कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०१ / ११४ № 101 of 114 रचना १०१ / ११४
११ अक्तूबर २०२० 11 October 2020 ११ अक्तूबर २०२०

ससुराल नहीं जाऊँगी 4 sasuraal naheen jaaoongee 4 ससुराल नहीं जाऊँगी 4

भाग ४

उन तीनों सखियों में गीता बड़बोली थी। वो इधर उधर की बातों के अलावा चुटकुलों से भी सुषमा और शांति का मनोरंजन करती रहती थी। एक पुत्र और एक पुत्री की माँ गीता पुत्र के विवाह के बाद दो बच्चों की दादी भी बन चुकी थी, लेकिन बेटी, बेटे से 6 वर्ष छोटी थी और कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी। बहू बेटा दोनों जॉब करते थे, अतः उनके दफ्तर और बेटी के कॉलेज जाने के बाद दोनों बच्चों को संभालने  के साथ ही कामवाली से खाना बनवाने से लेकर अन्य सभी कार्य अपनी देखरेख में करवाना उसी की जवाबदारी थी।

सुषमा भी एक पुत्र और एक पुत्री की माँ थी। उसके बेटे के विवाह को एक वर्ष ही हुआ था और बेटी अभी 12 वीं में ही पढ़ रही थी। बहू पढ़ी लिखी थी, लेकिन गृहस्थी संभालने के साथ नौकरी करना उसे पसंद नहीं था अतः वो घर में ही अपने दो बच्चों में व्यस्त रहती थी।

इकलौते पुत्र की माँ शांति एक लेखिका थी।  पति की असमय मृत्यु हो जाने से बेटे  के जॉब के कारण गाँव छोड़कर बेटे बहू के साथ ही रहने शहर चली आई थी।उनके विवाह को दो वर्ष ही हुए थे और अब तक कोई संतान नहीं थी।

चारों सखियों में एक समानता यह थी कि वे सुबह शीघ्र उठकर अनिवार्य रूप से प्रातः भ्रमण को एक साथ निकलती थीं और आधे घंटे तक अपनी-अपनी गति के अनुसार घूमने के बाद हाँफती हुईं इशारों में शाम को मिलने के वादे के साथ एक दूसरे से विदा लेकर अपने अपने फ़्लैट की लिफ्ट पकड़ लेती थीं.

शाम के सात बजे दिन भर की कवायद के बाद फिर वे वहीँ बगीचे में एक साथ बैठकर इधर उधर की चर्चा, हँसी-मजाक के साथ ९ बजे तक समय बिताकर रात्रि-भोजन के लिए वापस चली जाती थीं. ये दो घंटे उनके अपने होते थे. गीता की बहू और बेटा ऑफिस से आ गए होते थे और सुषमा की बहू भोजन बनाने में व्यस्त हो जाती थी. प्रभादेवी भी शाम का भोजन जल्दी बना लेती थी. तीनों के पतिदेव भी अपने दोस्तों के साथ टहलने निकल जाते थे. और शांति, जो अपने नाम के अनुरूप स्वभाव से भी शांत थी. वो बहू के होते हुए भी अपने सारे कार्य स्वयं करती थी और इस समय अपने लिए भोजन बनाकर ही नीचे उतरती थी.

एक तरह से देखा जाए तो चारों अपने-अपने परिवार के साथ संतुष्ट जीवन बिता रही थीं मगर ऐसा नहीं था. जहाँ सास-बहू एक ही छत के नीचे हों वहाँ रसोई के बर्तन बिना बजे कैसे रह सकते हैं...! तो प्रभा को छोड़कर तीनों गाहे-बगाहे अपनी-अपनी शिकायत-पोटली खोलकर अपना दुःख-दर्द साझा कर लेती थीं.

