कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०० / ११४ № 100 of 114 रचना १०० / ११४
४ अक्तूबर २०२० 4 October 2020 ४ अक्तूबर २०२०

ससुराल नहीं जाऊँगी - 3 sasuraal naheen jaaoongee - 3 ससुराल नहीं जाऊँगी - 3

विवाह समारोह निर्विघ्न संपन्न हो गया और शुभदा दुल्हन बनकर ससुराल आ गई. देर रात तक विवाह के बाद होने वाली रस्में निभाते-निभाते थक चुकी शुभदा को सुगन्धित फूलों से सजे-धजे शयन कक्ष में पहुँचा दिया गया. यह उसकी सुहागरात थी और वो सिकुड़ी सिमटी सुहाग सेज पर बेसब्री से प्रभात के आने का इंतजार कर रही थी. उसका मन मन में सौ-सौ शंकाएँ-कुशंकाएँ लिए स्वयं से ही तर्क-वितर्क में उलझा हुआ था.

वो सोच रही थी कि प्रभात को ससुर जी ने उसकी शर्त के बारे में अब तक तो नहीं बताया होगा. अब विवाह तो हो चुका है और शुभदा को उसने तन-मन से विवाह की पवित्र अग्नि के सम्मुख रस्मों और कसमों के साथ अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करके उसकी सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने का संकल्प लिया है. फिर भी पता चलने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी...?  इस पुरुष प्रधान समाज में क्या वो उसे हर क्षेत्र में समान अधिकार देने के लिए मन से तैयार हो जाएगा...?

फिर वो यह सोचकर निश्चिन्त हो जाती कि उसकी माँग स्वाभाविक है, अनुचित नहीं और ससुर जी को बेटे पर पूरा विश्वास होगा तभी तो उन्होंने उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करके ही आगे बढ़ने को कहा था...अतः उसे अब निडर होकर ही हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए और उसके होठों पर मुस्कराहट बिखर गई.

कुछ ही देर में जब प्रभात ने कमरे में प्रवेश किया तो शुभदा ने अपनी बेकाबू होती धडकनों को बड़ी मुश्किल से संभाला और अपनी नज़रें झुका लीं. प्रभात ने शेष बची हुई रात्रि में पूरे मान-सम्मान के साथ शुभदा को अपने प्यार के रंग से रँग लिया.

अगले दिन से मेहमानों का प्रस्थान होता गया और जब सभी मेहमान विदा हो गए. रिश्तेदारों की देखरेख में शुभदा का रसोईघर में प्रवेश का शगुन भी पूरा हो चुका था. अब जब घर में केवल चार प्राणी ही शेष रहे तो काम वालियों के होते हुए भी वर्मा जी ने सुबह का चाय-नाश्ता प्यार भरे अनुरोध के साथ शुभदा को बनाने के लिए कहा और सबको बैठक में आवश्यक चर्चा के लिए उपस्थित रहने की हिदायत दी. शुभदा तो चर्चा का मकसद तुरंत समझ गई, लेकिन उनकी धर्मपत्नी प्रभादेवी और प्रभात मन ही मन कयास लगाते रहे.

सबके एकत्र होते ही  चाय की चुस्कियों के साथ वर्मा जी बेटे से मुखातिब होकर बोले-

“प्रभात बेटे,. मुझे तुमसे कुछ विशेष बात कहनी है, इसलिए सबको एक साथ बुलाया है.”

“जी पिताजी, अवश्य!”

“मुझे गर्व है कि शुभदा बेटी मेरे घर की बहू बनकर आई है, लेकिन उसका आगमन एक शर्त पर हुआ है जिसे पूरा करने का मैं उसे वचन दे चुका हूँ, जो तुमसे सम्बंधित है, लेकिन यह बात बिटिया भी नहीं जानती कि मैंने वो वचन उसे तुमसे बिना चर्चा किये अथवा बिना सहमति के किस आधार पर दिया है. वैसे तो यह एक लम्बा किस्सा है जिसकी कड़ियाँ हम दोनों समधियों के परिवार से अनजाने में जुड़ गईं, लेकिन इस रिश्ते ने मेरे मन का खोया हुआ सुकून वापस लौटा दिया है.” कहते हुए वर्मा जी ने बारी-बारी सबकी और देखा.”

