaa

“andar hai to koee anaath ladakee aur khatare men bhee hai, usane wo ibaarat n jaane kaise likhee hogeekaheen wo nayanaa to naheen! lekin isakaa pataa kaise lag sakegaa!

usane dhaaee warshon se wahaan hone kee baat likhee hai aur nayanaa bhee lagabhag dhaaee warsh se hee laapataa haiwo nayanaa ho bhee sakatee hai, naheen bhee agar wo naheen huee to kॉpee-pen pahunchaate hue kisee ke pakade jaane par ho sakataa hai usake saath main bhee khatare men pad jaaoonaakhir anaathon kaa hotaa hee kaun hai! magar kuch bhee ho main usakee sahaayataa awashy karoongaa nayanaa ke binaa meraa koee wajood naheenwo n bhee huee to ek nirdosh baalaa kee sahaayataa karane kaa puny to milegaa heeaur jab tak usakaa sahee parichay aur doshiyon ke poore kriity kee wistriit jaanakaaree naheen milatee, pulis tak jaanaa wyarth hee hai”

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usane usee din ek patalee see kॉpee aur baalapen kee riphil khareed lee ghar pahunchakar usake pratham priishth par hee usane likhaa-

“he dewi! meraa naam aman hai, main bhee ek anaath yuwak hee hoon aur apane jeewan ke aath warsh isee shahar ke nirmalaadewee anaathaalay men wyateet kar chukaa hoonunheen dinon kee apanee sahapaathee priyatamaa nayanaa kee talaash men do warsh se is shahar men bhatak rahaa hoon, aapakaa parichay jo bhee ho mere lie poojaneey hain main har naaree kaa dil se sammaan karataa hoon, aap agar meree nayanaa ko jaanatee hon to kriipayaa apanee kahaanee aur poore parichay ke saath hee usake baare men bhee pooree jaanakaaree likh deejiyegaa main abhee itanaa kaabil to naheen hoon ki amaanushon se mukaabalaa kar sakoon lekin aapakee sahaayataa ke lie har sanbhaw prayaas awashy karoongaa yah kॉpee phir isee tarah sarakane kaa intajaar karataa rahoongaa”

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aman ne apanaa parichay aur anaathaalay kaa naam yah sochakar jaanaboojhakar likh diyaa thaa ki agar wo nayanaa huee to usakaa naam parichay pढ़te hee kushee se deewaanee ho jaaegee aur usakaa utsaah bhee bढ़ jaaegaa isee uthal-puthal men raat ko wo theek se so bhee naheen paayaa svayan dukhee hote hue bhee usakaa man kisee aur ko kasht men dekhakar wichalit ho jaataa thaa usake mastishk men lagaataar wichaaron kaa toofaan umad-ghumad machaa rahaa thaa n jaane wo ladakee kaun hai? kahaan se laaee gaee hogee aur dillee kee us naw-nirmit taaunaship kee kaee manjilaa bilding kee chaak chauband surakshaa ke beech ek flait men kis tarah use bandee banaakar rakhaa gayaa hogaa! aakhir samaadhaan n milane par aman kaa mastishk haarakar chupachaap kundalee maarakar nateejaa aane tak shaant baith gayaa

aman se din kaate naheen kat rahe the kisee abalaa par atyaachaar ho rahaa hai aur wo kuch naheen kar sakataayah sochakar wo widhaataa ko hee kosane lagataa thaa ki aakhir usane anaathon kee kismat kis kalam se kyaa sochakar likhee hai kaam par jaate samay wo kॉpee-pen yaad se jeb men rakh liyaa karataa thaa aur sochataa hee rahataa ki n jaane wo din kab aaegaa jab akhabaar phir se andar jaakar baahar waapas aane tak kaa safar pooraa kare aur wo kॉpee-pen sarakaakar bhaaramukt ho sake

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is tarah akhabaar chupachaap sarakataa rahaa aur samay bhee kuch din aage sarak gayaa pareekshaa nikat aa chukee thee, aman par pढ़aaee kaa lod adhik thaa wah sochataa ki agar theek se mehanat naheen huee to parinaam man maaphik naheen aaegaa

raat ko baajaaron men nayanaa ko khojanaa to jis din use purjaa milaa thaa, usee din se usane nayanaa ke wahaan hone kee aas men band kar diyaa thaa pareekshaa men ek maheenaa hee shesh hone ke baawajood usane apane kartavy ko aham maanakar akhabaar daalanaa naheen chodaa har subah wo us flait men akhabaar sarakaate samay aashaa bharee nazaron se dvaar ko dekhataa phir niraash lautakar pढ़aaee par dhyaan kendrit kar detaa

aakhir ek saptaah beetane par usakee yah muraad pooree ho gaee aur akhabaar par dabaaw mahasoos hote hee usane kॉpee-pen andar sarakaa diyaa aur usake saath hee akhabaar bhee kheench liyaa gayaa

ab aman ko us baalaa ke uttar kaa intajaar to thaa, lekin pareekshaa men bhee kuch din hee rah gae the atah wo svayan ko tanaawamukt rakhane kaa prayaas karate hue taiyaaree karataa rahaa

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kramashah

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अध्याय 20

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antim adhyaay

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kॉpee kheenchakar nayanaa bijalee kee phurtee se waapas rasoee men pahunch gaee usakee dhadakan kaee gunaa bढ़ gaee thee jayaraam waasharoom men hee thaa atah usane kॉpee se riphil alag kar lee aur apanee kurtee men haath daalakar kॉpee ko braa ke neeche dabaa diyaa aur riphil ko oopar se hee waheen phit kar diyaa phir jaldee-jaldee kaam pooraa karane lagee is samay jayaraam jaldee men hotaa thaa atah usapar itanaa gaur naheen kiyaa jaataa thaa

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jaise hee bel bajee, use lॉk kar diyaa gayaa wo to isakaa intajaar hee kar rahee thee, kamaraa band hote hee usane kॉpee-pen alamaaree men kapadon kee tah men chipaa lie likhane kaa kaam to baatharoom men hee thodaa-thodaa karake ho sakataa thaa, kyonki din-raat men jitanee baar use un raakshason dvaaraa raundaa jaataa, wo ghin ke maare usee samay nahaa letee thee aur isake is kriity men koee baadhaa naheen daalee jaatee thee

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hameshaa kee tarah kareeb aadhe ghante baad balaraam ne kamaraa kholaa aur nayanaa ko kheenchakar raundanaa shuroo kiyaa nayanaa ek ghante tak sharaab kee gandh sahan karatee huee chatapataatee rahee phir usake haal men jaane ke baad kॉpee-pen chipaakar nahaane chalee gaee

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jaise hee usane pahalaa pannaa kholaa to likhaawat se bharaa huaa dekhakar usane utsukataa wash pढ़naa shuroo kiyaa jyon-jyon wo pढ़tee gaee, usake tan-man kaa por-por khilataa gayaa man hee man wo kushee se kilak uthee aur likhanaa bhoolakar baar-baar pढ़tee aur ibaarat ko choomatee rahee, phir usane nahaakar kॉpee-pen waapas chipaa diyaa aur aman kee yaadon ko seene se lagaakar let gaee use wishvaas hee naheen ho rahaa thaa ki aman use is tarah mil jaaegaa

usake man men achaanak jijeewishaa jaagrat ho uthee thee usane soch liyaa ki ab kisee bhee tarah wo jald se jald apane jeewit hone kaa shubh samaachaar aman tak pahunchaane kaa prayaas karegee

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pratidin nayanaa saawadhaanee poorvak apanee kahaanee apane mastishk kee paraton se kॉpee karake pannon par pest karatee rahatee, likhate-likhate aksar ro padatee phir aansoo ponchakar svayan ko hee samajhaatee-

“aree pagalee, ab to tere hansane-muskuraane ke din nikat aa gae hain himmat rakhegee tabhee yah jang jeetakar jaalimon se badalaa le sakegee” phir wo jaldee se aansoo ponch letee

kahaanee do din men hee pooree ho gaee aur wo agale din se use seene men chipaae aman tak pahunchaane kaa intajaar karane lagee lekin is baar usase ek din bhee intajaar naheen ho paa rahaa thaa

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aakhir wo din bhee aa gayaa jab jayaraam ke shauch ke jaane ke samay hee nayanaa ne akhabaar sarakate dekhaa usane turant beaawaaz dvaar tak jaakar akhabaar par paanv rakh diyaa aman ke lie yah rukane kaa sanket thaa, phir usane kॉpee sarakaa dee aur saamaany gati se waapas bhee chalee gaee jayaraam abhee andar hee thaa, lekin itanee der men nayanaa kee dhadakanen bekaaboo hone lagee theen ki kaheen usakee harakat dekh n lee jaae, magar ab sar jhatakakar svayan ko saamaany banaae rakhaa usakee kahaanee sahee haathon men pahunch chukee thee aur use wishvaas thaa ki aman turant ekshan lekar use mukt karawaa degaa

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aman kee pareekshaa nikat aa gaee thee, lekin flait se kॉpee milane tak use chuttee n lekar intajaar karanaa hee thaa yahaan agar nayanaa n huee to bhee us anaath yuwatee kee sahaayataa se wo peeche naheen hategaa saath hee nayanaa kee talaash kee rooparekhaa nae sire se banaa legaa, yah sochakar hee wo svayan ko tanaawamukt karane kaa prayaas karataa rahataa thaa

isee gatisheel dinacharyaa men ek din baad hee wo apratyaashit ghatanaa ghat gaee jisakaa aman ko intajaar thaa

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us din jaise hee usane us phlait men akhabaar sarakaayaa, usee kshan akhabaar par dabaaw ke saath hee usakee dee huee kॉpee usakee bagal se baahar sarak kar aa gaee

aman ne besabree se kॉpee kholee aur apanaa likhaa huaa pahalaa priishth palataayaa to agale priishth par likhaa thaa-

“mere priy amoo, main tumhaaree ninnee hoon, tumhaaraa parichay pढ़kar mujhase adhik samay sabr naheen ho sakataa meraa aham uddeshy apanee daastaan tum tak hee pahunchaanaa thaa, meree pooree kahaanee is kॉpee men likhee huee hai, atah tumhen isee wakt kahaanee pढ़kar mujhe yahaan se nikaalane kaa prayaas karanaa hogaa in nirdayee maanawataa ke dushmanon ko rasaatal pahunchaanaa hee tumhaaraa pratham kartavy honaa chaahie”

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-tumhaaree ninnee

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aakhir aman kaa anumaan sahee nikalaa, lekin nayanaa kaa sandesh paakar wo bechain ho uthaa apanee priyatamaa ko is haalat men mahasoos karake munh se aah nikal padee aur wo man hee man budabudaane lagaa –

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“o meree ninnee, shukr hai tum jeewit to hobahut kasht jhele hain tumane, magar yah tumhaare kashton kaa antim din haiaur tum meree baahon men hogee!!”

kॉpee kholakar wo nayanaa kee kahaanee men chipee usakee peedaa kee paraton men kaid hotaa gayaa pढ़-pढ़ kar rotaa rahaa aur aansoo ponchataa rahaa lekin yah samay bhaawanaaon men bahane kaa naheen thaa choonki wo un sab neech paatron se poorv parichit thaa atah jaldee-jaldee usane 15 minit men kahaanee kaa saar samajh liyaa ab nayanaa kee mukti ke lie usakaa dimaag kaee gunaa tezee se kaary karane lagaa

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usane aage kee prakriyaa ke lie akhabaar ke adhikaariyon se hee salaah lene kaa nirnay karake ek adhikaaree ko phon lagaakar saaree baat bataaee adhikaaree ne aparaadh kee ganbheerataa jaanakar use samajhaayaa ki aise men pulis aur meediyaa ke paraspar saamanjasy w sahayog se hee aparaadhon par niyantran kiyaa jaa sakataa hai atah use turant printing plaant par pahunchanaa chaahie yahaan mashawiraa karane ke baad ek riportar ko saath lekar us eriyaa ke nikat ke thaane men kॉpee men warnit prasang ke aadhaar par aparaadhiyon ke khilaaph praathamik riport darj karawaanee hogee

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aman ne apanaa kaam pooraa karake ghar n jaakar baahar hee naashtaa kar liyaa aur ek ghante ke andar printing plaant par pahunch gayaa wahaan se pres riportar dew kumaar ke saath us flait ke antargat aane waale thaane pahunch gayaa riport likhane se pahale thaanaadhyaksh ne aparaadhiyon kee giraphtaaree ke lie ghatanaakram kee satyataa kaa saboot maangaa to dewakumaar ne nayanaa kee likhit kahaanee kee kॉpee prastut karake kahaa ki choonki peeditaa ko taalaa band karake rakhaa gayaa hai atah usakee likhit tahareer ko hee aadhaar banaakar maanik seth aur usake karmachaariyon ke wiruddh riport likhee jaanee chaahie is tarah dewakumaar ke sahayog aur maargadarshan men nirmalaadewee anaathaashram ke sanchaalak warg ke pramukh maanik seth aur usake sahayogiyon- jayaraam aur balaraam ke khilaaph nayanaa ke apaharan aur lambe samay tak bandee banaakar balaatkaar kiye jaane kee praathamik riport darj karawaakar sabhee aawashyak aupachaarikataaen dewakumaar dvaaraa hee sampann hueen

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maamalaa ganbheer jaanakaar thaanaadhyaksh ne uchch adhikaariyon ko soochit kiyaa doosare din subah maanik seth aur balaraam ko sethajee ke niwaas par hee giraphtaar kar liyaa gayaa phir unako saath lekar pulis teem, aman aur dewakumaar sabhee sosaayatee ke 15 wen maale ke flait nanbar 2 ke baahar the

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baahar ke taale kee chaabee balaraam ke paas hee thee usane pulis adhikaaree kaa ishaaraa dekhakar taalaa kholaa aur bel bajaa dee andar se dvaar ke hol se jhaankakar dekhane ke baad dvaar khul gayaa aur saamane kaa nazaaraa dekhakar andar upasthit jayaraam ke haathon ke tote hee ud gae sab log andar aa chuke the

apane maalik ko saamane pulis kee hiraasat men dekhakar jayaraam ne chupachaap apanee giraphtaaree de dee

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aman ne band kamaron par nazar daalee magar we baahar se lॉk the atah wo nayanaa ko aawaajen lagaane lagaa aawaajen sunakar nayanaa apane kamare kaa dvaar peetane lagee chaabiyaan balaraam ke paas hee theen, pulis adhikaaree ne use donon band kamaron ko kholane kaa aadesh diyaa kamaraa khulate hee nayanaa aansuon men tarabatar khadee apane muktidooton ko nihaarane lagee aman ne aage bढ़kar use gale lagaa liyaa

doosare kamare kaa taalaa khulane par andar mahangee sharaab kee botalon kaa akoot bhandaar dekhakar pulis adhikaaree kee aankhen phatee rah gaeen usane turant uchch adhikaariyon ko isakee soochanaa dee aur aage kee kaarrawaaee tak ooparee aadesh ke tahat flait seel karake teenon aparaadhiyon aur poochataach ke lie nayanaa, aman aur dewakumaar ko bhee thaane laayaa gayaa

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thaane men aman ne thaanaadhyaksh ko bataayaa ki nayanaa usakee bachapan kee premikaa hai aur we aman kee pareekshaa samaapt hote hee kort-mairij kar lenge thaanaadhyaksh ne donon ko badhaaee aur bhaawee jeewan kee shubhakaamanaaen deen aur aawashyak poochataach ke baad nayanaa ko usakee ichchaanusaar dewakumaar kee hee jawaabadehee par aman ke sanrakshan men yah likhawaakar bhej diyaa ki we kort men kes kee tithiyon par aniwaary roop se upasthit hote rahenge

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baad men kes kee pooree chaanabeen karake choonki “nirmalaadewee baal-aashram” bhee sandigdh gatiwidhiyon ke lie warnit thaa, use seel karake shailajaa par maanik seth kee awaidh gatiwidhiyon men paroksh roop se saath dene kaa abhiyog lagaakar sabhee aparaadhiyon ke wiruddh kort men chaarj sheet daakhil kar dee gaee

agale din nayanaa kee pooree kahaanee dillee ke prasiddh akhabaar ke mukhapriishth par thee

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aman nayanaa ko kamare par le aayaa thaa aur aagaraa phon lagaakar sabako khushakhabaree dete hue usakee baat daalee aur kushal se karawaaee ratan aur keerat ko bhee yah shubh samaachaar sunaa diyaa nayanaa ke aansoo thamane kaa naam hee naheen le rahe the aman ke baanhon men lete hee wo sanshay se bharee tharatharaatee aawaaz men kahane lagee-

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“amoo, kyaa tum mujhe itanaa samay un dushton ke saath bitaane ke baawajood mujhe man se sveekaar kar sakoge? main kewal tumhaaree ek jhalak dekhane ke lie hee apanee is apawitr deh kaa bojh dhotee rahee hoon”

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“kaisee baat kar rahee ho ninnee, meree ninnee! aaj meraa wajood kewal tumhaare hee dam par hai tumhaaree judaaee men taar-taar ho chukaa dil kaise tumhen dikhaaoonab is tarah kee koee baat jubaan par naheen laanaa tum mahaabhaarat ke is pauraanik prasang se to parichit hogee hee ki draupadee ke paanch pati the aur usane majabooree wash hee paanch bhaaiyon se wiwaah kee sveekriiti dee thee, lekin use maharshi kriishnadvaipaayan wedavyaas, jo mahaabhaarat granth ke rachayitaa aur un ghatanaaon ke saakshee bhee the, jo kramaanusaar us yug men ghatit hueen, ne aasheervaad diyaa thaa ki draupadee ek-ek warsh ke lie sabhee paandawon ke saath rahegee aur jab wah ek bhaaee se doosare bhaaee ke paas jaaegee, to usakaa kaumaary pun: waapas aa jaaegaa

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lekin is yug men puraanon men warnit prasang ko prateekaatmak maanakar dekhaa jaae to usake anusaar naaree agar man se pawitr hai to tan se kabhee apawitr naheen hotee agar aisaa hotaa to talaak ke baad punarviwaah, widhawaa wiwaah, wiwaah poorv rishte men rahanaa aur ichchaa se banaae hue daihik sanbandh ko kaanoonee maanyataa naheen milee hotee daalee aur kushal kaa udaaharan to tumhaare saamane hai heeapawitr to we narapashu raktabeej hain jo poojitaa naaree ke saath balaatkaar karake usake hriiday kee komalataa ko khand khand kar dete hain aur apane pariwaar men, patnee kee nazaron men pawitr bane rahate hain”

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“mere amoo tum nishchay hee kisee mahaapurush ke awataar hojo maanaw roop dharakar dharatee par janme ho main tumhaaraa har kadam par saath dene ko sadaiw tatpar rahoongee”

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“naheen ninnee, main kisee mahaapurush kaa awataar naheen, ek insaan hee hoon, meraa pratham sankalp to un raktabeejon kee rasikataa ko rasaatal dikhaanaa hai tumhaare aparaadhiyon ke wiruddh aisaa jaal bunaa jaa chukaa hai ki unhen chaahe jab bhee sajaa mile, kathoratam hee milegee aur isake lie tumhaaree kahaanee bahut badee bhoomikaa nibhaaegee

main apane makaan ke neeche ke khand men anaathaashram kee sthaapanaa karake usakaa kaaryabhaar daalee aur tumhen saunpakar apane patrakaaritaa-karm se maanawataa kee sewaa karataa rahoongaa aaj tum in raktabeejon kaa shikaar huee ho, kal aur baalaaen bhee kinheen raktabeejon kaa shikaar ho sakatee hain ham apanaa jeewan apane jaise besahaaraa logon ke kalyaan men hee bitaaenge”

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aman ne pareekshaa ke lie akhabaar baantane kaa kaam chod diyaa aur pareekshaa samaapt hote hee usane adhikaariyon se aagaraa jaane kee anumati maangee aur kahaa ki yah muqadamaa to n jaane kab tak chalataa rahegaa, use aagaraa men bahut se kaary sampann karane hain atah pareekshaa kaa parinaam aane ke baad wo saakshaatkaar kee aupachaarikataaen poorn karake unake akhabaar ke lie ऑn laain sewaaen detaa rahegaa aur kort kes kee tithiyon par waheen se aataa rahegaa

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isake baad usane apane aane kee soochanaa kushal ko dekar nayanaa ke saath aagaraa prasthaan kiyaa

unhen lene ke lie daalee aur kushal steshan pahunch gae the,

wahaan usane kiraayedaar se makaan kaa ooparee khand anubandh ke anusaar agrim notis dekar ek maheene men khaalee karane kaa anurodh kiyaa ek saptaah ke andar kushal ne bhee apane niwaas kee wyawasthaa anyatr kar lee aur aman ne teenon mitron kee sapatneek upasthiti men nayanaa ke saath kort men wiwaah kar liyaa

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agale hee din we donon prem ke prateek taajamahal ke paarshv men bahatee taaj nagaree kee jeewanarekhaa, maan yamunaa kee sangeetamay svaralaharee bikheratee nirmal dhaaraa men naukaa wihaar karate hue apanee puraanee yaadon kee gatharee kee gaanth khol baithe the beete hue palon ko to jaise pankh mil gae palak jhapakate hee ek-ek karake unake hriidayaakaash par ghane baadalon jaise chaa gae sahasaa nayanaa kaa haath apane gaalapar chalaa gayaa aur wo use sahalaane lagee to aman ne pooch liyaa-

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“kyaa huaa ninnee, koee pareshaanee hai kyaa?”

·

“naheen amoo, bas beete palon ne ghusapaith karake sharaarat shuroo kar dee to wotumhaare un bachapan men lie gae anaginat chumbanon kee chipachipaahat mahasoos ho rahee thee”

aman ne muskuraate hue use nikat kheenchakar usakaa gaal choom liyaa

·

samaapt 🙏

kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

### अध्याय 1

प्रिय पाठको

गीत, ग़ज़ल, छंद, लघुकथाएँ और कहानियों को पाठकों का अपार स्नेह मिलने के बाद उपन्यास लेखन की इच्छा मन में बलवती होती गई और लम्बे समय के बाद अंततः मेरा यह सपना भी पूर्ण हुआ और मेरा यह प्रथम उपन्यास धारावाहिक रूप में आपके सम्मुख है. यह कहानी दो अनाथ प्रेमियों के अनायास मिलने बिछुड़ने और पुनर्मिलन तक संघर्ष की है. यह उपन्यास एक बार पढने के बाद आप बार बार पढना चाहेंगे. आशा है इसे भी आप सबका स्नेह अवश्य मिलेगा।

__________

प्रलय से परिणय तक-  1

अध्याय १

बरसात का मौसम था और आगरा शहर में प्रतिदिन कम अधिक वर्षा होती ही रहती थी। अधिक वर्षा होती तो स्कूल की भी छुट्टी हो जाती थी। पिछले सप्ताह भी लगातार भारी वर्षा के कारण स्कूल बंद थे मगर इस सप्ताह के प्रारंभ में ही बिखरे-बिखरे बादल आसमान में सूर्य के साथ आँख मिचौली खेलने लगे थे।

शहर के एक मिशनरी स्कूल की पहली कक्षा के छात्र अमन की माँ प्रमिला ने उसे कुनकुने पानी से नहलाकर स्कूल की यूनीफोर्म में तैयार किया और गले में परिचय-पत्र लटकाकर बाहरी बरामदे में खेलने को कह दिया। फिर घड़ी पर नज़र डाली तो देखा अभी अमन की स्कूल बस आने में काफी देर है। उसके लिए दूध-नाश्ते के साथ ही रसोई के कुछ और कार्य भी हो जाएँगे, यह सोचकर वो रसोई में पहुँच गई। इधर अमन मुख्य द्वार के बाहर बाजू में बने गैराज में रखी हुई कार के आसपास ऊपर लटकते हुए चिड़ियों के घोंसले देखने में व्यस्त हो गया। ये लटकते हुए घोंसले उसके पापा ने मुख्य छत से कुछ नीचे बनी गैराज की छत के कंगूरों से जोड़कर विशेषकर चिड़ियों के लिए ही बनवाए थे। अमन को इन घोंसलों में चिड़ियों को आते जाते देखना बहुत अच्छा लगता था।

प्रमिला ने कुछ कार्य निपटाकर एक प्यार भरी नज़र कमरे में सोते हुए पति पर डाली। अभी प्रखर के उठने में काफ़ी देर है। उसका दफ्तर के लिए निकलने का समय १० बजे होता है अतः वो आराम से आठ बजे के बाद ही उठता है, तब तक अमन जा चुका होता है। फिर कुछ राहत महसूस करती हुई प्रमिला प्रखर और अपने लिए चाय-नाश्ता बनाने में जुट जाती है। प्रखर के भी कम नखरे नहीं होते, वो अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी पूरी तरह पूरी तरह प्रमिला पर निर्भर रहता है। प्रमिला को भी उसके नखरे उठाने में आनंद की ही अनुभूति होती है। उसके विचार में वो पत्नी ही कैसी जिसमें पति के प्रति समर्पण की भावना न हो। यही तो प्यार का असली रूप होता है... और वो प्यार भी कैसा जो प्रतिदान माँगे! फिर प्रमिला को तो बिना माँगे ही सब मिल जाता था... और अगर पति-पत्नी के विचार, जीवन-शैली अथवा आवश्यकताएँ कुछ अंतर न रखती हों,  आपसी नोक-झोंक ही न हो तो वैवाहिक जीवन का रस ही न निचुड़ जाए...!

अभी उसे पति के लिए नाश्ता,  फिर टिफिन के लिए खाना भी बनाना है। वो तो ठीक मगर क्या बनाना होगा यह निर्णय लेना भी कम जान खाऊ नहीं। हर सब्जी को देख परख कर वो कैसे सप्ताह भर के लिए फ्रिज में व्यवस्थित करती है यह उसके अलावा कौन समझ सकता है?

अमन के लिए क्या बनाए कि देखते ही प्यार से उससे चिपककर प्लेट में वो चीज़ और रखने की जिद करे या,  पतिदेव मनपसंद खाना खाकर प्रशंसनीय नज़रों से उसे निहारेंगे तो वो कैसे इस असीम सुख को आत्मसात करने का लोभ छोड़ सकती है।

शास्त्रों ने यों ही तो नारी के त्याग-बलिदान का इतना गुणगान नहीं किया। आज अगर महिला-वर्ग इसे पुरुषों की कुटिल चाल अथवा स्त्रियों के शोषण का नाम देता है तो यह उसकी भूल ही कहलाएगी। देने का आनंद केवल गृहिणी ही नहीं गृहस्वामी भी जानते हैं, तभी तो पत्नी और बच्चों के लिए उपहार लाते समय खुद को नज़रंदाज़ कर देते हैं!

खैर,  उसे तो अभी जाकर पतिदेव को नींद से जगाना है। यह जगाना भी पल-दो पल का कार्य नहीं बल्कि लम्बी चौड़ी रूपरेखा के अंतर्गत होता है।

प्रथम तो प्यार से जनाब के बालों में उंगलियाँ फिराते हुए कुछ मिनिट सहलाने के बाद उठने के लिए तैयार करना फिर हाँ-हूँ करते हुए जनाब जब तक आधा घंटा वाशरूम में बिताकर सोफे पर डट जाएँ, तब तक चाय बिस्किट के साथ ही टेबल पर ताजा अखबार और टी वी का रिमोट भी उपलब्ध होना चाहिए अन्यथा बात नहीं बनती।

पर इसके साथ ही उसे भी उसकी बगल में बैठकर चुस्कियाँ लेनी होती हैं। चाय भी प्रखर को अदरख वाली पतली और कड़क चाहिए तो उसे अधिक दूध वाली गाढ़ी और हरी इलायची डली हुई...वो सुबह की चाय के साथ कोई समझौता नहीं करती दोनों की पसंद से ही अलग-अलग चाय बनाती है। सुबह के समय शरीर में ऊर्जा तो होती ही है फिर भोजन बनाने तक उसकी कामवाली आ ही जाती है तो सब आराम से निपट जाता है। प्रखर के दफ्तर जाने के बाद उसे  हर काम निपटाकर नहाने धोने से १२ बजे फुर्सत मिलती है। दो बजे अमन वापस आ जाता है तब तक वो अपने घर के ही एक हिस्से में बने ब्यूटी-पार्लर के कार्य में व्यस्त हो जाती है।

वो अमन के आने के बाद एक घंटे के लिए पार्लर बंद रखती है और उसके साथ भोजन करके कुछ देर आराम करने के बाद फिर शाम तक अपने कार्य में लग जाती है। तब तक अमन भी खेलता रहता है और पार्लर बंद करने के बाद प्रखर के आने तक उसका समय अमन के होमवर्क और बातचीत के साथ ही बीतता  है। चूँकि सब्जियाँ सुबह ही बन जाती हैं अतः प्रखर के आने पर गरम रोटियाँ अथवा चावल बनाने ही शेष होते हैं।

विचारों में उलझी प्रमिला का ध्यान जब तब भंग हुआ जब खेलते हुए अमन ने जोर से उसे आवाज़ लगाई-

“मम्मी ...जल्दी आओ, देखो तो कितनी जोर से बरसात हो रही है और वो इत्ती दूर पानी की नदी भी बन गई है...”

प्रमिला चौंककर तुरंत बाहर आई तो बाहर का दृश्य देखकर उसके होश ही फाख्ता हो गए।

“अभी तो आसमान साफ था फिर यह अचानक अन्धकार कैसे छा गया? फिर वो पानी तो घर के पीछे की तरफ से ही आ रहा है। कहीं यमुना में बाढ़ तो नहीं आ गई...? बरसात के मौसम में आगरा में पड़ने वाले यमुना नदी-क्षेत्र में वैसे तो बाढ़ आसानी से नहीं आती लेकिन जब हरियाणा सीमा पर स्थित बाँध से पानी छोड़ा जाता है तो यह शहर भी भयंकर जल-प्रलय की चपेट में आ जाता है। उनकी कोलोनी पर, निचले क्षेत्र में होने से खतरा बना ही रहता है। लेकिन इस बार तो अलर्ट भी नहीं किया गया तो यह...”

