कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०२ / ११४ № 102 of 114 रचना १०२ / ११४
२१ अक्तूबर २०२० 21 October 2020 २१ अक्तूबर २०२०

ससुराल नहीं जाऊंगी- 5 sasuraal naheen jaaoongee- 5 ससुराल नहीं जाऊंगी- 5

चाय नाश्ते के साथ ही चर्चा पर विराम लग गया और सभी अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त होने लगे. शुभदा के अपने कमरे में जाते ही प्रभात ने उसे बाँहों के घेरे में कसते हुए पूछ लिया-

“शुभि डियर, यह पग फेरे के लिए मायके जाना क्या आवश्यक है?”

“बिलकुल जनाब! परम्पराएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर होती हैं और विवाह पूर्व अथवा पश्चात् संपन्न होने वाली सारी रस्में महत्वपूर्ण ही होती हैं...आपको कोई आपत्ति है...?” शुभदा ने इठलाते हुए प्रति प्रश्न किया.

“बेशक मुझे आपत्ति है...और क्यों न हो, अभी चार दिन भी विवाह को नहीं हुए और तुम मायके चली जाओ, यह मुझे स्वीकार नहीं...जब तुमने विवाह बाद लड़कियों के ससुराल जाने वाली एक विशिष्ट पुरानी परंपरा के विरुद्ध जंग छेड़ने का आह्वान किया है तो इस परंपरा का पालन किसलिए किया जा रहा है? क्यों नहीं नव-विवाहित जोड़े को तुरंत अलग करने की इस दिल जलाने वाली परंपरा को भी जलावतन कर दिया जाए...?”

“देखिये जी, ये परम्पराएँ ही हमारे देश को एक विशिष्ट पहचान देती हैं. जैसे मैंने ससुराल आकर विवाह के बाद होने वाली सारी रस्मों का विधिवत पालन किया है, वैसे ही यह पग फेरे की परंपरा दामाद को ससुराल बुलाकर स्वागत सत्कार के साथ सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के लिए निभाई जाती है. इन प्यारी परम्पराओं से ही नवविवाहित जोड़े का जीवन सरस बना रहता है, समझे...और फिर मैं कहाँ आपसे दूर जाना चाहती हूँ, रस्म तो दो दिन में भी पूरी हो सकती है, आप जल्दी ही लेने आ जाना, फिर हमारी छुट्टियाँ भी तो सीमित हैं न... अब मुझे जाने की तैयारी करने दीजिये.” कहते हुए शुभदा ने प्रभात की बाँहों से मुक्त होने का प्रयास किया.

अगले दिन शनिवार को शुभदा के पिताजी वहाँ पहुँच गए. शुभदा और प्रभात ने तो कार्यालय से एक महीने की छुट्टियाँ ली हुई थीं, सप्ताहांत आ जाने से वर्मा जी छुट्टियाँ पूर्ण हुईं होते हुए भी घर पर ही थे. सबने मिलकर सिन्हा जी का ज़ोरदार स्वागत किया. शुभदा भी बैठक में ही सबके साथ चर्चा में हिस्सा लेती रही. सब कुछ सामान्य और बेटी को प्रसन्न देखकर सिन्हा जी बहुत प्रसन्न हुए. चर्चा के दौरान शुभदा के जॉब पर भी बातचीत हुई। शुभदा ने बताया कि अभी तो उसने एक महीने की छुट्टी ले रखी है मगर उसका कार्यालय यहाँ से काफी दूर हो जाएगा। वो चाहती है कि उनका निवास ऐसे इलाके में हो जहाँ से प्रभात और उसके आने जाने की सुविधा के अलावा दोनों के परिवारों से भी निकटता बनी रहे।

