कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ६२ / ६३ № 62 of 63 रचना ६२ / ६३
२४ सितम्बर २०२० 24 September 2020 २४ सितम्बर २०२०

बदरा कारे badaraa kaare बदरा कारे

मौसम है बरसात का, बूँदों की बारात।

ढोल बजाने आ गए, बादल बिजली साथ।

बादल बिजली साथ, हो गई पुलकित धरती

ओढ़ चुनरिया सब्ज़, दिख रही जलकण भरती।

बिखरे रंग अपार, हुआ खुशियों का संगम

मन को भाया खूब,  रूप बरसाती-मौसम।

बच्चों ने मिलकर  किया, बूँदों का घेराव।

चली सुहानी सैर को, लो कागज़ की नाव।

लो कागज की नाव, संग गूँजी किलकारी

जल थल हुए समान, खिल उठी धरती सारी।

मौसम का उल्लास, छा गया सबके दिल पर

बूँदों का घेराव, किया बच्चों ने मिलकर।

बादल की मनुहार से, जाग उठे उद्यान।

पत्ते पत्ते ने किया, जल धारा में स्नान।

जलधारा में स्नान, खिल उठीं कोमल कलियाँ

मधुप कर उठे गान, उड़ीं चहुँ ओर तितलियाँ।

लहराया नम, शीत, पवन पुरवा का आँचल

जाग उठे उद्यान, देख बरसाती बादल।

बदरा कारे जा वहाँ, जहाँ सूखते खेत।

बंजर धरती हो चली, ज्यों मरुथल की रेत।

ज्यों मरुथल की रेत,  फसल से सावन रूठा।

वादा कर आषाढ़, न बरसा वो भी झूठा।

कहना मेरा मान, “कल्पना” कहती प्यारे

जहाँ सूखते खेत, चला जा बदरा कारे।

mausam hai barasaat kaa, boondon kee baaraat

dhol bajaane aa gae, baadal bijalee saath

baadal bijalee saath, ho gaee pulakit dharatee

oढ़ chunariyaa sabz, dikh rahee jalakan bharatee

bikhare rang apaar, huaa khushiyon kaa sangam

man ko bhaayaa khoob, roop barasaatee-mausam

·

bachchon ne milakar kiyaa, boondon kaa gheraaw

chalee suhaanee sair ko, lo kaagaz kee naaw

lo kaagaj kee naaw, sang goonjee kilakaaree

jal thal hue samaan, khil uthee dharatee saaree

mausam kaa ullaas, chaa gayaa sabake dil par

boondon kaa gheraaw, kiyaa bachchon ne milakar

·

baadal kee manuhaar se, jaag uthe udyaan

patte patte ne kiyaa, jal dhaaraa men snaan

jaladhaaraa men snaan, khil utheen komal kaliyaan

madhup kar uthe gaan, udeen chahun or titaliyaan

laharaayaa nam, sheet, pawan purawaa kaa aanchal

jaag uthe udyaan, dekh barasaatee baadal

·

badaraa kaare jaa wahaan, jahaan sookhate khet

banjar dharatee ho chalee, jyon maruthal kee ret

jyon maruthal kee ret, phasal se saawan roothaa

waadaa kar aashaaढ़, n barasaa wo bhee jhoothaa

kahanaa meraa maan, “kalpanaa” kahatee pyaare

jahaan sookhate khet, chalaa jaa badaraa kaare

मौसम है बरसात का, बूँदों की बारात।

ढोल बजाने आ गए, बादल बिजली साथ।

बादल बिजली साथ, हो गई पुलकित धरती

ओढ़ चुनरिया सब्ज़, दिख रही जलकण भरती।

बिखरे रंग अपार, हुआ खुशियों का संगम

मन को भाया खूब,  रूप बरसाती-मौसम।

बच्चों ने मिलकर  किया, बूँदों का घेराव।

चली सुहानी सैर को, लो कागज़ की नाव।

लो कागज की नाव, संग गूँजी किलकारी

जल थल हुए समान, खिल उठी धरती सारी।

मौसम का उल्लास, छा गया सबके दिल पर

बूँदों का घेराव, किया बच्चों ने मिलकर।

बादल की मनुहार से, जाग उठे उद्यान।

पत्ते पत्ते ने किया, जल धारा में स्नान।

जलधारा में स्नान, खिल उठीं कोमल कलियाँ

मधुप कर उठे गान, उड़ीं चहुँ ओर तितलियाँ।

लहराया नम, शीत, पवन पुरवा का आँचल

जाग उठे उद्यान, देख बरसाती बादल।

बदरा कारे जा वहाँ, जहाँ सूखते खेत।

बंजर धरती हो चली, ज्यों मरुथल की रेत।

ज्यों मरुथल की रेत,  फसल से सावन रूठा।

वादा कर आषाढ़, न बरसा वो भी झूठा।

कहना मेरा मान, “कल्पना” कहती प्यारे

जहाँ सूखते खेत, चला जा बदरा कारे।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