“आगे बोलिए पिताजी...!” प्रभात ने उत्सुकता दिखाते हुए कहा.

“बेटे, यह तो तुम जानते ही हो कि मेरा पेशा कितनी उलझनों वाला है और कुछ दिन पहले हुई मुंबई की एक युवती लीना की आत्महत्या से भी तुम अनभिज्ञ नहीं हो.”

“जी पिताजी...”

“तो बेटे, असल बात यह है कि उस दुर्घटना का कुछ हद तक मैं भी ज़िम्मेदार हूँ, क्योंकि लीना की  फरियाद दो बार कोर्ट में आने के बाद उसे और उसकी सास को मेरे पास काउंसलिंग के लिए भेजा गया था और चूँकि मेरे पेशे की प्राथमिकता दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर समझौता करवाने की है, अतः मैंने भी दोनों बार यही किया जिसका परिणाम इतने भयंकर रूप में सामने आएगा, यह मुझे भी अंदाज़ नहीं था.”

वर्मा जी की बात सुनकर शुभदा हक्की बक्की उनका मुँह ताकती  रह गई, लेकिन प्रभात बोला-

“मगर पिताजी, इसमें आपका तो कोई दोष नहीं, आपका कार्य तो कोर्ट के निर्देशानुसार ही होता है न...!”

“यह बात सही है, मगर इस बार न जाने क्यों मैंने स्वयं को भी दोषी पाया. अदालत का रवैया रिश्तों को बचाने का प्रयास करने का होता है, पर जब इस रवैये से रिश्ते इस कदर तार-तार होकर किसी बेकसूर का जीवन ही लील लें तो इस व्यवस्था पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक ही है. घर में विवाह का आयोजन था और मैं इस दुर्घटना से पहुँचे इस मानसिक आघात से उबरने का प्रयास कर ही रहा था कि समधी जी के अचानक आए फोन से जब पता चला कि लीना, मेरी होने वाली बहू शुभदा की अन्तरंग सखी थी और उसकी आत्महत्या से शुभदा बिटिया को इतना आघात पहुँचा है कि उसका लड़कियों का विदा होकर ससुराल जाना ही पुरुष-समाज की साजिश के अंतर्गत महसूस होने लगा और उसने ससुराल जाने से अपने माँ-पिता से साफ़ इनकार कर दिया.

उसका कहना था कि जब आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ी-लिखी नारी को पुरुष के समान क़ानूनी अधिकार दिए गए हैं तो सिर्फ लडकियाँ ही क्यों विदा होकर ससुराल जाएँ जहाँ उसकी गृहस्थी ही तहस नहस हो जाने की शंका सदैव बनी रहती हो. क्यों न बेटे को भी उसकी तरह माँ-पिता सुखद गृहस्थी का आशीर्वाद देकर बहू के साथ विदा करें...!! तो बेटे, शुभदा बिटिया ने भी माँ-पिता के समझाने पर इसी शर्त पर विवाह करना स्वीकार किया कि विवाह के उपरांत पति के साथ अपनी स्वतंत्र दुनिया बसाने के लिए तुम्हें भी उसके साथ हम विदा करें. मुझे लगा कि यह मेरे लिए भी पश्चाताप का उचित अवसर है और मैंने समधी जी की मनोस्थिति और शुभदा बिटिया की मानसिक पीड़ा को महसूस करके तत्काल निर्णय लेकर शुभदा बिटिया की शर्त स्वीकार कर ली और तुम्हें न बताने का अनुरोध भी किया ताकि विवाह का मंगल कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाए.

