कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ९८ / ११४ № 98 of 114 रचना ९८ / ११४
२७ सितम्बर २०२० 27 September 2020 २७ सितम्बर २०२०

ससुराल नहीं जाऊँगी. 2 sasuraal naheen jaaoongee 2 ससुराल नहीं जाऊँगी. 2

बेटी की बात सुनकर पिता, अरविन्द सिन्हा के चेहरे का रंग ही उड़ गया. हकबकाकर बोल पड़े-

“यह तुम क्या कह रही हो बेटी?  घर मेहमानों से भरा हुआ है. लीना की आत्महत्या के दोषियों को सजा अवश्य मिलेगी. मगर तुम इसके लिए क्यों अपना सुख और हमारा चैन छीनना चाहती हो...? और यह  आवश्यक नहीं कि हर सास बुरी हो...समाज में ऐसे भी अनेक उदहारण हैं जहाँ सास-ससुर की अच्छाई भी बहुओं को खटकती है और वे कोई न कोई बहाना बनाकर अलग परिवार बसा लेती हैं."

“यह भी हो सकता है लेकिन अच्छे व्यवहार के साथ भी अगर बहू को स्वतंत्रता न मिले, जिसकी उसे अपेक्षा होती है तो भी मनमुटाव आ ही जाता है. आखिर सास-बहू में एक पीढ़ी यानी लगभग २५ वर्षो का समयांतर होता है और उनकी सोच भी उसी काल के अनुरूप चलती है जब परिवार बड़े, अधिक संतान वाले होने से  लड़कियों  को शिक्षा से अधिक घरेलू कामकाज में पारंगत होना आवश्यक होता था.  क्या प्राचीन काल की १२ बच्चों को पालने संभालने वाली सास और आज एक या दो बच्चों को बड़ा करने वाली सास में कोई अंतर नहीं?  वह आज भी क्यों पुरानी लकीर की फकीर बनी हुई है,.. क्यों  नहीं अपना अतिरिक्त समय और ऊर्जा अपने स्वास्थय  पर खर्च करके बहू को बंधनमुक्त कर सकती...पिताजी,  अगर समाज चाहे  इन बातों को गंभीरता से न ले मगर मुझे ऐसा कोई प्रयोग नहीं करना जिससे  मेरी ज़िंदगी दाँव पर लग जाए.”

“बिटिया, क्या  हमारी संस्कृति के कोई मायने नहीं?  मेहमान सुनेंगे तो क्या कहेंगे?”

“संस्कार या संस्कृति के नाम पर ये नियम केवल बेटियों के लिए ही क्यों बनाए गए पिताजी...?  आज तो बेटा हो या बेटी,  अपने माँ-पिता की इकलौती संतान हो सकते हैं... लीना भी परिवार में इकलौती बेटी थी और मैं भी आपकी इकलौती बेटी ही हूँ... हमारे माँ-पिता भी अकेले में इसी परिस्थिति के शिकार हो सकते हैं...उन्हें भी देखरेख की आवश्यकता हो सकती है...!  फिर आपके समाज ने पुत्रों के माँ-पिता को ही बहुओं पर शासन करने का अधिकार क्यों दिया हुआ है...? क्या पुत्रियों के माँ-पिता इसी तरह दामाद पर शासन कर सकते हैं...?  आज आप देख ही रहे हैं न... आपके आदर्श आपकी संस्कृति किस तरह धरे रह गये...लीना तो एक नन्हीं जान के साथ अपनी जान से गई ही उसके माँ-पिता की क्या हालत हुई होगी... आखिर वो उनकी इकलौती संतान थी!

“लेकिन बेटी समाज को एकदम बदलना इतना आसान नहीं है, जो कहते हैं वे भी करने के लिए आगे नहीं आते.”

