कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १४९ / १६३ № 149 of 163 रचना १४९ / १६३
९ दिसम्बर २०१९ 9 December 2019 ९ दिसम्बर २०१९

कागा रे! kaagaa re! कागा रे!

कागा रे! मुंडेर छोड़ दे

मत मेहमान पुकार।

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली

चढ़ी न चौके दाल पनीली।

शेष नहीं मुट्ठी भर आटा

औंधे सोए तवा पतीली।

क्या खाएगा प्रियम पाहुना

कुछ  कर सोच-विचार।

एक कोठरी, दस बाशिंदे

मैला बिस्तर, चिंदे चिंदे।

पलकें बंद न होतीं पल भर।

चर्म चाटते, मुए पतंगे।

मच्छर चखते रक्त,  रेंगते

खटमल बना कतार।

काँव काँव की टेर छोड़ दे।

इस घर से यह चोंच मोड़ दे।

नहीं चाहती अपमानित हो

आगत घर का द्वार छोड़ दे।

काग सयाने तू क्या जाने

दीनों के संस्कार।

kaagaa re! munder chod de

mat mehamaan pukaar

·

choolhaa thandaa, lakadee seelee

chढ़ee n chauke daal paneelee

shesh naheen mutthee bhar aataa

aundhe soe tawaa pateelee

·

kyaa khaaegaa priyam paahunaa

kuch kar soch-wichaar

·

ek kotharee, das baashinde

mailaa bistar, chinde chinde

palaken band n hoteen pal bhar

charm chaatate, mue patange

·

machchar chakhate rakt, rengate

khatamal banaa kataar

·

kaanv kaanv kee ter chod de

is ghar se yah chonch mod de

naheen chaahatee apamaanit ho

aagat ghar kaa dvaar chod de

·

kaag sayaane too kyaa jaane

deenon ke sanskaar

कागा रे! मुंडेर छोड़ दे

मत मेहमान पुकार।

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली

चढ़ी न चौके दाल पनीली।

शेष नहीं मुट्ठी भर आटा

औंधे सोए तवा पतीली।

क्या खाएगा प्रियम पाहुना

कुछ  कर सोच-विचार।

एक कोठरी, दस बाशिंदे

मैला बिस्तर, चिंदे चिंदे।

पलकें बंद न होतीं पल भर।

चर्म चाटते, मुए पतंगे।

मच्छर चखते रक्त,  रेंगते

खटमल बना कतार।

काँव काँव की टेर छोड़ दे।

इस घर से यह चोंच मोड़ दे।

नहीं चाहती अपमानित हो

आगत घर का द्वार छोड़ दे।

काग सयाने तू क्या जाने

दीनों के संस्कार।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