मैं जानता था बेटे, कि तुम मेरे मन की दशा समझकर मेरे निर्णय का विरोध नहीं करोगे. तुम्हें भी जॉब के सिलसिले में  हो सकता है कंपनी प्रमोशन देकर किसी अन्य शहर में स्थानांतरित कर दे...उस स्थिति में भी तो तुम्हें हम प्रसन्न होकर विदा करेंगे ही और जिन माँ-पिता के पुत्र-पुत्री पढ़ाई के लिए विदेश जाकर वहीँ अपना बसेरा बना लेते हैं, उन्हें भी तो अपने बलबूते पर जीवन बिताना होता है! और यदि पुत्र अपने पिता के व्यवसाय से जुड़कर  परिवार के साथ रहता भी हो तो वहाँ पुत्र के विवाह के बाद सास-बहू में मनमुटाव चलता ही रहता है, फिर चाहे गलती किसी की न भी हो तो बारीकी से खोज निकाली जाती है जो और सास-बहू के मनमुटाव से पुत्र अथवा पति का भी अपना मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है और इस तरह की दुर्घटनाओं की आशंका जन्म लेने लगती है. शुभदा बेटी ने बिलकुल खरी बात कही और मैंने उसकी बात का मर्म समझकर ही एक नयी परंपरा का सूत्रपात अपने घर से करने का निर्णय लिया.”

“तो क्या पिताजी आपने शुभदा से मेरा विवाह घर से रिश्ता तोड़ने की शर्त पर किया है?” कुछ खिन्न मुद्रा में प्रभात बोला.

“नहीं बेटे, रिश्ता तोड़ने नहीं बल्कि मजबूती से जोड़ने के लिए मैन यह कदम उठाया है। इस बात को तुम अभी नहीं समझ सकोगे, कल शुभदा पग फेरे के लिए मायके जाएगी,  अतः अभी इतना ही कहना बहुत है, उसके वापस आने के बाद धीरे धीरे सब कुछ समझने भी लगोगे और मेरे निर्णय की दाद भी दोगे। हाँ, जब तक तुम्हारे निवास   की उचित व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक तुम दोनों को यहॉँ रहना होगा। अगर शुभदा बेटी इसके लिये तैयार न हो तो तब तक वो मायके में रह सकती है”। कहते हुए वर्मा जी ने शुभदा की तरफ नज़र घुमाई.

“ऐसा न कहिये पिताजी,  मैं तो हमेशा आपके सान्निध्य में रहना चाहती हूँ, मगर मैंने उस दुर्घटना के बाद बहू बेटियों के वांछित अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का संकल्प किया है, जिसे पूरा करने के लिए अलग रहना ही होगा. लेकिन हम अपना बसेरा इस घर के आसपास ही बसाएँगे ताकि प्रेम, अपनापन, एक दूसरे का सहयोग और निकटता बनी रहे”।

“मुझे तुम पर गर्व है बेटी,  तुम जैसा चाहोगी वैसा ही होगा. क्यों प्रभाजी, मैं ठीक कह रहा हूँ न...?” वर्मा जी ने आँखें मूँदे कुर्सी से सिर टिकाकर विचारों में खोई हुई प्रभादेवी को टोकते हुए प्रश्न किया.

प्रभादेवी बातचीत सुनते सुनते प्रतिपल  चेतन से अवचेतन में पहुँचकर अपनी हमउम्र सखियों के साथ प्रातः भ्रमण पर जाते हुए चर्चा में व्यस्त हो जाती थी, इस क्षण भी उसका अपनी सखियों, गीता, सुषमा और शांति के साथ वाद- विवाद जारी था।

क्रमशः...

wiwaah samaaroh nirvighn sanpann ho gayaa aur shubhadaa dulhan banakar sasuraal aa gaee der raat tak wiwaah ke baad hone waalee rasmen nibhaate-nibhaate thak chukee shubhadaa ko sugandhit phoolon se saje-dhaje shayan kaksh men pahunchaa diyaa gayaa yah usakee suhaagaraat thee aur wo sikudee simatee suhaag sej par besabree se prabhaat ke aane kaa intajaar kar rahee thee usakaa man man men sau-sau shankaaen-kushankaaen lie svayan se hee tark-witark men ulajhaa huaa thaa

·

wo soch rahee thee ki prabhaat ko sasur jee ne usakee shart ke baare men ab tak to naheen bataayaa hogaa ab wiwaah to ho chukaa hai aur shubhadaa ko usane tan-man se wiwaah kee pawitr agni ke sammukh rasmon aur kasamon ke saath apanee ardhaanginee sveekaar karake usakee surakshaa aur sammaan banaae rakhane kaa sankalp liyaa hai phir bhee pataa chalane par usakee kyaa pratikriyaa hogee? is purush pradhaan samaaj men kyaa wo use har kshetr men samaan adhikaar dene ke lie man se taiyaar ho jaaegaa?

