कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १६० / १६३ № 160 of 163 रचना १६० / १६३
६ नवम्बर २०२० 6 November 2020 ६ नवम्बर २०२०

आस के नवगीत गाएँ aas ke nawageet gaaen आस के नवगीत गाएँ

गर्दिशों के भूलकर शिकवे गिले,

फिर चलो नव आस के  नवगीत गाएँ।

प्रकृति आती,  नित्य

नव शृंगार कर।

रूप अनुपम, रंग

उजले गोद भर।

जो हमारे हिय छुपा है चित्रकार

भाव की ले तूलिका उसको जगाएँ।

झोलियाँ भर

ख़ुशबुएँ लाती हवा।

मखमली जाजम

बिछा जाती घटा।

ख़्वाहिशों के, बाग से चुनकर सुमन

शेष शूलों की चलो होली जलाएँ।

नित्य खबरें क्यों सुनें

खूँ से भरी।

क्यों न उनकी काट दें

उगती कड़ी।

लेखनी ले हाथ में नव क्रांति की

हर खबर को खुशनुमा मिलकर बनाएँ।

देख दुख, क्यों

हों दुखी, संसार का।

पृष्ठ क्यों ना

बंद कर दें  हार का।

खोजकर राहें नवल निस्तार की

जीत की अनुपम, नई दुनिया बसाएँ।

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

gardishon ke bhoolakar shikawe gile,

phir chalo naw aas ke nawageet gaaen

·

prakriiti aatee, nity

naw shriingaar kar

roop anupam, rang

ujale god bhar

·

jo hamaare hiy chupaa hai chitrakaar

bhaaw kee le toolikaa usako jagaaen

·

jholiyaan bhar

kushabuen laatee hawaa

makhamalee jaajam

bichaa jaatee ghataa

·

kvaahishon ke, baag se chunakar suman

shesh shoolon kee chalo holee jalaaen

·

nity khabaren kyon sunen

khoon se bharee

kyon n unakee kaat den

ugatee kadee

·

lekhanee le haath men naw kraanti kee

har khabar ko khushanumaa milakar banaaen

·

dekh dukh, kyon

hon dukhee, sansaar kaa

priishth kyon naa

band kar den haar kaa

·

khojakar raahen nawal nistaar kee

jeet kee anupam, naee duniyaa basaaen

·

-kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

गर्दिशों के भूलकर शिकवे गिले,

फिर चलो नव आस के  नवगीत गाएँ।

प्रकृति आती,  नित्य

नव शृंगार कर।

रूप अनुपम, रंग

उजले गोद भर।

जो हमारे हिय छुपा है चित्रकार

भाव की ले तूलिका उसको जगाएँ।

झोलियाँ भर

ख़ुशबुएँ लाती हवा।

मखमली जाजम

बिछा जाती घटा।

ख़्वाहिशों के, बाग से चुनकर सुमन

शेष शूलों की चलो होली जलाएँ।

नित्य खबरें क्यों सुनें

खूँ से भरी।

क्यों न उनकी काट दें

उगती कड़ी।

लेखनी ले हाथ में नव क्रांति की

हर खबर को खुशनुमा मिलकर बनाएँ।

देख दुख, क्यों

हों दुखी, संसार का।

पृष्ठ क्यों ना

बंद कर दें  हार का।

खोजकर राहें नवल निस्तार की

जीत की अनुपम, नई दुनिया बसाएँ।

-कल्पना रामानी

नवी मुंबई

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