वर्मा जी ने कुछ विचार करके कहा-

“मेरी एक राय है बेटी, तुमने महिलाओं की जिस समस्या को सुलझाने का संकल्प लिया है, उसके लिए अगर तुम चाहो तो पारिवारिक अदालत में,  जहाँ मेरी भी नियुक्ति है, काउंसलर के जॉब के लिए आवेदन दे सकती हो। स्नातक तो हो ही, बाकी आवश्यक ट्रेनिंग के अलावा कुछ विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ेगी। अभी तक महिलाओं की काउंसलिंग के लिए पुलिस महकमे से ही महिला पुलिस कर्मी को बुलाया जाता रहा है, मगर अब इस पद के लिए महिलाओं से आवेदन मँगाए जा रहे हैं। तुम्हें मेरा पूर्ण सहयोग और मार्गदर्शन तो मिलेगा ही,  आने-जाने की समस्या भी नहीं आएगी क्योंकि अदालत का रास्ता दोनों परिवारों के इलाकों से समान दूरी पर स्थित है। तुम अपना बसेरा कहीं भी बसा सकते हो”।

ससुर जी की बात से शुभदा को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई,  मगर उसने कहा कि वो इस मुद्दे पर अच्छी तरह विचार करके ही निर्णय लेना चाहेगी.

वो दिन हर्षोल्लास के साथ व्यतीत हो गया. रात में प्रभात के साथ भी उसकी नौकरी के विषय पर चर्चा होती रही.

शुभदा अपना कोई भी निर्णय प्रभात की राय और सहमति से ही लेना चाहती थी. उसका मानना था कि इस तरह पति-पत्नी के बीच एक दूसरे के प्रति सम्मान और अपनेपन की भावना प्रबल होती है. प्रभात ने अपने पिता की सूझबूझ की दाद देते हुए शुभदा को उनकी राय पर अमल करके आगे बढ़ने की सहर्ष शुभकामनाएँ दीं.

शुभदा तो इतने परिष्कृत विचारों वाले परिवार से रिश्ता जुड़ने पर गर्व से फूली नहीं समा रही थी. उसकी शेष रात प्रभात की बाँहों में अपना सुहाना सफ़र करती रही.

अगले दिन विदा होने से पहले उसने सास-ससुर को प्रणाम करके ससुर जी से कहा कि उसने उनकी सलाह के मुताबिक  नये जॉब के लिए मन बना लिया है और यहाँ से जाते ही अपने कार्यालय में इस्तीफा दे देगी. प्रभा देवी और वर्मा जी ने उसे अपना पूरा ध्यान रखने की हिदायत के साथ आशीर्वाद देकर विदा किया.

घर पहुँचने पर माँ ने उसका पूर्ण हर्षोल्लास से स्वागत किया और बाँहों में भरकर बलाएँ लेती रही.

आज उसने शुभदा की पसंद का ही खाना बनाया था.

भोजन आदि से निवृत्त होकर प्रतिभा देवी शुभदा से ससुराल के सदस्यों के व्यवहार के बारे में पूछने लगी. शुभदा ने प्रसन्नता पूर्वक सब कुछ अच्छा होने की बात कही और अपनी सखियों को फोन लगाकर अपने आने की सूचना के साथ ही शाम की चाय पर आमंत्रित कर लिया. जब शुभदा ने दो दिन में ही वापस जाने की बात बताई तो -

मुँहलगी सखी चित्रा बोल पड़ी-

“ऐसा कैसे हो सकता है शुभि,  हमें तो जीजू से मिलना है, जब दोनों की छुट्टियाँ भी हैं तो हम इतनी जल्दी थोड़े ही जाने देंगी”।

चित्रा के समर्थन में नीला, रश्मि और निशा भी  सुर मिलाते हुए कहने लगीं-

“हाँ हाँ, हमें जीजू से तो मिलना ही है..."

शुभदा बोली-

“ ठीक है बाबा, प्रभात को आने तो दो, कल फिर से आ जाना यहाँ  हल्ला करने...”

“वो तो हम बिना बुलाए भी आ जातीं,  हमें चाचीजी ने कल ही बताया कि तुमने किस शर्त पर विवाह किया है... अब ज़रा वहाँ के किस्से तो सुनाओ...जीजू ने सुनकर क्या प्रतिक्रिया दी...? चित्रा ने उतावलेपन से पूछा.”

