कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १५० / १६४ № 150 of 164 रचना १५० / १६४
९ दिसम्बर २०१९ 9 December 2019 ९ दिसम्बर २०१९

कागा रे! kaagaa re! कागा रे!

कागा रे! मुंडेर छोड़ दे

मत मेहमान पुकार।

॥

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली

चढ़ी न चौके दाल पनीली।

शेष नहीं मुट्ठी भर आटा

औंधे सोए तवा पतीली।

॥

क्या खाएगा प्रियम पाहुना

कुछ  कर सोच-विचार।

॥

एक कोठरी, दस बाशिंदे

मैला बिस्तर, चिंदे चिंदे।

पलकें बंद न होतीं पल भर।

चर्म चाटते, मुए पतंगे।

॥

मच्छर चखते रक्त,  रेंगते

खटमल बना कतार।

॥

काँव काँव की टेर छोड़ दे।

इस घर से यह चोंच मोड़ दे।

नहीं चाहती अपमानित हो

आगत घर का द्वार छोड़ दे।

॥

काग सयाने तू क्या जाने

दीनों के संस्कार।

kaagaa re! munder chod de

mat mehamaan pukaar

·

choolhaa thandaa, lakadee seelee

chढ़ee n chauke daal paneelee

shesh naheen mutthee bhar aataa

aundhe soe tawaa pateelee

·

kyaa khaaegaa priyam paahunaa

kuch kar soch-wichaar

·

ek kotharee, das baashinde

mailaa bistar, chinde chinde

palaken band n hoteen pal bhar

charm chaatate, mue patange

·

machchar chakhate rakt, rengate

khatamal banaa kataar

·

kaanv kaanv kee ter chod de

is ghar se yah chonch mod de

naheen chaahatee apamaanit ho

aagat ghar kaa dvaar chod de

·

kaag sayaane too kyaa jaane

deenon ke sanskaar

कागा रे! मुंडेर छोड़ दे

मत मेहमान पुकार।

॥

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली

चढ़ी न चौके दाल पनीली।

शेष नहीं मुट्ठी भर आटा

औंधे सोए तवा पतीली।

॥

क्या खाएगा प्रियम पाहुना

कुछ  कर सोच-विचार।

॥

एक कोठरी, दस बाशिंदे

मैला बिस्तर, चिंदे चिंदे।

पलकें बंद न होतीं पल भर।

चर्म चाटते, मुए पतंगे।

॥

मच्छर चखते रक्त,  रेंगते

खटमल बना कतार।

॥

काँव काँव की टेर छोड़ दे।

इस घर से यह चोंच मोड़ दे।

नहीं चाहती अपमानित हो

आगत घर का द्वार छोड़ दे।

॥

काग सयाने तू क्या जाने

दीनों के संस्कार।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