phir wo yah sochakar nishchint ho jaatee ki usakee maang svaabhaawik hai, anuchit naheen aur sasur jee ko bete par pooraa wishvaas hogaa tabhee to unhonne unhen pooree tarah aashvast karake hee aage bढ़ne ko kahaa thaaatah use ab nidar hokar hee har sthiti kaa saamanaa karane ke lie taiyaar rahanaa chaahie aur usake hothon par muskaraahat bikhar gaee

·

kuch hee der men jab prabhaat ne kamare men prawesh kiyaa to shubhadaa ne apanee bekaaboo hotee dhadakanon ko badee mushkil se sanbhaalaa aur apanee nazaren jhukaa leen prabhaat ne shesh bachee huee raatri men poore maan-sammaan ke saath shubhadaa ko apane pyaar ke rang se rang liyaa

·

agale din se mehamaanon kaa prasthaan hotaa gayaa aur jab sabhee mehamaan widaa ho gae rishtedaaron kee dekharekh men shubhadaa kaa rasoeeghar men prawesh kaa shagun bhee pooraa ho chukaa thaa ab jab ghar men kewal chaar praanee hee shesh rahe to kaam waaliyon ke hote hue bhee warmaa jee ne subah kaa chaay-naashtaa pyaar bhare anurodh ke saath shubhadaa ko banaane ke lie kahaa aur sabako baithak men aawashyak charchaa ke lie upasthit rahane kee hidaayat dee shubhadaa to charchaa kaa makasad turant samajh gaee, lekin unakee dharmapatnee prabhaadewee aur prabhaat man hee man kayaas lagaate rahe

·

sabake ekatr hote hee chaay kee chuskiyon ke saath warmaa jee bete se mukhaatib hokar bole-

“prabhaat bete, mujhe tumase kuch wishesh baat kahanee hai, isalie sabako ek saath bulaayaa hai”

·

“jee pitaajee, awashy!”

·

“mujhe garv hai ki shubhadaa betee mere ghar kee bahoo banakar aaee hai, lekin usakaa aagaman ek shart par huaa hai jise pooraa karane kaa main use wachan de chukaa hoon, jo tumase sambandhit hai, lekin yah baat bitiyaa bhee naheen jaanatee ki mainne wo wachan use tumase binaa charchaa kiye athawaa binaa sahamati ke kis aadhaar par diyaa hai waise to yah ek lambaa kissaa hai jisakee kadiyaan ham donon samadhiyon ke pariwaar se anajaane men jud gaeen, lekin is rishte ne mere man kaa khoyaa huaa sukoon waapas lautaa diyaa hai” kahate hue warmaa jee ne baaree-baaree sabakee aur dekhaa”

·

“aage bolie pitaajee!” prabhaat ne utsukataa dikhaate hue kahaa

·

“bete, yah to tum jaanate hee ho ki meraa peshaa kitanee ulajhanon waalaa hai aur kuch din pahale huee munbaee kee ek yuwatee leenaa kee aatmahatyaa se bhee tum anabhijn naheen ho”

·

“jee pitaajee”

·

“to bete, asal baat yah hai ki us durghatanaa kaa kuch had tak main bhee zimmedaar hoon, kyonki leenaa kee phariyaad do baar kort men aane ke baad use aur usakee saas ko mere paas kaaunsaling ke lie bhejaa gayaa thaa aur choonki mere peshe kee praathamikataa donon pakshon ko samajhaa-bujhaakar samajhautaa karawaane kee hai, atah mainne bhee donon baar yahee kiyaa jisakaa parinaam itane bhayankar roop men saamane aaegaa, yah mujhe bhee andaaz naheen thaa”

·

warmaa jee kee baat sunakar shubhadaa hakkee bakkee unakaa munh taakatee rah gaee, lekin prabhaat bolaa-

·

“magar pitaajee, isamen aapakaa to koee dosh naheen, aapakaa kaary to kort ke nirdeshaanusaar hee hotaa hai n!”