“अरे मेरे वकील ससुर जी के तर्कों के आगे तुम्हारे जीजू की क्या दाल गलती...उन्हें मानना ही पड़ा और सासुमाँ तो उनकी अर्द्धांगिनी होने पर गर्व जताते हुए उनके निर्णय का स्वागत किया...इतराते हुए शुभदा बोली.”

“अब तो ऐश हैं तुम्हारे,  ससुराल के डर से मेरा तो विवाह करने का मन ही नहीं हो रहा...” उनकी बातों से उदास होते हुए नीला ने कहा.”

“दुखी मत हो नीलू, मैंने तो इस कुप्रथा को क़त्ल करने का सरेआम संकल्प लिया है और अब अपनी नौकरी छोड़कर पारिवारिक न्यायलय में काउंसलर के पद के लिए अर्जी भेजनी है. यह निर्णय मैंने आदरणीय ससुर जी की सलाह देने पर लिया है. बस तुमको कुछ समय इंतज़ार करना पड़ेगा.”

“मगर मेरी तो सगाई हो चुकी है, फिर ससुराल तो जाना ही पड़ेगा न...” नीला ने बुझे हुए स्वर में कहा

“कोई बात नहीं नीलू, ख़ुशी से अपना नया जीवन आरम्भ करना, अगर कोई समस्या आए तो मेरे पास चली आना...शुभदा ने उसका मनोबल बढ़ाते हुए कहा.”

देर तक सखियों की हँसी-ठिठोली और छेड़छाड़ चलती रही. शुभदा का दिन तो आसानी से व्यतीत हो गया मगर रात में प्रभात उसके दिलो दिमाग पर छाने लगा. वो बड़ी बेसब्री से उसका फोन आने का इंतजार करती रही मगर देर तक जब उसका फोन नहीं आया तो स्वयं काल करने के लिए नंबर लगाया. प्रभात ने फोन तुरंत उठा लिया और कहा कि वो उसके ही फोन आने का इंतजार कर रहा था, ताकि वो जी भरकर सबसे दिल खोलकर बातचीत कर सके. फिर आधी रात तक उनके बीच  प्यार भरी अंतरंग बातचीत होती रही और कब आँख लगी यह उन्हें अहसास ही नहीं हुआ.

दो दिन बाद प्रभात उसे लेने भी आ गया. सास-ससुर के अपार स्नेह और आदर सत्कार से वो बहुत प्रभावित हुआ.

रात के एकांत में शुभदा ने सखियों से हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा उसे सुनाते हुए बताया कि अगला दिन तो उन सबके लिए रिज़र्व है फिर एक दो दिन घूमने फिरने में निकल जाएँगे, उसके बाद ही वापसी पर विचार करेंगे.

शुभदा की सहेलियों से मिलने की बात पर प्रभात को आत्मिक सुख मिला. सोचा कि शुभदा सही कह रही थी कि कुछ प्रथाएँ इतनी प्यारी होती हैं कि उनसे पीछा छुड़ाने के बजाय गले लगाने का मन करता है. अगर पग-फेरे की रस्म नहीं होती तो यह सुख नसीब ही न होता.

अगला दिन शुभदा की सखियों से परिचय और चुहलबाजी में बीता, उसके बाद दो दिन घूमने फिरने में बीत गए.

चौथे दिन सास-ससुर के आशीर्वाद स्वरूप मिले ढेर सारे उपहारों के साथ ससुराल की सुखद स्मृति संजोए प्रभात  शुभदा के साथ घर वापसी के लिए निकल पड़ा।

कहानी जारी रहेगी

आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।

5

·

chaay naashte ke saath hee charchaa par wiraam lag gayaa aur sabhee apanee apanee dinacharyaa men wyast hone lage shubhadaa ke apane kamare men jaate hee prabhaat ne use baanhon ke ghere men kasate hue pooch liyaa-

·

“shubhi diyar, yah pag phere ke lie maayake jaanaa kyaa aawashyak hai?”

