कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ६३ / ६३ № 63 of 63 रचना ६३ / ६३
२७ सितम्बर २०२० 27 September 2020 २७ सितम्बर २०२०

गाँव - शहर gaanv - shahar गाँव - शहर

*गाँव-शहर*

जीवन शैली शहर की, बोझिल और अधीर।

चौराहे गतिरोध हैं, सड़कें केवल भीड़।

सड़कें केवल भीड़, मची है मारामारी

सेहत से खिलवाड़, ह्रदय पर चलती आरी।

जमघट सुबहो-शाम, और हर दिन है रैली

बोझिल और अधीर, शहर की जीवन शैली।

शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।

रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।

कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई

मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।

तरस रहे हैं लोग, स्वस्थ बहती पुरवा को।

इमारतों की बाढ़, खा रही शुद्ध हवा को।

जनसंख्या की वृद्धि का, शहर झेलते दंश।

नाममात्र ही रह गया, प्राणवायु का अंश।

प्राणवायु का अंश, सिलसिला हर दिन जारी

गाँव शहर की ओर, बढ़ रहे बारी बारी।

पनपें यदि ग्रामीण,  रहे ना दुविधा बाकी।

शहरों से हो दूर, वृद्धि यह जनसंख्या की।

गाँव हमारे देश की, खुशहाली की खान।

फसल उगाते प्रेम से, सबके लिए किसान।

सबके लिए किसान, वहीं पाएँ यदि अवसर

जनसंख्या का बोझ, शहर पर होगा कमतर।

कहनी इतनी बात, अगर यह तंत्र विचारे

भर देंगे खलिहान, देश के, गाँव हमारे।

धारा अगर विकास की, मुड़े गाँव की ओर।

शहरों पर फिर क्यों पड़े, जनसंख्या का ज़ोर।

जनसंख्या का ज़ोर, अगर थोड़ा भी कम हो

प्रदूषणों से आज, शहर भी क्यों बेदम हो।

कहनी इतनी बात, यही देना है नारा

मुड़े गाँव की ओर, तरक्की की अब धारा।

*gaanv-shahar*

·

jeewan shailee shahar kee, bojhil aur adheer

chauraahe gatirodh hain, sadaken kewal bheed

sadaken kewal bheed, machee hai maaraamaaree

sehat se khilawaad, hraday par chalatee aaree

jamaghat subaho-shaam, aur har din hai railee

bojhil aur adheer, shahar kee jeewan shailee

·

shuddh hawaa ko khaa rahee, imaaraton kee phauj

rahawaasee majaboor hain, kartaaon kee mauj

kartaaon kee mauj, kar rahe khoob kamaaee

machee huee hai loot, naheen hotee sunawaaee

taras rahe hain log, svasth bahatee purawaa ko

imaaraton kee baaढ़, khaa rahee shuddh hawaa ko

·

janasankhyaa kee wriiddhi kaa, shahar jhelate dansh

naamamaatr hee rah gayaa, praanawaayu kaa ansh

praanawaayu kaa ansh, silasilaa har din jaaree

gaanv shahar kee or, bढ़ rahe baaree baaree

panapen yadi graameen, rahe naa duwidhaa baakee

shaharon se ho door, wriiddhi yah janasankhyaa kee

·

gaanv hamaare desh kee, khushahaalee kee khaan

phasal ugaate prem se, sabake lie kisaan

sabake lie kisaan, waheen paaen yadi awasar

janasankhyaa kaa bojh, shahar par hogaa kamatar

kahanee itanee baat, agar yah tantr wichaare

bhar denge khalihaan, desh ke, gaanv hamaare

·

dhaaraa agar wikaas kee, mude gaanv kee or

shaharon par phir kyon pade, janasankhyaa kaa zor

janasankhyaa kaa zor, agar thodaa bhee kam ho

pradooshanon se aaj, shahar bhee kyon bedam ho

kahanee itanee baat, yahee denaa hai naaraa

mude gaanv kee or, tarakkee kee ab dhaaraa

*गाँव-शहर*

जीवन शैली शहर की, बोझिल और अधीर।

चौराहे गतिरोध हैं, सड़कें केवल भीड़।

सड़कें केवल भीड़, मची है मारामारी

सेहत से खिलवाड़, ह्रदय पर चलती आरी।

जमघट सुबहो-शाम, और हर दिन है रैली

बोझिल और अधीर, शहर की जीवन शैली।

शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।

रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।

कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई

मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।

तरस रहे हैं लोग, स्वस्थ बहती पुरवा को।

इमारतों की बाढ़, खा रही शुद्ध हवा को।

जनसंख्या की वृद्धि का, शहर झेलते दंश।

नाममात्र ही रह गया, प्राणवायु का अंश।

प्राणवायु का अंश, सिलसिला हर दिन जारी

गाँव शहर की ओर, बढ़ रहे बारी बारी।

पनपें यदि ग्रामीण,  रहे ना दुविधा बाकी।

शहरों से हो दूर, वृद्धि यह जनसंख्या की।

गाँव हमारे देश की, खुशहाली की खान।

फसल उगाते प्रेम से, सबके लिए किसान।

सबके लिए किसान, वहीं पाएँ यदि अवसर

जनसंख्या का बोझ, शहर पर होगा कमतर।

कहनी इतनी बात, अगर यह तंत्र विचारे

भर देंगे खलिहान, देश के, गाँव हमारे।

धारा अगर विकास की, मुड़े गाँव की ओर।

शहरों पर फिर क्यों पड़े, जनसंख्या का ज़ोर।

जनसंख्या का ज़ोर, अगर थोड़ा भी कम हो

प्रदूषणों से आज, शहर भी क्यों बेदम हो।

कहनी इतनी बात, यही देना है नारा

मुड़े गाँव की ओर, तरक्की की अब धारा।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