इन सखियों का साथ काफी पुराना था. प्रभा पहले तो उनकी इस चर्चा में विशेष रूचि नहीं दिखाती थी, लेकिन बेटे का रिश्ता तय होने के बाद वो उनकी बातें कान खोलकर सुनती और मन ही मन अपनी बहू के साथ बेहतर रिश्ता जोड़ने के विकल्प खोजती रहती थी. विवाह की तैयारियों की व्यस्तता के कारण वो काफी दिनों से शाम की चर्चा में शामिल नहीं हो सकी थी, मगर तीनों सखियाँ गहरी मित्रता होने से प्रभात का विवाह होने तक उसकी सहायता के लिए और सभी कार्यक्रमों में शामिल होने घर पर ही आ जाया करती थीं.

आज उसे उन सबकी कही-सुनी बातें याद आ रही थीं. गीता कह रही थी-

“भई, मैं तो अब सचमुच परेशान रहने लगी हूँ, एक तरफ तो अंकित (पुत्र) के पिता मुझे दिन भर गर्दभ-हम्माली करते हुए देखकर इस बात से खिन्न होने लगते हैं कि मैं अब उनसे विमुख होने लगी हूँ. अक्सर कहते हैं कि अगर रूपल बिटिया की जवाबदारी न होती तो सब कुछ छोड़कर शेष जीवन शांति से बिताने चले चलते हिमालय की तराइयों में, बेटा-बहू चाहे जैसे निर्वाह करें. पढ़ी-लिखी, कमाऊ पत्नी पाकर बेटा तो निहाल हो गया है मगर हमारा तो जैसे अस्तित्व ही समाप्त हो गया है. विरोधी स्वर निकालें तो असभ्य कहलाए जाएँ...मगर पहले यह सब सूझता कहाँ है...! अब तो ‘दिल जलता है तो जलने दे, आँसू न बहा, फरियाद न कर...!!’ वाली बात हो गई है.”

सुषमा भी कहाँ चुप रहने वाली थी, बोल पड़ी-

“गीता बहन, केवल तुम ही इस चक्रवात में नहीं फँसी हो, हमारी स्थिति भी तुमसे बेहतर नहीं है. सुमन(बहू)का नौकरी न करना भी हमारी छाती पर मूँग दलने जैसा है. पूरी तरह काम वसूली के बावजूद रसोई अपनी पसंद की और अपनी समय-सुविधा के अनुसार ही बनाएगी. भला मिर्च मसालों और तेल में तर सब्जियाँ खाना क्या इस उम्र में हमारे अनुकूल है...? दाल बनेगी तो सिर्फ अरहर की, प्यार से साथ में कुछ इनके लिए बनाने को कह दूँ तो जली-कटी भी मुझे ही सुननी पड़े, बनाने लगूँ तो अधिक खर्च होने का राग अलापने लगे और यह सब मर्दों की पीठ पीछे ही होता है, सबके सामने तो जुबान पर चाशनी चिपकी रहती है. तुम बहन कष्ट झेलकर ही सही, खाना तो अपनी पसंद से ही सब बनवाती हो न...! एक शांति की ही शांति से ज़िन्दगी कट रही है. मगर वो अकेली है, एक बार बुराई मोल ली पर सुख से अपनी मन मर्ज़ी का तो बनाती खाती और रहती है...!!” कहते हुए सुषमा ने शांति पर नज़रें टिका दीं.

सुषमा और गीता की बातें सुनकर शांति ने मुस्कुराकर कहा-

“यह सच है बहनों, लेकिन मेरे हालात से तुम लोग वाकिफ नहीं हो. शायद तुम यह नहीं जानतीं कि मैं कमरे, कलम और कम्प्यूटर से क्यों चिपकी रहती हूँ, मेरा शांत दिखने वाला चेहरा अन्दर कितने तूफ़ान समेटे हुए है... क्योंकि मैंने मन की बात तुम सबसे कभी साझा ही नहीं की. चुपचाप दर्द सीने से लगाकर जीती रही हूँ...! क्योंकि मैं जानती हूँ कि यह मेरी अपनी पसंद है. अगर संन्यास न अपनाया तो वानप्रस्थ ही मेरे लिए अंतिम विकल्प होगा जो मैं नहीं चाहती अतः सब कुछ खो देने से जो है वही बेहतर है. तुम सब भी अपनी पसंद से जीवन बिताने को स्वतंत्र हो... अपने घरेलू मामलों में समाज की परवा करने से तो यही हासिल होना है...

