कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १५० / १६३ № 150 of 163 रचना १५० / १६३
१० दिसम्बर २०१९ 10 December 2019 १० दिसम्बर २०१९

भ्रमण-पथ bhraman-path भ्रमण-पथ

खुलीं पलकें भोर की  पग

बढ़ चले  लय में हमारे।

हरित कुसुमित क्यारियाँ हैं

इस किनारे-उस किनारे।

अरुणिमा प्राची में छाई

धूप शबनम से नहाई।

चाँद तारे कह गए हम

जा रहे हैं  दो विदाई।

कान में कहती हवाएँ

नज़र कर लो सब नज़ारे।

खिलीं कलियाँ हुई आहट

तितलियों की सुगबुगाहट।

पुष्प पल्लव औ लताओं

के लबों पर मुस्कुराहट।

सृष्टि के साथी सभी हैं

सजग स्वागत में हमारे।

बाग में बच्चों की तानें

विहग वृंदों की उड़ानें।

वृद्ध भी हर्षित हृदय हैं

साथ सब जाने अजाने।

मधुर बेला यह सुबह की

प्यार से सबको निहारे।

भ्रमण-पथ लंबा अकेला

लिपटकर कदमों से खेला।

कह रहा है गति बढ़ा लो

प्राणवायू का है रेला।

हर दिशा संगीतमय है

मुग्ध मौसम के इशारे।

khuleen palaken bhor kee pag

bढ़ chale lay men hamaare

harit kusumit kyaariyaan hain

is kinaare-us kinaare

·

arunimaa praachee men chaaee

dhoop shabanam se nahaaee

chaand taare kah gae ham

jaa rahe hain do widaaee

·

kaan men kahatee hawaaen

nazar kar lo sab nazaare

·

khileen kaliyaan huee aahat

titaliyon kee sugabugaahat

pushp pallaw au lataaon

ke labon par muskuraahat

·

sriishti ke saathee sabhee hain

sajag svaagat men hamaare

·

baag men bachchon kee taanen

wihag wriindon kee udaanen

wriiddh bhee harshit hriiday hain

saath sab jaane ajaane

·

madhur belaa yah subah kee

pyaar se sabako nihaare

·

bhraman-path lanbaa akelaa

lipatakar kadamon se khelaa

kah rahaa hai gati bढ़aa lo

praanawaayoo kaa hai relaa

·

har dishaa sangeetamay hai

mugdh mausam ke ishaare

खुलीं पलकें भोर की  पग

बढ़ चले  लय में हमारे।

हरित कुसुमित क्यारियाँ हैं

इस किनारे-उस किनारे।

अरुणिमा प्राची में छाई

धूप शबनम से नहाई।

चाँद तारे कह गए हम

जा रहे हैं  दो विदाई।

कान में कहती हवाएँ

नज़र कर लो सब नज़ारे।

खिलीं कलियाँ हुई आहट

तितलियों की सुगबुगाहट।

पुष्प पल्लव औ लताओं

के लबों पर मुस्कुराहट।

सृष्टि के साथी सभी हैं

सजग स्वागत में हमारे।

बाग में बच्चों की तानें

विहग वृंदों की उड़ानें।

वृद्ध भी हर्षित हृदय हैं

साथ सब जाने अजाने।

मधुर बेला यह सुबह की

प्यार से सबको निहारे।

भ्रमण-पथ लंबा अकेला

लिपटकर कदमों से खेला।

कह रहा है गति बढ़ा लो

प्राणवायू का है रेला।

हर दिशा संगीतमय है

मुग्ध मौसम के इशारे।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