कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १६१ / १६४ № 161 of 164 रचना १६१ / १६४
६ नवम्बर २०२० 6 November 2020 ६ नवम्बर २०२०

आस के नवगीत गाएँ aas ke nawageet gaaen आस के नवगीत गाएँ

गर्दिशों के भूलकर शिकवे गिले,

फिर चलो नव आस के  नवगीत गाएँ।

॥

प्रकृति आती,  नित्य

नव शृंगार कर।

रूप अनुपम, रंग

उजले गोद भर।

॥

जो हमारे हिय छुपा है चित्रकार

भाव की ले तूलिका उसको जगाएँ।

॥

झोलियाँ भर

ख़ुशबुएँ लाती हवा।

मखमली जाजम

बिछा जाती घटा।

॥

ख़्वाहिशों के, बाग से चुनकर सुमन

शेष शूलों की चलो होली जलाएँ।

॥

नित्य खबरें क्यों सुनें

खूँ से भरी।

क्यों न उनकी काट दें

उगती कड़ी।

॥

लेखनी ले हाथ में नव क्रांति की

हर खबर को खुशनुमा मिलकर बनाएँ।

॥

देख दुख, क्यों

हों दुखी, संसार का।

पृष्ठ क्यों ना

बंद कर दें  हार का।

॥

खोजकर राहें नवल निस्तार की

जीत की अनुपम, नई दुनिया बसाएँ।

॥

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

gardishon ke bhoolakar shikawe gile,

phir chalo naw aas ke nawageet gaaen

·

prakriiti aatee, nity

naw shriingaar kar

roop anupam, rang

ujale god bhar

·

jo hamaare hiy chupaa hai chitrakaar

bhaaw kee le toolikaa usako jagaaen

·

jholiyaan bhar

kushabuen laatee hawaa

makhamalee jaajam

bichaa jaatee ghataa

·

kvaahishon ke, baag se chunakar suman

shesh shoolon kee chalo holee jalaaen

·

nity khabaren kyon sunen

khoon se bharee

kyon n unakee kaat den

ugatee kadee

·

lekhanee le haath men naw kraanti kee

har khabar ko khushanumaa milakar banaaen

·

dekh dukh, kyon

hon dukhee, sansaar kaa

priishth kyon naa

band kar den haar kaa

·

khojakar raahen nawal nistaar kee

jeet kee anupam, naee duniyaa basaaen

·

-kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

गर्दिशों के भूलकर शिकवे गिले,

फिर चलो नव आस के  नवगीत गाएँ।

॥

प्रकृति आती,  नित्य

नव शृंगार कर।

रूप अनुपम, रंग

उजले गोद भर।

॥

जो हमारे हिय छुपा है चित्रकार

भाव की ले तूलिका उसको जगाएँ।

॥

झोलियाँ भर

ख़ुशबुएँ लाती हवा।

मखमली जाजम

बिछा जाती घटा।

॥

ख़्वाहिशों के, बाग से चुनकर सुमन

शेष शूलों की चलो होली जलाएँ।

॥

नित्य खबरें क्यों सुनें

खूँ से भरी।

क्यों न उनकी काट दें

उगती कड़ी।

॥

लेखनी ले हाथ में नव क्रांति की

हर खबर को खुशनुमा मिलकर बनाएँ।

॥

देख दुख, क्यों

हों दुखी, संसार का।

पृष्ठ क्यों ना

बंद कर दें  हार का।

॥

खोजकर राहें नवल निस्तार की

जीत की अनुपम, नई दुनिया बसाएँ।

॥

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