·

“bilakul janaab! paramparaaen hamaaree saanskriitik dharohar hotee hain aur wiwaah poorv athawaa pashchaat sanpann hone waalee saaree rasmen mahatvapoorn hee hotee hainaapako koee aapatti hai?” shubhadaa ne ithalaate hue prati prashn kiyaa

·

“beshak mujhe aapatti haiaur kyon n ho, abhee chaar din bhee wiwaah ko naheen hue aur tum maayake chalee jaao, yah mujhe sveekaar naheenjab tumane wiwaah baad ladakiyon ke sasuraal jaane waalee ek wishisht puraanee paranparaa ke wiruddh jang chedane kaa aahvaan kiyaa hai to is paranparaa kaa paalan kisalie kiyaa jaa rahaa hai? kyon naheen naw-wiwaahit jode ko turant alag karane kee is dil jalaane waalee paranparaa ko bhee jalaawatan kar diyaa jaae?”

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“dekhiye jee, ye paramparaaen hee hamaare desh ko ek wishisht pahachaan detee hain jaise mainne sasuraal aakar wiwaah ke baad hone waalee saaree rasmon kaa widhiwat paalan kiyaa hai, waise hee yah pag phere kee paranparaa daamaad ko sasuraal bulaakar svaagat satkaar ke saath sambandh pragaaढ़ karane ke lie nibhaaee jaatee hai in pyaaree paramparaaon se hee nawaviwaahit jode kaa jeewan saras banaa rahataa hai, samajheaur phir main kahaan aapase door jaanaa chaahatee hoon, rasm to do din men bhee pooree ho sakatee hai, aap jaldee hee lene aa jaanaa, phir hamaaree chuttiyaan bhee to seemit hain n ab mujhe jaane kee taiyaaree karane deejiye” kahate hue shubhadaa ne prabhaat kee baanhon se mukt hone kaa prayaas kiyaa

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agale din shaniwaar ko shubhadaa ke pitaajee wahaan pahunch gae shubhadaa aur prabhaat ne to kaaryaalay se ek maheene kee chuttiyaan lee huee theen, saptaahaant aa jaane se warmaa jee chuttiyaan poorn hueen hote hue bhee ghar par hee the sabane milakar sinhaa jee kaa zoradaar svaagat kiyaa shubhadaa bhee baithak men hee sabake saath charchaa men hissaa letee rahee sab kuch saamaany aur betee ko prasann dekhakar sinhaa jee bahut prasann hue charchaa ke dauraan shubhadaa ke jॉb par bhee baatacheet huee shubhadaa ne bataayaa ki abhee to usane ek maheene kee chuttee le rakhee hai magar usakaa kaaryaalay yahaan se kaaphee door ho jaaegaa wo chaahatee hai ki unakaa niwaas aise ilaake men ho jahaan se prabhaat aur usake aane jaane kee suwidhaa ke alaawaa donon ke pariwaaron se bhee nikatataa banee rahe

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“meree ek raay hai betee, tumane mahilaaon kee jis samasyaa ko sulajhaane kaa sankalp liyaa hai, usake lie agar tum chaaho to paariwaarik adaalat men, jahaan meree bhee niyukti hai, kaaunsalar ke jॉb ke lie aawedan de sakatee ho snaatak to ho hee, baakee aawashyak trening ke alaawaa kuch wishesh taiyaaree naheen karanee padegee abhee tak mahilaaon kee kaaunsaling ke lie pulis mahakame se hee mahilaa pulis karmee ko bulaayaa jaataa rahaa hai, magar ab is pad ke lie mahilaaon se aawedan mangaae jaa rahe hain tumhen meraa poorn sahayog aur maargadarshan to milegaa hee, aane-jaane kee samasyaa bhee naheen aaegee kyonki adaalat kaa raastaa donon pariwaaron ke ilaakon se samaan dooree par sthit hai tum apanaa baseraa kaheen bhee basaa sakate ho”

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sasur jee kee baat se shubhadaa ko to jaise manachaahee muraad mil gaee, magar usane kahaa ki wo is mudde par achchee tarah wichaar karake hee nirnay lenaa chaahegee