“मगर मैं समाज को बदलने का प्रयास अवश्य करूँगी पिताजी चाहे मुझे आजीवन विवाह न करने का संकल्प लेना पड़े...स्त्रियों के शोषण के नियम तो नर समाज ने स्वयं ही बनाए हैं फिर जब सास-बहू के मामले सर चढ़कर बोलने लगते हैं तो स्त्री को ही स्त्री की दुश्मन ठहराकर यही समाज अपना पल्ला क्यों झाड़ लेता है...? ज़रा इतिहास पर नज़र डालिए पिताजी, क्या पुरुष भी पुरुष के दुश्मन नहीं होते? यानी मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू...? मगर आज की पढ़ी लिखी बालाएँ उनकी इन चालाकियों और कुटिल चालों को अब बलाएँ बनकर मात देने में सक्षम हैं. जब कानून ने आज नारी को हर क्षेत्र में समानता के अधिकार दिए हैं तो  फिर यह समाज उसका पालन क्यों नहीं करता,  क्या ऐसा करना भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है? स्पष्ट है कि संस्कारों की आड़ में आज भी नर-समाज नारी के अधिकार हनन करना अपना अधिकार मानता है. लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।

इस मामले में मैं भी समान अधिकार चाहती हूँ। अब वो ज़माना नहीं रहा जब बेटियों को सिर्फ घरेलू कामकाज इसलिए सिखाए जाते थे कि उन्हें ससुराल में बहुरानी कम,  नौकरानी अधिक बनकर रहना होता था। आज माँ-पिता के लिए बेटियों को उच्च शिक्षित बनाना ही प्राथमिकता है ताकि वे आत्मनिर्भर होकर हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हों. बेटियाँ भी दहेज से मुक्ति और सास की कैद से आज़ादी ही चाहती हैं पिताजी, और मैं भी... यह शादी अब सिर्फ एक ही शर्त पर हो सकती है कि जिस तरह शादी के बाद मुझे विदा किया जाएगा, उसी तरह प्रभात को भी उसके माता-पिता को विदा करना पड़ेगा. बेटियों के लिए बबूल बोने वाले समाज को अब उसके कांटों की चुभन  भी सहन करनी पड़ेगी।” कहते हुए शुभदा रो पड़ी।

“बड़ी अजीबोगरीब शर्त है तुम्हारी शुभि, ऐसा भी कभी हुआ है? बुजुर्ग दंपति में से किसी एक के रह जाने के बाद उसकी देखभाल कौन करेगा?”

“जो कभी नहीं हुआ वो अब हुआ करेगा पिताजी... संतान अगर चाहे तो अपने माँ पिता को, फिर वे बेटी के माँ-पिता हों या बेटे के, निकट रखकर भी उनका पूरा ध्यान रखा जा सकता है। इससे बेटियों के माता पिता को भी वर पक्ष के आगे कभी अपमानित नहीं होना पड़ेगा।" सुबकते हुए शुभदा बोली.

“तुम्हारी बात में वज़न तो है बेटी, लेकिन मैं समधी जी के आगे तुम्हारी शर्त कैसे रखूँ समझ नहीं आता.”  कहते हुए सिन्हा जी चिंतातुर मुद्रा में वहाँ से उठकर चले गए.

माँ शुभदा को चुप कराने में लगी रही.

*******

विधि में स्नातक अभिजीत वर्मा पारिवारिक जिला कोर्ट में सरकार की तरफ से काउंसलर के तौर पर नियुक्त थे. अपने बरसों के अनुभव से वे जितने भी केस कोर्ट के निर्देशानुसार काउंसलिंग द्वारा सुलझाते थे वे समाचारपत्रों की सुर्खियाँ तो तत्काल बन जाते थे लेकिन वही केस दो-दो तीन-तीन बार वापस आने के बाद भी उलझे हुए रह जाते थे। उनको समझ में नहीं आता था कि आखिर उनसे गलती कहाँ होती है. ऐसे ही एक केस की परिणति में “बहू द्वारा फाँसी लगाकर आत्महत्या” का वाकया आज ही जब समाचार पत्र में उन्होंने पढ़ा तो सास बहू का नाम चित्र के साथ देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया. उनके सामने अपनी कार्यशैली के प्रति अनेक सवाल खड़े हो गए. लीना नाम पढ़ते ही वे जान गए कि जिस सास-बहू की काउंसलिंग करने के बाद उन्होंने समझौता करवाने का प्रयास किया था,  यह दुखद घटना उसी प्रयास का दुष्परिणाम है।