आज की सास तो सुधर चुकी है, मगर उसके अच्छे होने का फायदा बहुएँ बखूबी उठा रही हैं।

प्रभा बहन, अब तुम भी हमारी कतार में शामिल होने वाली हो अतः  सोच समझकर ही कदम उठाना। अब तो सास पर बहुएँ ही हावी हो रही हैं। हमारी व्यथा की सुनवाई कहीं नहीं होगी, क्योंकि पुराने ज़माने की सासुओं ने हमारे लिए इतने कांटे बो दिए हैं कि चुनते-चुनते सदी ही गुजर जाएगी। अरे, हमने तो अपनी सास के अत्याचार देख-देख कर स्वयं से वादा किया था कि हम अपनी बहू के साथ ऐसा व्यवहार हरगिज़ नहीं करेंगे, लेकिन यह तो मालूम न था कि इतना सफर तय करते-करते ज़माना इतना बदल जाएगा कि सास-वर्ग के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई ही शेष रहेगी. हाँ, कुछ पुराने ढर्रे की सासुएँ आज भी बहुओं पर भारी पड़ती हैं मगर उनका यह कृत्य उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता.”

प्रभा अवचेतन में ही सखियों की बातों पर चिंतन में डूबी हुई थी. गीता नौकरी करने वाली बहू से संतुष्ट नहीं थी, सुषमा घर पर रहने वाली बहू से और शांति संन्यास ओढ़कर भी संतुष्ट नहीं थी. वो अपने विवाह से पहले भी अपने आसपास के परिवारों में अलग-अलग माहौल देख चुकी थी. उसने कहीं भी सास-बहू को आपस में प्यार से रहते नहीं देखा. बुढ़ापे में सास या ससुर अकेले रह जाते तो बहुओं द्वारा और अधिक ही प्रताड़ित होते थे. सासुएँ बेटे पर अधिकार खो देने के डर से और बहुएँ पति पर एकाधिकार की चाहत से ही शायद एक दूसरी पर हावी होना चाहती होंगी. यानी बहुएँ प्राचीन काल से ही ससुराल जाना मन से स्वीकार नहीं कर सकीं. यह तो पुरुष समाज ने ही स्वार्थवश परम्पराओं, संस्कारों और फ़र्ज़ का मुलम्मा चढ़ाकर लड़कियों पर सारे नियम थोप दिए. आज अगर बेटियों की दबी हुई आवाज़ बुलंद हो रही है तो हमें यह परिवर्तन सहर्ष स्वीकार करना चाहिए. इसमें सास-बहू दोनों को स्वतंत्र जीवन जीने की सुविधा मिलेगी. बहू-बेटों की गृहस्थी में उलझकर  बुजुर्ग अपना सुख-चैन ही खो बैठते हैं.

अचानक पति के टोकने से विचार-मग्न प्रभादेवी की बंद पलकें खुलीं और वो चेतन में आकर बोल पड़ी-

‘आपने उचित निर्णय लिया है जी, मैं आपके निर्णय से पूरी तरह सहमत और संतुष्ट हूँ.”

क्रमशः...

bhaag 4

·

un teenon sakhiyon men geetaa badabolee thee wo idhar udhar kee baaton ke alaawaa chutakulon se bhee sushamaa aur shaanti kaa manoranjan karatee rahatee thee ek putr aur ek putree kee maan geetaa putr ke wiwaah ke baad do bachchon kee daadee bhee ban chukee thee, lekin betee, bete se 6 warsh chotee thee aur kॉlej ke antim warsh men thee bahoo betaa donon jॉb karate the, atah unake daphtar aur betee ke kॉlej jaane ke baad donon bachchon ko sanbhaalane ke saath hee kaamawaalee se khaanaa banawaane se lekar any sabhee kaary apanee dekharekh men karawaanaa usee kee jawaabadaaree thee

sushamaa bhee ek putr aur ek putree kee maan thee usake bete ke wiwaah ko ek warsh hee huaa thaa aur betee abhee 12 ween men hee pढ़ rahee thee bahoo pढ़ee likhee thee, lekin griihasthee sanbhaalane ke saath naukaree karanaa use pasand naheen thaa atah wo ghar men hee apane do bachchon men wyast rahatee thee