·

“yah baat sahee hai, magar is baar n jaane kyon mainne svayan ko bhee doshee paayaa adaalat kaa rawaiyaa rishton ko bachaane kaa prayaas karane kaa hotaa hai, par jab is rawaiye se rishte is kadar taar-taar hokar kisee bekasoor kaa jeewan hee leel len to is wyawasthaa par sawaaliyaa nishaan laganaa svaabhaawik hee hai ghar men wiwaah kaa aayojan thaa aur main is durghatanaa se pahunche is maanasik aaghaat se ubarane kaa prayaas kar hee rahaa thaa ki samadhee jee ke achaanak aae phon se jab pataa chalaa ki leenaa, meree hone waalee bahoo shubhadaa kee antarang sakhee thee aur usakee aatmahatyaa se shubhadaa bitiyaa ko itanaa aaghaat pahunchaa hai ki usakaa ladakiyon kaa widaa hokar sasuraal jaanaa hee purush-samaaj kee saajish ke antargat mahasoos hone lagaa aur usane sasuraal jaane se apane maan-pitaa se saaf inakaar kar diyaa

·

usakaa kahanaa thaa ki jab aadhunik pariwesh men palee-bढ़ee aur pढ़ee-likhee naaree ko purush ke samaan qaanoonee adhikaar die gae hain to sirph ladakiyaan hee kyon widaa hokar sasuraal jaaen jahaan usakee griihasthee hee tahas nahas ho jaane kee shankaa sadaiw banee rahatee ho kyon n bete ko bhee usakee tarah maan-pitaa sukhad griihasthee kaa aasheervaad dekar bahoo ke saath widaa karen!! to bete, shubhadaa bitiyaa ne bhee maan-pitaa ke samajhaane par isee shart par wiwaah karanaa sveekaar kiyaa ki wiwaah ke uparaant pati ke saath apanee svatantr duniyaa basaane ke lie tumhen bhee usake saath ham widaa karen mujhe lagaa ki yah mere lie bhee pashchaataap kaa uchit awasar hai aur mainne samadhee jee kee manosthiti aur shubhadaa bitiyaa kee maanasik peedaa ko mahasoos karake tatkaal nirnay lekar shubhadaa bitiyaa kee shart sveekaar kar lee aur tumhen n bataane kaa anurodh bhee kiyaa taaki wiwaah kaa mangal kaary nirvighn sanpann ho jaae

·

main jaanataa thaa bete, ki tum mere man kee dashaa samajhakar mere nirnay kaa wirodh naheen karoge tumhen bhee jॉb ke silasile men ho sakataa hai kanpanee pramoshan dekar kisee any shahar men sthaanaantarit kar deus sthiti men bhee to tumhen ham prasann hokar widaa karenge hee aur jin maan-pitaa ke putr-putree pढ़aaee ke lie widesh jaakar waheen apanaa baseraa banaa lete hain, unhen bhee to apane balaboote par jeewan bitaanaa hotaa hai! aur yadi putr apane pitaa ke wyawasaay se judakar pariwaar ke saath rahataa bhee ho to wahaan putr ke wiwaah ke baad saas-bahoo men manamutaaw chalataa hee rahataa hai, phir chaahe galatee kisee kee n bhee ho to baareekee se khoj nikaalee jaatee hai jo aur saas-bahoo ke manamutaaw se putr athawaa pati kaa bhee apanaa maanasik santulan dagamagaane lagataa hai aur is tarah kee durghatanaaon kee aashankaa janm lene lagatee hai shubhadaa betee ne bilakul kharee baat kahee aur mainne usakee baat kaa marm samajhakar hee ek nayee paranparaa kaa sootrapaat apane ghar se karane kaa nirnay liyaa”

·

“to kyaa pitaajee aapane shubhadaa se meraa wiwaah ghar se rishtaa todane kee shart par kiyaa hai?” kuch khinn mudraa men prabhaat bolaa

·

“naheen bete, rishtaa todane naheen balki majabootee se jodane ke lie main yah kadam uthaayaa hai is baat ko tum abhee naheen samajh sakoge, kal shubhadaa pag phere ke lie maayake jaaegee, atah abhee itanaa hee kahanaa bahut hai, usake waapas aane ke baad dheere dheere sab kuch samajhane bhee lagoge aur mere nirnay kee daad bhee doge haan, jab tak tumhaare niwaas kee uchit wyawasthaa naheen ho jaatee, tab tak tum donon ko yahॉn rahanaa hogaa agar shubhadaa betee isake liye taiyaar n ho to tab tak wo maayake men rah sakatee hai” kahate hue warmaa jee ne shubhadaa kee taraph nazar ghumaaee