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wo din harshollaas ke saath wyateet ho gayaa raat men prabhaat ke saath bhee usakee naukaree ke wishay par charchaa hotee rahee

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shubhadaa to itane parishkriit wichaaron waale pariwaar se rishtaa judane par garv se phoolee naheen samaa rahee thee usakee shesh raat prabhaat kee baanhon men apanaa suhaanaa safar karatee rahee

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aaj usane shubhadaa kee pasand kaa hee khaanaa banaayaa thaa

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munhalagee sakhee chitraa bol padee-

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“aisaa kaise ho sakataa hai shubhi, hamen to jeejoo se milanaa hai, jab donon kee chuttiyaan bhee hain to ham itanee jaldee thode hee jaane dengee”

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chitraa ke samarthan men neelaa, rashmi aur nishaa bhee sur milaate hue kahane lageen-

“haan haan, hamen jeejoo se to milanaa hee hai"

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shubhadaa bolee-

“ theek hai baabaa, prabhaat ko aane to do, kal phir se aa jaanaa yahaan hallaa karane”

“wo to ham binaa bulaae bhee aa jaateen, hamen chaacheejee ne kal hee bataayaa ki tumane kis shart par wiwaah kiyaa hai ab zaraa wahaan ke kisse to sunaaojeejoo ne sunakar kyaa pratikriyaa dee? chitraa ne utaawalepan se poochaa”

“are mere wakeel sasur jee ke tarkon ke aage tumhaare jeejoo kee kyaa daal galateeunhen maananaa hee padaa aur saasumaan to unakee arddhaanginee hone par garv jataate hue unake nirnay kaa svaagat kiyaaitaraate hue shubhadaa bolee”

“ab to aish hain tumhaare, sasuraal ke dar se meraa to wiwaah karane kaa man hee naheen ho rahaa” unakee baaton se udaas hote hue neelaa ne kahaa”

“dukhee mat ho neeloo, mainne to is kuprathaa ko qatl karane kaa sareaam sankalp liyaa hai aur ab apanee naukaree chodakar paariwaarik nyaayalay men kaaunsalar ke pad ke lie arjee bhejanee hai yah nirnay mainne aadaraneey sasur jee kee salaah dene par liyaa hai bas tumako kuch samay intazaar karanaa padegaa”

“magar meree to sagaaee ho chukee hai, phir sasuraal to jaanaa hee padegaa n” neelaa ne bujhe hue svar men kahaa

“koee baat naheen neeloo, kushee se apanaa nayaa jeewan aarambh karanaa, agar koee samasyaa aae to mere paas chalee aanaashhubhadaa ne usakaa manobal bढ़aate hue kahaa”

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der tak sakhiyon kee hansee-thitholee aur chedachaad chalatee rahee shubhadaa kaa din to aasaanee se wyateet ho gayaa magar raat men prabhaat usake dilo dimaag par chaane lagaa wo badee besabree se usakaa phon aane kaa intajaar karatee rahee magar der tak jab usakaa phon naheen aayaa to svayan kaal karane ke lie nanbar lagaayaa prabhaat ne phon turant uthaa liyaa aur kahaa ki wo usake hee phon aane kaa intajaar kar rahaa thaa, taaki wo jee bharakar sabase dil kholakar baatacheet kar sake phir aadhee raat tak unake beech pyaar bharee antarang baatacheet hotee rahee aur kab aankh lagee yah unhen ahasaas hee naheen huaa

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do din baad prabhaat use lene bhee aa gayaa saas-sasur ke apaar sneh aur aadar satkaar se wo bahut prabhaawit huaa

raat ke ekaant men shubhadaa ne sakhiyon se huee baatacheet kaa pooraa byauraa use sunaate hue bataayaa ki agalaa din to un sabake lie rizarv hai phir ek do din ghoomane phirane men nikal jaaenge, usake baad hee waapasee par wichaar karenge