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sushamaa bhee kahaan chup rahane waalee thee, bol padee-

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“geetaa bahan, kewal tum hee is chakrawaat men naheen phansee ho, hamaaree sthiti bhee tumase behatar naheen hai suman(bahoo)kaa naukaree n karanaa bhee hamaaree chaatee par moong dalane jaisaa hai pooree tarah kaam wasoolee ke baawajood rasoee apanee pasand kee aur apanee samay-suwidhaa ke anusaar hee banaaegee bhalaa mirch masaalon aur tel men tar sabjiyaan khaanaa kyaa is umr men hamaare anukool hai? daal banegee to sirph arahar kee, pyaar se saath men kuch inake lie banaane ko kah doon to jalee-katee bhee mujhe hee sunanee pade, banaane lagoon to adhik kharch hone kaa raag alaapane lage aur yah sab mardon kee peeth peeche hee hotaa hai, sabake saamane to jubaan par chaashanee chipakee rahatee hai tum bahan kasht jhelakar hee sahee, khaanaa to apanee pasand se hee sab banawaatee ho n! ek shaanti kee hee shaanti se zindagee kat rahee hai magar wo akelee hai, ek baar buraaee mol lee par sukh se apanee man marzee kaa to banaatee khaatee aur rahatee hai!!” kahate hue sushamaa ne shaanti par nazaren tikaa deen

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sushamaa aur geetaa kee baaten sunakar shaanti ne muskuraakar kahaa-

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“yah sach hai bahanon, lekin mere haalaat se tum log waakiph naheen ho shaayad tum yah naheen jaanateen ki main kamare, kalam aur kampyootar se kyon chipakee rahatee hoon, meraa shaant dikhane waalaa cheharaa andar kitane toofaan samete hue hai kyonki mainne man kee baat tum sabase kabhee saajhaa hee naheen kee chupachaap dard seene se lagaakar jeetee rahee hoon! kyonki main jaanatee hoon ki yah meree apanee pasand hai agar sannyaas n apanaayaa to waanaprasth hee mere lie antim wikalp hogaa jo main naheen chaahatee atah sab kuch kho dene se jo hai wahee behatar hai tum sab bhee apanee pasand se jeewan bitaane ko svatantr ho apane ghareloo maamalon men samaaj kee parawaa karane se to yahee haasil honaa hai

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aaj kee saas to sudhar chukee hai, magar usake achche hone kaa phaayadaa bahuen bakhoobee uthaa rahee hain

prabhaa bahan, ab tum bhee hamaaree kataar men shaamil hone waalee ho atah soch samajhakar hee kadam uthaanaa ab to saas par bahuen hee haawee ho rahee hain hamaaree wyathaa kee sunawaaee kaheen naheen hogee, kyonki puraane zamaane kee saasuon ne hamaare lie itane kaante bo die hain ki chunate-chunate sadee hee gujar jaaegee are, hamane to apanee saas ke atyaachaar dekh-dekh kar svayan se waadaa kiyaa thaa ki ham apanee bahoo ke saath aisaa wyawahaar haragiz naheen karenge, lekin yah to maaloom n thaa ki itanaa saphar tay karate-karate zamaanaa itanaa badal jaaegaa ki saas-warg ke lie ek taraph kuaan to doosaree taraph khaaee hee shesh rahegee haan, kuch puraane dharre kee saasuen aaj bhee bahuon par bhaaree padatee hain magar unakaa yah kriity unhen kaheen kaa naheen chodataa”