·

“aisaa n kahiye pitaajee, main to hameshaa aapake saannidhy men rahanaa chaahatee hoon, magar mainne us durghatanaa ke baad bahoo betiyon ke waanchit adhikaaron ke lie aawaaz uthaane kaa sankalp kiyaa hai, jise pooraa karane ke lie alag rahanaa hee hogaa lekin ham apanaa baseraa is ghar ke aasapaas hee basaaenge taaki prem, apanaapan, ek doosare kaa sahayog aur nikatataa banee rahe”

·

“mujhe tum par garv hai betee, tum jaisaa chaahogee waisaa hee hogaa kyon prabhaajee, main theek kah rahaa hoon n?” warmaa jee ne aankhen moonde kursee se sir tikaakar wichaaron men khoee huee prabhaadewee ko tokate hue prashn kiyaa

·

prabhaadewee baatacheet sunate sunate pratipal chetan se awachetan men pahunchakar apanee hamaumr sakhiyon ke saath praatah bhraman par jaate hue charchaa men wyast ho jaatee thee, is kshan bhee usakaa apanee sakhiyon, geetaa, sushamaa aur shaanti ke saath waad- wiwaad jaaree thaa

·

kramashah

विवाह समारोह निर्विघ्न संपन्न हो गया और शुभदा दुल्हन बनकर ससुराल आ गई. देर रात तक विवाह के बाद होने वाली रस्में निभाते-निभाते थक चुकी शुभदा को सुगन्धित फूलों से सजे-धजे शयन कक्ष में पहुँचा दिया गया. यह उसकी सुहागरात थी और वो सिकुड़ी सिमटी सुहाग सेज पर बेसब्री से प्रभात के आने का इंतजार कर रही थी. उसका मन मन में सौ-सौ शंकाएँ-कुशंकाएँ लिए स्वयं से ही तर्क-वितर्क में उलझा हुआ था.

वो सोच रही थी कि प्रभात को ससुर जी ने उसकी शर्त के बारे में अब तक तो नहीं बताया होगा. अब विवाह तो हो चुका है और शुभदा को उसने तन-मन से विवाह की पवित्र अग्नि के सम्मुख रस्मों और कसमों के साथ अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करके उसकी सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने का संकल्प लिया है. फिर भी पता चलने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी...?  इस पुरुष प्रधान समाज में क्या वो उसे हर क्षेत्र में समान अधिकार देने के लिए मन से तैयार हो जाएगा...?

फिर वो यह सोचकर निश्चिन्त हो जाती कि उसकी माँग स्वाभाविक है, अनुचित नहीं और ससुर जी को बेटे पर पूरा विश्वास होगा तभी तो उन्होंने उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करके ही आगे बढ़ने को कहा था...अतः उसे अब निडर होकर ही हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए और उसके होठों पर मुस्कराहट बिखर गई.

कुछ ही देर में जब प्रभात ने कमरे में प्रवेश किया तो शुभदा ने अपनी बेकाबू होती धडकनों को बड़ी मुश्किल से संभाला और अपनी नज़रें झुका लीं. प्रभात ने शेष बची हुई रात्रि में पूरे मान-सम्मान के साथ शुभदा को अपने प्यार के रंग से रँग लिया.

अगले दिन से मेहमानों का प्रस्थान होता गया और जब सभी मेहमान विदा हो गए. रिश्तेदारों की देखरेख में शुभदा का रसोईघर में प्रवेश का शगुन भी पूरा हो चुका था. अब जब घर में केवल चार प्राणी ही शेष रहे तो काम वालियों के होते हुए भी वर्मा जी ने सुबह का चाय-नाश्ता प्यार भरे अनुरोध के साथ शुभदा को बनाने के लिए कहा और सबको बैठक में आवश्यक चर्चा के लिए उपस्थित रहने की हिदायत दी. शुभदा तो चर्चा का मकसद तुरंत समझ गई, लेकिन उनकी धर्मपत्नी प्रभादेवी और प्रभात मन ही मन कयास लगाते रहे.