वो दहशत में भरकर जोर से प्रखर को आवाजें  लगाने लगी और गैराज में खेलते हुए अमन को लपककर गोद में उठाकर अन्दर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि किसी समुद्री ज्वार की तरह उछलता हुआ पानी गैराज तक आ पहुँचा और क्षण मात्र में ही प्रमिला के घुटनों तक पहुँच गया। प्रमिला पानी के जोर के कारण अमन को लिए हुए वहाँ से निकलने में भी असमर्थ हो गई। हालात बिगड़ते देख उसने अमन को जल्दी से कार के ऊपर धकेल दिया और स्वयं कार के सहारे वहीं खड़ी होकर जोर-जोर से प्रखर को आवाजें लगाने लगी। अमन डर के मारे मम्मी-मम्मी चिल्ला रहा था। पानी अन्दर की तरफ बढ़ता गया और अमन चिल्लाते-चिल्लाते कार के ऊपर ही बेहोश हो गया।

उस दिन यमुना में अचानक आई बाढ़ ने ज्यों बगावत ही कर दी थी। वो अपने सारे तटबंध तोड़कर शायद आगरा के रहवासियों को ज़िन्दगी से रिहा करने की कसम खाकर चली थी। तूफानी बारिश भी जिद पर अड़ी हुई थी कि आज न बरसी तो कब बरसेगी...लोगों की प्रार्थनाओं का उसपर कोई असर नहीं हो रहा था। सभी लोग  घर या बाहर जहाँ भी थे, अपनों की दुश्चिंता सीने में लिए आत्म-रक्षार्थ ऊँचे स्थानों की ओर  दौड़ रहे थे। शीघ्र ही बाढ़ का पानी घरों में ५-५ फुट तक घुस गया। लोग डूबने चिल्लाने लगे। सड़क पर चौपाये अजीबो गरीब आवाजें निकालते हुए इधर उधर भागने लगे। जो बेखबर थे उन्हें बाढ़ ने बिना खबर दिए निगलना शुरू कर  दिया। उस सजे धजे बंगले के अंदरूनी शानदार शयन-कक्ष में सोए हुए अमन के पिता प्रखर को इस विपदा का आभास तक न था।

जब तक प्रमिला की चीख-पुकार उसके कानों में पड़ी तब तक पानी अन्दर घुस चुका था और उसके पलंग से कुछ इंच ही नीचे था। यह दृश्य देखते ही प्रखर के होश उड़ गए।

वो तुरंत गिरता सँभलता आसपास के सामान का सहारा लेते हुए बाहर की ओर भागा और प्रमिला को सीने तक पानी में डूबी हुई देखकर चिल्लाकर उसे दिलासा देते हुए उसकी ओर तेज़ी से बढ़ने लगा मगर दालान की सीढियों से उतरने के प्रयास में पैर फिसल जाने से वहीँ गिर पड़ा।

कहानी जारी रहेगी, आपने उपन्यास का यह भाग पढ़ा, इसके लिए हार्दिक धन्यवाद

इस भाग के लिए अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।😊

### अध्याय 2

अमन को जब होश आया तो स्वयं को एक नाव में कुछ और बच्चे और बड़े लोगों के बीच देखा तो मम्मी ...पापा...पुकारते हुए रोना शुरू कर दिया मगर सुनता कौन...वहाँ सब तो सहमे हुए थे...कुछ देर में एक ऊँचे स्थान की सूखी ज़मीन पर उन सबको उतारकर नाव वापस पलट गई।

रो रोकर अब अमन के आँसू सूख चुके थे। वो हिचकियाँ लेते हुए वहीं सब ''''लोगों के बीच बैठ गया। किसी को पता नहीं था कि उनके परिजन कहाँ हैं? कुछ बताने या राहत देने वाला कोई नहीं था। यह हादसा सुबह-सुबह ही हुआ था। बाद में और भी बहुत से लोगों को वहाँ लाया गया था। वहाँ बैठे बैठे शाम हो गई, बारिश बंद होने से पानी उतरने लगा था। अब सबको भूख-प्यास सताने लगी थी। मगर आगे क्या होगा यह सोचकर सब भयाक्रांत एक दूसरे का मुँह देखते रहे।

तभी ऊपर आसमान में घरघराहट हुई और एक हेलिकोप्टर से वहाँ भोजन के पैकेट गिराए जाने लगे। कुछ बड़े समझदार बुजुर्गों ने सबको शांत रहने का संकेत देते हुए राहत में आया भोजन बाँटना शुरू किया। यह भूख भी इतनी अजीब चीज़ होती है, कि किसी का कितना भी अजीज बिछड़ जाए, उसपर हावी होना नहीं भूलती। यह उसका धर्म-कर्म जो ठहरा...सबने बेमन से थोड़ा-थोड़ा भोजन किया और आगे की सरकारी गतिविधि और अपनों के वहाँ आने का इंतजार करने लगे। कितने लोग अपने परिजन खो चुके हैं यह कोई नहीं जानता था। कितने अबोध बच्चों के सिर  से नीली छतरी वाले ने माँ-पिता रूपी छतरी छीन ली थी इसका किसी को बोध नहीं था।

बाढ़ तो अपनी विनाश लीला दिखाकर वापस चली गई थी मगर उस काली रात के साथ बहुतों की काली रात शुरू हो चुकी थी। नन्हें अमन ने स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर दिया था।

भोजन बाद उन सबको धीरे-धीरे हेलिकोप्टर की सहायता से राहत शिविर में पहुँचाया गया। फिर अगले दिन जिन लोगों के घर सुरक्षित थे और जिनके  परिजन पहुँच गए थे उन्हें वापस भेज दिया गया बाकी कुछ बच्चों को जिन्हें कोई लेने नहीं पहुँचा, अनाथालय भेज दिया गया।

अमन के गले में परिचय पत्र देखकर व्यवस्थापकों ने उसके घर पर संपर्क करना चाहा तो पता चला कि घर सूना पड़ा था और उसके माँ-पिता लापता थे। आगरा के अनाथालय भर जाने के कारण अगले दिन उसे एक प्राइवेट बस द्वारा दो स्वयंसेवकों के साथ दिल्ली के एक “निर्मला देवी बाल आश्रम” नाम के अनाथालय में पहुँचा दिया गया।

अमन जब आश्रम में पहुँचा, उस समय दिन के दो बज चुके थे।  वो भूख से बेहाल हो रहा था। आश्रम की संचालिका शैलजा ने स्वयंसेवक को बाहरी बरामदे में रखी हुई बेंच पर बिठाकर उस बालक को रसोई में काम करती हुई १४ वर्षीय किशोरी मीनू को आवाज़ लगाकर उसके हवाले किया फिर बरामदे में आकर स्वयंसेवक से अमन की जानकारी लेकर आश्रम के रजिस्टर में दर्ज करके उसे बच्चे की देखरेख के प्रति आश्वस्त करके सम्मानपूर्वक विदा किया।

मीनू उस बालक को स्टोर से धुले हुए कपड़े और साबुन तौलिया देकर अपने निकट ही खड़ी नयना से बोली-

“नयना,  यह अमन है, आज से यह भी यहीं सबके साथ रहेगा इसे नहाने का स्थान दिखा दो  और शीघ्र ही तैयार होकर सब भोजन कक्ष में आ जाओ।”

कहानी जारी रहेगी

### अध्याय 3

नयना...!  दिल्ली के उस अभावग्रस्त अनाथालय में पलने वाली एक अबोध बालिका थी, जिसे जन्म देकर एक शिशु-अनाथाश्रम के बाहर टंगे हुए पालने में छोड़कर उसकी माँ ने यमुना में कूदकर जान दे दी थी। उसने अपनी नवजात बच्ची के साथ रखे हुए अपने सुसाइड नोट में आत्महत्या का कारण स्पष्ट लिखा था मगर उस औरत की हैसियत या पहचान गौण रही होगी अतः उसे इस अवस्था में लाने वाले उस नामी गिरामी रक्तबीज को उसी की बिरादरी के रक्तबीजों द्वारा निर्दोष करार देकर फ़ाइल बंद कर दी गई थी।

नयना नाम भी उसे शिशु अनाथालय द्वारा उसकी बड़ी-बड़ी बोलती आँखों के आधार पर दिया गया था।

वैसे तो उस आश्रम के नियमानुसार नवजात शिशुओं को किसी न किसी ज़रूरतमंद निःसंतान दम्पतियों को गोद दे दिया जाता था लेकिन जो बच्चे दो वर्ष की उम्र तक किसी की गोद नहीं जाते, उन्हें बड़े बच्चों के अनाथाश्रम में भेज दिया जाता था। नयना भी उन्हीं बच्चों में से ही थी जिन्हें इस समय सीमा तक गोद जाने का कोई अवसर नहीं मिला था। अतः उसे “निर्मला देवी बाल-आश्रम” को सौंप दिया गया था, जहाँ २ से २० वर्ष तक के बच्चों को रखा जाता था।

नयना ने जब से होश सँभाला, स्वयं को उस अनाथालय की चौखट के अन्दर ही पाया। दुबली और कुछ लम्बी काया, चेहरा प्रातः किरण जैसा उर्जावान,  नैन नक्श धारदार, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें और सुनहरी सघन केश-राशि की मालकिन थी वो... लेकिन अपनी इन खूबियों के बारे में अनजान वो भोली बालिका हमेशा एक उदासी ओढ़े हुए ही दिखती थी। आश्रम की संचालिका शैलजा को वो अन्य सभी बच्चों के समान आंटी बुलाती थी। जो मिल जाता चुपचाप खा लेना और बाकी समय हमउम्र बच्चों के साथ खेलना ही उसकी दिनचर्या थी।

छः वर्ष की होने पर वो आश्रम के निकट बने हुए अनाथालय के ही स्कूल में पढ़ने के लिए जाने लगी और माँ-पिता की परिभाषा से परिचित हुई।

नयना अब उस परिवार का हिस्सा बन चुकी थी और उस जीर्ण-शीर्ण भवन को ही अपना घर मानने लगी थी।

वैसे तो उस आश्रम में चार कमरे, एक कार्यालय, एक रसोई, एक भोजन कक्ष बना हुआ था मगर वहाँ पलने वाले ४० बच्चों के लिए वो अपर्याप्त था।

उस अनाथालय में बच्चों के लिए न तो धुले वस्त्र  उपलब्ध होते न ही सोने के लिए पर्याप्त स्थान...रात में ज़मीन पर ही मैली कुचैली चादर या दरी डाल दी जाती थी। दो कमरों में लगभग २० बालिकाएँ और दूसरी तरफ के दो कमरों में उतने ही बालक सिकुड़कर सो जाते थे। दिन में सबको  एक साथ रखा जाता था और रात में लड़कों को अपने विभाग में भेज दिया जाता था। ओढ़ने के लिए भी एक चादर में दो बच्चों को काम चलाना होता और सर्दियों में तो तीन-तीन बच्चे एक ही फटे-पुराने कम्बल से सर्दी की ठिठुरन का सामना करने को मजबूर होते थे।

खाने के नाम पर उन्हें कभी सादे पानी में नमक मिर्च का छौंक लगाकर सूखी रोटियों के साथ दिया जाता तो कभी उबले हुए आलू पानी में घोलकर दे दिये  जाते। पेट भर मिले तो यही उनके लिए छप्पन भोग और पकवान थे, अन्यथा इसके लिए भी कभी कभी तरसना पड़ता और भूखे पेट ही सोना पड़ता। ये बच्चे और किसी स्वाद से तभी परिचित होते जब किसी विशेष अवसर पर कोई दान-दाता उन्हें भोजन करवाने आ जाता। धुले हुए वस्त्र भी जब कोई निरीक्षण करने आता तभी पहनने को मिलते थे। सौंदर्य-प्रेमी नयना का बालमन अच्छा पहनने-ओढ़ने-खाने के लिए न जाने कितने ताने-बाने बुनता रहता मगर मजबूरी में वो शक्ति ही कहाँ होती है जो विरोध का स्वर निकाल सके?

छोटी सी उम्र में ही परिस्थितियों ने उसे इतना समझदार बना दिया था कि अनाथालय की सारी अनियमितताओं को वो बखूबी समझने लगी थी। वो देखा करती थी उन दान-दाताओं को, जो किसी न किसी अवसर पर नए वस्त्र, चादरें, कम्बल आदि शैलजा आंटी को सौंपकर जाते थे मगर बच्चों को उनका स्पर्श भी नसीब नहीं होता था। वो अनाथालय में काम करने वाले कर्मचारियों की बातों से यह भी जानने लगी थी कि शैलजा आंटी का उस आश्रम में रहने के बावजूद एक भरा-पूरा परिवार था और उसके परिजन मिलने के लिए आते रहते थे। मगर वे उनके साथ क्यों नहीं रहतीं यह बात कोई नहीं जानता था।

जब भी कोई भलामानस बच्चों के जन्म दिन पर स्वादिष्ट खाद्य सामग्री उन अनाथ बच्चों के लिए देकर जाता तो नयना घूम-घूम कर सभी बच्चों को खुश होकर बताती कि आज उन्हें बढ़िया भोजन खाने को मिलेगा मगर शाम होते ही शैलजा के परिजन आते और खूब जी भरकर खा-पीकर लौट जाते। उस दिन उन्हें देर तक भोजन का इंतजार करना पड़ता और जो कुछ बचा रहता वो चखने मात्र के लिए उन्हें दिया जाता था। इसी कारण जब भी कोई नया बालक/ बालिका वहाँ लाया जाता,  नयना और भी उदास हो जाती थी।

ऐसे में बरसाती मौसम में एक दिन जब एक नया बालक उस अनाथालय में लाया  गया तो उसे मीनू के साथ देखकर आश्रम के सभी बच्चे आँखों में उत्सुकता लिए दूर से देखते रहे। मगर मीनू के निकट ही खड़ी नयना कुछ क्षणों के लिए उदास हो गई फिर अगले ही पल उस सुन्दर सलोने बालक को अपनी उम्र का देखकर उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक व्याप्त हो गई।  वह बड़ा खूबसूरत, गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल, भूरी आँखों वाला, शरीर से हृष्ट-पुष्ट बालक था। नयना का मन उससे बातें करने को मचलने लगा। यों वो सभी बच्चों के साथ हिली-मिली थी लेकिन उस बालक का आकर्षण ही अलग था। वो उससे दोस्ती करने के लिए उतावली हो उठी।

१४ वर्षीय मीनू,  नवीं कक्षा की छात्रा थी। अपनी हमउम्र दो और सहेलियों के साथ स्कूल से वापस आकर रसोई के कामकाज में भी महिला कर्मचारियों का सहयोग करती थी। वो नयना को बहुत प्यार करती थी और नयना को भी मीनू बहुत अच्छी लगती थी। नयना उसे और उसकी दोनों सहेलियों को दीदी कहती थी। यह भी उसे मीनू ने ही सिखाया था। नयना अक्सर उसके आसपास ही मंडराती रहती थी।

जब मीनू दीदी ने उसे ही उस बालक की जवाबदारी सौंपी तो नयना का मन प्रसन्न हो गया। उसकी उदासी पल भर में दूर हो गई। उसने दौड़कर अमन का हाथ पकड़ लिया और लगभग खींचते हुए बाथरूम तक ले आई। अमन हक्का-बक्का सा उसके पीछे खिंचता चला गया और उसका पीछा करती हुई उसकी बीती दास्तान बाथरूम के उखड़े हुए फर्श को देखकर उसके दिमाग के टुकड़े में अपना स्थान आरक्षित करने का प्रयास करने लगी। नयना उसे जल्दी से तैयार होने के लिए कहकर सहेलियों के साथ खेलने में व्यस्त हो गई।

कहानी जारी रहेगी। इस भाग के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा🙏😊

### अध्याय 4

बाथरूम के बूँद-बूँद टपकते नल से नहाता हुआ अमन घटनाक्रम याद करके रो-रोकर सोचता जा रहा था कि क्या उसके मम्मी-पापा अब उसे लेने कभी नहीं आएँगे? मगर यह स्वीकार करना उसके लिए कठिन था। थोड़ी देर में किसी ने बाहर से जल्दी निकलने के लिए आवाज़ लगाई तो उसने अपनी दास्तान को दिमाग के कोने में चित्रांकित करके बदन पोंछकर कपड़े पहने और बाहर आ गया

कुदरत ने एक दिन के अन्दर ही उसे अर्श से गिराकर फर्श पर पटक दिया था।

नयना ने अमन से तुरंत दोस्ती कर ली और अपनी दो प्रिय सहेलियों डाली और लता से परिचय करवाते हुए अपनी टोली में शामिल कर लिया। उसकी सहेलियाँ उसे निन्नी संबोधित कर रही थीं और कुछ ही देर में अमन उन सबके लिए अमू बन चुका था।

सुबह-सुबह माँ के स्नेहिल स्पर्श के साथ उठने और मुँह धुलवाकर दूध-अंडे का नाश्ता  करने वाले अमन को अब बहुत जोर से भूख लग रही थी। उसने नयना से पूछा-

“निन्नी, हमें खाना कब मिलेगा, मुझे तो बहुत भूख लगी है, मैंने तो अभी तक नाश्ता भी नहीं किया।” कहते हुए घर की याद में उसकी रुलाई फूट पड़ी।

“नाश्ता...! अमू, हमें नहीं मालूम नाश्ता क्या होता है। खाना बनने के बाद ही हमें बुलाया जाता है। तब तक हमें नहाकर  तैयार रहना होता है। खाना खाकर हम स्कूल चले जाते हैं फिर दूसरी बार शाम के समय भोजन मिलता है। मगर आज स्कूल की छुट्टी है न... तो खाना भी देर से बनेगा। जब तक हमें बुलाया नहीं जाता,  तब तक हम खेलते ही रहते हैं।”

“निन्नी, मेरे मम्मी-पापा कहाँ हैं मुझे लेने कब आएँगे...?मायूस होकर अमन ने अपने परिचय-पत्र को सहलाते हुए पूछा।”

“पता नहीं अमू,  चलो हम मीनू दीदी से पूछते हैं।” कहते हुए उसका हाथ पकड़कर नयना उसे एक तरफ ले जाने लगी।

मीनू दीदी ने रोते हुए अमन को प्यार से समझा-बुझाकर शांत किया और उसका परिचय पत्र देखते हुए बोली-

“अमन बाबा,  आपको अपना सामान और कपड़े-किताबें रखने के लिए एक अलमारी दी जाएगी, यह परिचय पत्र आप अपनी उस अलमारी में सँभालकर रख लेना। हो सकता है, इसके सहारे आपको अपने माँ-पिता मिल जाएँ...यहाँ रहने वाले सभी बच्चे किसी न किसी तरह अपने माँ-पिता खो चुके हैं। आप भी अब रोना छोड़कर इनके साथ मिलकर रहना, खेलना, खाना और स्कूल जाना शुरू कर दो। और हाँ, भोजन तैयार हो चुका है, जल्दी से सब पहुँच जाओ”।

बच्चों के भोजन कक्ष में पहुँचते ही  एक कर्मचारी ने एक फटी-पुरानी बड़ी सी दरी बिछाकर उन्हें कतार बनाकर बैठने का इशारा किया और सबके सामने एक प्लेट में कटोरा रखते हुए आलू का पतला शोरबा परोस दिया। नयना और बच्चों ने हाथ जोड़कर आँखें मूँदकर ईश्वर का धन्यवाद किया और चुपचाप शोरबा पीने लगे।  अमन के रोटी/चावल माँगने पर कर्मचारी कुछ नरमी से बोला-

“आज सामान ख़त्म हो जाने से भोजन में यही बना है बच्चों,  सामान आ जाएगा तो शाम को सब्जी रोटी बनेगी फिर भरपेट खा लेना।”

अमन, नयना और उसकी दोनों सहेलियाँ, डाली और लता एक ही कतार में बैठे थे। नयना अमन के पास ही बैठी थी। अमन को तो ऐसा भोजन और व्यवस्था देखकर उबकाई सी आने लगी। उसकी आँखों में  आँसू देखकर नयना दुखी होकर बोली-

“अमू, जो कुछ भी है खा लो, देखो सभी बच्चे भी यही भोजन कर रहे हैं। तुम भूखे रहोगे तो मेरे साथ कैसे खेलोगे और फिर तुम नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊँगी।”

अमन को भला यह बात कैसे हज़म होती कि नयना उसके लिए भूखी रहे। उसने चुपचाप शोरबे का पात्र उठाकर होठों से लगा लिया। कुछ ही मिनटों में बच्चों ने उठकर हाथ-मुँह धो लिए और खेलने के लिए आश्रम के बाहर जहाँ उनका स्कूल लगता था,  पहुँच गए। आज स्कूल बंद था और किताबों से मुक्ति...अतः जी भरकर खेलना ही उनके सारे गम सोखने का साधन था।

बचपन पर वैसे भी खुशियाँ अथवा गम हावी नहीं हो पाते, बच्चों को समय की धारा बहाकर जहाँ  पहुँचा दे, अपना ठिया बना ही लेते हैं। अमन भी अब इस दिनचर्या का आदी हो चला था। जैसा मिल जाए खा-पहन लेना और मस्त रहना ही उसके जीने का उद्देश्य हो गया था। आश्रम के सभी बच्चे उम्र और पसंद के आधार पर तीन-चार टोलियों में बंटे हुए थे।

नयना की सहेलियाँ डाली और लता भी उसकी तरह ही माँ-पिता द्वारा जन्म समय से ही त्याग दिए जाने की वजह से आश्रम में पल रही थीं तो उनमें आपसी लगाव भी स्वाभाविक था और अमन का परिचय अब तक उसके हमउम्र कुशल, कीरत और रतन नाम के तीन लड़कों से हो चुका था। वे वहाँ इधर-उधर सड़कों पर भटकते हुए  लाए गए थे। इन सात बच्चों का अब एक ही समूह बन गया था। उनका सोना-जागना, खाना-खेलना और स्कूल जाना सब एक साथ ही होता। इन सबके साथ अमन ने अपनी अभावग्रस्त ज़िन्दगी को आपसी मेल-मिलाप से आसान बनाना सीख लिया।

अमन को आए एक सप्ताह हो चुका था। अब वो पुरानी यादों को अपने परिचय पत्र के साथ आश्रम से मिली हुई अलमारी में सहेजकर नयना और साथियों के साथ नई ज़िन्दगी शुरू कर चुका था, जिसमें सुख-सुविधाओं और सपनों का कोई स्थान न होते हुए भी अपनापन, एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण की गहराई मौजूद थी।

आश्रम कम क्षेत्रफल में बना हुआ होने के कारण उसकी चारदीवारी से बाहर खाली जमीन पर बने हुए एक पुराने हालनुमा भवन को चार-पाँच हिस्सों में बाँटकर आधी ईंट की दीवार खड़ी करके पाँच कक्षाएँ और एक छोटा सा ऑफिस बना कर जूनियर हाईस्कूल का नाम दिया गया था, जहाँ एक प्रधानाध्यापक और दो शिक्षक मिलकर सुबह पहली से पाँचवीं और दोपहर को छठी से आठवीं कक्षा तक पढ़ा दिया करते थे। उनकी उपस्थिति  भी नियमित नहीं होती थी और अक्सर गायब ही रहते थे।

बच्चे जैसे-तैसे दो तीन घंटे स्कूल में बिता देते फिर स्कूल के बंद होने के बाद देर शाम तक आसपास उनका खेलकूद चलता रहता। लंगडी, खो-खो,  कबड्डी आदि तो स्कूल के समय ही बीच की छुट्टी में खेले जाते थे फिर बाद में उन सबका पसंदीदा खेल लुका-छुपी ही होता था। बाहर तो बाहर, आश्रम के परिसर में भी स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा जाता था। कहीं कचरे का ढेर तो कहीं टूटे फूटे फर्श, ईंट-पत्थर आदि के टीले बने हुए दिखते थे। आए दिन कोई न कोई बच्चा बीमार हो जाता था और चिकित्सा की भी उचित व्यवस्था न होने के कारण कई दिन रोग के साथ जीना ही उनकी नियति हो जाती थी।

गेट पर तैनात चौकीदार की निगरानी में ही सभी बच्चे स्कूल आते जाते थे। दूसरी पाली के बच्चों की छुट्टी होने के कुछ देर बाद ही बच्चों के खेल कूद शुरू हो जाते थे।

कहानी जारी रहेगी,  आपने यह भाग पूरा पढ़ा, हार्दिक धन्यवाद, अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दर्ज करें।🙏😊

### अध्याय 5

उस दिन सभी बच्चे अपने अपने समूह बनाकर मनपसंद खेल खेलने में लगे हुए थे। अमन और नयना के समूह को लुका छुपी खेल बहुत प्रिय था। वे अक्सर यही खेल खेलते थे। एक बच्चा आँखें मूँदकर १०० तक गिनती गिनता तब तक बाकी बच्चे इधर उधर छिप जाते थे। नयना और अमन एक साथ स्कूल-परिसर  में फैली कँटीली झाड़ियों के पीछे एक ऐसे स्थान पर छिप जाते थे जहाँ कुछ दूर होने के कारण आसानी से किसी की नज़र नहीं पड़ती थी। इस तरह वे दोनों दाम देने से बचे रहते थे।

एक बार वहाँ से निकलते हुए अमन पकड़ा गया तो दाम उसी को देना पड़ा। इस बार भी नयना जानबूझकर वहीं छिप गई क्योंकि वो अमन के हाथों आउट होकर दाम देना चाहती थी। बरसात का मौसम अभी बीता नहीं था । शायद यह एक संयोग ही था कि अमन ने १०० तक गिनती गिनकर जैसे ही आँखें खोलीं तो अँधेरा सा दिखने लगा। बादल देखकर वो सहम गया और अपने साथ हुई दुर्घटना की याद ताजा हो गई। वो हर तरफ दौड़ दौड़ कर जोर-जोर से सबको बरसात की चेतावनी देते हुए अपने स्थान से निकलने को कहकर अंदर की तरफ भागा लेकिन अगले ही पल नयना का विचार आते ही वहीं चारदीवारी के पास एक वृक्ष के नीचे खड़ा होकर उसका इंतजार करने लगा।

बारिश शुरू हो गई थी और सभी बच्चे उसके सामने से गुजरते हुए अंदर भाग निकले मगर नयना ने दूर होने के कारण शायद उसकी आवाज़ नहीं सुनी थी तो उसे न देखकर अमन भीगता हुआ अपने छिपने के स्थान की ओर भागा तो देखा नयना बाहर आने के प्रयास में झाड़ियों के काँटों में अटककर गिर गई थी। ज़मीन कच्ची होने से पानी गिरते ही कीचड़ और फिसलन हो जाने के कारण वो उठ  नहीं पा रही थी अमन ने उसे रोते देखकर हाथ पकड़कर उठाया और चुप कराते हुए उसका गाल चूम लिया।

नयना तुरंत चुप हो गई मगर अमन को धकेलकर अपना गाल सहलाते हुए रोषपूर्वक बोली

“छिः अमू,  तुमने मेरा गाल जूठा क्यों किया?”

“गाल भी जूठा होता है क्या निन्नी,  मैं तो जब भी रोता था, मम्मी मुझे इसी तरह  प्यार से गाल चूमकर चुप कराती थी” ।

“अच्छा... मम्मी बहुत अच्छी होती है न अमू...”

“बहुत अच्छी निन्नी, पापा भी बहुत अच्छे होते हैं, मगर न जाने क्यों आज तक मुझे लेने क्यों नहीं आए? वे मुझे कैसे भूल गए,  क्या उन्होंने मुझे ढूँढा न होगा?”

कहते हुए अमन उदास हो गया। उसकी नम आँखों को देखकर अब नयना ने प्यार से उसका गाल चूमते हुए कहा-

“रो मत अमू, अब हम इसी तरह एक दूसरे को चुप करवाया करेंगे”

“फिर तुम गाल जूठा होने की शिकायत तो नहीं करोगी न...”

“नहीं, मैं मुँह धो लिया करूँगी”।

“अच्छा निन्नी, जल्दी चलो यहाँ से, बारिश तेज़ हो जाएगी”।

“जल्दी कैसे चलूँ अमू, मेरे पैर में काँटे चुभ गए हैं। कहते हुए वो फिर रोने लगी”।

अमन ने उसका हाथ पकड़ा और बोला-

“अच्छा धीरे धीरे चलो,  भीग तो गए ही हैं न,  दीदी की डांट खा लेंगे और कपड़े बदल लेंगे”।

उन दोनों को भीगते हुए अंदर जाते देखकर चौकीदार ने भी गुस्से से भरकर डाँट दिया कि आगे से इतनी दूर गए तो आंटी से शिकायत करनी पड़ेगी।

कहानी जारी रहेगी, इस भाग पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा🙏😊

### अध्याय 6

समय गुजरता रहा और नयना-अमन की दोस्ती प्रगाढ़ होती गई। एक दिन दोपहर के समय बच्चे छुट्टी होने से स्कूल-परिसर में खेलने में व्यस्त थे। तभी एक सज्जन ने भोजन वस्त्रों के पैकेट उठाए अपने कर्मचारी के साथ उस भवन में प्रवेश किया। नयना की नज़र जब आश्रम के बरामदे की बेंच पर शैलजा से बातें करते हुए उस सज्जन पर पड़ी तो वो दौड़कर अमन को एक तरफ ले गई और उस तरफ इशारा करते हुए बताया-

“वो देखो अमू,  वो अंकल यहाँ आते ही रहते हैं। वे बहुत अच्छे हैं,  हमें एक साथ बिठाकर अपने सामने ही भोजन करवाते हैं। कभी-कभी वे रात में भी बहुत देर तक यहीं रहते हैं। आज भी ये हमें भोजन करवाकर ही वापस जाएँगे...

वैसे तो बहुत लोग खाने पीने की चीजों के अलावा भी बहुत सारे सामान- कम्बल, अनाज, वस्त्र आदि दान में दे जाते हैं। लेकिन वे सामान केवल हमें दिखाने के लिए होते हैं। देर रात को आंटी के घर से लोग आते हैं और खाना खाने के बाद सारा सामान अपने साथ ले जाते हैं।”

“मगर निन्नी, तुम यह सब कैसे जानती हो?”

“मुझे यह सब मीनू दीदी बताती रहती हैं। वो यह भी बताती हैं कि यहाँ काम करने वालों को कई महीने वेतन नहीं दिया जाता तो अब उनकी संख्या कम हो गई है अतः उन्हें और उनकी दो और दीदी लोगों को रसोई में बहुत काम करना पड़ता है। उनका और कोई नहीं है तो शादी होने तक वो यह घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकतीं। मीनू दीदी मुझे बहुत प्यार करती है। आंटी तो अधिक समय इन्हीं अंकल के साथ बाहर जाती रहती हैं...” कहते हुए नयना अचानक उदास हो गई।

“अरे निन्नी, अब मैं हूँ न! तुम उदास मत हुआ करो। तुम्हारी वे सहेलियाँ, डाली और लता भी तो बहुत अच्छी हैं। मेरे तीनों दोस्त कुशल, कीरत और रतन भी कितने अच्छे हैं! हम सब साथ हैं तो हमें कोई परेशान नहीं कर सकेगा...चलो अब अन्दर चलें बहुत भूख लगी है।”

सभी बच्चे उछलते-कूदते हुए आश्रम के गेट से अन्दर दाखिल हुए तो अंकल यानी माणिक सेठ उन्हें रोककर प्यार से हालचाल पूछने लगे। नयना को अमन का हाथ थामे देखकर बोले-

“अरे मेरी गुड़िया, आज तो बहुत खिली-खिली लग रही हो, तुम्हारे साथ ये कौन बालक है?” सेठजी नयना को प्यार से गुड़िया कहकर ही बुलाते थे।

“ये अमन है, अंकल जी...ये आगरा से आया है।”

सेठजी जानते थे कि किसी बच्चे के उस आश्रम में आने का क्या कारण होता है अतः उसने बात बदलते हुए तुरंत कहा-

“ठीक है बेटे अमन, यहाँ आपके बहुत से दोस्त हैं, अपने को कभी अकेला न समझना...”