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shubhadaa kee saheliyon se milane kee baat par prabhaat ko aatmik sukh milaa sochaa ki shubhadaa sahee kah rahee thee ki kuch prathaaen itanee pyaaree hotee hain ki unase peechaa chudaane ke bajaay gale lagaane kaa man karataa hai agar pag-phere kee rasm naheen hotee to yah sukh naseeb hee n hotaa

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agalaa din shubhadaa kee sakhiyon se parichay aur chuhalabaajee men beetaa, usake baad do din ghoomane phirane men beet gae

chauthe din saas-sasur ke aasheervaad svaroop mile dher saare upahaaron ke saath sasuraal kee sukhad smriiti sanjoe prabhaat shubhadaa ke saath ghar waapasee ke lie nikal padaa

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kahaanee jaaree rahegee

aapakee pratikriyaaon kaa intajaar rahegaa

चाय नाश्ते के साथ ही चर्चा पर विराम लग गया और सभी अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त होने लगे. शुभदा के अपने कमरे में जाते ही प्रभात ने उसे बाँहों के घेरे में कसते हुए पूछ लिया-

“शुभि डियर, यह पग फेरे के लिए मायके जाना क्या आवश्यक है?”

“बिलकुल जनाब! परम्पराएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर होती हैं और विवाह पूर्व अथवा पश्चात् संपन्न होने वाली सारी रस्में महत्वपूर्ण ही होती हैं...आपको कोई आपत्ति है...?” शुभदा ने इठलाते हुए प्रति प्रश्न किया.

“बेशक मुझे आपत्ति है...और क्यों न हो, अभी चार दिन भी विवाह को नहीं हुए और तुम मायके चली जाओ, यह मुझे स्वीकार नहीं...जब तुमने विवाह बाद लड़कियों के ससुराल जाने वाली एक विशिष्ट पुरानी परंपरा के विरुद्ध जंग छेड़ने का आह्वान किया है तो इस परंपरा का पालन किसलिए किया जा रहा है? क्यों नहीं नव-विवाहित जोड़े को तुरंत अलग करने की इस दिल जलाने वाली परंपरा को भी जलावतन कर दिया जाए...?”

“देखिये जी, ये परम्पराएँ ही हमारे देश को एक विशिष्ट पहचान देती हैं. जैसे मैंने ससुराल आकर विवाह के बाद होने वाली सारी रस्मों का विधिवत पालन किया है, वैसे ही यह पग फेरे की परंपरा दामाद को ससुराल बुलाकर स्वागत सत्कार के साथ सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के लिए निभाई जाती है. इन प्यारी परम्पराओं से ही नवविवाहित जोड़े का जीवन सरस बना रहता है, समझे...और फिर मैं कहाँ आपसे दूर जाना चाहती हूँ, रस्म तो दो दिन में भी पूरी हो सकती है, आप जल्दी ही लेने आ जाना, फिर हमारी छुट्टियाँ भी तो सीमित हैं न... अब मुझे जाने की तैयारी करने दीजिये.” कहते हुए शुभदा ने प्रभात की बाँहों से मुक्त होने का प्रयास किया.

अगले दिन शनिवार को शुभदा के पिताजी वहाँ पहुँच गए. शुभदा और प्रभात ने तो कार्यालय से एक महीने की छुट्टियाँ ली हुई थीं, सप्ताहांत आ जाने से वर्मा जी छुट्टियाँ पूर्ण हुईं होते हुए भी घर पर ही थे. सबने मिलकर सिन्हा जी का ज़ोरदार स्वागत किया. शुभदा भी बैठक में ही सबके साथ चर्चा में हिस्सा लेती रही. सब कुछ सामान्य और बेटी को प्रसन्न देखकर सिन्हा जी बहुत प्रसन्न हुए. चर्चा के दौरान शुभदा के जॉब पर भी बातचीत हुई। शुभदा ने बताया कि अभी तो उसने एक महीने की छुट्टी ले रखी है मगर उसका कार्यालय यहाँ से काफी दूर हो जाएगा। वो चाहती है कि उनका निवास ऐसे इलाके में हो जहाँ से प्रभात और उसके आने जाने की सुविधा के अलावा दोनों के परिवारों से भी निकटता बनी रहे।