सबके एकत्र होते ही  चाय की चुस्कियों के साथ वर्मा जी बेटे से मुखातिब होकर बोले-

“प्रभात बेटे,. मुझे तुमसे कुछ विशेष बात कहनी है, इसलिए सबको एक साथ बुलाया है.”

“जी पिताजी, अवश्य!”

“मुझे गर्व है कि शुभदा बेटी मेरे घर की बहू बनकर आई है, लेकिन उसका आगमन एक शर्त पर हुआ है जिसे पूरा करने का मैं उसे वचन दे चुका हूँ, जो तुमसे सम्बंधित है, लेकिन यह बात बिटिया भी नहीं जानती कि मैंने वो वचन उसे तुमसे बिना चर्चा किये अथवा बिना सहमति के किस आधार पर दिया है. वैसे तो यह एक लम्बा किस्सा है जिसकी कड़ियाँ हम दोनों समधियों के परिवार से अनजाने में जुड़ गईं, लेकिन इस रिश्ते ने मेरे मन का खोया हुआ सुकून वापस लौटा दिया है.” कहते हुए वर्मा जी ने बारी-बारी सबकी और देखा.”

“आगे बोलिए पिताजी...!” प्रभात ने उत्सुकता दिखाते हुए कहा.

“बेटे, यह तो तुम जानते ही हो कि मेरा पेशा कितनी उलझनों वाला है और कुछ दिन पहले हुई मुंबई की एक युवती लीना की आत्महत्या से भी तुम अनभिज्ञ नहीं हो.”

“जी पिताजी...”

“तो बेटे, असल बात यह है कि उस दुर्घटना का कुछ हद तक मैं भी ज़िम्मेदार हूँ, क्योंकि लीना की  फरियाद दो बार कोर्ट में आने के बाद उसे और उसकी सास को मेरे पास काउंसलिंग के लिए भेजा गया था और चूँकि मेरे पेशे की प्राथमिकता दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर समझौता करवाने की है, अतः मैंने भी दोनों बार यही किया जिसका परिणाम इतने भयंकर रूप में सामने आएगा, यह मुझे भी अंदाज़ नहीं था.”

वर्मा जी की बात सुनकर शुभदा हक्की बक्की उनका मुँह ताकती  रह गई, लेकिन प्रभात बोला-

“मगर पिताजी, इसमें आपका तो कोई दोष नहीं, आपका कार्य तो कोर्ट के निर्देशानुसार ही होता है न...!”

“यह बात सही है, मगर इस बार न जाने क्यों मैंने स्वयं को भी दोषी पाया. अदालत का रवैया रिश्तों को बचाने का प्रयास करने का होता है, पर जब इस रवैये से रिश्ते इस कदर तार-तार होकर किसी बेकसूर का जीवन ही लील लें तो इस व्यवस्था पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक ही है. घर में विवाह का आयोजन था और मैं इस दुर्घटना से पहुँचे इस मानसिक आघात से उबरने का प्रयास कर ही रहा था कि समधी जी के अचानक आए फोन से जब पता चला कि लीना, मेरी होने वाली बहू शुभदा की अन्तरंग सखी थी और उसकी आत्महत्या से शुभदा बिटिया को इतना आघात पहुँचा है कि उसका लड़कियों का विदा होकर ससुराल जाना ही पुरुष-समाज की साजिश के अंतर्गत महसूस होने लगा और उसने ससुराल जाने से अपने माँ-पिता से साफ़ इनकार कर दिया.

उसका कहना था कि जब आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी और पढ़ी-लिखी नारी को पुरुष के समान क़ानूनी अधिकार दिए गए हैं तो सिर्फ लडकियाँ ही क्यों विदा होकर ससुराल जाएँ जहाँ उसकी गृहस्थी ही तहस नहस हो जाने की शंका सदैव बनी रहती हो. क्यों न बेटे को भी उसकी तरह माँ-पिता सुखद गृहस्थी का आशीर्वाद देकर बहू के साथ विदा करें...!! तो बेटे, शुभदा बिटिया ने भी माँ-पिता के समझाने पर इसी शर्त पर विवाह करना स्वीकार किया कि विवाह के उपरांत पति के साथ अपनी स्वतंत्र दुनिया बसाने के लिए तुम्हें भी उसके साथ हम विदा करें. मुझे लगा कि यह मेरे लिए भी पश्चाताप का उचित अवसर है और मैंने समधी जी की मनोस्थिति और शुभदा बिटिया की मानसिक पीड़ा को महसूस करके तत्काल निर्णय लेकर शुभदा बिटिया की शर्त स्वीकार कर ली और तुम्हें न बताने का अनुरोध भी किया ताकि विवाह का मंगल कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाए.

