ससुराल नहीं जाऊँगी - 6 sasuraal naheen jaaoongee - 6 ससुराल नहीं जाऊँगी - 6
भाग 6
घर में प्रवेश करते ही एक अचंभे ने उनका स्वागत किया। वर्मा जी ने गोवा के दो टिकट होटल बुकिंग की डिटेल के कागजात के साथ प्रभात को सौंपते हुए कहा-
“बेटे, अब कुछ दिन आराम से बाहर एकांत में बिताकर आओ, फिर छुट्टियाँ समाप्त होने पर तो ज़िन्दगी के समर का सामना करना ही है। प्रभादेवी ने भी मुस्कुराकर शुभदा को शीघ्र तैयारी करने की हिदायत दी। प्रभात और शुभदा उनको प्रणाम करके सहर्ष नये सफर की तैयारी में जुट गए।
एक सप्ताह तक वे प्रसन्न मन भावी जीवन की चुनौतियों पर चर्चा के साथ मधुचंद्र मनाते रहे। वापस जाते ही उन्हें अपने निवास की व्यवस्था जो करनी थी...एक सप्ताह पूर्ण होने पर सुखद यादें अपने साथ संजोकर वापस उन्होंने मुंबई प्रस्थान किया.
सफ़र लम्बा नहीं था, दोनों ने अपने-अपने परिजनों को अपनी वापसी की सूचना दे दी थी लेकिन विमान से उतरकर हवाई अड्डे के परिसर में पहुँचते ही उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि उन दोनों के पिताश्री उन्हें लेने के लिए पहुँच गए थे। उन्होंने इस बात की तो कल्पना भी नहीं की थी क्योंकि वे स्वयं घर तक आने में सक्षम थे. यही नहीं, बाहर निकलकर उन्हें जब एक नई नवेली दुल्हन की तरह सजी धजी कार में बैठने को कहा गया तो एक और अचंभे का सामना करते हुए प्रभात बोल पड़ा-
“पिताजी, आप दोनों एक साथ... और यह नई गाड़ी?”
“घर चलकर आराम से बातें करते हैं बेटे...” गाड़ी में बैठने का इशारा करते हुए वर्मा जी ने कहा.
घर का हालचाल पूछते बतियाते वे घर भी पहुँच गए तो अंदर प्रवेश के साथ देखा कि शुभदा की माँ भी वहीं मौजूद है।
अब तो यह पहेली शुभदा और प्रभात की समझ में ही नहीं आ रही थी। शुभदा माँ से गले मिलकर उसे अपने कमरे में ले गई और प्रभात इधर-उधर घर की गहमा गहमी देखने लगा तो वर्मा जी ने उसकी जिज्ञासा देखकर उन्हें फ्रेश होकर बैठक में आने के लिए कह दिया.
उधर शुभदा माँ से पूछने लगी-
“यह अचानक आपका आना कैसे हुआ मम्मी...?”
लेकिन माँ के कुछ बोलने से पहले ही उसके प्रश्न का उत्तर पीछे से आया-
“शुभदा बेटी, तुम्हारे मम्मी-पापा को हमने ही आमंत्रित किया है. जल्दी तैयार होकर माँ के साथ बैठक में आ जाओ, वहीँ पर कल के लिए कार्यक्रम तय किया जाएगा."
कल के लिए कार्यक्रम...?फिर एक अचम्भा! प्रभादेवी की बात सुनकर शुभदा रोमांचित हो उठी. उसे यों लग रहा था जैसे किसी जादुई संदूक से अचम्भे एक के बाद एक निकलते जा रहे हों.
सबके बैठक में एकत्रित होते ही चाय-नाश्ते के साथ चर्चा शुरू हो गई. वर्मा जी ने प्रभात को संबोधित करके कहा-
“बेटे, यहाँ से नजदीकी इलाके में तुम दोनों की विदाई में उपहार स्वरूप देने के लिए दो बेडरूम, हाल, किचन वाला फ़्लैट फर्नीचर सहित और वो नई कार हम दोनों समधियों ने अपनी सामर्थ्यानुसार मिलकर खरीदे हैं और रसोई के आवश्यक सामान भी जुटा लिए गए हैं. आगे तुम दोनों अपनी इच्छानुसार फेर-बदल करते रहना... कल सुबह मुहूर्त के अनुसार हवन-पूजन का कार्यक्रम भी तय हो चुका है. इस अवसर पर हमने कुछ विशेष गणमान्य मित्रों को आमंत्रित किया है. तुम दोनों भी किसी अपनी मित्र मंडली से जिसे बुलाना चाहो, फोन पर सूचित कर सकते हो. तुम्हारी छुट्टियाँ समाप्त होने को हैं अतः सब कुछ जल्दी ही करना पड़ा.”