तभी शैलजा बोल पडीं-

“बच्चों, आज सेठजी के बेटे का जन्म दिन है, ये आप सबके लिए बहुत अच्छा भोजन और मिठाई लेकर आए हैं। जल्दी से हाथ धोकर भोजन कक्ष में चलो।”

सभी बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी भोजन कक्ष में पहुँचकर चटाई पर कतार बनाकर बैठ गए।

सेठजी और शैलजा ने बैठने के लिए कुर्सियाँ खींच लीं और सेठजी के साथ आया हुआ उनका कर्मचारी बच्चों को भोजन परोसने लगा।

इस तरह नयना और अमन हँसते-खेलते हुए बचपन की सीढ़ियाँ पार करके किशोर अवस्था में  पहुँच गए। आठवीं कक्षा में पहुँचने के साथ ही उनकी मानसिक और बौद्धिक शक्तियों का विकास होने लगा था। वे अब अपने अंदर हो रहे शारीरिक परिवर्तनों के चलते आमने-सामने होने पर शरमाने लगते थे। लुका-छिपी खेलना, एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना और गाल चूमना छूट गया था। मगर मन ही मन एक दूसरे के प्रति आकर्षण और बढ़ने लगा था।

अब वे जब भी फुरसत में होते, अपनी आगे की पढ़ाई और कैरियर की चिंता जताने लगते थे। मगर इसके साथ ही जब उन्हें पता चला कि आठवीं के बाद वहाँ के नियमानुसार लड़कों को तो अन्यत्र किसी लड़कों के ही आश्रम में भेज दिया जाता है और लड़कियों को दो किलोमीटर दूर स्थित एक सरकारी उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला में दाखिला दिला दिया जाता है। १२ वीं तक पढ़ाई पूरी होने के बाद वे बालिग हो चुकी होती हैं अतः नियमानुसार उनको आश्रम से विदा कर दिया जाता है अथवा उनके और आश्रम के संचालकों के आपसी अनुबंध के तहत विवाह होने तक आश्रम के कार्यों में सहयोग करना होता है।

उन दोनों को एक दूसरे से दूर होने के अहसास मात्र से ही अकेलेपन का डर सताने लगा। दोनों के मन के तार अनजाने में ही इतने गहरे जुड़ गए थे कि अब अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। वो पूरा साल उनके मनोमस्तिष्क में उथल-पुथल मचाता रहा। आश्रम में वैसे ही केवल एक शिक्षक के सहारे ही पढ़ाई संपन्न होती थी ऊपर से अलगाव के बोझ से लदे होने होने के कारण उनकी पढ़ाई भी ठीक तरह से नहीं हो पाई।

परीक्षाएँ सिर पर आ गई थीं मगर एक दूसरे से जुदा होने का गम उनकी एकाग्रता में बाधा बना हुआ था। स्कूल की आधी छुट्टी हो या खेलने की, ये दोनों एक तरफ बैठकर चिंतातुर अपने भविष्य की योजना पर चर्चा करते रहते। अमन कहता-

“निन्नी,  मैं जानता हूँ कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं और जुदा होकर कभी जी नहीं सकते मगर अभी हमारी उम्र इतनी नहीं कि एक साथ रहने की बात सोचें। मैं जहाँ भी जाऊँगा, बालिग होते ही तुमसे मिलने अवश्य आऊँगा फिर आगे की पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद तुम्हें दुल्हन बनाकर साथ ले जाऊँगा। तब तक तुम इसी आश्रम में मेरा इंतज़ार करना। तुम्हें हर हाल में हिम्मत से काम लेना होगा। खुद को कभी अनाथ न समझना। अपनी सहेलियों के साथ मिलकर अपनी आत्म-शक्ति के सहारे आगे बढ़ना होगा। अब परीक्षा समाप्त होने तक हम नहीं मिलेंगे और बेहतरीन परिणाम लाने का प्रयास करेंगे”।

“मैं पूरा प्रयास करूँगी अमू, मगर अपना वादा भूल मत जाना। हमारे पास तो संपर्क का भी कोई साधन नहीं... ऐसा न हो कि तुम दूर जाकर नई दुनिया बसा लो और नयना के नयन बरसते-बरसते सावन भादों बन जाएँ” कुछ शर्माते हुए नयना बोली।

“ऐसा कभी नहीं होगा निन्नी,  याद रहे, जिन गालों पर मेरे मासूम बचपन के अनगिनत चुम्बन अंकित हैं उन्हें अपने आँसुओं से धो मत डालना,  उन्हें मेरे प्यार की निशानी समझकर सहेजकर रखना। मुझे मेरी इच्छा के अनुसार मेरे आगरा के अनाथाश्रम में भेजा जाएगा ताकि मैं पुनः अपने शहर से जुड़ सकूँ। कुशल कीरत और रतन भी मेरे साथ ही रहेंगे। जिस माँ यमुना ने मुझसे मेरे माँ पिता को जुदा किया, मैं उसकी कसम खाकर कहता हूँ निन्नी, वही हमारे मिलन की साक्षी बनेगी। यह मेरा वादा और अटल इरादा है”।

परीक्षाएँ समय पर संपन्न हो गईं और परिणाम भी आ गया। नयना चूँकि शुरू से ही मेधावी थी अतः वो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई थी बाकी अमन सहित डाली, लता, कुशल, कीरत और रतन सभी द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे लेकिन उन सबके लिए यह उपलब्धि भी कम नहीं थी। वे आगे की पढ़ाई में और अधिक मेहनत करने का मन ही मन संकल्प कर चुके थे।

आखिर वो दिन भी आ गया जब सभी लड़कों को दिल्ली के लड़कों के आश्रम में भेज दिया गया। मगर अमन और उसके तीनों साथियों को आगरा के एक आश्रम में पहुँचा दिया गया। उस आश्रम में अब कुछ नए छोटे-छोटे बच्चे आ गए थे। यह चक्र वहाँ चलता ही रहता था और हर बालक-बालिका को वहाँ के नियमानुसार चलना ही उनकी नियति थी।

क्रमशः ...

### अध्याय 7

अमन के जाने के बाद नयना ने फिर से उदासी ओढ़ ली थी। डाली और लता पहले तो यह देखकर हैरान होती थीं। चूँकि बचपन कोई बोझ लेकर नहीं चलता, कौन किसके साथ अधिक रहता है, इससे किसी को कोई मतलब नहीं रहता और किसी से भी कुट्टी या बुच्ची चलती रहती है। मगर किशोरावस्था में कदम रखते ही  नयना के प्रति अमन के झुकाव से उन्हें ईर्ष्या अवश्य होने लगी थी क्योंकि अमन के कारण उन्हें नयना की उपेक्षा सहनी पड़ती थी,  लेकिन उनके मन में उन दोनों के प्रति द्वेष भाव कभी नहीं पनपा। उनसे नयना का दर्द देखा नहीं जाता था। वे उसे भरसक बहलाने का प्रयास करतीं और उसे कभी अकेली नहीं छोड़ती थीं। फिर कुछ ही समय बाद मीनू और उसकी सहायक लड़कियों,  माया और ममता के विवाह की चर्चा होने लगी तो नयना ने अपना ध्यान उस तरफ केंद्रित कर लिया। मीनू का लगाव नयना से अधिक था और अब वो दुनियादारी की बातें समझने लगी थी अतः वो अपनी अंतरंग बातें भी नयना से साझा करने लगी थी।

तीनों लड़कियों की शादी की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। आश्रम में वो कुछ ही दिन की मेहमान थीं अतः नयना, डाली और लता अधिकांश समय उनके साथ ही बनी रहती थीं। नयना ने नोट किया कि सेठजी सारे आयोजनों में आगे रहने के साथ ही विवाह की खरीदारी में भी विशेष रुचि ले रहे थे। वो अक्सर शाम के समय आश्रम आ जाते थे फिर शैलजा को कार में अपने साथ ले जाते थे। वापस आने पर देर रात तक वहीं बने रहते थे।

कुछ ही दिनों में उन लड़कियों के लिए कुछ हल्के-फुल्के गहने, कपड़े और गृहस्थी का आवश्यक सामान जुटा लिया गया। नयना मन ही मन अंदाज़ लगाती रहती कि लड़कियों के विवाह का खर्च कहाँ से आता है? आखिर एक दिन नयना ने जिज्ञासावश फिर से मीनू के पास जाकर पूछ लिया-

“दीदी, क्या आप सबके विवाह का सारा खर्च सेठजी कर रहे हैं”?

“नहीं मेरी भोली बहना, यहाँ धार्मिक प्रवृत्ति के रईस लोग लड़कियों की शादी के लिए काफी धन दान में देते रहते हैं। कुछ सहायता सरकार की तरफ से मिल जाती है जिसका विवरण रजिस्टर में दर्ज करके औपचारिक घोषणा कर दी जाती है। यह भी मैंने एक बार अचानक शैलजा आंटी की सेठजी के साथ हुई बातचीत सुन ली थी वरना हमें इसकी कोई जानकारी नहीं होती। विवाह करवाने और खर्च का सारा श्रेय सेठजी ले लेते हैं। किसी तरह की कोई पूछताछ नहीं होती बल्कि बड़े अधिकारी भी उनके साथ आकर अपने अनुमोदन के साथ सेठजी की प्रशंसा के समाचार अख़बारों में छपवाते हैं।

मैंने एक बार शैलजा आंटी से उनको अच्छे मूड में देखकर उनसे इस बारे में पूछा था तो उन्होंने यही कहा था कि इस आश्रम की लड़कियों के विवाह करवाने का दायित्व सेठजी का ही है,  वे एक नामी रईस व्यापारी होने के साथ ही इस आश्रम के मालिक और प्रबंधन समिति के प्रमुख हैं अतः दानस्वरूप आये हुए धन का लेखा-जोखा  उनके पास ही रहता है।”

“ओह, दीदी! अब एक बात और बता दीजिये कि विवाह के बाद आप लोग हमसे मिलने तो आया करेंगी न”?

“मैं यह भी नहीं जानती निन्नी,  हम १४ वर्ष तक इस आश्रम की पहली संचालिका माया देवी के सान्निध्य में पली हैं। उसके बाद यह शैलजा आंटी आईं। हमसे पहले विवाह कर चुकीं लड़कियाँ उन दिनों हमसे मिलने आती रहती थीं लेकिन बड़े मालिक की मृत्यु के बाद फिर कभी नहीं आईं। हमने कई बार शैलजा आंटी से उनसे मिलवाने के लिए याचना की मगर उन्होंने इस बारे में अनभिज्ञता जताते हुए रुखाई से यही कहा-

“उनके जीवन में झाँकने की अब किसी को कोई आवश्यकता नहीं, अपने काम से मतलब रखो।”

एक दिन सेठजी अपने साथ विवाह के इच्छुक कुछ लड़कों को ले आए। मीनू, माया और ममता को भी तैयार करवाकर बाहरी परिसर में बुलाया गया। उन लड़कों में से जिन तीन लड़कों ने एक एक लड़की को पसंद किया, उनके नाम सेठजी ने लड़कियों के नाम के साथ नोट कर लिए बाकी उनके पूरे परिचय के साथ तो सेठजी वाकिफ थे ही, अतः उन लड़कों को आश्वस्त करके आगे का कार्यक्रम तय होने के बाद सूचित करने का आश्वासन देकर सबको विदा किया।

कुछ समय बाद ही शैलजा और सेठजी ने सम्बंधित अधिकारियों को सूचित करके विवाह-समारोह आयोजित करने की अनुमति ले ली और विवाह का दिन तय कर लिया गया।

यह सब होने के बावजूद नयना उनके रिश्ते से संतुष्ट नहीं थी क्योंकि उसे उनकी जोड़ियाँ बेमेल लग रही थीं। आखिर एकांत पाते ही उसने मीनू से पूछ ही लिया-

“मीनू दीदी, आपने उस व्यक्ति को पसंद कैसे कर लिया, कहाँ आप इतनी सुंदर और कहाँ वो?  रूप रंग में तो आपके सामने वो कुछ नहीं लगता और उम्र में भी आपसे काफी बड़ा लग रहा है”।

मीनू ने उदासी भरे स्वर में जवाब दिया-

“मेरी गुड़िया, हम अनाथ लड़कियों की पसंद-नापसंद का यहाँ कोई महत्व नहीं है, न ही मुँह खोलने का अधिकार...क्योंकि अधिकार केवल इंसानों के लिए होते हैं और हमें यहाँ इंसान समझता ही कौन है?  ये सब देखना दिखाना केवल औपचारिकता है।”

“मगर सेठजी तो बहुत भले हैं,  आप उनसे मन की बात कह सकती थीं न”!

“उनका भलाई का बाना कितना कृपण है, यह तुम नहीं समझ सकोगी निन्नी...इनके पिता एक देवता थे और ये उनके विपरीत एक दैत्य ही कहलाने योग्य हैं”

“मगर दीदी, मैं समझना चाहती हूँ, क्योंकि आप तीनों की शादी के बाद हमें भी इसी स्थिति का सामना करना है, फिर मैं अपने सवालों के जवाब किससे माँगूँगी दीदी”?

“अभी केवल इतना जान लो निन्नी, कि तुम्हें भेड़ की खाल में छिपे इस आश्रम के सभी मर्द भेड़ियों से सावधान रहना है, बाकी सब धीरे धीरे समझने लगोगी।”

“तो क्या सेठजी भी...”?

“हाँ निन्नी...”

नयना मीनू की बात कुछ समझी कुछ न समझी। वो उसके उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई बल्कि उसके कथन की गूढ़ता ने उसके मस्तिष्क में द्वंद्व छेड़ दिया। शायद दीदी उसे कच्ची उम्र की समझने के कारण पूरी बात बताना नहीं चाहती मगर उसने उस नीच और निरंकुश इंसान की पूरी वास्तविकता जानने का दृढ़ निश्चय कर लिया था अतः पुनः मीनू से याचना भरे स्वर में कहा-

“दीदी लगता है, आप मुझसे कुछ छिपा रही हैं मगर दीदी यह तो आप भी समझती होंगी कि बेसहारा बच्चों का बौद्धिक विकास सामान्य सर्व सुविधा भोगी बच्चों की अपेक्षा जल्दी हो जाता है, वे दुनियादारी की बातें बहुत जल्दी समझने लगते हैं। आपकी बातों ने मेरे मन में उथल-पुथल मचा दी है और मेरी जिज्ञासा आपको शांत करनी ही होगी”।

“निन्नी, तुम्हें इतनी कृतसंकल्प देखकर एक शर्त पर तुमसे अपनी निजी बातें साझा कर रही हूँ। मगर ध्यानं रहे, किसी अन्य को इसकी भनक भी नहीं लगनी चाहिए वरना सेठजी नीचता की किसी भी हद तक जा सकते हैं और मेरे जाने के बाद तुम्हारा जीना दूभर कर देंगे...बस इसी एक वजह से मैं मुँह नहीं खोलना चाहती थी।”

“अगर आप मेरी या मेरी सहेलियों की सुरक्षा के लिए इतनी चिंतित हैं और बात इतनी गंभीर है दीदी, तो आप बेफिक्र रहिये, मैं आपकी बात का पूरा ध्यान रखूँगी।”

“तो सुनो निन्नी,  मैं यह तो नहीं जानती कि इस आश्रम के कानूनी नियम कायदे क्या हैं और क्या गैर कानूनी है, मगर सेठजी और शैलजा आंटी का अधिकतर एक साथ आना-जाना और आश्रम की गतिविधियों में सेठजी का हस्तक्षेप बना रहना इस बात का संकेत करता है कि वे कोई विशेष व्यक्ति हैं। आश्रम के सभी पुरुष कर्मचारी शैलजा आंटी और इन्हीं सेठजी की शह पर युवा होती हुई लड़कियों का यौन शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं। तुमने देखा होगा कि वे जब भी बच्चों के लिए भोजन आदि लाते हैं तो देर रात तक बने रहते हैं। वो इसलिए कि सिर्फ रात का अन्धकार ही ऐसे वासना-लोलुप नर-पिशाचों के कारनामें अपने आगोश में छिपा सकता है।

१२ वीं तक शिक्षा पूर्ण होते ही लड़कियों को आश्रम छोड़ने के लिए कह दिया जाता है। फिर उनके सामने यह प्रस्ताव भी रखा जाता है कि वे चाहें तो विवाह होने तक आश्रम में रह सकती हैं। मगर रसोई अथवा आश्रम के हर कार्य में उन्हें सहयोग करना होगा और बिना संचालकों की अनुमति के आश्रम के बाहर आना जाना उनके लिए वर्जित होगा।

जब लड़कियों को विवाह होने तक रहने खाने की सुविधा उपलब्ध हो तो भला आश्रम छोड़कर वे लावारिस भटकना क्यों पसंद करेंगी? हमने भी उनकी हर शर्त मानकर आश्रम में ही रहना स्वीकार कर लिया। हमें क्या पता था कि युवा अनाथ लड़कियाँ कहीं भी रहें, उन्हें सम्मान के साथ सुरक्षा नसीब नहीं होती।

एक बार लड़कियाँ रहना स्वीकार कर लें तो फिर उनको पोल खुलने के डर से विवाह से पहले कहीं जाने नहीं दिया जाता। उनका आश्रम के गेट से बाहर निकलना निषिद्ध कर दिया जाता है। उन्हें तरह तरह के प्रलोभन देकर भावनात्मक दबाव बनाकर अपनी बात मनवाई जाती है। यौन शोषण का यह घिनौना घुन उनके तन मन को इस कदर निचोड़कर सत्वहीन कर देता है कि वे किसी तरह छुटकारा पाने के लिए विवाह प्रस्ताव आते ही बिना कुछ सोचे समझे तैयार हो जाती हैं। विवाह से पहले उन्हें गर्भवती नहीं होने दिया जाता।

हमारा भी शर्तों पर रहने की सहमति के साथ ही शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का अध्याय आरम्भ हो गया। हमसे मनमाना कार्य लेने के बावजूद अँधेरे में सेठजी द्वारा हम लड़कियों का कौमार्य कुचला जाने लगा और यह सब शैलजा आंटी की नाक के नीचे ही संपन्न होता है। मुँह खोलने पर हमें मारकर फेंक देने अथवा किसी वेश्यालय में बेच देने की धमकी दी जाती रही। हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पातीं क्योंकि उनकी पहुँच उनके कथनानुसार ऊपर तक है और हमने स्वयं यहाँ रहना स्वीकार किया है। चोरी छिपे भाग भी जाएँ तो हमें कहीं आसरा मिलने की उम्मीद नहीं होती बल्कि पकड़ लिए जाने पर नारकीय जीवन में धकेल दिए जाने का डर रहता है। एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति बन जाती है। उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब दूसरी छोटी लडकियाँ पढ़ाई समाप्त करके बालिग हो जाती हैं तब पुरानी लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है। लड़के भी अनाथ, अभावग्रस्त, कुरूप अथवा गरीब ही चुने जाते है ताकि वे विरोधी स्वर हलक से  निकालते ही हलाल कर दिए जाएँ।”

मीनू की बाते सुनकर नयना के रोंगटे खड़े हो गए। मगर अब उसका मनोबल और दृढ़ होता गया। उसने तय कर लिया कि सब्र के साथ अपना सफ़र शुरू करके ही मंजिल हासिल हो सकेगी तब तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

नियत तिथि पर आश्रम के सदस्यों और कर्मचारियों के अलावा शैलजा और सेठजी द्वारा अधिकारियों को निमंत्रण भेजकर बुलाया गया। वर पक्ष से लड़कों के अभिभावक के रूप में उनके कुछ मित्र और परिचित शामिल हुए क्योंकि तीनों  लड़के भी लड़कियों की तरह अनाथ थे। माया का विवाह वैभव के साथ, ममता का शिशुपाल के साथ और मीनू का विवाह मिलिंद के साथ गठबंधन के साथ विवाह  समारोह संपन्न हुआ और तीनों जोड़ों को पहले से जुटाए हुए गृहस्थी के आवश्यक सामान  के अलावा आभूषण वस्त्रादि देकर विदा किया गया।

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### अध्याय 8

सृष्टि निर्माण के समय विधाता ने निश्चित ही कुछ इंसानों में हैवानी हवस इतनी कूट कूट कर भर दी होगी, जो युगों से मानवता को कलंकित करते आ रहे हैं। ये ऐसे रक्तबीज होते हैं जिनके जीवाश्म सदियों तक फिर-फिर आकार लेकर अपने दुष्कर्मों से इतिहास को दोहराते रहते हैं। फिर चाहे कितने भी अवतार जन्म लेते रहें मगर इन रक्तबीजों का जड़ मूल से समापन असंभव हो जाता है, क्योंकि इनका पोषण ऊँची पहुँच वाले रक्तबीजों द्वारा ही होता आया है अतः ये रूप बदल-बदल कर हर युग के अवतारों पर भी हावी होते रहते हैं।

माणिक सेठ!! जिनका वर्चस्व “निर्मलादेवी बाल आश्रम” पर हावी था,  स्थापित रक्तबीजों की  श्रंखला की एक सुदृढ़ कड़ी थे। उन्होंने अपने पिता ज्ञानचंद, जो “निर्मलादेवी बाल आश्रम” के संस्थापक थे, की नेकनामी के बल पर ऐसे राजनेताओं के साथ जुड़कर अपनी गहरी पैठ बना ली थी, जो उसके काले कारनामों में साथ देते रहें।

“निर्मलादेवी बाल आश्रम” की स्थापना सेठ ज्ञानचंद ने अपनी मृत पत्नी के नाम पर की थी। वे दिल्ली के एक प्रसिद्ध अनाज व्यापारी थे और समाज में अपनी नेकदिली और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। वे एक समाजसेवक और अनेक सामाजिक संगठनों के सदस्य भी थे। शानदार बंगला और नौकर चाकर उसने अपनी मेहनत के बल पर हासिल किए थे। माणिक उनका इकलौता पुत्र था।

माणिक का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ था। बचपन से ही मोहल्ले के बच्चों के बीच नेतागिरी दिखाना,  मारपीट करना उसका प्रिय शगल था। लेकिन ज्ञानचंद की सज्जनता का ख्याल करते हुए लोग उसकी शिकायत न करके समझा दिया करते थे। माणिक के १० वर्ष का होने पर उसकी माँ निर्मला देवी अपनी लम्बी लाइलाज बीमारी से कम उम्र में ही चल बसी। पत्नी की मृत्यु के बाद सेठ ज्ञानचंद को अकेलापन काटने लगा। वे माणिक के पालन-पोषण का अधिकाँश भार अपने सेवकों पर डालकर स्वयं सामाजिक संस्थाओं से जुड़ गए थे और उन्हीं दिनों अनाथालय की स्थापना भी की।

माणिक का मन पढ़ाई में कम लगता था, लेकिन बुद्धि तीव्र होने से उसे कक्षाओं में पास होने जितने नंबर मिल ही जाते थे। आठवीं कक्षा पास करके हाईस्कूल में प्रवेश के साथ ही उसका पिता के स्वभाव के विरुद्ध आचरण उजागर होने लगा और वह असामाजिक गतिविधियों में लिप्त होने लगा। पड़ोस मोहल्ले और राह चलती लड़कियों को छेड़ने में उसे रस आने लगा था। पड़ोसी ज्ञानचंद को जितने आदर से देखते, माणिक को अब उतनी ही हिकारत से देखने लगे थे। ज्ञानचंद भी उसकी हरकतों से अनजान नहीं थे। वे पुत्र पर लगाम कसने के लिए खाली समय में उसे व्यापारिक गतिविधियों में शामिल करने के साथ ही सामाजिक संगठनों में ले जाने लगे। १२ पास करने के बाद उसे कॉलेज न भेजकर घर पर ही कोचिंग दिलाकर ग्रेजुएशन पूरी करवाई।

शिक्षा पूरी होते ही उन्होंने माणिक की रसिक मिजाजी देखते हुए उसका विवाह दिल्ली की ही पढ़ी लिखी सुंदर कन्या सुषमा से करवा दिया। सुन्दर और सुशील पत्नी पाकर माणिक का मन घर में रमने लगा तो ज्ञानचंद ने व्यापार का अधिकांश कार्य माणिक को सौंप दिया और स्वयं सामाजिक संगठनों और अनाथाश्रम के संचालन के सहयोग में अधिक समय बिताने लगे। पत्नी के बिना उनका मन अब घर में नहीं रमता था। ५ वर्ष के अन्तराल में माणिक एक पुत्र और एक पुत्री का पिता बन चुका था लेकिन ज्ञानचंद का स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा था। एक दिन अचानक ही हृदयाघात से उनका देहांत हो गया।

पिता की अचानक मृत्यु से आहत माणिक को कुछ समय तो अपनी मानसिक पीड़ा से उबरने में लग गया फिर उसने व्यापार के साथ ही अनाथालय के संरक्षण  का जिम्मा भी स्वयं पर ले लिया।

सेठ ज्ञानचंद द्वारा नियुक्त आश्रम की संचालिका मायादेवी ने ७-८ वर्षों तक कार्यभार संभाला फिर उसने अपनी बढ़ती उम्र के कारण आगे आश्रम की जवाबदारी में खुद को अक्षम बताकर माणिक से आश्रम छोड़ने की अनुमति माँगी। माणिक पिताजी की सदस्यता वाली सामाजिक संस्थाओं में कभी कभार जाते रहते थे, उसने अपनी समस्या संस्था के सदस्यों के सामने रखी। वहाँ उन दिनों उस संस्था में शैलजा नाम की एक नई महिला सदस्य शामिल हुई थी।  उसने इस कार्य में रुचि प्रगट की। लगभग ३५ वर्षीय शैलजा ने बताया कि वो विधवा है।  दो साल पहले ही पति के एक सड़क दुर्घटना में देहांत के बाद वो अब अपने भाई-भाभी के साथ रहती है। वो दूसरी शादी करना नहीं चाहती और अपना जीवन समाज सेवा को ही समर्पित करना चाहती है। माणिक को और क्या चाहिए था, उसने तुरंत उसे “निर्मलादेवी बाल आश्रम” की संचालक नियुक्त कर दिया। और स्वयंम संरक्षक के पद पर बना रहा।

समाज में माणिक अब  माणिक सेठ  कहलाने लगा था। कुछ समय सामान्य रूप से गुजर गया। धीरे-धीरे संस्थाओं के माध्यम से उसका परिचय राजनेताओं से भी होता गया। जिनके सहयोग से अनाथालय के लिए आर्थिक अनुदान की व्यवस्था सुचारू रूप से होने लगी।

लेकिन कहा जाता है कि इंसान का स्वभाव कुछ अपवादों को छोड़कर कभी नहीं बदलता। माणिक का भी यह स्वरूप ओढ़ा हुआ बाहरी मुखौटा था, कुछ ही समय बाद उसका वास्तविक रूप सामने आने लगा। शैलजा को  अकेली देख-जानकर उसका रसिक-मिजाज, वासना लोलुप मन अपनी पत्नी सुषमा से उचाट होकर उसपर आसक्त होने लगा। शैलजा विधवा होने के साथ युवा और सुन्दर भी थी। उसकी भी कुछ अतृप्त यौन इच्छाएँ थीं, दोनों की उम्र में भी विशेष अंतर नहीं था अतः आश्रम का कार्यभार संभालने के बाद वो भी माणिक की तरफ आकर्षित होती चली गई।

लेकिन माणिक सेठ अपने युवा होते हुए पुत्र और पुत्री से गहराई से जुड़ा हुआ था, अतः उसने अपने क्रियाकलाप की भनक भी घर में नहीं लगने दी। आश्रम में वो रात में कभी नहीं रुकता था और कभी-कभी परिवार के साथ भी वहाँ चला  जाता था तो उनपर किसी को कोई शक नहीं होता था।

कुछ ही दिनों में उसने आश्रम पर नियुक्त सारे कर्मचारियों को किसी न किसी बहाने हटाकर अपनी शर्तों पर नई नियुक्तियाँ कर लीं, ताकि उसके कुकर्मों पर पर्दा बना रहे और उसके पिता की नेकनामी का लाभ भी उसे मिलता रहे।

माणिक के १० वर्ष इसी तरह ऐशो आराम में गुजर गए। उसका अधिकांश धन शैलजा पर खर्च होने लगा था फलस्वरूप उसकी आर्थिक स्थिति डांवांडोल होने लगी। इसका असर उसके आश्रम पर भी पड़ा और वहाँ पलने वाले बच्चे कुपोषण का शिकार होने लगे। उसकी बुद्धि ने कुंठित होकर उसे अपराध की दुनिया में धकेल दिया और वो  शीघ्र और अधिक धन कमाने के रास्ते खोजने लगा था।

पिता ज्ञानचंद ने बंगले के नजदीक ही एक नई बनी सोसायटी में एक दो बेडरूम, हाल, किचन का एक फ़्लैट ले रखा था, जिसका उपयोग वे संस्थाओं के सदस्यों के साथ विचार विमर्श करने में किया करते थे। जब भी मीटिंग होती वहाँ घरेलू सेवक  को बुला लेते और सबको चाय-नाश्ता करवाकर ही विदा करते थे। माणिक ने अब उसका उपयोग अवैध शराब के भण्डारण के लिए करने का विचार किया। लेकिन इसके लिए एक-दो विश्वसनीय आदमी होने आवश्यक थे जो वहाँ रहने के साथ ही उसके कार्य में भी सहयोग करें। इस बात पर विचार करने से उसका ध्यान अपने ही घर के कर्मचारियों की ओर आकर्षित हुआ।

उसके बंगले पर तीन कर्मचारी काम पर तैनात थे। एक पुराना सेवक अभिराम, जो घर के अंदरूनी कार्य किया करता था, वो रात में काम ख़त्म करके अपने घर चला जाता था। दो कर्मचारी और थे जिन्हें ज्ञानचंद जी ने चौकीदारी और ड्राइविंग के लिए नियुक्त किया था। वे दोनों भाई थे और शादीशुदा थे। उस समय दोनों की उम्र लगभग २५ के आसपास थी। उनकी नियुक्ति ज्ञानचंद द्वारा उनकी मृत्यु के कुछ माह पूर्व ही हुई थी। यहाँ काम करते हुए उन्हें अब ७-८ वर्ष हो चुके थे। इस अन्तराल में एक की पत्नी का देहावसान हो चुका था और दूसरे की झगड़ा करके उसे छोड़कर चली गई थी।

अतः माणिक ने उन दोनों की रहने की व्यवस्था बंगले के गैराज में बने एक कमरे में कर दी थी ताकि वे दिन-रात उसके संपर्क में रहें। माणिक ने उनको विश्वास में लेकर फ़्लैट में रहने और किन्हीं गरीब कन्याओं से विवाह करवाने का लालच दिया और अपने साथ अवैध कार्य में शामिल कर लिया।

अब उस फ़्लैट को घर का रूप दे दिया गया। दोनों भाई वहाँ रहने लगे और माणिक सेठ की गतिविधियाँ भी परदे के पीछे परवान चढ़ने लगीं।

लेकिन बात यहाँ तक ही समाप्त नहीं हुई,  कुछ समय गुजरते ही, माणिक का मन शैलजा से भी भरने लगा। उसकी वासना-युक्त निगाहें आश्रम की युवा होती हुई बालिकाओं की देह टटोलने लगी थीं और वो अपनी कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति के लिए शैलजा को ही मोहरा बनाने लगा था।

कहानी जारी रहेगी...