कोर्ट से उन्होंने चार दिन की छुट्टी ली हुई थी. दो दिन बाद ही उनके इकलौते बेटे का विवाह है. घर में ख़ुशी का माहौल है, मंगल कार्य संपन्न हो रहे हैं, बैठक में मेहमानों की हँसी-ठिठोली चल रही है. ऐसे में यह दिल दहला देने वाला समाचार पढ़कर उनका दिल अपराध बोध से भारी हुआ जा रहा था.

वे मेहमानों की नज़र बचाकर अपने कमरे में आकर चिंतन की मुद्रा में लेट गए.

तभी अचानक उनका मोबाइल बज उठा. देखा तो समधी जी का नंबर था. कुछ संयत  होकर उन्होंने मोबाइल कान से लगाया तो उधर से सिन्हा जी डूबी हुई आवाज़ में कह रहे थे-

“अभिवादन वर्मा जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ... मगर कैसे कहूँ, जुबान साथ नहीं दे रही...”

“ऐसी क्या बात हो गई सिन्हा जी,  आप बेफिक्र होकर बताइये, शादी की तैयारियाँ तो पूरी हो चुकी होंगी न...”

“जी वो सब तो हो चुका है, मगर क्या है कि आपने मुंबई की एक बहू द्वारा आत्महत्या का समाचार तो पढ़ा या सुना ही होगा...”

“जी हाँ, पढ़कर बहुत अफ़सोस हुआ. ईश्वर मृतका की आत्मा को शांति प्रदान करें. मगर आप इतने विचलित क्यों लग रहे हैं, कोई परेशानी तो नहीं...?”

“बात परेशान करने वाली ही है जी,  मृतका लीना,  मेरी बेटी की अन्तरंग सखी थी. इस समाचार ने उसे काफी उद्वेलित कर दिया है. उसका कहना है कि लीना की मृत्यु की ज़िम्मेदार उसकी सास ही है।

मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है, वर्मा जी, कि शुभदा बेटी ने शादी के बाद विदा होकर ससुराल जाने से साफ़ इनकार कर दिया है. वो कहती है कि शादी के बाद वो केवल पति-गृह जाएगी. प्रभात के माता पिता को मेरी तरह बेटे की भी विदाई करनी पड़ेगी, अन्यथा वो शादी नहीं करेगी. अब आप ही बताइये इस स्थिति का सामना मैं किस तरह करूँ?”

वर्मा जी तो पहले ही अपराध बोध के बोझ से छटपटा रहे थे, समधी जी की बात से यह जानकर कि लीना उसकी बहू की सहेली थी, उनकी छटपटाहट कई गुना बढ़ गई. उनका दिमाग कुछ पल खामोश रहकर मामले का विश्लेषण करने में गुम हो गया.

उन्हें अपनी बहू की माँग से समझ में आ गया कि उनसे गलती कहाँ होती है। शुभदा के निर्णय ने उनकी कार्यशैली पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया था. उन्होंने तय कर लिया कि इस तरह के मामलों में अब वे सास-बहू को सुलह करने की समझाइश कदापि न देंगे बल्कि बेटे पर ही गृहस्थी अलग करने का दबाव बनाएँगे. वे सास-बहू का तलाक तो नहीं करवा सकते लेकिन उनके इस निर्णय से निश्चित ही पति-पत्नी के आपसी तलाक के मामले भी कम हो जाएँगे.