“मगर पिताजी आपने ऐसा क्यों किया, जब हम दोनों कमा रहे हैं तो आप दोनों को अपनी जमा पूँजी इस तरह खर्च नहीं करनी चाहिए थी. हम धीरे धीरे सब संभाल ही लेते.” प्रभात ने आश्चर्य चकित होते हुए कहा.
“देखो बेटे, तुम दोनों ही हमारी इकलौती संतान हो और हमारे बाद हमारी सम्पति के वारिस भी... विवाह का खर्च, वस्त्र-आभूषण आदि भी हमने साझा ही किया था. हमने संतान के प्रति अपना फ़र्ज़ ही तो पूरा किया है न...बच्चों से हम केवल यही अपेक्षा रखते हैं कि वे रिश्तों में मिठास, नजदीकी और अपनापन बनाए रखें और सुख-दुःख साझा करते रहें. निवास अलग हुए तो क्या, दिल अलग नहीं होने चाहियें और हम जानते हैं कि नई पीढ़ी समझदार है, अपने संस्कार नहीं भूल सकती। तुम दोनों थके हुए हो, आज आराम कर लो. व्यवस्थाओं पर हमारी नज़र रहेगी.”
अगले दिन गृह-प्रवेश का सारा कार्यक्रम प्रसन्न वातावरण में संपन्न हो गया. वर्मा जी की जान पहचान उच्च वर्ग तक थी, कार्यक्रम में वकील, जज, राजनेता और विधायक आदि भी शामिल हुए थे. जहाँ वे सब उनके मुँह से नव-विवाहित बेटे-बहू को उसी शहर में अन्यत्र एक साथ विदा करने के कारण का विस्तृत विवरण सुनकर उनके इस निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा करके दिल खोलकर इस पथ का अनुसरण करने का संकल्प कर रहे थे वहीँ प्रभात के युवा मित्र भी उसके सब्र के साथ पिता का साथ देने के कायल हो रहे थे. उसके एक युवा पत्रकार मित्र ने तो उससे अनुमति लेकर सारे कार्यक्रम का वीडियो भी बना लिया और अगले दिन इस आदर्श परिवार की समूची दास्तान वीडियो सहित एक प्रसिद्ध अख़बार की सुर्ख़ियों में थी.
अगले दिन शुभदा के माँ-पिता से फोन अथवा वीडियो काल पर संपर्क बनाए रखने का वादा लेकर प्रभात और शुभदा उनको अपनी कार में सम्मानपूर्वक घर तक पहुँचाकर नई चुनौतियों का सामना करने को नए घर में आ गए.
गृह प्रवेश के सबसे पहले प्रभात ने सुंदर से नामपट पर "शुभप्रभात" उकेरवाकर घर के मुख्य द्वार पर फिक्स करवा दिया फिर ज़िन्दगी की गाड़ी को पटरी पर लाने के प्रयास में जुट गए।
प्रभात ने कार्यालय जाना आरम्भ कर दिया। वर्मा जी के प्रयास से शुभदा का भी जिला कोर्ट से काउंसलर के जॉब का आवेदन स्वीकृत हो गया था और वो भी
अब नियमित कार्यालय जाने लगी। प्रभात और उसके कार्यालय जाने का समय एक होने से प्रभात कार से पहले उसे उसके कार्यस्थल पर छोड़ देता फिर वापसी में भी साथ ले लेता था। उसके पास अब पारिवरिक केस भी सुलझाने के लिए आने लगे थे। इसके साथ उसे ६ महीने तक ट्रेनिंग स्वरूप जिन पिछड़े इलाकों के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले परिवारों से घरेलू हिंसा की शिकायतें दर्ज होती थीं, उन इलाकों में शिकायत कर्ताओं के घरों में जाकर वहाँ के वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार समझाइश देकर पुनः निरीक्षण के बाद परिणाम की फ़ाइल बनाते रहना था और अंत में सभी मामलों की फ़ाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी. दौरे के लिए उसे सरकारी गाड़ी, ड्राइवर के अतिरिक्त सहायता के लिए एक महिला कांस्टेबल के भी साथ जाने की उसे सुविधा दी गई थी. इस तरह वो दौरों के नए दौर में ढलती चली गई.