### अध्याय 9

मीनू, माया और ममता के विवाह के साथ ही नयना को आश्रम अब जैसे काट खाने को दौड़ता था। अमन की याद को तो बड़ी मुश्किल से दिमाग के कोने में कैद कर पाई थी कि अब यह झटका भी झेलना पड़ गया। आगे जिन मुश्किलों से गुजरना पड़ेगा, उसकी कल्पना मात्र से उसका रोम रोम सिहरने लगता था। लेकिन समय तो रुकता नहीं, लड़कियों की विदाई के अगले दिन ही शैलजा ने नयना, डाली और लता को बुलाकर लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा-

“बेटियो, मेरा अन्य कार्यों से बाहर आना-जाना लगा ही रहता है तो आज से पढ़ाई के अलावा रसोई के कार्यों में भी तुम तीनों को रसोई बनाने वालियों का सहयोग करना होगा। इस तरह तुम कुछ सीख भी सकोगी।”

तीनों बालिकाएँ उस समय कुछ कहना उचित न समझकर उनके निर्देशों का पालन करते हुए रसोई में जाकर भोजन तैयार करने वाली महिलाओं की सहायता करने में जुट गईं।

इस तरफ से संतुष्ट होने के बाद शैलजा तैयार होकर बाहर चली गई। एकांत पाते ही नयना ने डाली और लता को कमरे में बुलाकर मीनू के साथ हुई अपनी बातचीत विस्तार से उनको सुनाई और कहा-

“बहनो, अब हम तीनों को ही एक दूसरे का सहारा बनना है। हमें अब हर समय सावधान रहना चाहिए। इसके लिए हम तीनों हर समय हर पल साये की तरह एक दूसरे के साथ रहेंगी ताकि आश्रम का कोई पुरुष हमारा शारीरिक अथवा मानसिक शोषण न कर सके। हाईस्कूल पास करने के बाद ही देखा जाएगा कि ऊँट किस करवट बैठता है”।

“जो हुक्म मेरे आका, ऊँट चाहे जिस करवट बैठे,  हम तो तुम्हारी आज्ञा के बिना करवट भी नहीं बदलेंगी”। लता ने मुस्कुराकर विनोद के स्वर में कहा।

“मैं इस समय गंभीर हूँ लता, जो हश्र दीदी लोगों का हुआ है, वैसा हमारे साथ हरगिज़ न होने दूँगी। अनाथों के हक़ हड़पने और बेसहारा बालाओं पर अत्याचार का यह सिलसिला अब और आगे नहीं बढ़ने पाए, हमें इसके लिए कुछ ठोस उपाय

करने होंगे। आखिर आश्रम में हमेशा अँधेरे का ही राज क्यों होता है?  इस आश्रम के सुख-सूर्य को ग्रसने वाले माणिक सेठ के सारे राज फाश न किये तो मेरा नाम भी नयना नहीं”।

“मान गए डियर निन्नी, हम इन हब्शियों के आगे कभी हथियार नहीं डालेंगी। तुम्हारा दृढ़ संकल्प हमारा पथ प्रशस्त करता रहेगा।” कहते हुए डाली ने तैश में आकर अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।

विद्यालयों का नया सत्र आरंभ होते ही तीनों लड़कियों को सेठजी और शैलजा ने साथ जाकर राजकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय में दाखिला दिलवा दिया। यही नहीं, उन्होंने दिखावे के लिए ही सही, लड़कियों के आने जाने के लिए साईकिल उपलब्ध करवाने की माँग भी रखी,  मगर उनकी इस माँग को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि साइकिल केवल ५ किलोमीटर दूरी वाले स्कूलों अथवा कोलेजों के लिए उपलब्ध करवाई जाती है। आखिरकार तीनों सखियों ने आजादी की साँस ली।

आज स्कूल का पहला दिन था, स्कूल सुबह ९ से ४ बजे तक लगता था। वे बड़े सबेरे उठकर ऊत्साहपूर्वक तैयार हुईं। उन्होंने अपने कपड़ों में से सब्से अच्छे कपड़े छांटकर पहने। आज खाली हाथ ही जाना था। दो चार दिन में जब स्कूल की तरफ से यूनिफॉर्म और कॉपी किताबें मिल जाएँगी तो पढ़ाई भी शुरू हो जाएगी।

तैयार होकर उन्होंने आश्रम के बड़े हाल में लगी हुई दीवार घड़ी पर नज़र डाली तो आठ बज चुके थे। उन्हें पैदल ही दो किलोमीटर चलना था अतः वे जल्दी से निकल पडीं। रास्ता तो वे देख ही चुकी थीं, बातों-बातों में, बाहरी दुनिया के नजारों को आत्मसात करते हुए रास्ता कैसे  कट गया, उन्हें पता ही नहीं चला।

वे सोच रही थीं कि यह बंधनमुक्त दुनिया कितनी सुन्दर है। स्कूल सरकारी होने से अनाथों को निःशुल्क पढ़ाया जाता था तथा किताबें, कॉपियाँ भी फ्री उपलब्ध करवाई जाती थीं। विद्यालय का भवन पुराना अवश्य था लेकिन सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। स्टाफ रूम, लायब्रेरी, प्रयोगशाला और बड़ा सा खेल का मैदान आदि देखकर उन्हें सुखद अनुभूति हो रही थी।

पढ़ाई शुरू हो चुकी थी। नयना ने विज्ञान विषय लिया था मगर डाली और लता ने आर्ट्स... अतः उनकी कक्षाएँ अब अलग-अलग हो गई थीं। डाली और लता की तो नई सहेलियाँ बन गई थीं  मगर नयना के मन में अमन ने बसेरा बनाया हुआ था अतः वो अंतर्मुखी हो चली थी। जहाँ खाली पीरियड्स में डाली और लता लड़कियों के स्टाफ रूम में बैठकर सखियों के साथ गप्पें लड़ाती चहकती रहती थीं वहीं नयना वो समय लायब्रेरी में यों ही कोई किताब सामने रखकर अमन  के साथ बातें करते हुए बिता देती थी।

स्वाधीन साँसों का यह सुहाना सफ़र तीनों सखियों के अनाथ जीवन का स्वर्ण काल था। वे स्कूल हमेशा मुख्य सड़क से ही जाती थीं। कभी कभी आवारा लड़के उनका पीछा करते और इशारों से रुकने या पास आने का इशारा भी करते तो वे उस तरफ से मुँह फेर लेतीं जैसे उन्हें देखा ही नहीं। सड़क के किनारों पर आम अमरूद और इमली के फल वृक्ष देखकर उनके मुँह में पानी आ जाता और  वे अक्सर  गिरे हुए फल बटोरकर अपने बस्ते में रख लेतीं फिर स्कूल की आधी छुट्टी में चटखारे लेकर खातीं।

छुट्टी में बाहर निकलते ही प्रतिदिन गेट के एक तरफ एक अधेड़ व्यक्ति बड़े से टोकरे में उबले हुए चने लेकर बैठा मिलता था। वो हर लड़की को प्यार-मनुहार से बेटी संबोधित करके बुलाकर चने का दोना हाथ में देता था। आश्रम में उन्हें भोजन  दिन में ही मिलता था अतः तीनों सखियाँ आश्रम से भूखी ही निकलती थीं। अब चने का दोना और बस्ते में बटोरकर लाई हुई इमली और कच्चे आम लेकर एक पेड़ के नीचे बैठकर खाकर तृप्त हो लेती थीं। एक बार नयना ने उस व्यक्ति से पूछा-

“बाबा, आप इतने सारे चने प्रतिदिन कहाँ से लाते हैं?”

“बेटी मुझे यहाँ एक धनवान भले मानुष ने इस कार्य के लिए पगार पर नियुक्त किया है। निकट ही उनका भवन है। स्कूल शुरू होने के बाद मैं प्रतिदिन उनके दिए हुए चने लेकर यहाँ  बैठ जाता हूँ, फिर छुट्टी होने तक आसपास के धर्मालु लोग अपने घरों से उबले हुए चने ला कर टोकरी में यह कहकर डालते जाते हैं कि ये हमारी बेटियों के लिए हैं हम खुशकिस्मत हैं कि हमें संयोग से बेटियों की दुआएँ पाने का अवसर मिला है। यह टोकरी हमेशा भरी रहती है और चने कभी कम नहीं पड़ते। बचे हुए चने मैं अपने घर ले जाता हूँ।”

नयना पापी अँधेरे के पीछे छिपे पुण्य-प्रकाश के इस पहलू से पहली बार रूबरू हुई थी, सोचा करती- “एक तरफ तो बेटियों के मान-रक्षक धर्मनिष्ठ दानी मानव और दूसरी तरफ इसी दुनिया की उन्हीं बेटियों के सम्मान के भक्षक कर्मभ्रष्ट बेपानी दानव, वाह री, दोरंगी दुनिया”!

इस तरह पाप और पुण्य रूपी दो प्रवेश-द्वारों के बीच प्रतिदिन दो किलोमीटर का सफर तय करते हुए चार साल का समय इस तरह सरक गया कि उसकी सरसराहट भी सखियों ने महसूस नहीं की। अब केवल परीक्षाएँ शेष थीं मगर  नयना के नयनों की नींद यह सोचकर उड़ी हुई थी कि १२ वीं की परीक्षा समाप्त होने तक वे बालिग तो हो चुकेंगी मगर इसके बाद क्या होगा?

वो सोचती थी कि अब तक तो उनके साथ कोई अप्रिय प्रसंग शायद इसी कारण घटित नहीं हुआ कि वे परछाई की तरह एक दूसरी के साथ चिपकी रहती थीं। आगे न जाने क्या हो... सेठजी का शालीनता का लबादा स्थाई तो नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी दानवी प्रवृत्ति वाले इंसान का स्वभाव इतनी आसानी से नहीं बदल सकता। वातावरण की यह शांति आने वाले तूफान का संकेत ही हो सकती है मगर  सेठजी क्या जानें कि हम भी सजग हैं और उजले आवरण में छिपे उसके काले कर्मों से बखूबी परिचित हो चुकी हैं।

फिर भी एक शंका तो उसके मन में बनी हुई थी कि पढ़ाई पूर्ण होने के बाद अगर अमन मिलने नहीं आया अथवा उसे आने नहीं दिया गया तो क्या होगा? उनको तो परीक्षा परिणाम के बाद यह आश्रम छोड़ना ही है।

अमन ने आने का वादा तो किया है लेकिन सेठजी की नीयत का कोई भरोसा नहीं। यह सब सोचते सोचते नयना का सिर घूमने लगता मगर कोई समाधान नहीं सूझता था।

लता उसे पुनः उदास देखकर कहती-

“निन्नी, भविष्य की चिंता तो हमें भी है इस तरह चिंतित होने से हमारे परीक्षा-परिणाम पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। हमें अब केवल पढ़ाई पर ही ध्यान देना चाहिए।”

“सही कह रही हो सखी, हमें बेहतर परिणाम के लिए खूब मेहनत करनी चाहिए। कल से तैयारी के लिए छुट्टियाँ लग जाएँगी, हमें परीक्षा होने तक अब रसोई में नहीं जाना है। आंटी को हमारी यह बात माननी ही होगी।”

“बिल्कुल निन्नी, अब तो वे कुछ अलग ही मंसूबे बना रही होंगी तो हमपर दबाव भी नहीं डालेंगी।” डाली ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा।

आखिर समय पर परीक्षाएँ संपन्न हो गईं और छुट्टियों के साथ ही उनकी वो स्वप्नीली सुन्दर दुनिया भी अब आभासी होकर मन के दायरे में दाखिल हो गई।

परीक्षा का परिणाम घोषित होने तक अब पुनः आश्रम की कैद में ही इंतजार करने को मजबूर हो गईं।

कहानी जारी रहेगी...

### अध्याय 10

छुट्टियाँ तो थीं ही, अब तीनों सखियाँ दिन भर आश्रम के कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखने लगीं, मगर तीनों एक दूसरी का साया बनी एक साथ ही हर स्थान पर कार्य करती थीं ताकि किसी पुरुष कर्मचारी को उनपर कुदृष्टि डालने का अवसर ही न मिले। रात में भी एक साथ भोजन करके बिस्तर पर अपने भविष्य की योजना पर चर्चा करती रहती थीं।

उस दिन दोपहर का खाना सेठजी के घर से आया था और सेठजी शाम तक आश्रम में ही शैलजा के साथ आश्रम के ऑफिस में, चर्चा में व्यस्त थे। तय था कि वे हमेशा की तरह भोजन करके ही जाएँगे अतः उनके लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की गई थी। रसोई की कर्मचारियों ने  अपना काम पूरा करके शैलजा से घर जाने की अनुमति लेकर घर का रुख किया। बाकी काम तीनों लड़कियों को सहेजना था। शैलजा ने डाली और लता से कहा-

“तुम दोनों ज़रा उस विभाग में जाकर लड़कों के बिस्तर लगा दो, आज वहाँ का कर्मचारी जल्दी चला गया है। यहाँ अब अधिक काम नहीं है, नयना देख लेगी।

बाद में आकर तुम तीनों भोजन कर लेना।”

डाली और लता वहाँ चली गईं तो नयना को शैलजा ने ऑफिस में आने का इशारा किया।

वहाँ नयना ने सेठजी की मौजूदगी की बात कही तो उसने कहा-

“सेठजी तुमसे ही कुछ पूछना चाहते हैं”।

नयना सोच में पड़ गई कि क्या करे। उसे अब सेठजी की उपस्थिति से ही डर लगने लगता था फिर डाली और लता को दूसरी तरफ भेजने से उसके मन में शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। शैलजा उसके मन की बात ताड़ गई और बोली-

निन्नी बेटे, सेठजी से डरने की कोई बात नहीं है, वे इस आश्रम के सञ्चालक वर्ग के प्रमुख हैं और तुम लोगों का बुरा कभी नहीं चाहेंगे। मैं भी तो साथ हूँ न...

नयना बिना किसी प्रत्युत्तर के चुपचाप उनके साथ चली गईं।

सेठजी ने उसे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और बिना भूमिका बाँधे पूछा-

गुड़िया, यह तो तुम जानती ही हो कि १८ वर्ष की यानी बालिग होने पर लड़कियों को आश्रम छोड़ना पड़ता है। लेकिन अगर वे चाहें तो हमारी शर्तों पर विवाह होने तक यहाँ रह सकती हैं। मैं जानता हूँ कि डाली और लता का प्रतिनिधित्व तुम्हीं करती हो तो बताओ इस बारे में तुमने क्या विचार किया है?

“कैसी शर्तें अंकल? हमने तो अभी कोई विचार नहीं किया, परीक्षा का परिणाम आने पर ही तय करेंगी कि क्या करना है”।

"परीक्षा का परिणाम भी दूर नहीं है, गुड़िया... शर्तें तो यही हैं कि विवाह होने तक तुम लोगों को आश्रम के कार्य संभालने के अलावा संचालक शैलजा जी की अनुमति के बिना कहीं आने-जाने की सुविधा नहीं दी जाएगी। लेकिन अगर तुम चाहो तो मैं सिर्फ तुम्हारे लिए तुम तीनों का आगे पढ़ने के लिए कॉलेज में दाखिला दिलवा सकता हूँ।"

“मेरे लिए विशेष सुविधा किसलिए अंकल?”

“तुम्हें मैं दिल से चाहता हूँ गुड़िया रानी, तुम्हें बस कभी-कभी मेरी इच्छा का ध्यान रखना होगा। मेरी बात मानोगी तो मैं तुम तीनों को कॉलेज में एडमिशन दिलाने के साथ आने-जाने के लिए स्कूटी और  मोबाइल दिलाने के अतिरिक्त अच्छा भोजन-वस्त्र भी उपलब्ध करवाता रहूँगा। यह सब सिर्फ तुम्हारी खातिर करूँगा। तुम्हारी सहेलियों को हमारे सम्बन्ध की भनक भी नहीं लगने पाएगी। और अगर तुम लोगों ने आश्रम छोड़ भी दिया तो तुम्हारा क्या हश्र हो सकता है, इसका अनुमान तुम लगा सकती हो। मैं चाहूँ तो आसानी से किसी भी लड़की को अपनी अंकशायिनी  बना सकता हूँ मगर मैं किसी के साथ ज़बरदस्ती कभी नहीं करता। मेरी बात मानने वाली यहाँ की हर लड़की विवाह के बाद सम्मान से अपनी गृहस्थी बसा लेती है।” कहते हुए सेठजी ने अपना हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखे नयना के हाथ को दबा दिया।

नयना ने इधर उधर देखा तो शैलजा वहाँ से जा चुकी थी। वो तुरंत उनका हाथ झटककर खड़ी हो गई और कठोर स्वर में बोली-

“अंकल, मैंने आपके इस रूप की कल्पना भी नहीं की थी कि लड़कियों के अनाथ और असहाय होने का आप इस तरह फायदा उठाते हैं।

हमें चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े, अपने सम्मान का सौदा यानी स्त्रीत्व का अपमान कभी स्वीकार नहीं करेंगी। याद रखिये, सिर्फ हौसलों के बल पर एक दिया भी तूफान से लड़ सकता है। आप हमारा मनोबल कभी नहीं तोड़ सकते... परीक्षा का परिणाम आते ही हम आश्रम छोड़ देंगी। अपमानित आश्रय से सम्मानित संघर्ष हमे सौ बार स्वीकार है”।

“इस समय तुम जोश में हो गुड़िया, बैठो और होश में आकर ज़रा गौर से मेरी बात पर विचार करके बताओ, कि यहाँ सुख सुविधाओं के बीच अपना कैरियर बनाना चाहती हो या सड़कों पर भीख माँगकर ज़िन्दगी ख़राब करना...”

“मैं पूरी तरह होश में हूँ अंकल, मेरा निर्णय अडिग है, आप किसी गलतफहमी में न रहिएगा।”

कहते हुए नयना कक्ष से बाहर निकल कर रसोई में पहुँच गई। तब तक डाली और लता भी लड़कों के बिस्तर ठीक करके वापस आ गई थीं। नियमानुसार उन्होंने छोटे बच्चों को भोजन परोसकर खिलाया  फिर उन्हें एक  कर्मचारी ने  परोसकर खिला दिया। शैलजा अपना भोजन बैठक में ही करती थीं। उन्होंने सेठजी और अपना भोजन वहीँ मंगा लिया था।

खाना खाकर शयन कक्ष में जाते ही नयना ने सारा किस्सा सखियों को सुनाया कि किस तरह उसने सेठजी के मंसूबों को मटियामेट कर दिया था। फिर वे देर रात तक आश्रम छोड़ने के बाद की स्थिति पर विचार विमर्श करती रहीं।

आखिर तय किया गया कि वे परीक्षा के परिणाम के बाद जिस दिन अंक सूची लेने जाएँगी, उसी दिन स्कूल से ही जानकारी लेकर बिना किसी सामान के आगरा के लिए बस पकड़ लेंगी। और वहाँ पहुँचकर किसी तरह अमन का पता लगाकर आगे योजना पर विचार करेंगी। परिणाम की सूचना तो आश्रम में ही मिल जाएगी, मगर सुरक्षा के मद्देनजर अपनी योजना की जानकारी आश्रम के किसी भी कर्मचारी अथवा शैलजा आंटी को नहीं देनी है, क्योंकि हो सकता है, सेठजी उनके लिए कोई नया जाल बिछाने की तैयारी कर चुके हों। बाकी सब परिस्थिति के अनुसार ही निर्णय लेना होगा।

उस रात तीनों को नींद ही नहीं आई। उस रात के बाद लम्बे समय तक सेठजी आश्रम नहीं पधारे। शैलजा का भी नयना के साथ व्यवहार सामान्य ही था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन नयना उस वासना लोलुप, निकृष्ट नरपशु माणिक सेठ के प्रति आँखें खुली ही रखना चाहती थी।

उधर नयना द्वारा अपमानित होकर माणिक शांति से तो बैठ नहीं सकता था सिर्फ अपने हावभाव छिपाने के लिए उसने आश्रम जाना छोड़ दिया था। वो नयना को सबक सिखाने के लिए कोई सुरक्षित मार्ग खोज रहा था। अचानक उसे एक कुत्सित विचार सूझा और अपनी सूझबूझ पर अपनी ही पीठ थपथपाते हुए उसने बलराम-जयराम को बुलाकर कहा-

“देखो बलराम, अब इस उम्र में तुम दोनों के लिए कोई कन्या तो मिलने से रही, लेकिन तुम दोनों अगर मेरी योजना में शामिल हो जाओ तो एक सुन्दर और अल्हड़ युवा लड़की तुम दोनों के लिए उपलब्ध हो सकती है।”

“मैं समझा नहीं सेठजी, आप किस लड़की की बात कर रहे हैं और यह कैसे संभव है।”

माणिक ने उनको नयना के बारे में बताकर उसके अपहरण की योजना में शामिल होने की बात कही। पहले तो बलराम डर के मारे इनकार करता रहा लेकिन जब माणिक ने अवैध कारोबार में उनको फँसाने की धमकी दी तो उनको मजबूर होकर उसकी बात माननी पड़ी और देर तक नयना के अपहरण की योजना पर चर्चा होती रही।

कुछ दिन बाद जब शैलजा को परीक्षा का परिणाम आने का समाचार मिला तो उसने नयना को बुलाकर सूचना दी और कहा-

“निन्नी, अब परिणाम तो आ चुका है, तुम तीनों को शीघ्र ही यह आश्रम छोड़ना पड़ेगा।”।

“हमने तय कर लिया है आंटी,  हम अंक सूची प्राप्त करने के लिए अगले सत्र के लिए स्कूल खुलने तक इंतज़ार करेंगी। उसके बाद आश्रम छोड़ देंगी”। नयना ने रुखाई से जवाब दिया

उनको रिज़ल्ट की सूचना तो मिली मगर आश्रम में जो समाचार पत्र आता था उसमें उसकी जानकारी नहीं थी और यहाँ कम्प्यूटर की भी व्यवस्था नहीं थी अतः उनको स्कूल जाकर ही पता लग सकता था। यह जून का महीना था और स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थीं मगर नयना जानती थी कि छुट्टियों के दिनों में स्कूलों के कार्यालय खुले रहते हैं,  जिनमें नॉन टीचिंग स्टाफ उपस्थित रहता है अतः वे स्कूल  जाकर परिणाम देख आएँगी। फिर अंकसूची स्कूल का नया सत्र आरम्भ होने पर लेने चली जाएँगी।

अगले दिन शैलजा को स्कूल के कार्यालय से सूचना मिली कि स्कूल के सूचना-पट पर परीक्षा का परिणाम लग चुका है। इस बार दिल्ली में मानसून के जल्दी आने के संकेत मिले हैं, अतः कार्यालय सप्ताहांत के बाद बंद हो जाएगा। इस बीच छात्र-छात्राएँ आकर अपना परीक्षा-परिणाम देख सकते हैं। अंकसूची तैयार होने में समय लगेगा अतः वो स्कूल खुलने के बाद ही मिल सकेगी।

शैलजा ने नयना को बुलाकर यह बात बताई तो नयना ने कल ही डाली और लता के साथ जाने की बात कह दी।

उस रात खाना खाने के बाद लता की तबियत खराब होने लगी और उल्टी दस्त के साथ बुखार आ गया।

उस समय तो शैलजा ने आश्रम में उपलब्ध बुखार की गोली खिला दी तो उसे नींद भी आ गई मगर सबेरे फिर उसे तेज़ बुखार चढ़ गया।

नयना ने लता के स्वस्थ होने तक स्कूल जाना स्थगित कर दिया और वो डाली के साथ उसकी देखरेख में लग गईं। तीन दिन बाद उसका बुखार तो उतर गया मगर कमज़ोरी होने के कारण वो पैदल स्कूल तक जाने में असमर्थ थी। परिणाम लेने जाना भी अनिवार्य था वरना स्कूल पर पूरी तरह ताला लग सकता है। नयना ने  शैलजा से लता की देखरेख के लिए एक कर्मचारी को लगाने और डाली के साथ परिणाम देखने के लिए स्कूल जाने की अनुमति माँगी।

शैलजा ने दो टूक जवाब देते हुए कहा-

“निन्नी तुम जानती ही हो कि यहाँ कर्मचारियों की कितनी कमी है, तुम डाली को लता की देखरेख में  छोड़कर अकेली भी जा सकती हो, स्कूल के रास्ते से तो परिचित हो ही...”

नयना वैसे नहीं भी जाती तो स्कूल खुलने पर अंकसूची के साथ परिणाम मालूम होना ही था और आगे पढ़ने की भी कोई योजना नहीं थी। लेकिन उत्सुकता को रोक पाना मुश्किल था। अतः उसने डाली को लता की देखभाल के लिए छोड़कर अकेली ही स्कूल जाने का निर्णय लिया। सड़क ट्राफिक वाली थी, अतः स्कूल अकेली जाने में डर की कोई बात नहीं थी, बल्कि आश्रम में लता को अकेली छोड़ने में डर बना रहता।

सुबह जल्दी ही नयना निकल पड़ी। स्कूल पहुँचकर सूचना पट पर कार्यालय के एक अधिकारी की सहायता से वो तीनों के रोल नंबर खोजने लग गई।

जब उसने प्रथम श्रेणी की सूची में तीनों के रोल नंबर देखे तो प्रसन्नता से उसकी आँखों से आँसू छलछला आए। उनकी मेहनत रंग लाई थी।

अधिकारी ने उसे बधाई देते हुए अंकसूची लेने के लिए स्कूल खुलने के बाद आने को कहा। नयना उन्हें धन्यवाद कहकर वापस जाने के लिए निकल पड़ी।

क्रमशः

### अध्याय 11

जून का तीसरा सप्ताह चल रहा था। आसमान में सुबह से ही हल्के बादल छाए हुए थे जो अब तक सघन हो चले थे। नयना ने आधी दूरी भी तय नहीं की थी कि हल्की- हल्की बूँदा-बाँदी होने लग गई। घबराकर नयना ने चाल और तेज़ कर दी। वो रिज़ल्ट वाला अखबार तो खरीद नहीं सकती थी,  अब जल्दी ही शुभ समाचार सखियों को सुनाने के लिए आतुर थी। लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। अचानक बारिश तूफानी गति से तेज़ होती गई।

नयना के पास छाता नहीं था अतः वो एक तरफ एक घने पेड़ के नीचे खड़ी होकर बारिश रुकने या कम होने का इंतज़ार करने लगी। सड़क से पैदल चलने वाले लोग गायब हो गए थे लेकिन वाहनों का आना जाना बदस्तूर था। तभी एक तरफ से तेज़ गति से आती हुई एक कार उसके निकट ही आकर रुक गई और आगे की खिड़की खोलकर माणिक ने नयना को संबोधित करके पूछा-

”अरे गुड़िया, यहाँ अकेली क्या कर रही हो”?

”अंकल मैं रिज़ल्ट देखने स्कूल गई थी। अब वापस जा रही हूँ”।

”ठीक है, वह सब बाद में बताना, अभी भीग रही हो, जल्दी से गाड़ी में बैठ जाओ,  मैं मीनू को कुछ सामान देने जा रहा हूँ,  कुछ समय लग ही जाएगा वापसी में तुम्हें आश्रम छोड़ता हुआ जाऊँगा। मैं शैलजा जी को सूचित कर देता हूँ”।

मीनू का नाम सुनते ही नयना के कान खड़े हो गए। सोचने लगी कि सेठजी ने शादी के बाद भी शायद मीनू से संबंध बनाकर रखे होंगे तभी तो उसे आश्रम में नहीं बुलाया जाता। उसे सेठजी से घिन सी आने लगी। पर इस समय वो चार साल बाद मीनू से मिल सकेगी, यह सोचकर ही रोमांचित हो उठी। उधर बारिश भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी तो  सेठजी का सामान्य व्यवहार देखकर वो बिना किसी दुविधा के चुपचाप पिछली सीट पर बैठ गई। वो नहीं जानती थी कि उसके अपमान से आहत होकर माणिक सेठ एक खूँखार दरिंदा बन चुका है और उसे फाँसने के  लिए जाल बुना जा चुका है।

कार चल पड़ी तो सेठजी ने गर्दन पीछे घुमाकर नयना से कहा-

“अब बताओ गुड़िया, तुम सबका  रिज़ल्ट कैसा रहा”?

“हम तीनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई हैं अंकल...”