पहले लगता था कि पति-पत्नी के बीच तलाक के मामले उनकी आपसी वजह होती है, लेकिन कुछ वर्षों से परिवार परामर्श केंद्र में पति या परिवार से अलग होने के लिए अर्जी लेकर आने वाली अधिकांश महिलाएँ पति से नहीं सास और ननद के तानों से परेशान होने के कारण परिवार से अलग होने की माँग लेकर आ रही थीं। सर्वेक्षणों के अनुसार भी पति-पत्नी में तलाक के कारणों में अधिकांश मामले सास-बहू के बीच की अनबन के ही होते थे। अतः वे कुछ त्वरित निर्णय लेते हुए बोल पड़े-

“ओह सिन्हा जी,  लीना के दुखद अंत का जिम्मेदार कुछ हद तक मैं भी हूँ क्योंकि उसकी पारिवारिक अदालत में सास से अलग होने की अर्जी पर सुलह मैंने ही करवाके वापस भेजा था.

इस तरह मैं भी कमोबेश शुभदा बेटी का अपराधी हूँ. जो अस्वस्थ पुरातन कुप्रथाएँ बेटियों का जीवन लीलती रहें उनका विलय और स्वस्थ नूतन प्रथाओं का उदय आज के परिपेक्ष्य में अति आवश्यक है और इसका सूत्रपात मैं अपने घर से ही करूँगा.

मुझे शुभदा बेटी की शर्त स्वीकार है। वो जैसा चाहेगी वैसा ही होगा. शादी के बाद औपचारिक रस्मों का निर्वाह करके कुछ दिन में  उनके लिए उचित व्यवस्था करके उन्हें बाकायदा समारोह आयोजित करके विदा कर दिया जाएगा. आप निश्चिन्त होकर आगे बढ़ें. लेकिन बिटिया से कहियेगा कि यह बात प्रभात के कान में नहीं पड़नी चाहिए वरना हो सकता है वो विरोध करने पर उतर आए. मैं उसे उचित समय पर शांति से सब समझा दूँगा.”

सिन्हा जी को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि समधी जी बात को इतने हलके में लेंगे.  ख़ुशी-ख़ुशी पत्नी को यह बात बताई तो उसका मन भी हल्का हो गया और बेटी को यह बात बताकर आश्वस्त करके वे आगे की तैयारियों में लग गए.

क्रमशः...

betee kee baat sunakar pitaa, arawind sinhaa ke chehare kaa rang hee ud gayaa hakabakaakar bol pade-

“yah tum kyaa kah rahee ho betee? ghar mehamaanon se bharaa huaa hai leenaa kee aatmahatyaa ke doshiyon ko sajaa awashy milegee magar tum isake lie kyon apanaa sukh aur hamaaraa chain cheenanaa chaahatee ho? aur yah aawashyak naheen ki har saas buree hoshamaaj men aise bhee anek udahaaran hain jahaan saas-sasur kee achchaaee bhee bahuon ko khatakatee hai aur we koee n koee bahaanaa banaakar alag pariwaar basaa letee hain"

“yah bhee ho sakataa hai lekin achche wyawahaar ke saath bhee agar bahoo ko svatantrataa n mile, jisakee use apekshaa hotee hai to bhee manamutaaw aa hee jaataa hai aakhir saas-bahoo men ek peeढ़ee yaanee lagabhag 25 warsho kaa samayaantar hotaa hai aur unakee soch bhee usee kaal ke anuroop chalatee hai jab pariwaar bade, adhik santaan waale hone se ladakiyon ko shikshaa se adhik ghareloo kaamakaaj men paarangat honaa aawashyak hotaa thaa kyaa praacheen kaal kee 12 bachchon ko paalane sanbhaalane waalee saas aur aaj ek yaa do bachchon ko badaa karane waalee saas men koee antar naheen? wah aaj bhee kyon puraanee lakeer kee phakeer banee huee hai, kyon naheen apanaa atirikt samay aur oorjaa apane svaasthay par kharch karake bahoo ko bandhanamukt kar sakateepitaajee, agar samaaj chaahe in baaton ko ganbheerataa se n le magar mujhe aisaa koee prayog naheen karanaa jisase meree zindagee daanv par lag jaae”

·

“bitiyaa, kyaa hamaaree sanskriiti ke koee maayane naheen? mehamaan sunenge to kyaa kahenge?”

