कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना २९ / ६३ № 29 of 63 रचना २९ / ६३
३१ मार्च २०१३ 31 March 2013 ३१ मार्च २०१३

दुनिया बड़ी कमाल की duniyaa badee kamaal kee दुनिया बड़ी कमाल की

दुनिया

बड़ी कमाल की, कहते हैं सब गोल।

रिश्ते

हों या प्रेम हो, सबका लगता मोल।

सबका

लगता मोल, हुई

हर बात दिखावा

सतही

मन इंसान, बन

गया एक छलावा।

ओढ़े

हुए नकाब, फिर

रहे ज्ञानी गुनिया

कहे

कल्पना गोल, बड़ी अद्भुत यह दुनिया।

दुःख

सागर जो मानते, दुनिया को

इंसान।

खुद

जोड़े उसने सभी, व्यर्थ साज सामान।

व्यर्थ

साज सामान, दुःखों का बोझ बढ़ाते

बरबादी

की ओर, कदम

फिर बढ़ते जाते।

भरते

duniyaa

badee kamaal kee, kahate hain sab gol

·

rishte

hon yaa prem ho, sabakaa lagataa mol

·

sabakaa

lagataa mol, huee

har baat dikhaawaa

·

satahee

man insaan, ban

gayaa ek chalaawaa

·

oढ़e

hue nakaab, phir

rahe jnaanee guniyaa

·

kahe

kalpanaa gol, badee adbhut yah duniyaa

·

duhkh

saagar jo maanate, duniyaa ko

insaan

·

khud

jode usane sabhee, wyarth saaj saamaan

·

wyarth

saaj saamaan, duhkhon kaa bojh bढ़aate

·

barabaadee

kee or, kadam

phir bढ़te jaate

·

bharate

दुनिया

बड़ी कमाल की, कहते हैं सब गोल।

रिश्ते

हों या प्रेम हो, सबका लगता मोल।

सबका

लगता मोल, हुई

हर बात दिखावा

सतही

मन इंसान, बन

गया एक छलावा।

ओढ़े

हुए नकाब, फिर

रहे ज्ञानी गुनिया

कहे

कल्पना गोल, बड़ी अद्भुत यह दुनिया।

दुःख

सागर जो मानते, दुनिया को

इंसान।

खुद

जोड़े उसने सभी, व्यर्थ साज सामान।

व्यर्थ

साज सामान, दुःखों का बोझ बढ़ाते

बरबादी

की ओर, कदम

फिर बढ़ते जाते।

भरते

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