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prabhaa awachetan men hee sakhiyon kee baaton par chintan men doobee huee thee geetaa naukaree karane waalee bahoo se santusht naheen thee, sushamaa ghar par rahane waalee bahoo se aur shaanti sannyaas oढ़kar bhee santusht naheen thee wo apane wiwaah se pahale bhee apane aasapaas ke pariwaaron men alag-alag maahaul dekh chukee thee usane kaheen bhee saas-bahoo ko aapas men pyaar se rahate naheen dekhaa buढ़aape men saas yaa sasur akele rah jaate to bahuon dvaaraa aur adhik hee prataadit hote the saasuen bete par adhikaar kho dene ke dar se aur bahuen pati par ekaadhikaar kee chaahat se hee shaayad ek doosaree par haawee honaa chaahatee hongee yaanee bahuen praacheen kaal se hee sasuraal jaanaa man se sveekaar naheen kar sakeen yah to purush samaaj ne hee svaarthawash paramparaaon, sanskaaron aur farz kaa mulammaa chढ़aakar ladakiyon par saare niyam thop die aaj agar betiyon kee dabee huee aawaaz buland ho rahee hai to hamen yah pariwartan saharsh sveekaar karanaa chaahie isamen saas-bahoo donon ko svatantr jeewan jeene kee suwidhaa milegee bahoo-beton kee griihasthee men ulajhakar bujurg apanaa sukh-chain hee kho baithate hain

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achaanak pati ke tokane se wichaar-magn prabhaadewee kee band palaken khuleen aur wo chetan men aakar bol padee-

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‘aapane uchit nirnay liyaa hai jee, main aapake nirnay se pooree tarah sahamat aur santusht hoon”

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kramashah

भाग ४

उन तीनों सखियों में गीता बड़बोली थी। वो इधर उधर की बातों के अलावा चुटकुलों से भी सुषमा और शांति का मनोरंजन करती रहती थी। एक पुत्र और एक पुत्री की माँ गीता पुत्र के विवाह के बाद दो बच्चों की दादी भी बन चुकी थी, लेकिन बेटी, बेटे से 6 वर्ष छोटी थी और कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी। बहू बेटा दोनों जॉब करते थे, अतः उनके दफ्तर और बेटी के कॉलेज जाने के बाद दोनों बच्चों को संभालने  के साथ ही कामवाली से खाना बनवाने से लेकर अन्य सभी कार्य अपनी देखरेख में करवाना उसी की जवाबदारी थी।

सुषमा भी एक पुत्र और एक पुत्री की माँ थी। उसके बेटे के विवाह को एक वर्ष ही हुआ था और बेटी अभी 12 वीं में ही पढ़ रही थी। बहू पढ़ी लिखी थी, लेकिन गृहस्थी संभालने के साथ नौकरी करना उसे पसंद नहीं था अतः वो घर में ही अपने दो बच्चों में व्यस्त रहती थी।

इकलौते पुत्र की माँ शांति एक लेखिका थी।  पति की असमय मृत्यु हो जाने से बेटे  के जॉब के कारण गाँव छोड़कर बेटे बहू के साथ ही रहने शहर चली आई थी।उनके विवाह को दो वर्ष ही हुए थे और अब तक कोई संतान नहीं थी।

चारों सखियों में एक समानता यह थी कि वे सुबह शीघ्र उठकर अनिवार्य रूप से प्रातः भ्रमण को एक साथ निकलती थीं और आधे घंटे तक अपनी-अपनी गति के अनुसार घूमने के बाद हाँफती हुईं इशारों में शाम को मिलने के वादे के साथ एक दूसरे से विदा लेकर अपने अपने फ़्लैट की लिफ्ट पकड़ लेती थीं.

शाम के सात बजे दिन भर की कवायद के बाद फिर वे वहीँ बगीचे में एक साथ बैठकर इधर उधर की चर्चा, हँसी-मजाक के साथ ९ बजे तक समय बिताकर रात्रि-भोजन के लिए वापस चली जाती थीं. ये दो घंटे उनके अपने होते थे. गीता की बहू और बेटा ऑफिस से आ गए होते थे और सुषमा की बहू भोजन बनाने में व्यस्त हो जाती थी. प्रभादेवी भी शाम का भोजन जल्दी बना लेती थी. तीनों के पतिदेव भी अपने दोस्तों के साथ टहलने निकल जाते थे. और शांति, जो अपने नाम के अनुरूप स्वभाव से भी शांत थी. वो बहू के होते हुए भी अपने सारे कार्य स्वयं करती थी और इस समय अपने लिए भोजन बनाकर ही नीचे उतरती थी.