मैं जानता था बेटे, कि तुम मेरे मन की दशा समझकर मेरे निर्णय का विरोध नहीं करोगे. तुम्हें भी जॉब के सिलसिले में  हो सकता है कंपनी प्रमोशन देकर किसी अन्य शहर में स्थानांतरित कर दे...उस स्थिति में भी तो तुम्हें हम प्रसन्न होकर विदा करेंगे ही और जिन माँ-पिता के पुत्र-पुत्री पढ़ाई के लिए विदेश जाकर वहीँ अपना बसेरा बना लेते हैं, उन्हें भी तो अपने बलबूते पर जीवन बिताना होता है! और यदि पुत्र अपने पिता के व्यवसाय से जुड़कर  परिवार के साथ रहता भी हो तो वहाँ पुत्र के विवाह के बाद सास-बहू में मनमुटाव चलता ही रहता है, फिर चाहे गलती किसी की न भी हो तो बारीकी से खोज निकाली जाती है जो और सास-बहू के मनमुटाव से पुत्र अथवा पति का भी अपना मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है और इस तरह की दुर्घटनाओं की आशंका जन्म लेने लगती है. शुभदा बेटी ने बिलकुल खरी बात कही और मैंने उसकी बात का मर्म समझकर ही एक नयी परंपरा का सूत्रपात अपने घर से करने का निर्णय लिया.”

“तो क्या पिताजी आपने शुभदा से मेरा विवाह घर से रिश्ता तोड़ने की शर्त पर किया है?” कुछ खिन्न मुद्रा में प्रभात बोला.

“नहीं बेटे, रिश्ता तोड़ने नहीं बल्कि मजबूती से जोड़ने के लिए मैन यह कदम उठाया है। इस बात को तुम अभी नहीं समझ सकोगे, कल शुभदा पग फेरे के लिए मायके जाएगी,  अतः अभी इतना ही कहना बहुत है, उसके वापस आने के बाद धीरे धीरे सब कुछ समझने भी लगोगे और मेरे निर्णय की दाद भी दोगे। हाँ, जब तक तुम्हारे निवास   की उचित व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक तुम दोनों को यहॉँ रहना होगा। अगर शुभदा बेटी इसके लिये तैयार न हो तो तब तक वो मायके में रह सकती है”। कहते हुए वर्मा जी ने शुभदा की तरफ नज़र घुमाई.

“ऐसा न कहिये पिताजी,  मैं तो हमेशा आपके सान्निध्य में रहना चाहती हूँ, मगर मैंने उस दुर्घटना के बाद बहू बेटियों के वांछित अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का संकल्प किया है, जिसे पूरा करने के लिए अलग रहना ही होगा. लेकिन हम अपना बसेरा इस घर के आसपास ही बसाएँगे ताकि प्रेम, अपनापन, एक दूसरे का सहयोग और निकटता बनी रहे”।

“मुझे तुम पर गर्व है बेटी,  तुम जैसा चाहोगी वैसा ही होगा. क्यों प्रभाजी, मैं ठीक कह रहा हूँ न...?” वर्मा जी ने आँखें मूँदे कुर्सी से सिर टिकाकर विचारों में खोई हुई प्रभादेवी को टोकते हुए प्रश्न किया.

प्रभादेवी बातचीत सुनते सुनते प्रतिपल  चेतन से अवचेतन में पहुँचकर अपनी हमउम्र सखियों के साथ प्रातः भ्रमण पर जाते हुए चर्चा में व्यस्त हो जाती थी, इस क्षण भी उसका अपनी सखियों, गीता, सुषमा और शांति के साथ वाद- विवाद जारी था।

क्रमशः...

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