“अरे वाह! फिर तो मेरी बधाई स्वीकार करो। इस ख़ुशी में अगली बार आश्रम में आने पर मिठाई बँटवाऊँगा।”

नयना कोई जवाब न देकर अपने ही विचारों में खोई रही।

कार चिकनी सड़क पर सरपट दौड़ी जा रही थी। लगभग आधे घंटे के बाद नई बनी हुई बहुमंजिला इमारतों का सिलसिला आरम्भ हो गया। कुछ आगे अन्दर की तरफ एक दो मोड़ लेकर गाड़ी एक बहुमंजिला इमारत के गेट के आगे रुकी फिर वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी ने सेठजी को गाड़ी में देखते ही गेट खोल दिया और गाड़ी अन्दर दाखिल हो गई।

सेठजी ने उतरकर पीछे का गेट खोलकर नयना को उतरने के लिए कहा। नीचे उतरकर नयना विस्मय से चारों तरफ देखती जा रही थी। वो सेठजी के पीछे एक बड़े से कक्ष में दाखिल हुई। उस कक्ष में कुछ बेंचें लगी हुई थीं जो उस समय खाली थीं।

एक कोने में एक कुर्सी पर बैठा हुआ एक व्यक्ति सामने रखी हुई मेज पर सिर रखकर ऊँघ रहा था। उनकी आहट से वो सजग होकर बैठ गया। पीछे ड्राइवर भी सामान के एक बड़े से झोले के साथ आ गया था। फिर सेठजी ने एक बंद गेट के एक तरफ का बटन दबाया तो दरवाजा खुल गया और वे तीनों अन्दर प्रविष्ट हो गए। नयना बहुमंजिला इमारतों में ऊपर नीचे जाने वाली लिफ्ट के बारे में किताबों में पढ़ चुकी थी तो सेठजी को १५ नंबर के बटन को दबाते देख वो समझ गई कि यह लिफ्ट है और उन्हें १५ वीं मंज़िल पर लेकर जा रही है। यानी मीनू दीदी इसी बिल्डिंग में पंद्रहवीं मंजिल पर रहती हैं। लिफ्ट के रुकते ही वे बाहर आ गए। वहाँ छोटी सी गैलरी में दो दरवाजे थे। सेठजी के एक दरवाजे के बाहर लगे हुए बटन को दबाते ही एक व्यक्ति ने आकर दरवाजा खोल दिया और एक तरफ हट गया।

उन तीनों के अन्दर प्रवेश के साथ ही उस व्यक्ति ने तुरंत गेट बंद कर दिया। नयना की निगाहें इधर-उधर घर का निरीक्षण करने के साथ ही मीनू को तलाश रही थीं। एक तरफ उसे अस्त व्यस्त रसोईघर दिखा मगर मीनू वहाँ नहीं थी।  सेठजी ने उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए एक कक्ष में प्रवेश किया। नयना ने सोचा, शायद मीनू अन्दर ही होगी और वो भी सेठजी के पीछे कक्ष में पहुँच गई।

लेकिन मीनू वहाँ भी नहीं थी। मगर उसके अन्दर आते ही सेठजी ने बाहर जाकर कमरे को बाहर से लॉक कर दिया। नयना समझ गई कि उसे छल से यहाँ लाया गया है, वो रो रो कर बदहवास होकर दरवाजा पीटने लगी।

थोड़ी ही देर बाद सेठजी कमरा खोलकर उसके निकट आए तो उनके मुँह से आने वाली बदबू से नयना समझ गई कि वो शराब पीकर आए हैं। वो सहमकर पीछे हटने लगी तो माणिक उसका कंधा दबाते हुए कुटिलता पूर्वक बोला -

“नयना रानी, बोलो अब क्या विचार है...तुमने सोचा होगा, तुम्हें सेठजी से आसानी से छुटकारा मिल गया, मगर मैं भी तुम्हें हासिल करने का इरादा कर चुका था। अगर तुम आश्रम में ही मेरी बात मान लेती तो पढ़ाई पूरी करने के साथ ही विवाह करके सुखी जीवन बिता देती,  मगर खैर! वहाँ न सही यहीं सही...अब तो सिर्फ मेरी इच्छा पूर्ति ही नहीं करनी बल्कि तुम्हें मेरे कर्मचारियों की भी घरवाली बनकर हम बिस्तर होने के अलावा उनके सारे कार्य करने होंगे। आश्रम में मैं मनमानी नहीं कर सकता था मगर यहाँ तुम पूरी तरह मेरी मुट्ठी में हो। अब चूँकि मेरा यह ठिकाना,  मेरी असलियत तुम जान चुकी हो तो आजीवन मेरी बंदिनी बनकर रहना पड़ेगा। यहाँ से बाहर कदम रखने का प्रयास भी न करना...वरना तुम्हारी उन दोनों चहेतियों को ऐसी जगह भेज दिया जाएगा जहाँ शरीफ इंसान  जाने के लिए सौ बार सोचते हैं।”?

खुद को असहाय और घिरा हुआ देखकर नयना की आँखों में आँसू आ गए। वो गिड़गिड़ाकर बोलने लगी-

“मैंने आपका क्या बिगाड़ा है अंकल,  मैं तो आपकी बेटी समान हूँ, कृपया मुझे छोड़ दीजिए”।

“हा... हा... हा... बेटी समान हो मगर बेटी नहीं।  तुमने मेरा तिरस्कार करके अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मारी है, अब इन ज़ख्मों को सहलाने यहाँ कोई नहीं आएगा”। कहते हुए सेठजी ने उसे खींचकर पलंग पर धकेल दिया।

नयना हाथ पैर पटकती, जार-जार रोती चीखती, छटपटाती रही और वो नराधम चटखारे लेते हुए उसके तन को तार-तार करता रहा। फिर जी भर जाने के बाद उसका कसाव ढीला पड़ते ही नयना ने अपने वस्त्र सँभाले और उसे हिकारत से देखते हुए बोली-

“याद रखना पापी माणिक सेठ,  तुमने धोखे से मेरा अपहरण करके बलपूर्वक शील भंग किया है। तुम्हें रावण कहना रावण का भी अपमान ही होगा। उसने तो माँ सीता का केवल अपहरण ही किया था तो भी श्रीराम ने पूरी तरह उसका साम्राज्य नेस्तनाबूद कर दिया। मगर इस युग में भी कोई राम अवश्य अवतरित  हुआ होगा जो  मुझ जैसी अनगिनत असहाय बालाओं की पुकार सुनकर तुम्हारे पतित रक्त की एक-एक बूँद को रसातल दिखाकर रहेगा,  ताकि कोई नया रक्तबीज फिर जन्म न ले सके”।

“नहीं गुड़िया, इतनी बद्दुआ मत दो, अभी तो बरसों तुम्हें हम सबका जी बहलाना है,

चुपचाप हमारे काम करती रहोगी तो तुम्हें हम और कोई कष्ट नहीं देंगे”।

और अट्टहास करते हुए वो वहाँ से चला गया।

क्रमशः

### अध्याय 12

सेठजी के कमरे से जाने के तुरंत बाद वो व्यक्ति जिसने द्वार खोला था,  अंदर आया और नयना के निकट बैठकर उसकी पीठ सहलाते हुए सहानुभूति जताकर  पानी पिलाने लगा। नयना ने उसका हाथ झटककर गिलास गिरा दिया और उसे परे धकेल दिया।

“नयना रानी,  तुमने सेठजी की बात नहीं सुनी...? मेरा नाम बलराम है। मैं सेठजी के बँगले पर रात की ड्यूटी पर और दिन में घर पर ही रहता हूँ। हम दो भाई हैं और दोनों सेठजी के कर्मचारी हैं। आज से तुम्हें हम दोनों भाइयों की घरवाली बनकर रहना होगा और घर के सारे कार्य भी सँभालने होंगे। दिन के भोजन की व्यवस्था हो चुकी है, जब मन करे रसोई से लेकर खा लेना।”  इतना कहकर उसने पुनः नयना को निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया।

नयना में अब चीखने-चिल्लाने अथवा विरोध करने की शक्ति भी शेष नहीं थी, वो जीवित लाश की तरह निढाल स्वयं को लुटते हुए देखती रही और बलराम उसे जी भरकर निचोड़ने के बाद उठते हुए बोला-

“देखो रानी,  मेरे जाते ही जयराम यहाँ आएगा और रात भर तुम्हारे साथ रहेगा। तुम्हारे लिए यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं है अतः अब आँसू बहाना छोड़कर ख़ुशी ख़ुशी हमारी इच्छा पूरी करते रहना ही तुम्हारे लिए एकमात्र विकल्प है।”

इतना कहकर वो कमरे से बाहर हाल में रखे हुए पलंग पर पसर कर खर्राटे भरने लगा।

नयना में अब शक्ति लेश मात्र भी शेष न थी। भूख से अलग प्राण व्याकुल हो रहे थे। मगर इस समय परिस्थितियों से समझौता करके फिर अपनी दशा पर विचार करने की बात सोचकर वो यंत्रचालित पुतली की तरह चुपचाप रसोई में पहुँच गई और पानी पीकर सारे सामान उलट पुलट कर देखने लगी। जो बैग उसके साथ ही उन पिशाचों द्वारा लाये गए थे उसमें फल, सब्जियाँ और सलाद आदि थे। बाकी सारा सामान भी इधर-उधर से झाँकता हुआ दिख रहा था। वहीँ पर कुछ तैयार भोजन भी रखा हुआ था। उसने थोडा सा खाना लेकर कमरे में जाकर नीचे बैठकर खा लिया फिर वापस रसोई में बर्तन रखकर कमरे में आकर निढाल सी सो गई।

उसका शरीर टूटा जा रहा था और आँखें मुंदी जा रही थीं। कब उसे झपकी लग गई इसका उसे तब पता चला जब बलराम ने उसे झिंझोड़कर जगा दिया और बोला-

“उठो रानी, कुछ देर में जयराम आ जाएगा,  तुम रसोई में जाकर जल्दी से भोजन तैयार करो। सामान सब वहीं मिल जाएगा।”  फिर वो हाल में टी वी चालू करके बैठ गया।”

नयना चुपचाप रसोई में पहुँच गई। लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कैसे और कहाँ से शुरुवात करे...खाना बनाना तो वो जानती थी फिर भी खुद को असहाय और अकेली पाकर दिमाग काम नहीं कर रहा था। फिर भी उसने  एक नज़र इधर-उधर डाली और खाना बनाने में जुट गई।

नए और अपरिचित स्थान पर उसे कुछ परेशानी भी आई लेकिन एक घंटे में ही उसने दाल-चावल, सब्जी-रोटी बनाकर रख दी और कमरे में चली गई।

कुछ देर में बलराम उसके पास आकर बोला-

“नयना रानी, आओ भोजन कर लो।  तुम्हें जयराम के आने से पहले खाना  खा लेना चाहिए। वरना भूखे पेट उसकी भूख कैसे शांत करोगी...?”

मगर नयना बाद में खाने की बात कहकर बैठी रही। फिर जब टी वी की आवाज़ आने लगी तो चुपचाप उठकर थोड़ा सा खाना लेकर खा लिया।

जैसे ही डोर-बेल बजी,  बलराम ने उसका कमरा बाहर से लॉक कर दिया। नयना का दिल बैठने लगा। वो मरी सी हालत में पलंग पर पड़कर आँखें बंद करके फिर उसी आँधी का सामना करने की हिम्मत जुटाने लगी। उसने गेट खुलने फिर बंद होने की आवाज़ सुनी फिर कुछ ही देर में कमरे के खुलने और किसी के आने की आहट और...

किसी ने उसे खींचकर उठाया और अपना परिचय देते हुए बोला-

“नयना रानी, तुमने मुझे पहचान तो लिया होगा,  मैं जयराम हूँ, सेठजी के साथ आश्रम में भी आता रहता था।”  कहते हुए उसने अपने मोबाइल पर म्युज़िक ऑन किया, फिर उसके साथ वही घिनौना खेल शुरू कर दिया। नयना की चीखें, रुदन, कराहें, आहें सब घुटकर उस चौखट के अन्दर कैद हो गईं और उसे तब तक रौंदा जाता रहा जब तक वो बेहोश न हो गई।

लगभग आधी रात को उसकी नींद खुली तो कमरे में जीरो बल्ब जल रहा था और वहाँ कोई नहीं था। उसे प्यास लगी थी। लेकिन उठते हुए उसका बदन बुरी तरह दर्द करने लगा। किसी तरह कमरे का द्वार खोलकर धीरे-धीरे किचन से पानी ले आई, पीकर फिर बिस्तर पर पड़ गई।

सुबह मुँह अँधेरे ही जयराम ने उसे झिंझोड़कर उठाया और बोला-

“उठो नयना रानी, बहुत आराम हो गया। जल्दी से चाय नाश्ता बनाकर मेरे लिए दिन का टिफिन तैयार करो। बलराम एक घंटे में पहुँच जाएगा।”

नयना उनके नाम से तो परिचित हो चुकी थी,  न जाने क्या सोचकर इनके माता-पिता ने इन रावणों के नाम के साथ राम का नाम चिपका दिया था। मन ही मन उसने उनके नाम के आगे राम हटाकर रावण कर दिया था। वो उन रावणों को कुछ भी जवाब देना व्यर्थ समझकर गूँगी गुड़िया की तरह चुपचाप काम में लग जाती थी।

डोर बेल बजते ही उसे कमरे में जाने को कहकर बाहर से लॉक कर दिया गया। लगभग आधे घंटे के बाद जब बलराम ने द्वार खोला तो जयराम खा-पीकर टिफिन लेकर जा चुका था।  हाल के द्वार का अन्दर से ताला लगा दिया गया था। बलराम उसे जी भरकर निचोड़ने के बाद नहाने चला गया।

नयना दिन भर मशीन की तरह काम करती रहती। जब उसका दर्द महसूस करने वाला कोई नहीं था  तो रोकर भी क्या होता। इन निर्दयी राक्षसों से राहत की कोई उम्मीद ही नहीं थी।

बलराम कभी-कभी उसे भी नाश्ते या खाने पर साथ बैठने को बोलता था मगर नयना कोई उत्तर नहीं देकर अपना काम करने लग जाती थी। अतः फिर उसने उसे बोलना छोड़ दिया। खा पीकर उसे घर के सारे कार्य सहेजने की हिदायत देकर हाल में पलंग पर सो जाता था।

उसके नींद के आगोश में जाते ही नयना  नहा धोकर, सफाई के अलावा रसोई के काम सहेजती और अपना भोजन कमरे में ही कर लेती थी। धीरे धीरे उसने पूरे घर पर खोजी दृष्टि डालनी शुरू की।  वो दो कमरे और एक हाल वाला फ़्लैट था। उसके  कमरे का द्वार खोलते ही एक गलियारा दिखता था जिसके  एक तरफ बाथरूम, दूसरी तरफ रसोई घर और उससे लगा हुआ एक और कमरा था जो बंद था जिसे उसने कभी खुलते हुए नहीं देखा। सामने ही बड़ा सा हाल था जिसके एक तरफ मुख्य द्वार था और दूसरी तरफ बड़ी सी काँच के पल्लों वाली खिड़की थी। जिसे खोलने पर काफी चौड़ा जंगला बना हुआ था। सामने का हिस्सा आड़ी सलाखों से बंद था।

हाल में एक तरफ टी। वी। रखा हुआ था। उसके सामने दो पलंग लगे हुए थे, बीच में एक बड़ी सी मेज और चार कुर्सियाँ रखी हुई थीं। हाल के चौड़े हिस्से में अलमारियाँ फिक्स थीं।

इसी तरह उसके कमरे में भी जंगले जैसी एक खिड़की और फिक्स अलमारी थी। पहले दिन ही उसे अलमारी में अपनी नाप के कपड़े बलराम ने दिखाए थे। श्रृंगार का सामान भी दीवार में एक फिक्स दर्पण के साथ दराज में उपलब्ध था। बाथरूम में भी नहाने और कपड़े धोने का सामान रखा हुआ था। उसके अपहरण के साथ ही शायद यह सारी व्यवस्थाएँ योजनाबद्ध तरीके से की गई होंगी।

रसोई का सारा सामान,  दूध आदि बलराम आते समय ले आया था। सुबह सुबह उसके सामने ही अखबार,  हॉकर द्वार के नीचे की दरार से सरकाकर डाल जाता था।

यही प्रतिदिन का क्रम था। अन्य किसी को नयना ने वहाँ आते या डोर बेल बजाते कभी नहीं देखा। रसोई के सारे कार्य भोजन पकाने से लेकर सफाई बर्तन भी उसी से करवाए जाते थे। लेकिन कपड़े उससे नहीं धुलवाए जाते थे। शायद आते-जाते धोबी के पास ले जाते होंगे।

दिन में वो हाल से अखबार लाकर रखती और खाली समय में पढ़कर दिन काट लेती थी। रातों को लुट-पिटकर थकी-हारी एकांत पाते ही अमन की याद में व्याकुल होती रहती और सोचती कि काश! उसके पास डायरी और पेन होता तो उससे ढेर सी बातें-शिकायतें करती। अपने ज़ख्म और दर्द साझा करती।

हर दूसरे-तीसरे दिन सेठजी भी दोपहर में आ जाते थे। उस दिन बलराम पहले ही उसे आगाह कर देता था कि सेठजी जब तक रहेंगे उसे कमरे में बंद कर दिया जाएगा अतः वो भोजन पानी कमरे में रख ले। हाल में और कौन आता था अथवा  क्या चर्चा होती थी इसका आभास तक उसे नहीं होने दिया जाता था क्योंकि बेल बजते ही हमेशा उसे कमरे में लॉक कर दिया जाता था। माणिक कमरा खोलकर अन्दर आता और औपचारिक चिकनी चुपड़ी बातें करते हुए एक घंटे तक नयना को निचोड़ता रहता फिर उसे शाम तक कमरे में बंद कर दिया जाता था। हाल में होने वाली गतिविधियों की उसे भनक भी नहीं लगती थी और सेठजी के जाने के बाद ही बलराम उसका कमरा खोलता था।

वो सोचती ऐसा शायद उसके भागने की शंका के कारण किया जाता होगा। लेकिन नयना इस तरह की मूर्खता तो कभी करने वाली नहीं थी। दूध से जला हुआ छाछ भी फूँककर पीता है, वो मुक्ति के ऐसे मार्ग की तलाश में थी, जिसपर कदम रखने में जोखिम बिल्कुल न हो, यानी साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

क्रमशः ...

### अध्याय 13

महानगर का जीवन भी महासमर ही होता है।  यानी आपाधापी,  भागदौड़, एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में फँसे लोग,  गाँवों और छोटे शहरों से पलायन करके बसे हुए लोग, एक तरफ साफ़ सुथरे, सजीले विशाल भवन,  अट्टालिकाएँ,  ऊँचे फ़्लैट तो दूसरी तरफ गंदगी के आगोश में पलतीं छोटी-छोटी टीन-टप्पर वाली बस्तियाँ...एक तरफ छप्पन भोग वाले राजसी स्वाद तो दूसरी तरफ रोटी को तरसते कुपोषित पेट...एक तरफ सुसज्जित नर्म शैय्याएँ, नित्य नूतन वस्त्राभूषण तो दूसरी तरफ फुटपाथी सेज पर सोते अधनंगे चिथड़ों में लिपटे लज्जित शरीर... कहीं सुगन्धित तरणतालों में तैरते लचीले बदन तो कहीं जल-बूँद को तरसते मैले कुचैले तन... अमन अपने विगत जीवन से जान चुका था कि यह अंतर कुदरती नहीं बल्कि महानगरों के महामानवों द्वारा साधित मंतर का परिणाम ही होता है।

अमन के पास समय बिताने और जानकारियाँ जुटाने का एकमात्र साथी मोबाइल ही था। रात में मित्रों से बातचीत करके अपना हालचाल बताकर उनका पूछा फिर देर तक गूगल पर सर्च कर करके  अगले दिन के कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त हो गया। सबसे पहले उसने दिल्ली के सारे रजिस्टर्ड अनाथाश्रमों के संपर्क नंबर और पते नोट किये फिर ६ महीने पुरानी तारीखों के आधार पर उन आश्रमों से जुड़े समाचार तलाश करके एक साथ आराम से पढ़ने और मनन करने के लिए सबकी लिंक सहेजता गया।  इस कार्य में ही उसे काफी समय लग गया था और  नींद उसपर हावी होने लगी थी अतः बाकी कार्यों को नई सुबह से विस्तार देने का निर्णय लेकर बिस्तर पर पसरकर निद्रा के आगोश में चला गया।

सुबह ६ बजे चिड़ियों के चहकने की आवाज़ के साथ उसकी नींद टूटी। उसने मुस्कुराते हुए मोबाइल का अलार्म बंद किया फिर फुर्ती से उठकर नित्य कर्मों से फारिग होकर तैयार हो गया।

कमरे से बाहर निकलकर उसने निकट ही गुमटी पर बन रही एक कप चाय पी। सुबह की हवा बहुत सुहानी लग रही थी,  उसकी धर्मशाला सघन इलाके में थी अतः वो सैर के लिहाज से  आगे निकलकर मुख्य सड़क पर आ गया। महानगर की ज़िंदगी दौड़ने लगी थी। हर तरह के वाहन अपने-अपने  मुकाम तक पहुँचने की कतार में थे।

अमन अपनी चिंताओं को चित्त से चिपकाए धीरे-धीरे चहलकदमी करता हुआ बढ़ रहा था। अचानक सामने से उसे कुछ साइकिल सवारों का काफिला आता हुआ दिखाई दिया। सबके साथ आगे-पीछे अखबारों का एक एक गट्ठर लदा हुआ था। अमन ने अंदाज़ लगाया कि वे सब अखबार बाँटने वाले होंगे। वो भी किसी ऐसे ही चंद घंटों के काम की तलाश में था, उसे यह काम उपयुक्त महसूस हुआ। अगर मिल जाए तो सुबह दो चार घंटों के निवेश से उसका पेट भरने का जुगाड़ हो सकता है। वो उसी दिशा में बढ़ता गया जिस दिशा से साइकिल सवार आ रहे थे।

कुछ देर बढ़ने के बाद एक उसे एक चौक पर अख़बारों से लदा हुआ वाहन दिखाई दिया। अमन निकट जाकर सारी प्रक्रिया देखने लगा। वहीं पर नीचे एक तिरपाल बिछाई गई थी। कुछ लोग अख़बारों के बण्डल उतार रहे थे। कुछ अधिकारी भी वहाँ उपस्थित थे।  अखबार बाँटने वाले बण्डल अलग-अलग कर रहे थे फिर अपने-अपने हिस्से के पैकेट लेकर निकलते जा रहे थे।

अमन ने सोचा कि इस काम के लिए तो साइकिल होना आवश्यक है। अगर काम मिल जाता है तो वो कुछ दिन पैदल भी कार्य कर सकता है।

उसने उन हॉकरों से ही इस काम के लिए जानकारी जुटाने के विचार से एक हॉकर  को अपना परिचय देकर पूछा कि उसका नाम क्या है, वो कहाँ रहता है, क्या उसे भी यह काम मिल सकता है? उस व्यक्ति ने बताया कि उसका नाम गणेश है। उनका एक संघ है। इस काम के लिए उनके संघ के प्रमुख से मिलना चाहिए। वे सब निकट की बस्ती में रहते हैं। इस समय कुछ सदस्य काम पर जा चुके हैं और कुछ जाने की जल्दी में हैं। वे लोग प्रतिदिन सुबह ४ बजे यहाँ पहुँच जाते हैं, फिर आधे घंटे बाद अख़बारों का वाहन आते ही काम में जुट जाते हैं। अगर वो कल सुबह ४ बजे वहाँ आ जाए तो संघ-प्रमुख उसे अखबार के अधिकारियों से कहकर उसे भी काम दिला सकता है।

अगले दिन अमन के अलार्म की चिड़ियों ने तीन बजे ही चहककर उसे भोर होने का संकेत दे दिया। अमन जल्दी से नित्य कर्मों से फारिग होकर ४ बजे से कुछ पहले ही अपने गंतव्य तक पहुँच गया। कुछ हॉकर  वहाँ आ चुके थे। वो गणेश के आने का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद उसे गणेश दिखाई दिया। धीरे-धीरे सदस्य भी वहाँ एकत्रित होने लगे। उसने गणेश के पास जाकर मुस्कुराकर हाथ मिलाया। गणेश ने उसका मंतव्य समझकर उसे एक कसे हुए गठीले बदन वाले युवक के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। अमन ने नमस्कार के साथ ही अपना परिचय देकर कार्य दिलाने का आग्रह किया।

दिनेश नाम के उस व्यक्ति ने उसका संक्षिप्त परिचय पूछा। अमन के अनाथ होने की बात जानकर  उसने अमन को दिलासा देकर अपने संघ में शमिल होने के लिए कहा।

अमन ने स्वीकृति देने के साथ ही उनकी ही बस्ती में एक कमरे का सुविधाजनक मकान किराये पर लेने की इच्छा भी जताई।

मेहनतकश लोग ईमानदार तो होते ही हैं, एक दूसरे के दर्द में भी साथ खड़े होते हैं।

अमन ने यह सब जिया और महसूस भी किया था। दिनेश उसे अखबार के अधिकारियों  के पास ले गया।

अमन के व्यक्तित्व, वेशभूषा और बातचीत के लहजे से प्रभावित अधिकारियों द्वारा यह पूछने पर कि पढ़ा लिखा और १२ वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बावजूद उसने यह रोज़गार क्यों चुना,  वो तो आगे पढ़ाई जारी रखकर बेहतरीन कैरियर बना सकता है तो उसने दिल्ली में विशेष उद्देश्य से आने की बात बताई और कहा कि उस कार्य के अलावा उसे अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी ही है, अतः अभी केवल गुजारे लायक रकम की ही दरकार है। अधिकारियों ने उससे कहा कि जब तक किसी नए इलाके से संपर्क/प्रचार  करके कार्य बढ़ाया जाए, तब तक उसे दिल्ली के अपने निवास के आसपास के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर अखबार बेचने का कार्य करना होगा। अमन ने अपनी सहमति दे दी।

अमन ने गूगल पर सर्च करके जानकारी जुटाई फिर आसपास के स्टेशनों के नाम  और यात्री गाड़ियों के रुकने का समय आदि नोट करके अगले दिन से ही अपना कार्य आरम्भ कर दिया। नित्य सुबह चार बजे से उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती थी। इस तरह सबके  सहयोग से उसे कार्य तो मिला ही, उनकी बस्ती में एक ठीक-ठाक घर की व्यवस्था भी हो गई। और वो धर्मशाला छोड़कर उन श्रमिकों की बस्ती में आ गया। अमन की कहानी से उन सबको अमन अपना सा लगा और वो भी शीघ्र ही उनमें घुल मिल गया। उसे अपने कार्यस्थल तक अखबार के सेंटर से दो किलोमीटर दूर जाना ही पड़ता था। कुछ दिन वो पैदल ही आना-जाना करता रहा। फिर साइकिल खरीदने, सीखने से लेकर अखबार बाँटने तक पूरा कार्य समझने में भी उसे उन सबका सहयोग मिलता रहा।

मोहल्ले में अमन अकेला था मगर उन सबके अपने परिवार थे,  अपनी समस्याएँ व प्राथमिकताएँ थीं। अमन की प्राथमिकता नयना की तलाश करना ही थी और  इस कार्य में वो किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता था अतः किसी से अपने उद्देश्य का जिक्र नहीं किया।

अखबार बेचते हुए वो जब भी फुर्सत में होता समाचार पढ़ने लगता था। दुनिया, देश, हर शहर, हर गाँव के हर गली मोहल्ले के समाचार इन अख़बारों में होते थे। लेकिन उसकी निगाहें दिल्ली के अनाथालयों के समाचार तलाशती रहती थीं। जिस अखबार में इस तरह का समाचार होता उसकी एक प्रति वो अपने पास रख लेता था और घर आकर कुछ गौर से पढ़ा करता था। अक्सर समाचार हृदय विदीर्ण करने वाले होते थे। मोबाइल पर भी सहेजी हुई लिंक्स पर इसी तरह के समाचार मिलते थे। मगर निर्मलादेवी अनाथालय के बारे में उसे अलग-अलग की वर्ड्स से सर्च करने के बावजूद अब तक कोई समाचार नहीं मिला था।

अनाथों पर तरह तरह के अत्याचार, बालिकाओं, किशोरियों, युवतियों के संचालकों द्वारा ही मान-मर्दन करने के किस्से पढ़-पढ़कर उसका दिल नयना की सलामती की दुआ माँगने लगता। न जाने वो किस जहान में खो गई है... कब और कैसे उसे खोज पाउँगा...यह सब सोच-सोच कर उसका मन निराशा से भर जाता फिर अगले ही पल स्वयं को दिलासा भी देने लगता-

“अरे, अमन तुम तो इन कुहासों की कोख में ही अपने जीवन के बचपन और कैशोर्य का अनमोल हिस्सा जी चुके हो, अब तो तुम्हारे जीवन में उजालों का फैला हुआ आसमान है...इस तरह हिम्मत हारकर क्या तुम नयना के साथ अन्याय नहीं कर रहे...? वो कहीं न कहीं तुम्हारा इंतजार कर रही होगी...अपना लक्ष्य मत भूलो...!!”  फिर वो आगे की रूपरेखा तैयार करने लगता।

गुजर-बसर तो होने ही लगी थी, वो अधिक से अधिक मेहनत करके अख़बारों से होने वाली कमाई से ही खर्च पूरा कर लेता था। अपने मकान के किराये के पैसे उसने पढ़ाई और आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए रख छोड़े थे। अखबार के अधिकारियों से भी वो अक्सर चर्चा करके इस क्षेत्र की जानकारियाँ जुटाता रहता था। वो आश्चर्य-चकित होकर सोचता रहता कि एक ही दिन में इतने समाचार कैसे एकत्र होकर छप जाते हैं?

एक दिन उसने जिज्ञासावश एक अधिकारी से चर्चा करते हुए यह सब जानना चाहा। अधिकारी उसकी वाक्पटुता और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी के भी अच्छे ज्ञान से प्रभावित हो चुके थे। उन्हें अमन में एक होनहार पत्रकार बनने की संभावना नज़र आई। उन्होंने उसे एक दिन कार्यस्थल पर आकर सारी प्रक्रिया सामने देखने का निमंत्रण देकर एक कार्ड आगे बढ़ा दिया जिसमें कार्यस्थल का पता और संपर्क नंबर नोट था।

अमन अपनी मुँहमाँगी मुराद पूरी होते देख उसी दिन अपना कार्य समाप्त करके साइकिल से ही ५ किलोमीटर का सफ़र करके वहाँ पहुँच गया। वहाँ उसका परिचय कई वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों से हुआ। उनका उत्साह और फुर्ती देखते ही बनती थी।

लगभग दो घंटे वहाँ रहकर अमन सारी प्रक्रियाएँ देखता और समझता रहा। चर्चा से उसने जान लिया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का ही आवश्यक अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों का अध्ययन, चिंतन-मनन, लेखन, अभिव्यक्ति का हुनर और जनसेवा की भावना का होना पत्रकार के लिए अति आवश्यक है। इस कार्य में भी कैरियर बनाने के लिए अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि विकल्प मौजूद हैं।

क्रमशः...