सप्ताहांत में कभी शुभदा के माँ पिता तो कभी प्रभात के आकर उनकी हौसला अफजाई करते रहते थे ताकि दिलों से दिल जुड़े रहें। प्रभादेवी ने प्रभात की जवाबदारी से मुक्त होकर अपने स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए प्रातः भ्रमण का समय बढ़ा दिया था साथ ही योग कक्षाओं में भी जाने लगी थीं। उनकी सहेलियाँ भी उन्हें प्रसन्न और स्वस्थ देखकर उसकी आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करने में पीछे नहीं रहती थीं बल्कि वे भी उनके समान बच्चों की गृहस्थी से आज़ाद होने की इच्छा करने लगी थीं।
क्रमशः....
*****
प्रिय पाठकों
नमस्कार
स्वास्थ्य गड़बड़ होने के कारण यह भाग प्रकाशित करने में विलंब हुआ, इसके लिए दिली खेद है। नया भाग समय पर प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा। 😊
इस भाग के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं के इंतज़ार में
-कल्पना रामानी
नवी मुंबई
bhaag 6
ghar men prawesh karate hee ek achanbhe ne unakaa svaagat kiyaa warmaa jee ne gowaa ke do tikat hotal buking kee ditel ke kaagajaat ke saath prabhaat ko saunpate hue kahaa-
“bete, ab kuch din aaraam se baahar ekaant men bitaakar aao, phir chuttiyaan samaapt hone par to zindagee ke samar kaa saamanaa karanaa hee hai prabhaadewee ne bhee muskuraakar shubhadaa ko sheeghr taiyaaree karane kee hidaayat dee prabhaat aur shubhadaa unako pranaam karake saharsh naye saphar kee taiyaaree men jut gae
ek saptaah tak we prasann man bhaawee jeewan kee chunautiyon par charchaa ke saath madhuchandr manaate rahe waapas jaate hee unhen apane niwaas kee wyawasthaa jo karanee theeek saptaah poorn hone par sukhad yaaden apane saath sanjokar waapas unhonne munbaee prasthaan kiyaa
safar lambaa naheen thaa, donon ne apane-apane parijanon ko apanee waapasee kee soochanaa de dee thee lekin wimaan se utarakar hawaaee adde ke parisar men pahunchate hee unake aashchary kaa thikaanaa n rahaa jab unhonne dekhaa ki un donon ke pitaashree unhen lene ke lie pahunch gae the unhonne is baat kee to kalpanaa bhee naheen kee thee kyonki we svayan ghar tak aane men saksham the yahee naheen, baahar nikalakar unhen jab ek naee nawelee dulhan kee tarah sajee dhajee kaar men baithane ko kahaa gayaa to ek aur achanbhe kaa saamanaa karate hue prabhaat bol padaa-
“pitaajee, aap donon ek saath aur yah naee gaadee?”
“ghar chalakar aaraam se baaten karate hain bete” gaadee men baithane kaa ishaaraa karate hue warmaa jee ne kahaa
ghar kaa haalachaal poochate batiyaate we ghar bhee pahunch gae to andar prawesh ke saath dekhaa ki shubhadaa kee maan bhee waheen maujood hai
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“yah achaanak aapakaa aanaa kaise huaa mammee?”
lekin maan ke kuch bolane se pahale hee usake prashn kaa uttar peeche se aayaa-
“shubhadaa betee, tumhaare mammee-paapaa ko hamane hee aamantrit kiyaa hai jaldee taiyaar hokar maan ke saath baithak men aa jaao, waheen par kal ke lie kaaryakram tay kiyaa jaaegaa"
kal ke lie kaaryakram?phir ek achambhaa! prabhaadewee kee baat sunakar shubhadaa romaanchit ho uthee use yon lag rahaa thaa jaise kisee jaaduee sandook se achambhe ek ke baad ek nikalate jaa rahe hon
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kramashah
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priy paathakon
namaskaar
svaasthy gadabad hone ke kaaran yah bhaag prakaashit karane men wilanb huaa, isake lie dilee khed hai nayaa bhaag samay par prakaashit karane kaa prayaas rahegaa 😊
is bhaag ke lie aapakee pratikriyaaon ke intazaar men
-kalpanaa raamaanee
nawee munbaee
भाग 6
घर में प्रवेश करते ही एक अचंभे ने उनका स्वागत किया। वर्मा जी ने गोवा के दो टिकट होटल बुकिंग की डिटेल के कागजात के साथ प्रभात को सौंपते हुए कहा-
“बेटे, अब कुछ दिन आराम से बाहर एकांत में बिताकर आओ, फिर छुट्टियाँ समाप्त होने पर तो ज़िन्दगी के समर का सामना करना ही है। प्रभादेवी ने भी मुस्कुराकर शुभदा को शीघ्र तैयारी करने की हिदायत दी। प्रभात और शुभदा उनको प्रणाम करके सहर्ष नये सफर की तैयारी में जुट गए।
एक सप्ताह तक वे प्रसन्न मन भावी जीवन की चुनौतियों पर चर्चा के साथ मधुचंद्र मनाते रहे। वापस जाते ही उन्हें अपने निवास की व्यवस्था जो करनी थी...एक सप्ताह पूर्ण होने पर सुखद यादें अपने साथ संजोकर वापस उन्होंने मुंबई प्रस्थान किया.