वर्मा जी ने कुछ विचार करके कहा-

“मेरी एक राय है बेटी, तुमने महिलाओं की जिस समस्या को सुलझाने का संकल्प लिया है, उसके लिए अगर तुम चाहो तो पारिवारिक अदालत में,  जहाँ मेरी भी नियुक्ति है, काउंसलर के जॉब के लिए आवेदन दे सकती हो। स्नातक तो हो ही, बाकी आवश्यक ट्रेनिंग के अलावा कुछ विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ेगी। अभी तक महिलाओं की काउंसलिंग के लिए पुलिस महकमे से ही महिला पुलिस कर्मी को बुलाया जाता रहा है, मगर अब इस पद के लिए महिलाओं से आवेदन मँगाए जा रहे हैं। तुम्हें मेरा पूर्ण सहयोग और मार्गदर्शन तो मिलेगा ही,  आने-जाने की समस्या भी नहीं आएगी क्योंकि अदालत का रास्ता दोनों परिवारों के इलाकों से समान दूरी पर स्थित है। तुम अपना बसेरा कहीं भी बसा सकते हो”।

ससुर जी की बात से शुभदा को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई,  मगर उसने कहा कि वो इस मुद्दे पर अच्छी तरह विचार करके ही निर्णय लेना चाहेगी.

वो दिन हर्षोल्लास के साथ व्यतीत हो गया. रात में प्रभात के साथ भी उसकी नौकरी के विषय पर चर्चा होती रही.

शुभदा अपना कोई भी निर्णय प्रभात की राय और सहमति से ही लेना चाहती थी. उसका मानना था कि इस तरह पति-पत्नी के बीच एक दूसरे के प्रति सम्मान और अपनेपन की भावना प्रबल होती है. प्रभात ने अपने पिता की सूझबूझ की दाद देते हुए शुभदा को उनकी राय पर अमल करके आगे बढ़ने की सहर्ष शुभकामनाएँ दीं.

शुभदा तो इतने परिष्कृत विचारों वाले परिवार से रिश्ता जुड़ने पर गर्व से फूली नहीं समा रही थी. उसकी शेष रात प्रभात की बाँहों में अपना सुहाना सफ़र करती रही.

अगले दिन विदा होने से पहले उसने सास-ससुर को प्रणाम करके ससुर जी से कहा कि उसने उनकी सलाह के मुताबिक  नये जॉब के लिए मन बना लिया है और यहाँ से जाते ही अपने कार्यालय में इस्तीफा दे देगी. प्रभा देवी और वर्मा जी ने उसे अपना पूरा ध्यान रखने की हिदायत के साथ आशीर्वाद देकर विदा किया.

घर पहुँचने पर माँ ने उसका पूर्ण हर्षोल्लास से स्वागत किया और बाँहों में भरकर बलाएँ लेती रही.

आज उसने शुभदा की पसंद का ही खाना बनाया था.

भोजन आदि से निवृत्त होकर प्रतिभा देवी शुभदा से ससुराल के सदस्यों के व्यवहार के बारे में पूछने लगी. शुभदा ने प्रसन्नता पूर्वक सब कुछ अच्छा होने की बात कही और अपनी सखियों को फोन लगाकर अपने आने की सूचना के साथ ही शाम की चाय पर आमंत्रित कर लिया. जब शुभदा ने दो दिन में ही वापस जाने की बात बताई तो -

मुँहलगी सखी चित्रा बोल पड़ी-

“ऐसा कैसे हो सकता है शुभि,  हमें तो जीजू से मिलना है, जब दोनों की छुट्टियाँ भी हैं तो हम इतनी जल्दी थोड़े ही जाने देंगी”।

चित्रा के समर्थन में नीला, रश्मि और निशा भी  सुर मिलाते हुए कहने लगीं-

“हाँ हाँ, हमें जीजू से तो मिलना ही है..."