### अध्याय 14

एक दिन कुशल ने सलाह दी कि क्यों न आगरा के पर्यटन स्थलों पर जाकर भीख माँगी जाए, चूँकि ऐसे स्थानों पर आने वाले अधिकांश लोग रईस होते हैं। अतः पैसा तो अच्छा मिलेगा ही, देखने का अवसर भी मिल जाएगा। उसकी बात सुनकर रतन बोल पड़ा-

“यार कुशल, तुमने तो मेरे मन की बात कह दी...मैंने इतिहास की किताब में ताजमहल का चित्र देखकर सोचा था, यह चित्र ही इतना सुन्दर है तो सामने देखने पर कैसा होगा? तब तो यह सोचा भी न था कि एक दिन किस्मत हमें इस तरह यहीं ले आएगी।”

“क्या बात कही मित्र, अब तो देखे बिना चैन नहीं पड़ने वाला...” बस अब अमन भैया के आदेश का इंतज़ार है।” अमन की तरफ देखकर कीरत ने भी अपना सुर मिलाया। वो अमन को भैया ही कहा करता था।

ताजमहल का जिक्र छिड़ते ही अमन के नयन, नयना को याद करके अनायास गीले हो गए।

सातवीं कक्षा में आगरा का इतिहास पढ़ते हुए ताजमहल देखने के कितने सपने उन दोनों ने मिलकर संजोए थे। अब तो वो भी बड़ी हो गई होगी...उसे ज़रूर याद करती होगी। उसने उससे फिर मिलने का वादा जो किया था...उसे तो मेरी परेशानियों का अंदाज़ भी नहीं होगा। न जाने अब कब उससे मिलना होगा। एक ठंडी साँस छोड़ते हुए वो जैसे तन्द्रा से जागा-

“हाँ हाँ, किसी से जानकारी लेकर आज ही उस तरफ चले चलते हैं न...” कहते हुए अमन ने अपनी सहमति से मित्रों की माँग पर मुहर लगा दी।

फुटपाथ से उतरकर वे सड़क पर आ गए। एक तरफ आटोरिक्शा कतार में लगे हुए थे एक आदमी को वहीं खड़ा देखकर अमन ने पूछा-

“भाई सा...ताजमहल यहाँ से कितनी दूर है”?

४-५ किलोमीटर से अधिक दूर नहीं होगा। कहते हुए ऑटो रिक्शा वाले ने अन्दर बैठने का इशारा किया। मगर तब तक वे चारों आगे बढ़ चुके थे।

कुशल, कीरत और रतन उत्साहपूर्वक बातें करते हुए चल रहे थे, लेकिन  अमन के नयनों में नयना इस कदर बसी हुई थी कि वो जिस तरफ नज़र घुमाता, नयना ही नगर आती।  राह चलते  हुए अपनी ही परछाई को नयना समझकर बातें करने लगता। मित्रगण उसे खोया हुआ देख कर समझते यह घर छिन जाने के कारण ही इतना उदास है। कहीं अवसादग्रस्त न हो जाए, इस बात का पूरा ध्यान रखते और बात-बात पर कहकहे लगाते और चुटकुले सुनाने लगते थे।

चलते-चलते सहसा अमन के मन में विचार आया कि ताजमहल तो यमुना के किनारे बना हुआ है, तो क्यों न अपना सफर यमुना के घाट से शुरू किया जाए...उसने मित्रों से इस बारे में बात की तो रतन तुरंत बोल पड़ा-

“बात तो पते की कही है यार...यमुना के घाट पर ही नहा धोकर वस्त्र भी बदल लेंगे। कहीं आसपास मंदिर होगा तो दर्शन के साथ ही भिक्षार्जन से पेट-पूजा भी हो जाएगी। इससे सुहाना  सफ़र और कौनसा होगा...”

उनका आश्रम भी यमुना किनारे ही था, अतः चारों अपने जाने पहचाने आश्रम की ओर चल पड़े। आश्रम के नजदीक घाट पर नदी का पानी स्वच्छ नहीं था, अतः वहाँ से राह चलते लोगों से ताजमहल की दिशा की जानकारी लेकर किनारे-किनारे आगे बढ़ते गए। काफी दूर जाकर अपेक्षाकृत साफ़ जल और चौड़ा पाट देख वहीं रुककर सबने नहाकर  वस्त्र बदले लेकिन वहाँ सुनसान होने से भोजन मिलना संभव नहीं था अतः भूखे पेट ही उनका काफिला पूरी रफ़्तार से अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ा।

अविराम चलते हुए सिर्फ एक घंटे के अन्दर ही उन्होंने ५ किलोमीटर का रास्ता तय कर लिया और वे अब ताज नगरी की शान, ताजमहल के सामने थे।

प्रवेश द्वार पर सैलानियों को देख-देखकर उन्होंने भी हर प्रक्रिया से गुजरते हुए टोकन लेकर बाहरी द्वार से अन्दर प्रवेश कर लिया।

नज़ारा इतना नयनाभिराम था कि वे भिक्षा और भूख भूलकर ताज की छवि निहारने में खो से गए। वहाँ पर्यटकों का ख़ासा हुजूम ताजमहल देखने आया हुआ था। आसपास और भी स्मारक थे। देशी-विदेशी हर तरह के लोग थे। जो घूम फिर कर थक जाते थे, उनमें कुछ बाहरी परिसर के मार्ग के दोनों तरफ कतार में लगी हुई बेंचों पर बैठ जाते थे अथवा नजदीक ही पार्क में चले जाते थे।

अमन ने मित्रों को समझाया- “भई हम पेशेवर भिखारी नहीं हैं,  कुछ सोच समझकर ही हमें यहाँ भीख माँगनी है। विदेशी पर्यटकों के सामने बिल्कुल नहीं जाना है। हमें मज़बूरी यह कार्य करवा रही है,  ऐसा न हो कि उनकी नज़रों में हमारे देश की दागी तस्वीर अंकित हो जाए। पुलिस के जवान भी हर तरफ फैले हुए हैं, अतः हम जहाँ भीड़ कम हो वहीं अपना काम करेंगे। जहाँ कोई विस्तार से बताने को कहे तभी प्रमाण पत्र दिखाना है। अब हमें अलग हो जाना चाहिए। समय पूरा होने से आधा घंटा पहले हमें पार्क में ही एक दूसरे का इंतज़ार करना है।”

इस तरह मशविरा करने के बाद वे अलग-अलग होकर अपने काम में जुट गए।

घूमते-घूमते  अमन को बाहरी परिसर में एक बेंच पर दो युवा जोड़े थकान उतारते हुए दिखाई दिए। दोनों महिलाएँ देखने में जितनी सुंदर थीं उतने ही दोनों पुरुष भी आकर्षक व्यक्तित्व और गठीले बदन के थे। उनकी बातचीत में भी शालीनता की झलक दिखाई दे रही थी। अमन हिम्मत करके उनके पास जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

“तुम कौन हो भाई, तुम्हें क्या परेशानी है”? एक युवक ने पूछ लिया

अमन ने प्रत्युत्तर में अपनी कहानी सुनाकर सहायता के लिए हाथ फैला दिया।

“लेकिन भाई,  तुम लगते तो पढ़े लिखे हो। फिर तुम ऐसे स्थान पर इस तरह...”?

“जी साहब, मैंने १२ वीं प्रथम श्रेणी में पास की है। सर्टिफिकेट भी मेरे पास है, मगर परिस्थितितों का मारा हूँ, उम्मीद का दिया लेकर मंज़िल की तलाश में जुटा हुआ हुआ हूँ”।

हुम्म...उस व्यक्ति ने निकट बैठी हुई अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहा-

“माना, यह सचमुच मुसीबत का मारा हुआ लग रहा है, मेरे पास तो कैश नहीं है, तुम्हीं इसकी कुछ सहायता करो।”

युवती ने पर्स खोलकर टटोला और बोली-

“रोशी, मेरे पास ५०० का ही नोट है, दे दूँ”?

तभी दूसरा व्यक्ति बोल पड़ा

“अरे भाभीजी,  इसमें पूछने की क्या बात है, रोशन सेठ क्या मना करेंगे”?

“ऐ मिस्टर, बीच में टोकना बुरी बात है...”

फिर मुस्कुराते हुए युवती ने अमन की तरफ नोट बढ़ा दिया। और दूसरी युवती को संबोधित करके बोली-

“शिखा डियर, तुम भी अपना पर्स टटोल लो, ये मर्द लोग हमारा बटुआ देखकर ही खाली हाथ चलते हैं”।

शिखा ने पति की ओर देखा तो पहले वाले युवक ने,  जिसे पत्नी द्वारा रोशी संबोधित किया गया था, उसे टोका-

“लो भई, अब आपको भला वकील साहब की आज्ञा चाहिए?”

“नहीं ऐसी बात नहीं है जीजू, पर मेरे पर्स में बड़ा नोट नहीं है, मुझसे कैश जल्दी खर्च हो जाता है अतः सौरभ ही सब सँभालते हैं”।

उसका इशारा समझकर सौरभ नाम के युवक ने मुस्कुराते हुए शाही अंदाज में जेब से ५०० का नोट अमन की ओर बढ़ाकर पूछा-

“अमन भाई, तुम रहते कहाँ हो?”

अमन ने नोट लेकर अपने बैग से बचपन का परिचय-पत्र निकालकर कथित वकील साहब की ओर बढ़ाते हुए अपनी कहानी का दुखद अंश कह सुनाया।

उसकी कहानी सुनकर दोनों युवतियों का कोमल मन कराह उठा। वे अपने पतियों की ओर सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद से निहारने लगीं।

रोशन नाम के युवक ने उसकी आपबीती पर दुःख प्रगट करते हुए कहा-

“अमन भाई, लगता है आज कुदरत ने तुम्हारी सहायता करने के लिए ही शायद हमसे मिलवाया है। हमारे ये मित्रवर उज्जैन के प्रसिद्ध वकील सौरभ झाँगियानी जी हैं। इनसे तुम्हें उचित सलाह भी मुफ्त मिल जाएगी”।

सौरभ ने परिचय-पत्र पर दृष्टि गड़ाते हुए कुछ विचार करने के बाद कहा-

“अमन भाई, तुम्हें सीधे जिला-कोर्ट जाकर अपने घर पर अवैध कब्जे के विरुद्ध अर्जी दखिल कर देनी चहिये। संविधान में गरीब, अनाथ अथवा प्राकृतिक आपदा-ग्रस्त को सुप्रीम कोर्ट तक मुफ्त में कानूनी सहायता देने का प्रावधान है। वैसे कानून के नए नियमों के अनुसार अगर लावारिस मकान पर कोई अवैध कब्जा कर ले तो १२ साल निवास करने के बाद वो मकान कानूनी तौर पर उसका हो जाता है। तुम्हारे कथनानुसार तुम्हारे मकान पर अवैध कब्ज़ा हुए १० वर्ष हो चुके हैं अब केवल दो वर्ष ही बाकी हैं। अगर तुम शीघ्र ही अपनी याचिका कोर्ट में दाखिल कर दोगे तो अदालत तुम्हें मुफ्त सरकारी वकील उपलब्ध करवा देगी या फिर तुम्हारे हक़ में तुरंत फैसला भी दे सकती है। हम लोग उज्जैन के हैं और आगरा घूमने के उद्देश्य से यहाँ आए हैं। कल तक वापस भी जाना है। अगर यहाँ का निवासी होता तो तुम्हें इंसाफ दिलाने में कोई कसर न छोड़ता”।

अमन ने उसकी सलाह अपने मन के संदूक में तुरंत सहेज ली और हाथ जोड़कर धन्यवाद कहकर उन सहृदय जोड़ों को मन ही मन सैकड़ों दुआएँ देता हुआ आगे बढ़ गया।अमन के पास अपने मकान का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं था। सिर्फ परिचय पत्र ही एकमात्र सबूत उसके पास था। भिक्षाटन के दौरान मिली सभी सलाहें उसके मन के संदूक में सिलसिलेवार सजी हुई थीं। उसने सलाहों के संदूक को एकाग्र होकर टटोला तो सभी उन सलाहचंद्रों के मुख से निकले नेक शब्द उसके साथ संवाद करने लगे जो उसके व्यक्तित्व और बातचीत के अंदाज़ को देखकर अविश्वसनीय नज़रों से निहारने लगते थे फिर दान स्वरूप कुछ मोटी रकम देकर अपने सामान्य ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए एकाध सलाह सौंपना न भूलते थे-

“अरे बेटे, इस तरह क्यों भटक रहे हो, हाल ही में उत्तराखंड कैबिनेट ने राजकीय अनाथ आश्रमों में पले बढ़े बच्चों को सरकारी नौकरी में पाँच प्रतिशत आरक्षण देने पर मुहर लगा दी है। तुम्हें केवल संस्था की ओर से दिया गया प्रमाणपत्र ही प्रस्तुत करना होगा।”

“अदालत अनाथों के लिए सरकारी वकील मुफ्त उपलब्ध करवाती है, तुम्हें सीधे कोर्ट जाकर अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए अर्जी देनी चाहिए। यही नहीं अनाथों को बिना केस के शीघ्र निर्णय की सुविधा भी दी जाती है।”

अमन को यह सारी जानकारी उसे उज्जैन के वकील सौरभ झांगियानी से भी मिल चुकी थी, मगर उसकी मुख्य समस्या यानी भूख मिटाने और हाथ में कुछ रकम जुटाने की थी जिसके लिए वे भिक्षुक बनकर भटक रहे थे, वो अब काफी हद तक सुलझ चुकी थी यानी अब इतनी रकम उनके पास एकत्र हो चुकी थी कि वे आगे की गतिविधि के लिए सक्रिय हो जाएँ। अमन जान गया था यह उनके सुदर्शन व्यक्तित्व, माँगने का विनम्र लहजा और पढ़े-लिखे होने के कारण ही संभव हुआ था, अतः आगे भी कोई बाधा नहीं आएगी यह सुनिश्चित करने के बाद अमन ने सबसे पहले सबके लिए स्मार्ट मोबाइल खरीद लिया। फिर रतन और कीरत को भिक्षार्जन करते रहने की हिदायत देकर स्वयं कुशल के साथ अगले कदम की रूपरेखा बनाने में जुट गया।

इसके बावजूद चारों का फोन पर संपर्क बनाए रखकर दोपहर और रात्रि में एक स्थान पर मिलना पूर्ववत था।

अब अमन ने उज्जैन के वकील सौरभ झांगियानी से मिली हुई सलाह के मुताबिक- “जिन पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क कानूनी सेवाओं की आवश्यकता है, वे लिखित रूप में एक आवेदन प्रस्तुत करके सम्बंधित प्राधिकरण या समिति से संपर्क कर निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त कर सकते हैं।”  विचार करके “डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी” से संपर्क किया और अपनी पूरी समस्या विस्तार से बताई। चूँकि वो अनाथ और बाढ़ पीड़ित होने के साथ ही धोखे का शिकार हुआ था अतः प्रतिक्रिया स्वरूप वहाँ से आश्वस्त करके कानूनी सहायता प्राप्त करने के कारण को अथारिटी के अधिकारियों द्वारा तैयार किये गए प्रपत्रों को भरकर लिखित रूप से आवेदन प्रस्तुत करने का अनुरोध किये जाने पर उसने लिखित आवेदन प्रस्तुत कर दिया।

उसके आवेदन पर “विधिक सेवा संस्थान” द्वारा उचित आवश्यक कार्यवाही शुरू करने का आश्वासन देकर उसके केस की जानकारी सम्बंधित पक्ष को भेज दी गई। आगे की कार्यवाही में अदालत द्वारा परामर्श और उसके केस का प्रतिनिधित्व करने के लिए अमन को एक वकील प्रदान किया गया।

सरकारी वकील ने जाँच के दौरान बाढ़ दुर्घटना की बंद हो चुकी फाइल फिर से खुलवाई तो पता चला कि अमन के माता पिता की उस दुर्घटना में मृत्यु के बाद उसको अनाथालय भेजने के साथ ही उसका मकान एक स्वयंसेवी संस्था को सौंप दिया गया था। एक निश्चित अवधि तक अमन के किसी परिचित अथवा रिश्तेदार का इंतज़ार करने के बाद कोई दावेदार न मिलने पर संस्था के सदस्यों की बैठक में उस मकान से होने वाली आमदनी अमन की शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च होने के बाद बाकी रकम उसका बैंक में खाता बनवाकर जमा करते रहने का निर्णय लिया गया था।

लेकिन इस निर्णय के बाद कुछ ही दिनों के अन्दर अचानक संस्था के प्रमुख ६० वर्षीय उमाप्रसाद की अचानक मृत्यु हो जाने से मामला ठन्डे बस्ते में चला गया था और नए अध्यक्ष के कार्यभार संभालने के बाद इस तरफ किसी ने ध्यान न दिया। लावारिस मकान पर न जाने कितने लोभी घात लगाए बैठे थे। अवसर मिलते ही पड़ोस के ही परिवार के बड़े बेटे ने उसपर अपना कब्जा कर लिया था।

अमन इन कानूनी उलझनों से परिचित ही नहीं था। वकील के प्रतिनिधित्व में लगातार ६ महीने तक कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते उसका दिमाग चक्करधिनी बन गया था। कुशल हमेशा साथ रहकर उसका उत्साह वर्धन करता रहता था। उसके वकील का यह पहला केस था अतः उसने तत्परता दिखाते हुए केस को अतिशीघ्र परिणाम तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी बुद्धिमता से उसे बिना परेशानी दिए सारे सबूत एकत्र करके न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिए। कुछ समय वाद-विवाद चलता रहा आखिर इस केस पर त्वरित न्याय प्रक्रिया के अंतर्गत अमन के वकील की जीत की मोहर लग गई और अमन को अपने  मकान का कब्ज़ा वापस मिल गया।

क्रमशः...

### अध्याय 15

अमन को घर वापस मिलना एक बहुत बड़ी जंग जीतने के समान था। चारों मित्र भिक्षाटन  छोड़कर व्यवस्थाओं के जोड़ तोड़ में जुट गए। अमन ने देखा कि पूरे घर की दीवारें और फिक्स किया हुआ फर्नीचर सुरक्षित था बाकी सब सामान कहाँ गया इसका कोई पता नहीं लगा। अमन ने भी उस तरफ सोचना व्यर्थ जानकर आगे बढ़ना उचित समझा।

त्वरित निर्णय लेकर उसने मकान का ऊपरी खण्ड एक महीने के अग्रिम किराए पर एक परिवार को दे दिया। उस रकम से नीचे के खंड के दो कमरों के लिए पलंग और अलमारियों की व्यवस्था कर ली। हाल में ८ वीं तक के बच्चों को ट्यूशन देने बाबत बाहरी द्वार पर नोटिस लगा दिया। भोजन के लिए टिफिन की व्यवस्था कर ली गई।

घर की समस्या हल होते ही अमन के मनोमस्तिष्क  के तहखाने से निकलकर नयना चिर परिचित मुस्कान के साथ उसके सामने उपस्थित हो गई। अमन अपनी पलकें बंद करके उसकी छवि निहारकर निहाल होता रहा। रात होते ही मन ही मन योजना बनाता हुआ स्वयं से ही बतियाने लगा।

“मुझे शीघ्र ही उससे मिलने जाना होगा। काश,  निन्नी के पास भी एक स्मार्ट मोबाइल होता तो इस समय हम आमने सामने बात कर रहे होते, अब इस दिल का क्या करूँ जो इसी क्षण उसकी आवाज़ सुनना चाहता है। क्यों न मैं आश्रम की संचालिका शैलजा को फोन करके एक बार नयना से बात करवाने का आग्रह करूँ, वो उसे जानती पहचानती हैं तो इनकार नहीं करेंगी”।

अमन ने तुरंत अपनी सोच को विश्राम देकर सर्च करके ऑन लाइन डायरेक्टरी से आश्रम का नंबर खोज निकाला और काल कर दिया।

वहाँ से शैलजा ने ही काल अटेंड किया और पूछा-

“आप कौन हैं, किससे बात करना चाहते हैं?”

“मैं अमन हूँ आंटीजी, आठवीं कक्षा तक आपके आश्रम में पलने-बढ़ने वाला अमन...! आपके आशीर्वाद से मैंने आगरा में १२ वीं तक शिक्षा पूर्ण करके अपना घर भी हासिल कर लिया है”।

“बहुत अच्छा बेटे, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं, इतने समय बाद मुझे कैसे याद किया”?

“मैं आपके आश्रम की अपनी बचपन की सहपाठी नयना से बात करना चाहता हूँ, आप ज़रा उससे बात करवा दीजिये प्लीज़...!”

“नयना! ओह अमन, मुझे खेद है कि वो अब इस आश्रम में नहीं है।”

“फिर वो कहाँ है आंटीजी, मेरी उससे वहाँ पुनः आने और तब तक वहीँ मेरा इंतजार करने की बात हुई थी। कृपया बताइए मेरा मन बेचैन हो रहा है।” शैलजा के इस अप्रत्याशित उत्तर से व्यथित होकर अमन ने पूछा।

“मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है अमन कि वो ६ महीने पहले १२ वीं का परीक्षा परिणाम ज्ञात करने स्कूल के लिए निकली थी, फिर वापस आश्रम नहीं पहुँची। हमने बहुत खोजबीन की मगर  अब तक उसका पता नहीं चला। हमने पुलिस में भी रिपोर्ट कर दी थी”।

लेकिन ऐसा कैसे हुआ आंटीजी, क्या वो अकेली ही आश्रम से निकली थी? उसकी सहेलियाँ डाली और लता तो हमेशा उसके साथ ही रहती थीं, वे उसके साथ क्यों नहीं गई थीं...? आंटीजी क्या मैं उनसे बात कर सकता हूँ”?

“नयना के लापता होने के चार माह बाद उसकी दोनों सहेलियाँ एक रात आश्रम से भाग निकलीं फिर उनका भी कोई पता नहीं चला।”

पूरी बात सुनकर अमन सकते में आ गया।  उसका तो दिल ही बैठने लगा।  क्या कहे समझ ही पा रहा था।  आँखों से आँसू झरने लगे और काँपते हुए हाथों से मोबाइल छूटकर नीचे गिर गया। उसे अपनी धड़कनें थमती सी प्रतीत होने लगीं।

लग रहा था था,  उसके कष्टों का कारवाँ इतनी आसानी से उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है।

उसने पूरी रात करवटों में गुज़र दी। न जाने उसकी निन्नी किस मुसीबत में फँसी होगी... आखिर वो गई कहाँ उसकी खोज क्यों नहीं की गई। फिर स्वयं से बतियाने लगा-

“मैं भी कितना नादान हूँ, आवश्यक नहीं कि नयना जितनी मेरे लिए महत्वपूर्ण है, आश्रम के लिए भी हो... आखिर थी तो अनाथ ही न...?मगर मैं उसे अवश्य खोज निकालूँगा।  होगी तो इसी जहान में, धरती या आसमान तो उसे निगल नहीं गया होगा...! न जाने कहाँ किस हाल में होगी, मुझे बहुत याद करती होगी...विधाता न जाने क्यों सारे दुःख-दर्द, संघर्ष और परेशानियाँ, गरीब और असहाय इंसानों के कोटे में आरक्षित करके रख देता है, जो समय-समय पर अपने होने का अहसास करवाने के लिए सामने चले आते हैं...”

सोच-सोचकर अमन का सिर फटा जा रहा था, उसकी सारी खुशी काफूर हो चुकी थी।

मित्रगण अपने-अपने बिस्तर पर निद्रामग्न थे मगर अमन का मन सुबह होने के इंतज़ार में छटपटा रहा था। रात भर वो आगे की योजना बनाने में उलझा रहा

जैसे ही भोर हुई, उसने बेसब्र होकर मित्रों को उठा दिया और शैलजा के साथ हुई बातचीत उन्हें सुनाकर बोला-

“भाइयो,  मुझे शीघ्र ही दिल्ली जाना होगा...”।

वे सब अमन के नयना के साथ लगाव से तो वाकिफ थे मगर उनके संबंध की गहराई से वे परिचित नहीं थे। उसकी बात सुनकर कुशल बोल पड़ा

“अमन भैया, मैं भी आपके साथ चलूँगा, अकेले जाना ठीक नहीं होगा।”

कुशल बोला-

“नहीं मित्र, मुझे तो मकान मिलने के साथ ही सम्पति का मालिक होने के कारण अनाथों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुविधा मिलेगी नहीं,  मगर तुम तीनों को अभी नौकरी का मुकाम हासिल करना ही है। तुम यहाँ कोचिंग का कार्य जारी रखते हुए नौकरी के लिए भी आवेदन का फॉर्म भर देना। मकान की देखरेख भी तुम लोगों को ही करनी है। किराए का पैसा मेरे अकाउंट में आता रहेगा। मुझे दिल्ली में न जाने कितने समय तक रहना पड़े, इसका कोई भरोसा नहीं जब तक नयना का पता नहीं लग जाता, मैं वापस नहीं आऊँगा। मेरे साथ मेरा पुख्ता परिचय है, कोई भी छोटी मोटी नौकरी मिलने में दिक्कत नहीं आएगी। रहने के लिए भी कुछ न कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी। तुम तीनों को जब तक नौकरी नहीं मिल जाती, गुजर बसर के लिए यहीं रहना है। मोबाइल पर सम्पर्क बना रहेगा”।

मित्रों को सारी बातें समझाकर अमन एक बैग में आवश्यक सामान के साथ कुछ कैश रखकर बस स्टैंड पर पहुँच गया। वो सुविधा के विचार से जाना तो ट्रेन से चाहता था मगर आरक्षण के लिए कुछ दिन इंतजार करना पड़ सकता था और उसके लिए हर पल कीमती था। उसके बस में होता तो वो तुरंत दिल्ली पहुँच जाता और नयना की खोज में जुट जाता, मगर...परिस्थितियाँ  इंसान को इतना बेबस बना देती हैं कि वो चाह की राह से काँटे चुनते-चुनते तन-मन ज़ख़्मी कर बैठता है।

आगरा से दिल्ली बसें जाती ही रहती थीं, अमन ने पूछताछ करके सबसे पहले प्रस्थान करने वाली बस का टिकट खरीदा और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।

दिल्ली पहुँचकर अमन ने चारों तरफ सरसरी नज़र दौड़ाई। इस शहर से वो  अनजान ही था। अपने जीवन का जो हिस्सा उसने यहाँ गुजारा था, वो पिंजरे में कैद पंछी के समान ही था जो दाने-पानी के लिए मालिकों की मेहरबानी का मोहताज होता है। यह बात अलग थी कि उसी पिंजरे में उसे कुछ प्रेमिल-पल भी नसीब हुए थे जो अब उसके जीवन में कब पुनः प्रवेश करेंगे इसका कोई पता न होते हुए भी उसके जीने का सहारा थे। उन पलों की नायिका नयना की तलाश ही अब जीने का एकमात्र उद्देश्य था। नयना के विचार मात्र से उसे अनाथालय में उसके साथ बिताए दिनों को याद करके अधरों पर मीठी सी मुस्कान आ गई मगर अगले ही क्षण उसके गुमशुदा होने के गम ने मुस्कान को मायूसी में बदल दिया।

बस स्टैंड पर हर तरह के लोग बिखरे हुए थे। छोटे बड़े सभी भागदौड़ में लगे हुए थे। पानी की बोतलें बेचने वाले, फेरी करके चने मूँगफली समोसे आदि बेचने वाले इस तरह गतिमान थे कि देखकर लगता था जैसे ज़िन्दगी ने पंख पहन लिए हों। इसके अलावा एक तरफ खाने पीने के सामान  के तरह-तरह के स्टाल लगे हुए थे। दूसरी तरफ सजी धजी दुकानें और छोटी बड़ी गुमटियाँ भी थीं। सबसे पहले अमन ने एक गुमटी के सामने बेंच पर बैठकर चाय-समोसे का  आर्डर दिया। फिर भुगतान करते हुए गुमटी के मालिक से पूछकर आसपास की किसी ठीक-ठाक धर्मशाला का पता नोट किया, जहाँ वो ढंग का कमरा मिलने तक रह सके। फिर एक ऑटो रिक्शा से वहाँ पहुँचकर धर्मशाला के मालिक से एक कमरे के लिए निवेदन किया। मालिक ने उसकी पूरी जानकारी अता-पता मोबाईल नंबर आदि रजिस्टर में दर्ज करके अग्रिम भुगतान लेकर एक कमरा खुलवाकर उसकी चाबी उसे सौंप दी। शाम हो चुकी थी। सुबह से निकला अमन नहा-धोकर भोजन करने के साथ ही शहर से परिचित होने के लिए निकल पड़ा।

क्रमशः...