सफ़र लम्बा नहीं था, दोनों ने अपने-अपने परिजनों को अपनी वापसी की सूचना दे दी थी लेकिन विमान से उतरकर हवाई अड्डे के परिसर में पहुँचते ही उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि उन दोनों के पिताश्री उन्हें लेने के लिए पहुँच गए थे। उन्होंने इस बात की तो कल्पना भी नहीं की थी क्योंकि वे स्वयं घर तक आने में सक्षम थे. यही नहीं, बाहर निकलकर उन्हें जब एक नई नवेली दुल्हन की तरह सजी धजी कार में बैठने को कहा गया तो एक और अचंभे का सामना करते हुए प्रभात बोल पड़ा-
“पिताजी, आप दोनों एक साथ... और यह नई गाड़ी?”
“घर चलकर आराम से बातें करते हैं बेटे...” गाड़ी में बैठने का इशारा करते हुए वर्मा जी ने कहा.
घर का हालचाल पूछते बतियाते वे घर भी पहुँच गए तो अंदर प्रवेश के साथ देखा कि शुभदा की माँ भी वहीं मौजूद है।
अब तो यह पहेली शुभदा और प्रभात की समझ में ही नहीं आ रही थी। शुभदा माँ से गले मिलकर उसे अपने कमरे में ले गई और प्रभात इधर-उधर घर की गहमा गहमी देखने लगा तो वर्मा जी ने उसकी जिज्ञासा देखकर उन्हें फ्रेश होकर बैठक में आने के लिए कह दिया.
उधर शुभदा माँ से पूछने लगी-
“यह अचानक आपका आना कैसे हुआ मम्मी...?”
लेकिन माँ के कुछ बोलने से पहले ही उसके प्रश्न का उत्तर पीछे से आया-
“शुभदा बेटी, तुम्हारे मम्मी-पापा को हमने ही आमंत्रित किया है. जल्दी तैयार होकर माँ के साथ बैठक में आ जाओ, वहीँ पर कल के लिए कार्यक्रम तय किया जाएगा."
कल के लिए कार्यक्रम...?फिर एक अचम्भा! प्रभादेवी की बात सुनकर शुभदा रोमांचित हो उठी. उसे यों लग रहा था जैसे किसी जादुई संदूक से अचम्भे एक के बाद एक निकलते जा रहे हों.
सबके बैठक में एकत्रित होते ही चाय-नाश्ते के साथ चर्चा शुरू हो गई. वर्मा जी ने प्रभात को संबोधित करके कहा-
“बेटे, यहाँ से नजदीकी इलाके में तुम दोनों की विदाई में उपहार स्वरूप देने के लिए दो बेडरूम, हाल, किचन वाला फ़्लैट फर्नीचर सहित और वो नई कार हम दोनों समधियों ने अपनी सामर्थ्यानुसार मिलकर खरीदे हैं और रसोई के आवश्यक सामान भी जुटा लिए गए हैं. आगे तुम दोनों अपनी इच्छानुसार फेर-बदल करते रहना... कल सुबह मुहूर्त के अनुसार हवन-पूजन का कार्यक्रम भी तय हो चुका है. इस अवसर पर हमने कुछ विशेष गणमान्य मित्रों को आमंत्रित किया है. तुम दोनों भी किसी अपनी मित्र मंडली से जिसे बुलाना चाहो, फोन पर सूचित कर सकते हो. तुम्हारी छुट्टियाँ समाप्त होने को हैं अतः सब कुछ जल्दी ही करना पड़ा.”
“मगर पिताजी आपने ऐसा क्यों किया, जब हम दोनों कमा रहे हैं तो आप दोनों को अपनी जमा पूँजी इस तरह खर्च नहीं करनी चाहिए थी. हम धीरे धीरे सब संभाल ही लेते.” प्रभात ने आश्चर्य चकित होते हुए कहा.