“sanskaar yaa sanskriiti ke naam par ye niyam kewal betiyon ke lie hee kyon banaae gae pitaajee? aaj to betaa ho yaa betee, apane maan-pitaa kee ikalautee santaan ho sakate hain leenaa bhee pariwaar men ikalautee betee thee aur main bhee aapakee ikalautee betee hee hoon hamaare maan-pitaa bhee akele men isee paristhiti ke shikaar ho sakate hainunhen bhee dekharekh kee aawashyakataa ho sakatee hai! phir aapake samaaj ne putron ke maan-pitaa ko hee bahuon par shaasan karane kaa adhikaar kyon diyaa huaa hai? kyaa putriyon ke maan-pitaa isee tarah daamaad par shaasan kar sakate hain? aaj aap dekh hee rahe hain n aapake aadarsh aapakee sanskriiti kis tarah dhare rah gayeleenaa to ek nanheen jaan ke saath apanee jaan se gaee hee usake maan-pitaa kee kyaa haalat huee hogee aakhir wo unakee ikalautee santaan thee!

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“lekin betee samaaj ko ekadam badalanaa itanaa aasaan naheen hai, jo kahate hain we bhee karane ke lie aage naheen aate”

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pahale lagataa thaa ki pati-patnee ke beech talaak ke maamale unakee aapasee wajah hotee hai, lekin kuch warshon se pariwaar paraamarsh kendr men pati yaa pariwaar se alag hone ke lie arjee lekar aane waalee adhikaansh mahilaaen pati se naheen saas aur nanad ke taanon se pareshaan hone ke kaaran pariwaar se alag hone kee maang lekar aa rahee theen sarvekshanon ke anusaar bhee pati-patnee men talaak ke kaaranon men adhikaansh maamale saas-bahoo ke beech kee anaban ke hee hote the atah we kuch tvarit nirnay lete hue bol pade-

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बेटी की बात सुनकर पिता, अरविन्द सिन्हा के चेहरे का रंग ही उड़ गया. हकबकाकर बोल पड़े-

“यह तुम क्या कह रही हो बेटी?  घर मेहमानों से भरा हुआ है. लीना की आत्महत्या के दोषियों को सजा अवश्य मिलेगी. मगर तुम इसके लिए क्यों अपना सुख और हमारा चैन छीनना चाहती हो...? और यह  आवश्यक नहीं कि हर सास बुरी हो...समाज में ऐसे भी अनेक उदहारण हैं जहाँ सास-ससुर की अच्छाई भी बहुओं को खटकती है और वे कोई न कोई बहाना बनाकर अलग परिवार बसा लेती हैं."

“यह भी हो सकता है लेकिन अच्छे व्यवहार के साथ भी अगर बहू को स्वतंत्रता न मिले, जिसकी उसे अपेक्षा होती है तो भी मनमुटाव आ ही जाता है. आखिर सास-बहू में एक पीढ़ी यानी लगभग २५ वर्षो का समयांतर होता है और उनकी सोच भी उसी काल के अनुरूप चलती है जब परिवार बड़े, अधिक संतान वाले होने से  लड़कियों  को शिक्षा से अधिक घरेलू कामकाज में पारंगत होना आवश्यक होता था.  क्या प्राचीन काल की १२ बच्चों को पालने संभालने वाली सास और आज एक या दो बच्चों को बड़ा करने वाली सास में कोई अंतर नहीं?  वह आज भी क्यों पुरानी लकीर की फकीर बनी हुई है,.. क्यों  नहीं अपना अतिरिक्त समय और ऊर्जा अपने स्वास्थय  पर खर्च करके बहू को बंधनमुक्त कर सकती...पिताजी,  अगर समाज चाहे  इन बातों को गंभीरता से न ले मगर मुझे ऐसा कोई प्रयोग नहीं करना जिससे  मेरी ज़िंदगी दाँव पर लग जाए.”