### अध्याय 16

महानगर का जीवन भी महासमर ही होता है।  यानी आपाधापी,  भागदौड़, एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में फँसे लोग,  गाँवों और छोटे शहरों से पलायन करके बसे हुए लोग, एक तरफ साफ़ सुथरे, सजीले विशाल भवन,  अट्टालिकाएँ,  ऊँचे फ़्लैट तो दूसरी तरफ गंदगी के आगोश में पलतीं छोटी-छोटी टीन-टप्पर वाली बस्तियाँ...एक तरफ छप्पन भोग वाले राजसी स्वाद तो दूसरी तरफ रोटी को तरसते कुपोषित पेट...एक तरफ सुसज्जित नर्म शैय्याएँ, नित्य नूतन वस्त्राभूषण तो दूसरी तरफ फुटपाथी सेज पर सोते अधनंगे चिथड़ों में लिपटे लज्जित शरीर... कहीं सुगन्धित तरणतालों में तैरते लचीले बदन तो कहीं जल-बूँद को तरसते मैले कुचैले तन... अमन अपने विगत जीवन से जान चुका था कि यह अंतर कुदरती नहीं बल्कि महानगरों के महामानवों द्वारा साधित मंतर का परिणाम ही होता है।

अमन के पास समय बिताने और जानकारियाँ जुटाने का एकमात्र साथी मोबाइल ही था। रात में मित्रों से बातचीत करके अपना हालचाल बताकर उनका पूछा फिर देर तक गूगल पर सर्च कर करके  अगले दिन के कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त हो गया। सबसे पहले उसने दिल्ली के सारे रजिस्टर्ड अनाथाश्रमों के संपर्क नंबर और पते नोट किये फिर ६ महीने पुरानी तारीखों के आधार पर उन आश्रमों से जुड़े समाचार तलाश करके एक साथ आराम से पढ़ने और मनन करने के लिए सबकी लिंक सहेजता गया।  इस कार्य में ही उसे काफी समय लग गया था और  नींद उसपर हावी होने लगी थी अतः बाकी कार्यों को नई सुबह से विस्तार देने का निर्णय लेकर बिस्तर पर पसरकर निद्रा के आगोश में चला गया।

सुबह ६ बजे चिड़ियों के चहकने की आवाज़ के साथ उसकी नींद टूटी। उसने मुस्कुराते हुए मोबाइल का अलार्म बंद किया फिर फुर्ती से उठकर नित्य कर्मों से फारिग होकर तैयार हो गया।

कमरे से बाहर निकलकर उसने निकट ही गुमटी पर बन रही एक कप चाय पी। सुबह की हवा बहुत सुहानी लग रही थी,  उसकी धर्मशाला सघन इलाके में थी अतः वो सैर के लिहाज से  आगे निकलकर मुख्य सड़क पर आ गया। महानगर की ज़िंदगी दौड़ने लगी थी। हर तरह के वाहन अपने-अपने  मुकाम तक पहुँचने की कतार में थे।

अमन अपनी चिंताओं को चित्त से चिपकाए धीरे-धीरे चहलकदमी करता हुआ बढ़ रहा था। अचानक सामने से उसे कुछ साइकिल सवारों का काफिला आता हुआ दिखाई दिया। सबके साथ आगे-पीछे अखबारों का एक एक गट्ठर लदा हुआ था। अमन ने अंदाज़ लगाया कि वे सब अखबार बाँटने वाले होंगे। वो भी किसी ऐसे ही चंद घंटों के काम की तलाश में था, उसे यह काम उपयुक्त महसूस हुआ। अगर मिल जाए तो सुबह दो चार घंटों के निवेश से उसका पेट भरने का जुगाड़ हो सकता है। वो उसी दिशा में बढ़ता गया जिस दिशा से साइकिल सवार आ रहे थे।

कुछ देर बढ़ने के बाद एक उसे एक चौक पर अख़बारों से लदा हुआ वाहन दिखाई दिया। अमन निकट जाकर सारी प्रक्रिया देखने लगा। वहीं पर नीचे एक तिरपाल बिछाई गई थी। कुछ लोग अख़बारों के बण्डल उतार रहे थे। कुछ अधिकारी भी वहाँ उपस्थित थे।  अखबार बाँटने वाले बण्डल अलग-अलग कर रहे थे फिर अपने-अपने हिस्से के पैकेट लेकर निकलते जा रहे थे।

अमन ने सोचा कि इस काम के लिए तो साइकिल होना आवश्यक है। अगर काम मिल जाता है तो वो कुछ दिन पैदल भी कार्य कर सकता है।

उसने उन हॉकरों से ही इस काम के लिए जानकारी जुटाने के विचार से एक हॉकर  को अपना परिचय देकर पूछा कि उसका नाम क्या है, वो कहाँ रहता है, क्या उसे भी यह काम मिल सकता है? उस व्यक्ति ने बताया कि उसका नाम गणेश है। उनका एक संघ है। इस काम के लिए उनके संघ के प्रमुख से मिलना चाहिए। वे सब निकट की बस्ती में रहते हैं। इस समय कुछ सदस्य काम पर जा चुके हैं और कुछ जाने की जल्दी में हैं। वे लोग प्रतिदिन सुबह ४ बजे यहाँ पहुँच जाते हैं, फिर आधे घंटे बाद अख़बारों का वाहन आते ही काम में जुट जाते हैं। अगर वो कल सुबह ४ बजे वहाँ आ जाए तो संघ-प्रमुख उसे अखबार के अधिकारियों से कहकर उसे भी काम दिला सकता है।

अगले दिन अमन के अलार्म की चिड़ियों ने तीन बजे ही चहककर उसे भोर होने का संकेत दे दिया। अमन जल्दी से नित्य कर्मों से फारिग होकर ४ बजे से कुछ पहले ही अपने गंतव्य तक पहुँच गया। कुछ हॉकर  वहाँ आ चुके थे। वो गणेश के आने का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद उसे गणेश दिखाई दिया। धीरे-धीरे सदस्य भी वहाँ एकत्रित होने लगे। उसने गणेश के पास जाकर मुस्कुराकर हाथ मिलाया। गणेश ने उसका मंतव्य समझकर उसे एक कसे हुए गठीले बदन वाले युवक के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। अमन ने नमस्कार के साथ ही अपना परिचय देकर कार्य दिलाने का आग्रह किया।

दिनेश नाम के उस व्यक्ति ने उसका संक्षिप्त परिचय पूछा। अमन के अनाथ होने की बात जानकर  उसने अमन को दिलासा देकर अपने संघ में शमिल होने के लिए कहा।

अमन ने स्वीकृति देने के साथ ही उनकी ही बस्ती में एक कमरे का सुविधाजनक मकान किराये पर लेने की इच्छा भी जताई।

मेहनतकश लोग ईमानदार तो होते ही हैं, एक दूसरे के दर्द में भी साथ खड़े होते हैं।

अमन ने यह सब जिया और महसूस भी किया था। दिनेश उसे अखबार के अधिकारियों  के पास ले गया।

अमन के व्यक्तित्व, वेशभूषा और बातचीत के लहजे से प्रभावित अधिकारियों द्वारा यह पूछने पर कि पढ़ा लिखा और १२ वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बावजूद उसने यह रोज़गार क्यों चुना,  वो तो आगे पढ़ाई जारी रखकर बेहतरीन कैरियर बना सकता है तो उसने दिल्ली में विशेष उद्देश्य से आने की बात बताई और कहा कि उस कार्य के अलावा उसे अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी ही है, अतः अभी केवल गुजारे लायक रकम की ही दरकार है। अधिकारियों ने उससे कहा कि जब तक किसी नए इलाके से संपर्क/प्रचार  करके कार्य बढ़ाया जाए, तब तक उसे दिल्ली के अपने निवास के आसपास के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर अखबार बेचने का कार्य करना होगा। अमन ने अपनी सहमति दे दी।

अमन ने गूगल पर सर्च करके जानकारी जुटाई फिर आसपास के स्टेशनों के नाम  और यात्री गाड़ियों के रुकने का समय आदि नोट करके अगले दिन से ही अपना कार्य आरम्भ कर दिया। नित्य सुबह चार बजे से उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती थी। इस तरह सबके  सहयोग से उसे कार्य तो मिला ही, उनकी बस्ती में एक ठीक-ठाक घर की व्यवस्था भी हो गई। और वो धर्मशाला छोड़कर उन श्रमिकों की बस्ती में आ गया। अमन की कहानी से उन सबको अमन अपना सा लगा और वो भी शीघ्र ही उनमें घुल मिल गया। उसे अपने कार्यस्थल तक अखबार के सेंटर से दो किलोमीटर दूर जाना ही पड़ता था। कुछ दिन वो पैदल ही आना-जाना करता रहा। फिर साइकिल खरीदने, सीखने से लेकर अखबार बाँटने तक पूरा कार्य समझने में भी उसे उन सबका सहयोग मिलता रहा।

मोहल्ले में अमन अकेला था मगर उन सबके अपने परिवार थे,  अपनी समस्याएँ व प्राथमिकताएँ थीं। अमन की प्राथमिकता नयना की तलाश करना ही थी और  इस कार्य में वो किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता था अतः किसी से अपने उद्देश्य का जिक्र नहीं किया।

अखबार बेचते हुए वो जब भी फुर्सत में होता समाचार पढ़ने लगता था। दुनिया, देश, हर शहर, हर गाँव के हर गली मोहल्ले के समाचार इन अख़बारों में होते थे। लेकिन उसकी निगाहें दिल्ली के अनाथालयों के समाचार तलाशती रहती थीं। जिस अखबार में इस तरह का समाचार होता उसकी एक प्रति वो अपने पास रख लेता था और घर आकर कुछ गौर से पढ़ा करता था। अक्सर समाचार हृदय विदीर्ण करने वाले होते थे। मोबाइल पर भी सहेजी हुई लिंक्स पर इसी तरह के समाचार मिलते थे। मगर निर्मलादेवी अनाथालय के बारे में उसे अलग-अलग की वर्ड्स से सर्च करने के बावजूद अब तक कोई समाचार नहीं मिला था।

अनाथों पर तरह तरह के अत्याचार, बालिकाओं, किशोरियों, युवतियों के संचालकों द्वारा ही मान-मर्दन करने के किस्से पढ़-पढ़कर उसका दिल नयना की सलामती की दुआ माँगने लगता। न जाने वो किस जहान में खो गई है... कब और कैसे उसे खोज पाउँगा...यह सब सोच-सोच कर उसका मन निराशा से भर जाता फिर अगले ही पल स्वयं को दिलासा भी देने लगता-

“अरे, अमन तुम तो इन कुहासों की कोख में ही अपने जीवन के बचपन और कैशोर्य का अनमोल हिस्सा जी चुके हो, अब तो तुम्हारे जीवन में उजालों का फैला हुआ आसमान है...इस तरह हिम्मत हारकर क्या तुम नयना के साथ अन्याय नहीं कर रहे...? वो कहीं न कहीं तुम्हारा इंतजार कर रही होगी...अपना लक्ष्य मत भूलो...!!”  फिर वो आगे की रूपरेखा तैयार करने लगता।

गुजर-बसर तो होने ही लगी थी, वो अधिक से अधिक मेहनत करके अख़बारों से होने वाली कमाई से ही खर्च पूरा कर लेता था। अपने मकान के किराये के पैसे उसने पढ़ाई और आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए रख छोड़े थे। अखबार के अधिकारियों से भी वो अक्सर चर्चा करके इस क्षेत्र की जानकारियाँ जुटाता रहता था। वो आश्चर्य-चकित होकर सोचता रहता कि एक ही दिन में इतने समाचार कैसे एकत्र होकर छप जाते हैं?

एक दिन उसने जिज्ञासावश एक अधिकारी से चर्चा करते हुए यह सब जानना चाहा। अधिकारी उसकी वाक्पटुता और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी के भी अच्छे ज्ञान से प्रभावित हो चुके थे। उन्हें अमन में एक होनहार पत्रकार बनने की संभावना नज़र आई। उन्होंने उसे एक दिन कार्यस्थल पर आकर सारी प्रक्रिया सामने देखने का निमंत्रण देकर एक कार्ड आगे बढ़ा दिया जिसमें कार्यस्थल का पता और संपर्क नंबर नोट था।

अमन अपनी मुँहमाँगी मुराद पूरी होते देख उसी दिन अपना कार्य समाप्त करके साइकिल से ही ५ किलोमीटर का सफ़र करके वहाँ पहुँच गया। वहाँ उसका परिचय कई वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों से हुआ। उनका उत्साह और फुर्ती देखते ही बनती थी।

लगभग दो घंटे वहाँ रहकर अमन सारी प्रक्रियाएँ देखता और समझता रहा। चर्चा से उसने जान लिया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का ही आवश्यक अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों का अध्ययन, चिंतन-मनन, लेखन, अभिव्यक्ति का हुनर और जनसेवा की भावना का होना पत्रकार के लिए अति आवश्यक है। इस कार्य में भी कैरियर बनाने के लिए अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि विकल्प मौजूद हैं।

क्रमशः...

### अध्याय 17

अनाथालय की सवाली ज़िन्दगी जीते जीते अमन के सीने में न जाने कितने सवाल दफन होते गए थे। उनके जवाब खोजने के लिए उसे पत्रकारिता का पेशा ही बेहतरीन, सहज और रुचिकर प्रतीत हुआ। उसने तय कर लिया कि नयना की तलाश के साथ ही उसे इस दिशा में भी कदम बढ़ाना चाहिए। इसके लिए उसने अपनी सीमित आय के बारे में अखबार के अधिकारियों को बताकर सहयोग और मार्गदर्शन के लिए अनुरोध किया। अधिकारियों ने उसे १२ वीं के बाद किये जा सकने वाले कुछ ऐसे कोर्सों के बारे में बताया जो अखबार बाँटने का कार्य जारी रखते हुए वो अपने घर पर अध्ययन-रत रहकर भी कर सकता है। इसके साथ ही उसे दिल्ली की नई सोसायटी की बहुमंजिला इमारतों में अखबार बाँटने का कार्य सौंप दिया ताकि एक निश्चित अवधि में उसका कार्य पूरा हो जाया करे।

जानकारी हसिल होते ही अमन ने अपने अध्ययन के लिए कंप्यूटर सहित आवश्यक सामग्री एकत्र करके उन अधिकारियों के मार्गदर्शन में फॉर्म भरकर अपना अध्ययन आरम्भ कर दिया। उसने सुबह १० बजे तक अखबार बाँटना, फिर भोजन, आराम के बाद दोपहर से शाम ढलने तक का समय नयना की तलाश के लिए और रात में अध्ययन के लिए तय कर लिया।

उधर आगरा से कुशल का फोन आया कि उन तीनों को नौकरी के लिए आवेदन पत्रों पर आरक्षित कोटे में इंटरव्यू के बाद सरकारी नौकरी मिल गई है, और वे कम किराये वाले सरकारी आवास में रहने की व्यवस्था कर सकते हैं, अतः अमन को यहाँ आकर मकान के निचले खंड को भी किराये पर चढ़ा देना चाहिए। लेकिन अमन ने सिलसिलेवार कुशल के साथ अपने क्रियाकलाप की जानकारी साझा करते हुए कहा कि उसने पत्रकारिता का डिप्लोमा कोर्स करने के लिए फॉर्म भर दिया है। इस अवधि में वो नयना की तलाश और पढ़ाई एक साथ जारी रखेगा। अगर आवश्यकता हुई तो उसे लोन भी मिल जाएगा लेकिन जब तक उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता,  उनको अभी वहीं रहकर नौकरी करते रहना चाहिए ताकि मकान की देखरेख होती रहे।

अब अमन प्रतिदिन भूख-प्यास भूलकर अथक भटकता रहता। ६ महीने तक उसने एक-एक करके दिल्ली के लगभग सारे अधिकृत, अनधिकृत अनाथालय,  नारी निकेतन खँगाल लिए लेकिन उसे नयना का किसी तरह का कोई सुराग नहीं मिला। अब न चाहते हुए भी एक बारगी  उसके जेहन में वेश्यालयों के खतरनाक दृश्य दृष्टिगोचर होने लगे। वो अपनी निरपराध मासूम नयना के साथ नियति के इस कदर क्रूर अन्याय की कल्पना तक नहीं कर सकता था लेकिन मन को कठोर बनाकर तलाश जारी रखनी ही थी, क्योंकि अब तलाश का अंतिम चरण इसी प्रवेशद्वार से गुजरकर ही पूर्ण हो सकता था, अतः वो अपना रूटीन बदलकर देर रात को दिल्ली के रेड लाइट एरिया सहित इसी तरह के बदनाम बाजारों का रास्ता तय करने लगा।

इन स्थलों पर उसके साथ एक समस्या यह भी थी कि इतने साल के बाद नयना को पहचानेगा कैसे? अनाथालय अथवा नारी निकेतन तो सबका पूरा ब्यौरा रखते हैं लेकिन यहाँ वो सब सही जानकारी तो मिलेगी नहीं,  अतः उसने  जाँच का नया तरीका ईजाद कर लिया, जिसके अनुसार अगर नयना कहीं होगी भी तो अपना नाम सुनकर उसे एकदम पहचान लेगी। वो किसी भी अड्डे पर जाकर संचालिका को मुँहमाँगी रकम चुका देता फिर अन्दर जाते ही मेकअप से लिपी-पुती कामुक हावभाव प्रदर्शित करती हुई युवती के सामने हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठकर कहता-

“हे देवि, मैं इस मार्ग का अनुगामी नहीं हूँ... अपनी प्रियतमा की तलाश में भटक रहा हूँ। क्या तुम मेरी नयना को जानती हो?”

जब सामने से आश्चर्य मिश्रित नज़रें उसे घूरने लगतीं तो चुपचाप सर झुकाए क्षमा माँगकर वहाँ से निकल जाता। इसी तरह दीवानों की तरह भटकते हुए उसे ६ महीने बीत गए।

अब उसका मन इन स्थलों पर नियमित आने का मन नहीं होता था। वहाँ मजबूरी और शोषण की शिकार औरतों पर होते हुए अत्याचार के अहसास मात्र से ही उसका कलेजा काँपने लगता था और उसका मन फिर अपने अध्ययन पर एकाग्र नहीं हो पाता था। अतः अब सप्ताह में एक ही दिन आने का तय करके उसने अपने अध्ययन पर ध्यान देना शुरू किया। इस तरह लगभग ६ महीने और बीत गए। एक दिन उस बदनाम बाजार की एक कोठरी में एक युवती से यही सवाल दोहराया तो सामने वाली युवती ने बेताबी से उसे झिंझोड़कर पूछ लिया-

“कौन नयना, किस नयना की बात कर रहे हो,  तुम कौन हो, बोलो?”

उसके प्रतिप्रश्न से अमन को उम्मीद की किरण दिखाई दी, वो उसके मुँह से ही आगे सुनने के लिए तुरंत बोल पड़ा –

“मैं अमन हूँ...”

“नयना!!...अमन!!...आह, कहीं यह सपना तो नहीं...क्या तुम “निर्मलादेवी बाल आश्रम” वाले अमन हो...?”

“हाँ हाँ, जल्दी बताओ देवि! क्या तुम नयना के बारे में कोई जानकारी रखती हो, वो कहाँ है, कैसी है?”

यह सुनते ही उस युवती की आँखों से अश्रुधार फूट पड़ी और हिचकियाँ लेते हुए रोते रोते बोली-।

“अमन भैया, मैं नयना की बदनसीब सखी डाली हूँ।”  कहते हुए वो युवती ज़ार ज़ार रोने लगी।

“अरे, पहले चुप हो जाओ डाली बहन,  मुझे बताओ, तुम यहाँ क्यों और कैसे आई,  नयना और तुम्हारी वो सखी लता कहाँ है?  मेरी शैलजा आंटी से बात हुई थी उन्होंने नयना के लापता होने और उसके ६ महीने बाद तुम दोनों के आश्रम से भाग जाने की बात बताकर और कोई जानकारी नहीं होने की बात कही।”

“अमन भैया,  नयना का तो कोई पता नहीं चला और लता ने इन्हीं अँधेरों में मौत को गले लगाकर अपने कष्टों को विराम दे दिया। लेकिन मैं उन जालिमों को सबक सिखाने के लिए यह बदतर ज़िन्दगी उस घड़ी के इंतजार में जीती रही हूँ, जब यहाँ से किसी तरह निकलकर अपनी दास्तान तुम तक न पहुँचा देती। अगर मैं भी मौत को गले लगा लेती तो मानवता को कलंकित करने वाले उन भेड़ की खाल में छिपे भेड़ियों के व्यभिचार के किस्से किसी तहखाने में दम तोड़ देते। लगता है उन पापियों के पाप के घड़े भर गए होंगे तभी कुदरत ने तुम्हें यहाँ पहुँचा दिया है। अमन भैया, अब नयना की तलाश के साथ मेरा भविष्य भी तुम्हारे ऊपर ही निर्भर है, क्या तुम मुझे नीता आंटी से छुड़ाकर अपने साथ ले जाओगे?”

“बिलकुल! अब तो यह मेरा पहला कर्तव्य है लेकिन यह सब कैसे हुआ डाली बहन, मुझे सब विस्तार से बताओ।”

अमन के मुँह से सहानुभूति के बोल सुनते ही डाली के नयनों से अश्रुधार बहने लगी उसकी आँखों के सामने विगत का कालिमा से लिपा पुता दृश्य जीवंत हो गया। अश्रु पोंछकर उसने अमन को पानी देकर दो घूँट स्वयं भी पिए, फिर अमन के अनाथालय छोड़ने के बाद वहाँ तक पहुँचने की सारी दास्तान विस्तार से सुनाई-

“नयना के लापता  होने के बाद सेठजी का हमारे साथ शारीरिक शोषण के साथ ही अमानवीय व्यवहार आरम्भ हो गया था। उनकी बातों से हमें स्पष्ट पता चल गया था कि नयना को उसी ने गायब किया या करवाया है। वे हमेशा धमकी देते थे कि अगर उसकी किसी बात का विरोध किया तो हमें भी नयना के पास भेज देगा, जहाँ हर दिन हमारा जिस्म शिकारी कुत्तों की तरह नोचा जाएगा। शैलजा आंटी को भी उनके हर दुष्कृत्य की जानकारी रहती थी, मगर सब कुछ जानकर भी अनजान बनी रहती थीं।

हम कुछ दिन चुपचाप अत्याचार सहती रहीं। फिर हमने अपने बचाव और नयना का समाचार तुम  तक पहुँचाने के विचार से आश्रम से भाग निकलने की योजना बनाई क्योंकि नयना के लापता होने से हम समझ गई थीं कि बालिग होने के बाद मुक्त करना केवल दिखावा था।

एक दिन अवसर देखकर आधी रात को चौकीदार को ऊँघते देखकर हम आश्रम की दीवार के टूटे हुए हिस्से तक पहुँच गईं। वहाँ से कुछ प्रयास के बाद हम नीचे कूदने में सफल हो गईं। अब हमें आगरा पहुँचने के लिए सुबह तक इंतज़ार करना था अतः सुरक्षित स्थान तक पहुँचने के लिए हमने स्कूल जाने वाले रास्ते की विपरीत दिशा में दौड़ना शुरू किया क्योंकि उस रास्ते से ही नयना लापता हुई थी अतः हमारे लिए भी पकड़ी जाने का जोखिम था।

रास्ता सुनसान था और अनजान भी...बदहवासी में आगे दौड़ते हुए देखकर हमें गश्ती पुलिस के दो आदमियों ने रोक लिया और पूछताछ शुरू कर दी। हमने कुछ भी न बताते हुए स्टेशन तक पहुँचने में सहायता माँगी तो वे हमें चौकी तक ले गए और उनके पूछताछ के कठोर लहजे से हमने सारी सच्चाई बयान कर दी। लेकिन सेठजी का नाम सुनकर उन्होंने उनको नामी समाजसेवक करार देकर हमपर ही सेठजी पर गलत इलज़ाम लगाने का आरोप मढ़ दिया और हमें अन्दर ले जाकर हमारे साथ घंटों दुष्कृत्य करते रहे फिर वहीँ कमरे में बंद कर दिया। हम डर के मारे आगे की सोचकर काँपती रहीं, सुबह होते ही उन्होंने सेठजी को बुलवाकर हमें फिर से उन्हें सौंप दिया।”

कहते-कहते डाली फिर से रोने लगी। अमन ने उसे धैर्य बँधाते हुए उसकी पीठ पर हाथ फेरा और पानी का गिलास आगे बढाया। दो घूँट पीकर भर्राए गले से वो फिर कहने लगी-

“हमें तीन दिन तक आश्रम के एक कमरे में कैद करके रखा गया। रात में सेठजी आते और गालियों की बौछार और मारपीट के साथ ज़बरदस्ती अपनी हवस पूरी करते रहे। फिर चौथे दिन एक महिला को साथ में ले आए और उसके सामने प्यार जताते हुए यह कहकर कि ये नारी-निकेतन की संचालिका नीता देवी हैं। तुम दोनों को अपने आश्रम में ले जाएँगी।  वहाँ तुम्हें विवाह होने तक गृह-उद्योग में पारंगत किया जाएगा, हमें उस महिला के हवाले कर दिया। फिर आंटी हमें यहाँ लेकर आ गईं। आगे भैया...जो हुआ मैं बयान नहीं कर सकती।”  डाली फिर अपनी नम होती हुई आँखें पोंछने लगी।

डाली की दर्द भरी दास्तान से अमन की आँखों में खून उतर आया। कैसा नादान था वो...जो अब तक शैलजा आंटी और सेठजी को देवदूत समझता रहा। अनाथों का सहारा मानता रहा...उसने उसी समय नीता देवी से डाली को अपनी बहन बताकर मुँहमाँगी रकम लेकर उसके सुपुर्द करने का निवेदन किया। काफी अनुनय-विनय के बाद नीता देवी ने उसकी बात मान ली। लेकिन अमन के पास कैश रकम  नहीं थी अतः अगले दिन रकम के साथ आने का वायदा करके डाली को सांत्वना देकर वापस घर आ गया।

अमन चाहता तो पुलिस तक जा सकता था मगर इस तरह बात सेठजी तक जाती और डाली के साथ ही उसकी अपनी और नयना की जान को भी खतरा उत्पन्न हो जाता...

अतः जब तक नयना का पता नहीं चल जाता, तब तक सेठजी पर हाथ डालना ठीक न समझकर उसने  डाली को सुरक्षित आगरा पहुँचाने का निर्णय लिया।

अगले दिन रात को अमन कुछ जल्दी ही घर से निकल पड़ा। वायदे के मुताबिक उस वेश्यालय की संचालिका को कैश रकम देकर डाली को लेकर सीधे आगरा जाने वाली बसों के नियत स्टॉप पर पहुँच गया। वो उसे कमरे पर ले जाकर किसी को उसके बारे में बताना नहीं चाहता था। उसने टिकट लेकर डाली को बस में बिठा दिया और बताया कि उसने मित्रों से बात कर ली है,  आगरा पहुँचते ही कुशल उसे लेने बस स्टॉप पर पहुँच जाएगा। वहाँ अपना घर होने से उसे कोई परेशानी नहीं आएगी। डाली सजल नेत्रों से अमन को दुवाएँ देते हुए निहारती रही और अमन उसे विदा करके वापस घर आ गया।

क्रमशः

### अध्याय 18

नयना उन तीन गिद्धों के चंगुल से छूटने को छटपटाती रहती थी। उसका शारीरिक शोषण होता रहा। वे तीनों गर्भनिरोधकों का प्रयोग करते थे अतः एक तरफ से वो अवश्य बेफिक्र थी कि उसकी कोख में कभी उन रक्तबीजों का बीज अंकुरित नहीं होगा। मगर व्याकुल मन सोचता रहता कि क्या वो इस जनम में अमन से कभी नहीं मिल पाएगी?  क्या उसे अगले जन्म में पाने के लिए मृत्यु को गले लगा लेना चाहिए...? मगर अमन तो यह जान भी नहीं पाएगा कि मैं उसके लिए प्राण त्याग चुकी हूँ। फिर दूसरे जन्म में भी दो प्रेमी वास्तव में मिलते ही हों यह निश्चित कहाँ होता है? बल्कि उसकी रूह भी प्यासी ही भटकती रहेगी। उसे इसी जन्म में अपने प्यार को पाना है...कभी तो अत्याचार के घिनौने घन छंटेंगे और प्यार के सुख-सूरज की पहली किरण उसके जीवन के अँधेरों को उजालों में बदलने उगेगी! इसके लिए उसे चाहे कितना ही अत्याचार क्यों न सहन करना पड़े, वो अपना हौसला टूटने न देगी। अमन का वो प्रथम प्रेमिल, पावन स्पर्श फिर उसकी ज़िन्दगी की धडकनों में समाकर उसके तन-मन को तृप्त करने के इंतजार में होगा। इस तरह मृत्यु का वरण करने से तो वो अमन से सदा के लिए दूर हो जाएगी।

हर दिन हर रात उसके जेहन में यही उथल पुथल मची रहती। मन ही मन बुदबुदाती रहती- “अमन अवश्य मुझसे मिलने आश्रम में गया होगा। न जाने मेरे बारे में उसे क्या सूचना दी गई होगी...वो मुझे खोजने का अवश्य प्रयास कर रहा होगा...डाली और लता भी न जाने किस हाल में होंगी, यहाँ से निकलने के लिए किसी की सहायता कैसे ली जाए...इन भाइयों से तो सहायता के लिए कुछ कहना भी खतरा मोल लेने जैसा है, आखिर बाहर कैसे निकल सकूँगी...? किसी को सूचित करूँ भी तो कैसे...? आजीवन तो इन नरपशुओं के साथ रह नहीं सकती”

उस दिन सफाई करते हुए वो हाल के द्वार तक पहुँची तो नीचे से अखबार को सरककर अन्दर आते देखकर उसके मस्तिष्क में अचानक बिजली सी कौंध गई कि अगर इसी तरीके से कोई कागज़ का पुर्जा अन्दर से सरकाकर बाहर अखबार लाने वाले व्यक्ति तक पहुँचाया जा सके तो हो सकता है वो उसकी कुछ सहायता करने के लिए कुछ प्रयास करे...लेकिन सफाई जयराम के सामने ही करनी होती थी तो वहाँ कैसे कुछ भी कर सकती है...फिर उसके पास कागज़ कलम भी तो नहीं...और वो मन मसोस कर रह जाती।

सोचते सोचते एक दिन उसे एक उपाय सूझा। सबसे पहले उसने कागज़ का कोरा टुकड़ा खोजना शुरू किया। यह काम उसका आसानी से हो गया। शीघ्र ही उसकी नज़र में रसोई में सामान सब्जी के साथ आने वाले कागज़ के पैकेट आ गए। उसने एक पैकेट छिपाकर अपनी अलमारी के कपड़ों के बीच दबाकर रख लिया। फिर श्रृंगार के सामान से काजल की पेन्सिल लिखने के लिए निकालकर नहाते समय कागज़ और कपड़ों के साथ बाथरूम में चली गई। कागज़ पर उसने संक्षेप में अपनी परेशानी लिखकर पुनः छिपाकर अल्मारी में कपड़ों के बीच दबा दिया। यहाँ तक सफलता मिलने पर उसकी बाँछें खिल गईं।

लेकिन पुर्जे को बाहर पहुँचाना टेढ़ी खीर था। अब रसोई में काम करते हुए उसका पूरा ध्यान द्वार और जयराम पर ही केन्द्रित होता था। उसके शौच के लिए जाते समय वो रसोई में काम कर रही होती थी। अगर जयराम के शौच के लिए जाते ही उसी क्षण अखबार वाला आ जाए तो उसका काम बन सकता है। इसमें जोखिम तो बहुत था, अगर पकड़ी गई तो उसका क्या हाल किया जाएगा यह उसकी कल्पना से परे था फिर भी वो हर दिन एक नई आशा के साथ उस क्षण का इंतज़ार करती जब ऐसा संयोग घटित हो जाए।

अगर इंसान के इरादे दृढ़ हों और सोच सकारात्मक हो तो कुदरत भी सदय होकर साथ देने लगती है। द्वार की दरार बहुत पतली होने से अखबार सरकाने वाले को कुछ पल तो लगते ही थे और नयना प्रतिदिन एक नन्ही सी आस में कागज़ का पुर्जा अखबार आने तक अपने कपड़ों में ही छिपाकर रखती थी फिर सफल न होने पर तुरंत अल्मारी में रख आती थी।

आखिर उसे चार महीने के लम्बे इंतजार के बाद वो अवसर मिल ही गया, जब नयना ने जयराम के शौच के लिए जाते ही अखबार सरकते देखा। उसने अविलम्ब बिजली की फुर्ती से दबे पाँव वहाँ पहुँचकर अन्दर आते अखबार पर पाँव जमा दिया और फिर पुर्जे के साथ ही वापस बाहर सरका दिया और हाँफती-काँपती वापस रसोई में पहुँचकर मन ही मन प्रार्थना करती हुई धड़कते दिल से प्रतिक्रिया देखने लगी। कुछ ही क्षणों के बाद अखबार वापस अन्दर सरकाया गया तो उसकी जान में जान आई। उसकी विनती विधाता ने स्वीकार कर ली थी। उसकी दुर्दशा की खबर ख़बरें पहुँचाने वाले के हाथ में जा चुकी थी। नयना को अब आशा की नई किरण उगने का इंतजार करना था। यह इंतजार उसकी ज़िन्दगी में नया सबेरा लेकर आएगा, इस विश्वास के साथ नयना का आत्मबल कई गुना बढ़ गया था।

डाली को गए  ५-६ महीने बीत चुके थे लेकिन अभी तक नयना का कोई पता नहीं चला था। अमन चिंतातुर मुद्रा में दिन काट रहा था, इस बीच एक दिन कुशल का फोन आया-

“अमन भैया, डाली के यहाँ रहने से आस पड़ोस के लोग हमें शंकित नज़रों से देखने लगे हैं। साथ रहते हुए मैं और डाली एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं अतः उचित यही होगा कि हम कोर्ट में विवाह कर लें। वैसे हम तीनों ने तय किया था कि तुम्हारी नयना भाभी के साथ वापसी के बाद ही हम भी किसी अनाथालय के सामूहिक विवाह आयोजन में शामिल होकर विवाह करेंगे लेकिन अब अधिक टालना उचित नहीं है। रतन और कीरत भी चाहते हैं कि वे आत्मनिर्भर हो चुके हैं अतः विवाह करके अपना घर बसा लें। इसके लिए हमें तुम्हारी सहमति और आशीर्वाद की आवश्यकता है।”

“यह तो बहुत अच्छी बात है कुशल, तुमने डाली के बारे में मेरी चिंता दूर कर दी। तुम तीनों सहर्ष विवाह करके अपना घर बसा सकते हो मगर तुम्हें डाली के साथ मेरे आने तक घर की देखरेख के लिए वहीँ रहना होगा और जिस दिन रतन और कीरत के विवाह का आयोजन निश्चित हो तुम भी वही दिन अपने लिए चुनोगे तभी मैं आयोजन में उपस्थित हो सकूँगा। मैं काम से छुट्टी नहीं ले सकता अतः वहाँ रात में नहीं रुकूँगा। सभी कार्यक्रम संपन्न होते ही उसी दिन वापस निकलना होगा।”

लगभग तीन चार महीने के बाद रतन और कीरत के विवाह की तिथि सारी औपचारिकताओं के बाद तय हो गई और कुशल ने भी वही दिन विवाह के लिए तय कर लिया। अमन उस दिन सुबह अपना काम समाप्त होते ही आगरा चला आया और तीनों मित्रों के विवाह-आयोजन में शामिल हुआ। डाली की तो रुलाई ही नहीं रुक रही थी। बार-बार नयना के मिलने की उम्मीद में  अमन का हौसला बढ़ा रही थी। रतन और कीरत ने अपने रहने की व्यवस्था कर ली थी। आखिर सबको शुभकामनाएँ देते हुए अमन ने भारी मन से सबसे शीघ्र मिलने का आश्वासन देकर विदा ली।

क्रमशः...