“देखो बेटे, तुम दोनों ही हमारी इकलौती संतान हो और हमारे बाद हमारी सम्पति के वारिस भी... विवाह का खर्च, वस्त्र-आभूषण आदि भी हमने साझा ही किया था. हमने संतान के प्रति अपना फ़र्ज़ ही तो पूरा किया है न...बच्चों से हम केवल यही अपेक्षा रखते हैं कि वे रिश्तों में मिठास, नजदीकी और अपनापन बनाए रखें और सुख-दुःख साझा करते रहें. निवास अलग हुए तो क्या, दिल अलग नहीं होने चाहियें और हम जानते हैं कि नई पीढ़ी समझदार है, अपने संस्कार नहीं भूल सकती। तुम दोनों थके हुए हो, आज आराम कर लो. व्यवस्थाओं पर हमारी नज़र रहेगी.”
अगले दिन गृह-प्रवेश का सारा कार्यक्रम प्रसन्न वातावरण में संपन्न हो गया. वर्मा जी की जान पहचान उच्च वर्ग तक थी, कार्यक्रम में वकील, जज, राजनेता और विधायक आदि भी शामिल हुए थे. जहाँ वे सब उनके मुँह से नव-विवाहित बेटे-बहू को उसी शहर में अन्यत्र एक साथ विदा करने के कारण का विस्तृत विवरण सुनकर उनके इस निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा करके दिल खोलकर इस पथ का अनुसरण करने का संकल्प कर रहे थे वहीँ प्रभात के युवा मित्र भी उसके सब्र के साथ पिता का साथ देने के कायल हो रहे थे. उसके एक युवा पत्रकार मित्र ने तो उससे अनुमति लेकर सारे कार्यक्रम का वीडियो भी बना लिया और अगले दिन इस आदर्श परिवार की समूची दास्तान वीडियो सहित एक प्रसिद्ध अख़बार की सुर्ख़ियों में थी.
अगले दिन शुभदा के माँ-पिता से फोन अथवा वीडियो काल पर संपर्क बनाए रखने का वादा लेकर प्रभात और शुभदा उनको अपनी कार में सम्मानपूर्वक घर तक पहुँचाकर नई चुनौतियों का सामना करने को नए घर में आ गए.
गृह प्रवेश के सबसे पहले प्रभात ने सुंदर से नामपट पर "शुभप्रभात" उकेरवाकर घर के मुख्य द्वार पर फिक्स करवा दिया फिर ज़िन्दगी की गाड़ी को पटरी पर लाने के प्रयास में जुट गए।
प्रभात ने कार्यालय जाना आरम्भ कर दिया। वर्मा जी के प्रयास से शुभदा का भी जिला कोर्ट से काउंसलर के जॉब का आवेदन स्वीकृत हो गया था और वो भी
अब नियमित कार्यालय जाने लगी। प्रभात और उसके कार्यालय जाने का समय एक होने से प्रभात कार से पहले उसे उसके कार्यस्थल पर छोड़ देता फिर वापसी में भी साथ ले लेता था। उसके पास अब पारिवरिक केस भी सुलझाने के लिए आने लगे थे। इसके साथ उसे ६ महीने तक ट्रेनिंग स्वरूप जिन पिछड़े इलाकों के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले परिवारों से घरेलू हिंसा की शिकायतें दर्ज होती थीं, उन इलाकों में शिकायत कर्ताओं के घरों में जाकर वहाँ के वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार समझाइश देकर पुनः निरीक्षण के बाद परिणाम की फ़ाइल बनाते रहना था और अंत में सभी मामलों की फ़ाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी. दौरे के लिए उसे सरकारी गाड़ी, ड्राइवर के अतिरिक्त सहायता के लिए एक महिला कांस्टेबल के भी साथ जाने की उसे सुविधा दी गई थी. इस तरह वो दौरों के नए दौर में ढलती चली गई.
सप्ताहांत में कभी शुभदा के माँ पिता तो कभी प्रभात के आकर उनकी हौसला अफजाई करते रहते थे ताकि दिलों से दिल जुड़े रहें। प्रभादेवी ने प्रभात की जवाबदारी से मुक्त होकर अपने स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए प्रातः भ्रमण का समय बढ़ा दिया था साथ ही योग कक्षाओं में भी जाने लगी थीं। उनकी सहेलियाँ भी उन्हें प्रसन्न और स्वस्थ देखकर उसकी आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करने में पीछे नहीं रहती थीं बल्कि वे भी उनके समान बच्चों की गृहस्थी से आज़ाद होने की इच्छा करने लगी थीं।
क्रमशः....
*****
प्रिय पाठकों
नमस्कार
स्वास्थ्य गड़बड़ होने के कारण यह भाग प्रकाशित करने में विलंब हुआ, इसके लिए दिली खेद है। नया भाग समय पर प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा। 😊
इस भाग के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं के इंतज़ार में
-कल्पना रामानी
नवी मुंबई