एक तरह से देखा जाए तो चारों अपने-अपने परिवार के साथ संतुष्ट जीवन बिता रही थीं मगर ऐसा नहीं था. जहाँ सास-बहू एक ही छत के नीचे हों वहाँ रसोई के बर्तन बिना बजे कैसे रह सकते हैं...! तो प्रभा को छोड़कर तीनों गाहे-बगाहे अपनी-अपनी शिकायत-पोटली खोलकर अपना दुःख-दर्द साझा कर लेती थीं.

इन सखियों का साथ काफी पुराना था. प्रभा पहले तो उनकी इस चर्चा में विशेष रूचि नहीं दिखाती थी, लेकिन बेटे का रिश्ता तय होने के बाद वो उनकी बातें कान खोलकर सुनती और मन ही मन अपनी बहू के साथ बेहतर रिश्ता जोड़ने के विकल्प खोजती रहती थी. विवाह की तैयारियों की व्यस्तता के कारण वो काफी दिनों से शाम की चर्चा में शामिल नहीं हो सकी थी, मगर तीनों सखियाँ गहरी मित्रता होने से प्रभात का विवाह होने तक उसकी सहायता के लिए और सभी कार्यक्रमों में शामिल होने घर पर ही आ जाया करती थीं.

आज उसे उन सबकी कही-सुनी बातें याद आ रही थीं. गीता कह रही थी-

“भई, मैं तो अब सचमुच परेशान रहने लगी हूँ, एक तरफ तो अंकित (पुत्र) के पिता मुझे दिन भर गर्दभ-हम्माली करते हुए देखकर इस बात से खिन्न होने लगते हैं कि मैं अब उनसे विमुख होने लगी हूँ. अक्सर कहते हैं कि अगर रूपल बिटिया की जवाबदारी न होती तो सब कुछ छोड़कर शेष जीवन शांति से बिताने चले चलते हिमालय की तराइयों में, बेटा-बहू चाहे जैसे निर्वाह करें. पढ़ी-लिखी, कमाऊ पत्नी पाकर बेटा तो निहाल हो गया है मगर हमारा तो जैसे अस्तित्व ही समाप्त हो गया है. विरोधी स्वर निकालें तो असभ्य कहलाए जाएँ...मगर पहले यह सब सूझता कहाँ है...! अब तो ‘दिल जलता है तो जलने दे, आँसू न बहा, फरियाद न कर...!!’ वाली बात हो गई है.”

सुषमा भी कहाँ चुप रहने वाली थी, बोल पड़ी-

“गीता बहन, केवल तुम ही इस चक्रवात में नहीं फँसी हो, हमारी स्थिति भी तुमसे बेहतर नहीं है. सुमन(बहू)का नौकरी न करना भी हमारी छाती पर मूँग दलने जैसा है. पूरी तरह काम वसूली के बावजूद रसोई अपनी पसंद की और अपनी समय-सुविधा के अनुसार ही बनाएगी. भला मिर्च मसालों और तेल में तर सब्जियाँ खाना क्या इस उम्र में हमारे अनुकूल है...? दाल बनेगी तो सिर्फ अरहर की, प्यार से साथ में कुछ इनके लिए बनाने को कह दूँ तो जली-कटी भी मुझे ही सुननी पड़े, बनाने लगूँ तो अधिक खर्च होने का राग अलापने लगे और यह सब मर्दों की पीठ पीछे ही होता है, सबके सामने तो जुबान पर चाशनी चिपकी रहती है. तुम बहन कष्ट झेलकर ही सही, खाना तो अपनी पसंद से ही सब बनवाती हो न...! एक शांति की ही शांति से ज़िन्दगी कट रही है. मगर वो अकेली है, एक बार बुराई मोल ली पर सुख से अपनी मन मर्ज़ी का तो बनाती खाती और रहती है...!!” कहते हुए सुषमा ने शांति पर नज़रें टिका दीं.