“बिटिया, क्या  हमारी संस्कृति के कोई मायने नहीं?  मेहमान सुनेंगे तो क्या कहेंगे?”

“संस्कार या संस्कृति के नाम पर ये नियम केवल बेटियों के लिए ही क्यों बनाए गए पिताजी...?  आज तो बेटा हो या बेटी,  अपने माँ-पिता की इकलौती संतान हो सकते हैं... लीना भी परिवार में इकलौती बेटी थी और मैं भी आपकी इकलौती बेटी ही हूँ... हमारे माँ-पिता भी अकेले में इसी परिस्थिति के शिकार हो सकते हैं...उन्हें भी देखरेख की आवश्यकता हो सकती है...!  फिर आपके समाज ने पुत्रों के माँ-पिता को ही बहुओं पर शासन करने का अधिकार क्यों दिया हुआ है...? क्या पुत्रियों के माँ-पिता इसी तरह दामाद पर शासन कर सकते हैं...?  आज आप देख ही रहे हैं न... आपके आदर्श आपकी संस्कृति किस तरह धरे रह गये...लीना तो एक नन्हीं जान के साथ अपनी जान से गई ही उसके माँ-पिता की क्या हालत हुई होगी... आखिर वो उनकी इकलौती संतान थी!

“लेकिन बेटी समाज को एकदम बदलना इतना आसान नहीं है, जो कहते हैं वे भी करने के लिए आगे नहीं आते.”

“मगर मैं समाज को बदलने का प्रयास अवश्य करूँगी पिताजी चाहे मुझे आजीवन विवाह न करने का संकल्प लेना पड़े...स्त्रियों के शोषण के नियम तो नर समाज ने स्वयं ही बनाए हैं फिर जब सास-बहू के मामले सर चढ़कर बोलने लगते हैं तो स्त्री को ही स्त्री की दुश्मन ठहराकर यही समाज अपना पल्ला क्यों झाड़ लेता है...? ज़रा इतिहास पर नज़र डालिए पिताजी, क्या पुरुष भी पुरुष के दुश्मन नहीं होते? यानी मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू...? मगर आज की पढ़ी लिखी बालाएँ उनकी इन चालाकियों और कुटिल चालों को अब बलाएँ बनकर मात देने में सक्षम हैं. जब कानून ने आज नारी को हर क्षेत्र में समानता के अधिकार दिए हैं तो  फिर यह समाज उसका पालन क्यों नहीं करता,  क्या ऐसा करना भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है? स्पष्ट है कि संस्कारों की आड़ में आज भी नर-समाज नारी के अधिकार हनन करना अपना अधिकार मानता है. लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।

इस मामले में मैं भी समान अधिकार चाहती हूँ। अब वो ज़माना नहीं रहा जब बेटियों को सिर्फ घरेलू कामकाज इसलिए सिखाए जाते थे कि उन्हें ससुराल में बहुरानी कम,  नौकरानी अधिक बनकर रहना होता था। आज माँ-पिता के लिए बेटियों को उच्च शिक्षित बनाना ही प्राथमिकता है ताकि वे आत्मनिर्भर होकर हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हों. बेटियाँ भी दहेज से मुक्ति और सास की कैद से आज़ादी ही चाहती हैं पिताजी, और मैं भी... यह शादी अब सिर्फ एक ही शर्त पर हो सकती है कि जिस तरह शादी के बाद मुझे विदा किया जाएगा, उसी तरह प्रभात को भी उसके माता-पिता को विदा करना पड़ेगा. बेटियों के लिए बबूल बोने वाले समाज को अब उसके कांटों की चुभन  भी सहन करनी पड़ेगी।” कहते हुए शुभदा रो पड़ी।

“बड़ी अजीबोगरीब शर्त है तुम्हारी शुभि, ऐसा भी कभी हुआ है? बुजुर्ग दंपति में से किसी एक के रह जाने के बाद उसकी देखभाल कौन करेगा?”

