गाँव - शहर gaanv - shahar गाँव - शहर
*गाँव-शहर*
जीवन शैली शहर की, बोझिल और अधीर।
चौराहे गतिरोध हैं, सड़कें केवल भीड़।
सड़कें केवल भीड़, मची है मारामारी
सेहत से खिलवाड़, ह्रदय पर चलती आरी।
जमघट सुबहो-शाम, और हर दिन है रैली
बोझिल और अधीर, शहर की जीवन शैली।
शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।
रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।
कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई
मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।
तरस रहे हैं लोग, स्वस्थ बहती पुरवा को।
इमारतों की बाढ़, खा रही शुद्ध हवा को।
जनसंख्या की वृद्धि का, शहर झेलते दंश।
नाममात्र ही रह गया, प्राणवायु का अंश।
प्राणवायु का अंश, सिलसिला हर दिन जारी
गाँव शहर की ओर, बढ़ रहे बारी बारी।
पनपें यदि ग्रामीण, रहे ना दुविधा बाकी।
शहरों से हो दूर, वृद्धि यह जनसंख्या की।
गाँव हमारे देश की, खुशहाली की खान।
फसल उगाते प्रेम से, सबके लिए किसान।
सबके लिए किसान, वहीं पाएँ यदि अवसर
जनसंख्या का बोझ, शहर पर होगा कमतर।
कहनी इतनी बात, अगर यह तंत्र विचारे
भर देंगे खलिहान, देश के, गाँव हमारे।
धारा अगर विकास की, मुड़े गाँव की ओर।
शहरों पर फिर क्यों पड़े, जनसंख्या का ज़ोर।
जनसंख्या का ज़ोर, अगर थोड़ा भी कम हो
प्रदूषणों से आज, शहर भी क्यों बेदम हो।
कहनी इतनी बात, यही देना है नारा
मुड़े गाँव की ओर, तरक्की की अब धारा।
*gaanv-shahar*
jeewan shailee shahar kee, bojhil aur adheer
chauraahe gatirodh hain, sadaken kewal bheed
sadaken kewal bheed, machee hai maaraamaaree
sehat se khilawaad, hraday par chalatee aaree
jamaghat subaho-shaam, aur har din hai railee
bojhil aur adheer, shahar kee jeewan shailee
shuddh hawaa ko khaa rahee, imaaraton kee phauj
rahawaasee majaboor hain, kartaaon kee mauj
kartaaon kee mauj, kar rahe khoob kamaaee
machee huee hai loot, naheen hotee sunawaaee
taras rahe hain log, svasth bahatee purawaa ko
imaaraton kee baaढ़, khaa rahee shuddh hawaa ko
janasankhyaa kee wriiddhi kaa, shahar jhelate dansh
naamamaatr hee rah gayaa, praanawaayu kaa ansh
praanawaayu kaa ansh, silasilaa har din jaaree
gaanv shahar kee or, bढ़ rahe baaree baaree
panapen yadi graameen, rahe naa duwidhaa baakee
shaharon se ho door, wriiddhi yah janasankhyaa kee
gaanv hamaare desh kee, khushahaalee kee khaan
phasal ugaate prem se, sabake lie kisaan
sabake lie kisaan, waheen paaen yadi awasar
janasankhyaa kaa bojh, shahar par hogaa kamatar
kahanee itanee baat, agar yah tantr wichaare
bhar denge khalihaan, desh ke, gaanv hamaare
dhaaraa agar wikaas kee, mude gaanv kee or
shaharon par phir kyon pade, janasankhyaa kaa zor
janasankhyaa kaa zor, agar thodaa bhee kam ho
pradooshanon se aaj, shahar bhee kyon bedam ho
kahanee itanee baat, yahee denaa hai naaraa
mude gaanv kee or, tarakkee kee ab dhaaraa
*गाँव-शहर*
जीवन शैली शहर की, बोझिल और अधीर।
चौराहे गतिरोध हैं, सड़कें केवल भीड़।
सड़कें केवल भीड़, मची है मारामारी
सेहत से खिलवाड़, ह्रदय पर चलती आरी।
जमघट सुबहो-शाम, और हर दिन है रैली
बोझिल और अधीर, शहर की जीवन शैली।
शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।
रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।
कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई
मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।
तरस रहे हैं लोग, स्वस्थ बहती पुरवा को।
इमारतों की बाढ़, खा रही शुद्ध हवा को।
जनसंख्या की वृद्धि का, शहर झेलते दंश।
नाममात्र ही रह गया, प्राणवायु का अंश।
प्राणवायु का अंश, सिलसिला हर दिन जारी
गाँव शहर की ओर, बढ़ रहे बारी बारी।
पनपें यदि ग्रामीण, रहे ना दुविधा बाकी।
शहरों से हो दूर, वृद्धि यह जनसंख्या की।
गाँव हमारे देश की, खुशहाली की खान।
फसल उगाते प्रेम से, सबके लिए किसान।
सबके लिए किसान, वहीं पाएँ यदि अवसर
जनसंख्या का बोझ, शहर पर होगा कमतर।
कहनी इतनी बात, अगर यह तंत्र विचारे
भर देंगे खलिहान, देश के, गाँव हमारे।
धारा अगर विकास की, मुड़े गाँव की ओर।
शहरों पर फिर क्यों पड़े, जनसंख्या का ज़ोर।
जनसंख्या का ज़ोर, अगर थोड़ा भी कम हो
प्रदूषणों से आज, शहर भी क्यों बेदम हो।
कहनी इतनी बात, यही देना है नारा
मुड़े गाँव की ओर, तरक्की की अब धारा।