### अध्याय 19

उसी दिन सुबह अमन ने हमेशा की तरह उस टाउनशिप की बीस मंजिला बिल्डिंग के १५ वें माले पर स्थित फ़्लैट नंबर २ के बंद द्वार के नीचे बनी हुई पतली सी दरार से अखबार को बीच से खोलकर कुछ झुकते हुए सरकाना चाहा तो अखबार ने आधी दूरी तय करने के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया और वहीं रुक गया। अमन ने उसे डांट लगाते हुए कहा-

“अबे जल्दी जा न! जानते नहीं कि अभी कितने घरों के अखबार बाँटने बाकी हैं...”

मगर वो काफी प्रयास के बावजूद अन्दर तो नहीं घुसा बल्कि वापस बाहर आ गया। अमन ने सोचा कि शायद अन्दर कोई सामान गिरा पड़ा होगा जिससे टकराकर यह वापस आ गया। उसे इस फ़्लैट के लिए विशेष हिदायत दी गई थी कि अखबार बाहर नहीं छोड़ना है क्योंकि कि उस घर में रहने वाला रात की शिफ्ट में नौकरी करता है और उसका पेमेंट ऑन लाइन हो जाता है।

वो थोड़ा और झुककर  पुनः प्रयास करने लगा तो उसे अखबार के नीचे एक कागज़ का पुर्जा दिखाई दिया जो उसी के साथ किसी ने अन्दर से सरकाया था। अचंभित अमन कभी उस फ़्लैट के द्वार पर लगे हुए बड़े से ताले को देखता तो कभी उस पुर्जे को...अगर अन्दर कोई है तो बाहर से ताला क्यों लगाया गया है... जबकि बिल्डिंग के हर फ़्लैट के द्वार में आटोमेटिक लॉक लगा हुआ होता है। इसका मतलब कुछ गड़बड़ वाली बात हो सकती है। उसने पुर्जे को जैसे ही उठाया तो ऊपर ही वार्निंग शब्द के साथ लिखा हुआ था-

“प्लीज़...प्लीज़!  यह बाद में छुपाकर पढ़िएगा पहले अखबार सरका दीजिये।”

ये शब्द पढ़ते ही अमन एकदम डर गया कि न जाने क्या बात है। वो किसी मुसीबत में न पड़ जाए अतः उसने जल्दी से पुर्जा जेब के हवाले किया और उस फ्लोर के बाक़ी फ्लैट्स में अखबार हमेशा के क्रमानुसार द्वार के बाहर डाल दिया।

अपना काम पूरा होते ही वो शीघ्र ही घर आ गया और जेब से पुर्जा निकालकर पहले उसने उसकी लिखावट पर गौर किया। वो इबारत किसी काली कलर पेन्सिल से लिखी हुई लग रही थी, उसने पढ़ना शुरू किया –

“मैं यहाँ पर बंदिनी हूँ, आपसे सहायता की दरकार है। आप जो कोई भी सज्जन हैं, मानव ही होंगे...यहाँ मैं लगभग ढाई वर्षों से मानवता को कलंकित करने वाले तीन दानवों द्वारा दी जा रही शारीरिक और मानसिक यातना झेल्र रही हूँ। मुझे विश्वास है कि आप मेरी सहायता अवश्य करेंगे।

कृपया कहीं से एक पतली कॉपी और पेन अथवा पेन्सिल खरीदकर, जो इस दरार से अन्दर आ सके काम पर आते समय प्रतिदिन अपनी जेब में रख लिया करें। जिस दिन आज की तरह अखबार पर दबाव लगे, कॉपी-पेन तुरंत अन्दर सरका दीजियेगा। यह पुर्जा मैंने जिस तरह बाहर सरकाया है। वो अवसर पुनः कब मिलेगा, मैं नहीं जानती लेकिन इंतजार अवश्य करूँगी।  अगर आप आते रहे तो कापी पेन मिलते ही अपनी पूरी कहानी लिखकर फिर से आज की तरह आप तक पहुँचाने में भी कुछ समय लग सकता है। अपना परिचय भी अगर आपका सहयोग मिला तो बाद में ही दूँगी”।

-एक अनाथ बदनसीब बाला

इबारत पढ़ते ही अमन की छठी इन्द्रिय सक्रिय हो उठी। उसके मस्तिष्क ने तेज़ी से सोचना शुरू कर दिया...

“अन्दर है तो कोई अनाथ लड़की और खतरे में भी है, उसने वो इबारत न जाने कैसे लिखी होगी...कहीं वो नयना तो नहीं...! लेकिन इसका पता कैसे लग सकेगा...!

उसने ढाई वर्षों से वहाँ होने की बात लिखी है और नयना भी लगभग ढाई वर्ष से ही लापता है...वो नयना हो भी सकती है, नहीं भी...  अगर वो नहीं हुई तो कॉपी-पेन पहुँचाते हुए किसी के पकड़े जाने पर हो सकता है उसके साथ मैं भी खतरे में पड़ जाऊँ...आखिर अनाथों का होता ही कौन है...! मगर कुछ भी हो मैं उसकी सहायता अवश्य करूँगा। नयना के बिना मेरा कोई वजूद नहीं...वो न भी हुई तो एक निर्दोष बाला की सहायता करने का पुण्य तो मिलेगा ही...और जब तक उसका सही परिचय और दोषियों के पूरे कृत्य की विस्तृत जानकारी नहीं मिलती, पुलिस तक जाना व्यर्थ ही है।”

उसने उसी दिन एक पतली सी कॉपी और बालपेन की रिफिल खरीद ली। घर पहुँचकर उसके प्रथम पृष्ठ पर ही उसने लिखा-

“हे देवि! मेरा नाम अमन है, मैं भी एक अनाथ युवक ही हूँ और अपने जीवन के आठ वर्ष इसी शहर के निर्मलादेवी अनाथालय में व्यतीत कर चुका हूँ...उन्हीं दिनों की अपनी सहपाठी  प्रियतमा नयना की तलाश में दो वर्ष से इस शहर में भटक रहा हूँ, आपका परिचय जो भी हो मेरे लिए पूजनीय हैं। मैं हर नारी का दिल से सम्मान करता हूँ, आप अगर मेरी नयना को जानती हों तो कृपया अपनी कहानी और पूरे परिचय के साथ ही उसके बारे में भी पूरी जानकारी लिख दीजियेगा। मैं अभी इतना काबिल तो नहीं हूँ कि अमानुषों से मुकाबला कर सकूँ लेकिन आपकी सहायता के लिए हर संभव प्रयास अवश्य करूँगा। यह कॉपी फिर इसी तरह सरकने का इंतजार करता रहूँगा।”

अमन ने अपना परिचय और अनाथालय का नाम यह सोचकर जानबूझकर लिख दिया था कि अगर वो नयना हुई तो उसका नाम परिचय पढ़ते ही ख़ुशी से दीवानी हो जाएगी और उसका उत्साह भी बढ़ जाएगा। इसी उथल-पुथल में रात को वो ठीक से सो भी नहीं पाया। स्वयं दुखी होते हुए भी उसका मन किसी और को कष्ट में देखकर विचलित हो जाता था। उसके मस्तिष्क में लगातार विचारों का तूफ़ान उमड़-घुमड़ मचा रहा था। न जाने वो लड़की कौन है?  कहाँ से लाई गई होगी और दिल्ली की उस नव-निर्मित टाउनशिप की कई मंजिला बिल्डिंग की चाक चौबंद सुरक्षा के बीच एक फ़्लैट में किस तरह उसे बंदी बनाकर रखा गया होगा...! आखिर समाधान न मिलने पर अमन का मस्तिष्क  हारकर चुपचाप कुंडली मारकर नतीजा आने तक शांत बैठ गया।

अमन से दिन काटे नहीं कट रहे थे। किसी अबला पर अत्याचार हो रहा है और वो कुछ नहीं कर सकता...यह सोचकर वो विधाता को ही कोसने लगता था कि आखिर उसने अनाथों की किस्मत किस कलम से क्या सोचकर लिखी है... काम पर जाते समय वो कॉपी-पेन याद से जेब में रख लिया करता था और सोचता ही रहता कि न जाने वो दिन कब आएगा जब अखबार फिर से अन्दर जाकर बाहर वापस आने तक का सफ़र पूरा करे और वो कॉपी-पेन सरकाकर भारमुक्त हो सके।

इस तरह अखबार चुपचाप सरकता रहा और समय भी कुछ दिन आगे सरक गया। परीक्षा निकट आ चुकी थी, अमन पर पढ़ाई का लोड अधिक था। वह सोचता कि अगर ठीक से मेहनत नहीं हुई तो परिणाम मन माफिक नहीं आएगा।

रात को बाजारों में नयना को खोजना तो जिस दिन उसे पुर्जा मिला था, उसी दिन से उसने नयना के वहाँ होने की आस में बंद कर दिया था। परीक्षा में एक महीना ही शेष होने के बावजूद उसने अपने कर्तव्य को अहम् मानकर अखबार डालना नहीं छोड़ा। हर सुबह वो उस फ़्लैट में अखबार सरकाते समय आशा भरी नज़रों से द्वार को देखता फिर निराश लौटकर पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित कर देता।

आखिर एक सप्ताह बीतने पर उसकी यह मुराद पूरी हो गई और अखबार पर दबाव महसूस होते ही उसने कॉपी-पेन अन्दर सरका दिया और उसके साथ ही अखबार भी खींच लिया गया।

अब अमन को उस बाला के उत्तर का इंतजार तो था, लेकिन परीक्षा में भी कुछ दिन ही रह गए थे अतः वो स्वयं को तनावमुक्त रखने का प्रयास करते हुए तैयारी करता रहा।

क्रमशः

### अध्याय 20

अंतिम अध्याय

कॉपी खींचकर नयना बिजली की फुर्ती से वापस रसोई में पहुँच गई। उसकी धड़कन कई गुना बढ़ गई थी। जयराम वाशरूम में ही था अतः उसने कॉपी से रिफिल अलग कर ली और अपनी कुर्ती में हाथ डालकर कॉपी को ब्रा के नीचे दबा दिया और रिफिल को ऊपर से ही वहीँ फिट कर दिया। फिर जल्दी-जल्दी काम पूरा करने लगी। इस समय जयराम जल्दी में होता था अतः उसपर इतना गौर नहीं किया जाता था।

जैसे ही बेल बजी, उसे लॉक कर दिया गया। वो तो इसका इंतजार ही कर रही थी, कमरा बंद होते ही उसने कॉपी-पेन अलमारी में कपड़ों की तह में छिपा लिए। लिखने का काम तो बाथरूम में ही थोड़ा-थोड़ा करके हो सकता था, क्योंकि दिन-रात में जितनी बार उसे उन राक्षसों द्वारा रौंदा जाता, वो घिन के मारे उसी समय नहा लेती थी और इसके इस कृत्य में कोई बाधा नहीं डाली जाती थी।

हमेशा की तरह करीब आधे घंटे बाद बलराम ने कमरा खोला और नयना को खींचकर रौंदना शुरू किया। नयना एक घंटे तक शराब की गंध सहन करती हुई छटपटाती रही फिर उसके हाल में जाने के बाद कॉपी-पेन छिपाकर नहाने चली गई।

जैसे ही उसने पहला पन्ना खोला तो लिखावट से भरा हुआ देखकर उसने उत्सुकता वश पढ़ना शुरू किया। ज्यों-ज्यों वो पढ़ती गई, उसके तन-मन का पोर-पोर खिलता गया। मन ही मन वो ख़ुशी से किलक उठी और लिखना भूलकर बार-बार पढ़ती और इबारत को चूमती रही, फिर उसने नहाकर  कॉपी-पेन वापस छिपा दिया और अमन की यादों को सीने से लगाकर लेट गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अमन उसे इस तरह मिल जाएगा।

उसके मन में अचानक जिजीविषा जाग्रत हो उठी थी। उसने सोच लिया कि अब किसी भी तरह वो जल्द से जल्द अपने जीवित होने का शुभ समाचार अमन तक पहुँचाने का प्रयास करेगी।

प्रतिदिन नयना सावधानी पूर्वक अपनी कहानी अपने मस्तिष्क की परतों से कॉपी करके पन्नों  पर पेस्ट करती रहती, लिखते-लिखते अक्सर रो पड़ती फिर आँसू पोंछकर स्वयं को ही समझाती-

“अरी पगली, अब तो तेरे हँसने-मुस्कुराने के दिन निकट आ गए हैं। हिम्मत रखेगी तभी यह जंग जीतकर जालिमों से बदला ले सकेगी...” फिर वो जल्दी से आँसू पोंछ लेती।

कहानी दो दिन में ही पूरी हो गई और वो अगले दिन से उसे सीने में छिपाए अमन तक पहुँचाने का इंतजार करने लगी। लेकिन इस बार उससे एक दिन भी इंतजार नहीं हो पा रहा था

आखिर वो दिन भी आ गया जब जयराम के शौच के जाने के समय ही नयना ने अखबार सरकते देखा उसने तुरंत बेआवाज़ द्वार तक जाकर अखबार पर पाँव रख दिया। अमन के लिए यह रुकने का संकेत था, फिर उसने कॉपी सरका दी और सामान्य गति से वापस भी चली गई। जयराम अभी अन्दर ही था, लेकिन  इतनी देर में नयना की धडकनें बेकाबू होने लगी थीं कि कहीं उसकी हरकत देख न ली जाए,  मगर अब सर झटककर स्वयं को सामान्य बनाए रखा।  उसकी कहानी सही हाथों में पहुँच चुकी थी और उसे विश्वास था कि अमन तुरंत एक्शन लेकर उसे मुक्त करवा देगा।

अमन की परीक्षा निकट आ गई थी, लेकिन फ़्लैट से कॉपी मिलने तक उसे छुट्टी न लेकर इंतजार करना ही था। यहाँ अगर नयना न हुई तो भी उस अनाथ युवती की सहायता से वो पीछे नहीं हटेगा साथ ही नयना की तलाश की रूपरेखा नए सिरे से बना लेगा, यह सोचकर ही वो स्वयं को तनावमुक्त करने का प्रयास करता रहता था।

इसी गतिशील दिनचर्या में एक दिन बाद ही वो अप्रत्याशित घटना घट गई जिसका अमन को इंतजार था।

उस दिन जैसे ही उसने उस फ्लैट में अखबार सरकाया,  उसी क्षण अखबार पर दबाव के साथ ही उसकी दी हुई कॉपी उसकी बगल से बाहर सरक कर आ गई।

अमन ने बेसब्री से कॉपी खोली और अपना लिखा हुआ पहला पृष्ठ पलटाया तो अगले पृष्ठ पर लिखा था-

“मेरे प्रिय अमू, मैं तुम्हारी निन्नी हूँ, तुम्हारा परिचय पढ़कर मुझसे अधिक समय सब्र नहीं हो सकता। मेरा अहम उद्देश्य अपनी दास्तान तुम तक ही पहुँचाना था, मेरी पूरी कहानी इस कॉपी में लिखी हुई है,  अतः तुम्हें इसी वक्त कहानी पढ़कर मुझे यहाँ से निकालने का प्रयास करना होगा। इन निर्दयी मानवता के दुश्मनों को रसातल पहुँचाना ही तुम्हारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।”

-तुम्हारी निन्नी

आखिर अमन का अनुमान सही निकला, लेकिन नयना का सन्देश पाकर वो बेचैन हो उठा। अपनी प्रियतमा को इस हालत में महसूस करके मुँह से आह निकल पड़ी और वो मन ही मन बुदबुदाने लगा –

“ओ मेरी निन्नी, शुक्र है तुम जीवित तो हो...बहुत कष्ट झेले हैं तुमने, मगर यह तुम्हारे कष्टों का  अंतिम दिन है...और तुम मेरी बाहों में होगी...!!”

कॉपी खोलकर वो नयना की कहानी में छिपी उसकी पीड़ा की परतों में कैद होता गया। पढ़-पढ़ कर रोता रहा और आँसू पोंछता रहा। लेकिन यह समय भावनाओं में बहने का नहीं था। चूँकि वो  उन सब नीच पात्रों से पूर्व परिचित था अतः जल्दी-जल्दी उसने १५ मिनिट में कहानी का सार समझ लिया। अब नयना की मुक्ति के लिए उसका दिमाग कई गुना तेज़ी से कार्य करने लगा।

उसने आगे की प्रक्रिया के लिए अखबार के अधिकारियों से ही सलाह लेने का निर्णय करके एक अधिकारी को फोन लगाकर सारी बात बताई। अधिकारी ने अपराध की गंभीरता जानकर उसे  समझाया कि ऐसे में पुलिस और मीडिया के परस्पर सामंजस्य व सहयोग से ही अपराधों पर नियंत्रण किया जा सकता है अतः उसे तुरंत प्रिंटिंग प्लांट पर पहुँचना चाहिए। यहाँ मशविरा करने के बाद एक रिपोर्टर को साथ लेकर उस एरिया के निकट के थाने में कॉपी में वर्णित प्रसंग के आधार पर अपराधियों के खिलाफ प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवानी होगी।

अमन ने अपना काम पूरा करके घर न जाकर बाहर ही नाश्ता कर लिया और एक घंटे के अन्दर प्रिंटिंग प्लांट पर पहुँच गया। वहाँ से प्रेस रिपोर्टर देव कुमार के साथ उस फ़्लैट के अंतर्गत आने वाले थाने पहुँच गया। रिपोर्ट लिखने से पहले थानाध्यक्ष ने अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए घटनाक्रम की सत्यता का सबूत माँगा तो देवकुमार ने नयना की लिखित कहानी की कॉपी प्रस्तुत करके कहा कि चूँकि पीड़िता को ताला बंद करके रखा गया है अतः उसकी लिखित तहरीर को ही आधार बनाकर माणिक सेठ और उसके कर्मचारियों  के विरुद्ध रिपोर्ट लिखी जानी चाहिए। इस तरह देवकुमार के सहयोग और मार्गदर्शन में निर्मलादेवी अनाथाश्रम के संचालक वर्ग के प्रमुख माणिक सेठ और उसके सहयोगियों- जयराम और बलराम के खिलाफ नयना के अपहरण और लम्बे समय तक बंदी बनाकर बलात्कार किये जाने की प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाकर सभी आवश्यक औपचारिकताएँ देवकुमार द्वारा ही सम्पन्न हुईं।

मामला गंभीर जानकार थानाध्यक्ष ने उच्च अधिकारियों को सूचित किया। दूसरे दिन सुबह माणिक सेठ और बलराम को सेठजी के निवास पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। फिर उनको साथ लेकर पुलिस टीम, अमन और देवकुमार सभी सोसायटी के १५ वें माले के फ़्लैट नंबर २ के बाहर थे।

बाहर के ताले की चाबी बलराम के पास ही थी उसने पुलिस अधिकारी का इशारा देखकर ताला खोला और बेल बजा दी। अन्दर से द्वार के होल से झाँककर देखने के बाद द्वार खुल गया और सामने का नज़ारा देखकर अन्दर उपस्थित जयराम के हाथों के तोते ही उड़ गए। सब लोग अन्दर आ चुके थे।

अपने मालिक को सामने पुलिस की हिरासत में देखकर जयराम ने चुपचाप अपनी गिरफ्तारी दे दी।

अमन ने बंद कमरों पर नज़र डाली मगर वे बाहर से लॉक थे अतः वो नयना को आवाजें लगाने लगा। आवाजें सुनकर नयना अपने कमरे का द्वार पीटने लगी। चाबियाँ बलराम के पास ही थीं, पुलिस अधिकारी ने उसे दोनों बंद कमरों को खोलने का आदेश दिया। कमरा खुलते ही नयना आँसुओं में तरबतर खड़ी अपने मुक्तिदूतों को निहारने लगी। अमन ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।

दूसरे कमरे का ताला खुलने पर अन्दर महँगी शराब की बोतलों का अकूत भण्डार देखकर पुलिस अधिकारी की आँखें फटी रह गईं। उसने तुरंत उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना दी और आगे की कार्रवाई तक ऊपरी आदेश के तहत फ़्लैट सील करके तीनों अपराधियों और पूछताछ के लिए नयना, अमन और देवकुमार को भी  थाने लाया गया।

थाने में अमन ने थानाध्यक्ष को बताया कि नयना उसकी बचपन की प्रेमिका है और वे अमन की परीक्षा समाप्त होते ही कोर्ट-मैरिज  कर लेंगे। थानाध्यक्ष ने दोनों को बधाई और भावी जीवन की शुभकामनाएँ दीं और आवश्यक पूछताछ के बाद नयना को उसकी इच्छानुसार देवकुमार की ही जवाबदेही पर अमन के संरक्षण में यह लिखवाकर भेज दिया कि वे कोर्ट में केस की तिथियों पर अनिवार्य रूप से उपस्थित होते रहेंगे।

बाद में केस की पूरी छानबीन करके चूँकि “निर्मलादेवी बाल-आश्रम” भी संदिग्ध गतिविधियों के लिए वर्णित था, उसे सील करके शैलजा पर माणिक सेठ की अवैध गतिविधियों में परोक्ष रूप से साथ देने का अभियोग लगाकर सभी अपराधियों के विरुद्ध कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल कर दी गई।

अगले दिन नयना की पूरी कहानी दिल्ली के प्रसिद्ध अखबार के मुखपृष्ठ पर थी।

अमन नयना को कमरे पर ले आया था और आगरा फोन लगाकर सबको खुशखबरी देते हुए उसकी बात डाली और कुशल से करवाई। रतन और कीरत को भी यह शुभ समाचार सुना दिया। नयना के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अमन के बाँहों में लेते ही वो संशय से भरी थरथराती आवाज़ में कहने लगी-

“अमू, क्या तुम मुझे इतना समय उन दुष्टों के साथ बिताने के बावजूद मुझे मन से स्वीकार कर सकोगे? मैं केवल तुम्हारी एक झलक देखने के लिए ही अपनी इस अपवित्र देह का बोझ ढोती रही हूँ।”

“कैसी बात कर रही हो निन्नी, मेरी निन्नी...! आज मेरा वजूद केवल तुम्हारे ही दम पर है। तुम्हारी जुदाई में तार-तार हो चुका दिल कैसे तुम्हें दिखाऊँ...अब इस तरह की कोई बात जुबान पर नहीं लाना...  तुम महाभारत के इस पौराणिक प्रसंग से तो परिचित होगी ही कि द्रौपदी के पाँच पति थे और उसने मजबूरी वश ही पाँच भाइयों से विवाह की स्वीकृति दी थी, लेकिन उसे महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास, जो महाभारत ग्रंथ के रचयिता और उन घटनाओं के साक्षी भी थे, जो क्रमानुसार उस युग में घटित हुईं, ने आशीर्वाद दिया था कि द्रौपदी एक-एक वर्ष के लिए सभी पांडवों के साथ रहेगी और जब वह एक भाई से दूसरे भाई के पास जाएगी, तो उसका कौमार्य पुन: वापस आ जाएगा।

लेकिन इस युग में पुराणों में वर्णित प्रसंग को प्रतीकात्मक मानकर देखा जाए तो उसके अनुसार नारी अगर मन से पवित्र है तो तन से कभी अपवित्र नहीं होती... अगर ऐसा होता तो तलाक के बाद पुनर्विवाह, विधवा विवाह, विवाह पूर्व रिश्ते में रहना और इच्छा से बनाए हुए दैहिक संबंध को कानूनी मान्यता नहीं मिली होती। डाली और कुशल का उदाहरण तो तुम्हारे सामने है ही...अपवित्र तो वे नरपशु रक्तबीज हैं जो पूजिता नारी के साथ बलात्कार करके उसके हृदय की कोमलता को खंड खंड कर देते हैं और अपने परिवार में, पत्नी की नज़रों में पवित्र बने रहते हैं।”

“मेरे अमू तुम निश्चय ही किसी महापुरुष के अवतार हो...जो मानव रूप धरकर धरती पर जन्मे हो। मैं तुम्हारा हर कदम पर साथ देने को सदैव तत्पर रहूँगी।”

“नहीं निन्नी, मैं किसी महापुरुष का अवतार नहीं, एक इंसान ही हूँ, मेरा प्रथम संकल्प तो उन  रक्तबीजों की रसिकता को रसातल दिखाना है। तुम्हारे अपराधियों के विरुद्ध ऐसा जाल बुना जा चुका है कि उन्हें चाहे जब भी सजा मिले, कठोरतम ही मिलेगी और  इसके लिए तुम्हारी कहानी बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी।

मैं अपने मकान के नीचे के खंड में अनाथाश्रम की स्थापना करके उसका कार्यभार डाली और तुम्हें सौंपकर अपने पत्रकारिता-कर्म से मानवता की सेवा करता रहूँगा। आज तुम इन रक्तबीजों का शिकार हुई हो, कल और बालाएँ भी किन्हीं रक्तबीजों का शिकार हो सकती हैं... हम अपना जीवन अपने जैसे बेसहारा लोगों के कल्याण में ही बिताएँगे।”

अमन ने परीक्षा के लिए अखबार बांटने का काम छोड़ दिया और परीक्षा समाप्त होते ही उसने अधिकारियों से आगरा जाने की अनुमति माँगी और कहा कि यह मुक़दमा तो न जाने कब तक चलता रहेगा, उसे आगरा में बहुत से कार्य सम्पन्न करने हैं अतः परीक्षा का परिणाम आने के बाद वो साक्षात्कार की औपचारिकताएँ पूर्ण करके उनके अखबार के लिए ऑन लाइन सेवाएँ देता रहेगा और कोर्ट केस की तिथियों पर वहीँ से आता रहेगा।

इसके बाद उसने अपने आने की सूचना कुशल को देकर नयना के साथ आगरा प्रस्थान किया।

उन्हें लेने के लिए डाली और कुशल स्टेशन पहुँच गए थे,

वहाँ उसने किरायेदार से मकान का ऊपरी खण्ड अनुबंध के अनुसार अग्रिम नोटिस देकर एक महीने में खाली करने का अनुरोध किया। एक सप्ताह के अन्दर कुशल ने भी अपने निवास की व्यवस्था अन्यत्र कर ली और अमन ने तीनों मित्रों की सपत्नीक उपस्थिति में नयना के साथ कोर्ट में विवाह कर लिया।

अगले ही दिन वे दोनों प्रेम के प्रतीक ताजमहल के पार्श्व में बहती ताज नगरी की जीवनरेखा, माँ यमुना की संगीतमय स्वरलहरी बिखेरती निर्मल धारा में नौका विहार करते हुए अपनी पुरानी यादों की गठरी की गाँठ खोल बैठे थे। बीते हुए पलों को तो जैसे पंख मिल गए। पलक झपकते ही एक-एक करके उनके हृदयाकाश पर घने बादलों जैसे छा गए। सहसा नयना का हाथ अपने गालपर चला गया और वो उसे सहलाने लगी तो अमन ने पूछ लिया-

“क्या हुआ निन्नी, कोई परेशानी है क्या...?”

“नहीं अमू, बस बीते पलों ने घुसपैठ करके शरारत शुरू कर दी तो वो...तुम्हारे उन बचपन में लिए गए अनगिनत चुम्बनों की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।”

अमन ने मुस्कुराते हुए उसे निकट खींचकर उसका गाल चूम लिया।

समाप्त 🙏

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