सुषमा और गीता की बातें सुनकर शांति ने मुस्कुराकर कहा-

“यह सच है बहनों, लेकिन मेरे हालात से तुम लोग वाकिफ नहीं हो. शायद तुम यह नहीं जानतीं कि मैं कमरे, कलम और कम्प्यूटर से क्यों चिपकी रहती हूँ, मेरा शांत दिखने वाला चेहरा अन्दर कितने तूफ़ान समेटे हुए है... क्योंकि मैंने मन की बात तुम सबसे कभी साझा ही नहीं की. चुपचाप दर्द सीने से लगाकर जीती रही हूँ...! क्योंकि मैं जानती हूँ कि यह मेरी अपनी पसंद है. अगर संन्यास न अपनाया तो वानप्रस्थ ही मेरे लिए अंतिम विकल्प होगा जो मैं नहीं चाहती अतः सब कुछ खो देने से जो है वही बेहतर है. तुम सब भी अपनी पसंद से जीवन बिताने को स्वतंत्र हो... अपने घरेलू मामलों में समाज की परवा करने से तो यही हासिल होना है...

आज की सास तो सुधर चुकी है, मगर उसके अच्छे होने का फायदा बहुएँ बखूबी उठा रही हैं।

प्रभा बहन, अब तुम भी हमारी कतार में शामिल होने वाली हो अतः  सोच समझकर ही कदम उठाना। अब तो सास पर बहुएँ ही हावी हो रही हैं। हमारी व्यथा की सुनवाई कहीं नहीं होगी, क्योंकि पुराने ज़माने की सासुओं ने हमारे लिए इतने कांटे बो दिए हैं कि चुनते-चुनते सदी ही गुजर जाएगी। अरे, हमने तो अपनी सास के अत्याचार देख-देख कर स्वयं से वादा किया था कि हम अपनी बहू के साथ ऐसा व्यवहार हरगिज़ नहीं करेंगे, लेकिन यह तो मालूम न था कि इतना सफर तय करते-करते ज़माना इतना बदल जाएगा कि सास-वर्ग के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई ही शेष रहेगी. हाँ, कुछ पुराने ढर्रे की सासुएँ आज भी बहुओं पर भारी पड़ती हैं मगर उनका यह कृत्य उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता.”

प्रभा अवचेतन में ही सखियों की बातों पर चिंतन में डूबी हुई थी. गीता नौकरी करने वाली बहू से संतुष्ट नहीं थी, सुषमा घर पर रहने वाली बहू से और शांति संन्यास ओढ़कर भी संतुष्ट नहीं थी. वो अपने विवाह से पहले भी अपने आसपास के परिवारों में अलग-अलग माहौल देख चुकी थी. उसने कहीं भी सास-बहू को आपस में प्यार से रहते नहीं देखा. बुढ़ापे में सास या ससुर अकेले रह जाते तो बहुओं द्वारा और अधिक ही प्रताड़ित होते थे. सासुएँ बेटे पर अधिकार खो देने के डर से और बहुएँ पति पर एकाधिकार की चाहत से ही शायद एक दूसरी पर हावी होना चाहती होंगी. यानी बहुएँ प्राचीन काल से ही ससुराल जाना मन से स्वीकार नहीं कर सकीं. यह तो पुरुष समाज ने ही स्वार्थवश परम्पराओं, संस्कारों और फ़र्ज़ का मुलम्मा चढ़ाकर लड़कियों पर सारे नियम थोप दिए. आज अगर बेटियों की दबी हुई आवाज़ बुलंद हो रही है तो हमें यह परिवर्तन सहर्ष स्वीकार करना चाहिए. इसमें सास-बहू दोनों को स्वतंत्र जीवन जीने की सुविधा मिलेगी. बहू-बेटों की गृहस्थी में उलझकर  बुजुर्ग अपना सुख-चैन ही खो बैठते हैं.

अचानक पति के टोकने से विचार-मग्न प्रभादेवी की बंद पलकें खुलीं और वो चेतन में आकर बोल पड़ी-

‘आपने उचित निर्णय लिया है जी, मैं आपके निर्णय से पूरी तरह सहमत और संतुष्ट हूँ.”

क्रमशः...

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