“जो कभी नहीं हुआ वो अब हुआ करेगा पिताजी... संतान अगर चाहे तो अपने माँ पिता को, फिर वे बेटी के माँ-पिता हों या बेटे के, निकट रखकर भी उनका पूरा ध्यान रखा जा सकता है। इससे बेटियों के माता पिता को भी वर पक्ष के आगे कभी अपमानित नहीं होना पड़ेगा।" सुबकते हुए शुभदा बोली.

“तुम्हारी बात में वज़न तो है बेटी, लेकिन मैं समधी जी के आगे तुम्हारी शर्त कैसे रखूँ समझ नहीं आता.”  कहते हुए सिन्हा जी चिंतातुर मुद्रा में वहाँ से उठकर चले गए.

माँ शुभदा को चुप कराने में लगी रही.

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विधि में स्नातक अभिजीत वर्मा पारिवारिक जिला कोर्ट में सरकार की तरफ से काउंसलर के तौर पर नियुक्त थे. अपने बरसों के अनुभव से वे जितने भी केस कोर्ट के निर्देशानुसार काउंसलिंग द्वारा सुलझाते थे वे समाचारपत्रों की सुर्खियाँ तो तत्काल बन जाते थे लेकिन वही केस दो-दो तीन-तीन बार वापस आने के बाद भी उलझे हुए रह जाते थे। उनको समझ में नहीं आता था कि आखिर उनसे गलती कहाँ होती है. ऐसे ही एक केस की परिणति में “बहू द्वारा फाँसी लगाकर आत्महत्या” का वाकया आज ही जब समाचार पत्र में उन्होंने पढ़ा तो सास बहू का नाम चित्र के साथ देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया. उनके सामने अपनी कार्यशैली के प्रति अनेक सवाल खड़े हो गए. लीना नाम पढ़ते ही वे जान गए कि जिस सास-बहू की काउंसलिंग करने के बाद उन्होंने समझौता करवाने का प्रयास किया था,  यह दुखद घटना उसी प्रयास का दुष्परिणाम है।

कोर्ट से उन्होंने चार दिन की छुट्टी ली हुई थी. दो दिन बाद ही उनके इकलौते बेटे का विवाह है. घर में ख़ुशी का माहौल है, मंगल कार्य संपन्न हो रहे हैं, बैठक में मेहमानों की हँसी-ठिठोली चल रही है. ऐसे में यह दिल दहला देने वाला समाचार पढ़कर उनका दिल अपराध बोध से भारी हुआ जा रहा था.

वे मेहमानों की नज़र बचाकर अपने कमरे में आकर चिंतन की मुद्रा में लेट गए.

तभी अचानक उनका मोबाइल बज उठा. देखा तो समधी जी का नंबर था. कुछ संयत  होकर उन्होंने मोबाइल कान से लगाया तो उधर से सिन्हा जी डूबी हुई आवाज़ में कह रहे थे-

“अभिवादन वर्मा जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ... मगर कैसे कहूँ, जुबान साथ नहीं दे रही...”

“ऐसी क्या बात हो गई सिन्हा जी,  आप बेफिक्र होकर बताइये, शादी की तैयारियाँ तो पूरी हो चुकी होंगी न...”

“जी वो सब तो हो चुका है, मगर क्या है कि आपने मुंबई की एक बहू द्वारा आत्महत्या का समाचार तो पढ़ा या सुना ही होगा...”

“जी हाँ, पढ़कर बहुत अफ़सोस हुआ. ईश्वर मृतका की आत्मा को शांति प्रदान करें. मगर आप इतने विचलित क्यों लग रहे हैं, कोई परेशानी तो नहीं...?”