शुभदा बोली-

“ ठीक है बाबा, प्रभात को आने तो दो, कल फिर से आ जाना यहाँ  हल्ला करने...”

“वो तो हम बिना बुलाए भी आ जातीं,  हमें चाचीजी ने कल ही बताया कि तुमने किस शर्त पर विवाह किया है... अब ज़रा वहाँ के किस्से तो सुनाओ...जीजू ने सुनकर क्या प्रतिक्रिया दी...? चित्रा ने उतावलेपन से पूछा.”

“अरे मेरे वकील ससुर जी के तर्कों के आगे तुम्हारे जीजू की क्या दाल गलती...उन्हें मानना ही पड़ा और सासुमाँ तो उनकी अर्द्धांगिनी होने पर गर्व जताते हुए उनके निर्णय का स्वागत किया...इतराते हुए शुभदा बोली.”

“अब तो ऐश हैं तुम्हारे,  ससुराल के डर से मेरा तो विवाह करने का मन ही नहीं हो रहा...” उनकी बातों से उदास होते हुए नीला ने कहा.”

“दुखी मत हो नीलू, मैंने तो इस कुप्रथा को क़त्ल करने का सरेआम संकल्प लिया है और अब अपनी नौकरी छोड़कर पारिवारिक न्यायलय में काउंसलर के पद के लिए अर्जी भेजनी है. यह निर्णय मैंने आदरणीय ससुर जी की सलाह देने पर लिया है. बस तुमको कुछ समय इंतज़ार करना पड़ेगा.”

“मगर मेरी तो सगाई हो चुकी है, फिर ससुराल तो जाना ही पड़ेगा न...” नीला ने बुझे हुए स्वर में कहा

“कोई बात नहीं नीलू, ख़ुशी से अपना नया जीवन आरम्भ करना, अगर कोई समस्या आए तो मेरे पास चली आना...शुभदा ने उसका मनोबल बढ़ाते हुए कहा.”

देर तक सखियों की हँसी-ठिठोली और छेड़छाड़ चलती रही. शुभदा का दिन तो आसानी से व्यतीत हो गया मगर रात में प्रभात उसके दिलो दिमाग पर छाने लगा. वो बड़ी बेसब्री से उसका फोन आने का इंतजार करती रही मगर देर तक जब उसका फोन नहीं आया तो स्वयं काल करने के लिए नंबर लगाया. प्रभात ने फोन तुरंत उठा लिया और कहा कि वो उसके ही फोन आने का इंतजार कर रहा था, ताकि वो जी भरकर सबसे दिल खोलकर बातचीत कर सके. फिर आधी रात तक उनके बीच  प्यार भरी अंतरंग बातचीत होती रही और कब आँख लगी यह उन्हें अहसास ही नहीं हुआ.

दो दिन बाद प्रभात उसे लेने भी आ गया. सास-ससुर के अपार स्नेह और आदर सत्कार से वो बहुत प्रभावित हुआ.

रात के एकांत में शुभदा ने सखियों से हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा उसे सुनाते हुए बताया कि अगला दिन तो उन सबके लिए रिज़र्व है फिर एक दो दिन घूमने फिरने में निकल जाएँगे, उसके बाद ही वापसी पर विचार करेंगे.

शुभदा की सहेलियों से मिलने की बात पर प्रभात को आत्मिक सुख मिला. सोचा कि शुभदा सही कह रही थी कि कुछ प्रथाएँ इतनी प्यारी होती हैं कि उनसे पीछा छुड़ाने के बजाय गले लगाने का मन करता है. अगर पग-फेरे की रस्म नहीं होती तो यह सुख नसीब ही न होता.

अगला दिन शुभदा की सखियों से परिचय और चुहलबाजी में बीता, उसके बाद दो दिन घूमने फिरने में बीत गए.

चौथे दिन सास-ससुर के आशीर्वाद स्वरूप मिले ढेर सारे उपहारों के साथ ससुराल की सुखद स्मृति संजोए प्रभात  शुभदा के साथ घर वापसी के लिए निकल पड़ा।

कहानी जारी रहेगी

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