“बात परेशान करने वाली ही है जी,  मृतका लीना,  मेरी बेटी की अन्तरंग सखी थी. इस समाचार ने उसे काफी उद्वेलित कर दिया है. उसका कहना है कि लीना की मृत्यु की ज़िम्मेदार उसकी सास ही है।

मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है, वर्मा जी, कि शुभदा बेटी ने शादी के बाद विदा होकर ससुराल जाने से साफ़ इनकार कर दिया है. वो कहती है कि शादी के बाद वो केवल पति-गृह जाएगी. प्रभात के माता पिता को मेरी तरह बेटे की भी विदाई करनी पड़ेगी, अन्यथा वो शादी नहीं करेगी. अब आप ही बताइये इस स्थिति का सामना मैं किस तरह करूँ?”

वर्मा जी तो पहले ही अपराध बोध के बोझ से छटपटा रहे थे, समधी जी की बात से यह जानकर कि लीना उसकी बहू की सहेली थी, उनकी छटपटाहट कई गुना बढ़ गई. उनका दिमाग कुछ पल खामोश रहकर मामले का विश्लेषण करने में गुम हो गया.

उन्हें अपनी बहू की माँग से समझ में आ गया कि उनसे गलती कहाँ होती है। शुभदा के निर्णय ने उनकी कार्यशैली पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया था. उन्होंने तय कर लिया कि इस तरह के मामलों में अब वे सास-बहू को सुलह करने की समझाइश कदापि न देंगे बल्कि बेटे पर ही गृहस्थी अलग करने का दबाव बनाएँगे. वे सास-बहू का तलाक तो नहीं करवा सकते लेकिन उनके इस निर्णय से निश्चित ही पति-पत्नी के आपसी तलाक के मामले भी कम हो जाएँगे.

पहले लगता था कि पति-पत्नी के बीच तलाक के मामले उनकी आपसी वजह होती है, लेकिन कुछ वर्षों से परिवार परामर्श केंद्र में पति या परिवार से अलग होने के लिए अर्जी लेकर आने वाली अधिकांश महिलाएँ पति से नहीं सास और ननद के तानों से परेशान होने के कारण परिवार से अलग होने की माँग लेकर आ रही थीं। सर्वेक्षणों के अनुसार भी पति-पत्नी में तलाक के कारणों में अधिकांश मामले सास-बहू के बीच की अनबन के ही होते थे। अतः वे कुछ त्वरित निर्णय लेते हुए बोल पड़े-

“ओह सिन्हा जी,  लीना के दुखद अंत का जिम्मेदार कुछ हद तक मैं भी हूँ क्योंकि उसकी पारिवारिक अदालत में सास से अलग होने की अर्जी पर सुलह मैंने ही करवाके वापस भेजा था.

इस तरह मैं भी कमोबेश शुभदा बेटी का अपराधी हूँ. जो अस्वस्थ पुरातन कुप्रथाएँ बेटियों का जीवन लीलती रहें उनका विलय और स्वस्थ नूतन प्रथाओं का उदय आज के परिपेक्ष्य में अति आवश्यक है और इसका सूत्रपात मैं अपने घर से ही करूँगा.

मुझे शुभदा बेटी की शर्त स्वीकार है। वो जैसा चाहेगी वैसा ही होगा. शादी के बाद औपचारिक रस्मों का निर्वाह करके कुछ दिन में  उनके लिए उचित व्यवस्था करके उन्हें बाकायदा समारोह आयोजित करके विदा कर दिया जाएगा. आप निश्चिन्त होकर आगे बढ़ें. लेकिन बिटिया से कहियेगा कि यह बात प्रभात के कान में नहीं पड़नी चाहिए वरना हो सकता है वो विरोध करने पर उतर आए. मैं उसे उचित समय पर शांति से सब समझा दूँगा.”

सिन्हा जी को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि समधी जी बात को इतने हलके में लेंगे.  ख़ुशी-ख़ुशी पत्नी को यह बात बताई तो उसका मन भी हल्का हो गया और बेटी को यह बात बताकर आश्वस्त करके वे आगे की तैयारियों में लग गए.

क्रमशः...

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