कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ७२ / ११४ № 72 of 114 रचना ७२ / ११४
५ सितम्बर २०१८ 5 September 2018 ५ सितम्बर २०१८

सबसे पहले हिंदी sabase pahale hindee सबसे पहले हिंदी

लघुकथा

“माँ, हम मूवी देखने जा रहे हैं, रात का खाना भी बाहर ही खाकर आएँगे, गुड़िया सो रही है, जाग जाए तो उसे ज़रा बहला देना”

कहते हुए अतुल ने अचला की ओर देखा। अचला ने मुस्कुराकर हामी भर दी। बेटे की कल छुट्टी है तो एक दिन बहू के साथ घूमना फिरना हो जाता है। अचला को बाहर का खाना नहीं रुचता और बढ़ती उम्र में घूमने या मूवी देखने का भी कोई शौक नहीं तो वो कहीं बेटे-बहू के साथ नहीं जाती। वैसे तो वे अपनी तीन वर्षीया पुत्री गुड़िया को साथ ही ले जाते हैं, अचला को परेशान नहीं करना चाहते, लेकिन वो अभी तक उठी नहीं थी तो सोचा माँ बहला लेगी।

उसने गुड़िया के जागने से पहले ही अपने लिए दलिया बना लिया और बालकनी में टहलने लगी। कुछ देर में ही गुड़िया जाग गई और माँ को न देखकर रोने लगी। दादी उसे बहलाने में जुट गई।

“चुप हो जा बिटिया, ममा आपके लिए टॉफी लेने गई है, आती ही होगी” लेकिन चुप होने के बजाय वो और ज़ोर से रोने लगी।

हड्डियों के दर्द के कारण अचला उसे गोद में नहीं उठा सकती थी, वहीं नेपकिन गीली करके आई और पास ही बैठकर उसका मुँह पोंछा और प्यार से सहलाने लगी। उसके खिलौने लाकर सामने रख दिये तो धीरे-धीरे गुड़िया चुप हो गई। उसके चुप होते ही अचला झट से उठकर दूध गरम करके ले आई और उसे पिलाने लगी। लेकिन गुड़िया मचलते हुए बोली- दादी बनाना...

“क्या बनाना बेटा, पहले दूध पी लो फिर आप जो कहोगी हम बनाएँगे।”

-दूद नईं… बनाना...

अचला एक कटोरी में दलिया ले आई और चम्मच देकर बोली-

“लो बेटी दलिया बनाओ और खाओ”।

गुड़िया ने मचलते हुए कटोरी दूर ठेल दी और फिर ‘बनाना’ की रट लगाने लगी

अचला परेशान हो गई, न जाने इसे क्या बनाना है, फिर कुछ सोचकर थोड़ा आटा गूँथकर लोई और खिलौना बेलन-चकला लाकर नीचे दरी बिछा दी और गुड़िया को बिस्तर से उतारकर कहा-

“लो बेटी आप रोटी बनाओ...ऐसे...फिर हम खाएँगे”

गुड़िया खुश होकर व्यस्त हो गई तो अचला फिर से दूध लाकर उसे पीने के लिए मनाने लगी।

लेकिन गुड़िया ने दूध न लेते हुए बेलन-चकला, भी परे धकेल दिया और फिर से ‘बनाना...’ की रट लगाने लगी

अचला ने हैरान होकर बेटे को फोन करना चाहा लेकिन उसकी मोबाइल का स्विच ऑफ था। क्या करे, बच्ची को कैसे चुप कराए…कपड़ों की कतरन लाकर दी कि वो गुड़िया बनाए, कागज़ लाकर दिये कि वो नाव बनाए लेकिन गुड़िया ने ‘बनाना’ की रट नहीं छोड़ी। अचला का पहली बार बाल-हठ से सामना हुआ था। सोचा, नीचे बगीचे में ले जाऊँ, बच्चों को देखकर शायद ज़िद भूल जाए। बोली- “बेटा चलो हम झूला झूलेंगे”।

गुड़िया खुश हो गई, नीचे जाते ही वो बच्चों के साथ मस्ती करने लगी, फिर झूले में बैठ गई। समय काफी हो चुका था, गुड़िया ने न दूध पिया था न ही कुछ खाया था, अचला को चिंता सताने लगी, बेटे-बहू को लौटने में देर हो सकती है, क्या करे। अँधेरा होने लगा तो गुड़िया को वापस ऊपर ले आई। फिर से दलिया परोसकर ले आई कि शायद बच्ची मेरे साथ कुछ खा ले लेकिन नहीं, दलिया देखते ही गुड़िया फिर ‘बनाना’ की रट लगाते हुए रोने लगी। फिर रोते रोते ही उसे नींद आ गई। अचला से भी कुछ नहीं खाया गया वो बेटे बहू का इंतज़ार करने लगी। कुछ देर बाद वे लौटे तो अचला ने एक अपराधिनी की तरह पूरा किस्सा बयान किया।

सुनते ही बेटा तो हँसी से लोटपोट हो गया लेकिन बहू ने दौड़कर गुड़िया को भूखी जानकर उठा दिया और बेतहाशा चूमने लगी, गुड़िया नींद में ही बनाना...बनाना...टेरती रही। बेटे ने पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा-

“रीना, कल तुम फल सब्जियों के नामों वाली हिन्दी-अंग्रेज़ी की सचित्र किताब माँ के लिए ले आना, उनको कुछ तो अँग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए न...”

रीना तुनककर बोली- किताब आएगी लेकिन माँ जी के लिए नहीं, गुड़िया के लिए- मुझे अपनी बच्ची पर इस उम्र में अंग्रेज़ी नहीं लादनी...वो सबसे पहले हिन्दी सीखेगी।

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

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laghukathaa

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“maan, ham moowee dekhane jaa rahe hain, raat kaa khaanaa bhee baahar hee khaakar aaenge, gudiyaa so rahee hai, jaag jaae to use zaraa bahalaa denaa”

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kahate hue atul ne achalaa kee or dekhaa achalaa ne muskuraakar haamee bhar dee bete kee kal chuttee hai to ek din bahoo ke saath ghoomanaa phiranaa ho jaataa hai achalaa ko baahar kaa khaanaa naheen ruchataa aur bढ़tee umr men ghoomane yaa moowee dekhane kaa bhee koee shauk naheen to wo kaheen bete-bahoo ke saath naheen jaatee waise to we apanee teen warsheeyaa putree gudiyaa ko saath hee le jaate hain, achalaa ko pareshaan naheen karanaa chaahate, lekin wo abhee tak uthee naheen thee to sochaa maan bahalaa legee

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usane gudiyaa ke jaagane se pahale hee apane lie daliyaa banaa liyaa aur baalakanee men tahalane lagee kuch der men hee gudiyaa jaag gaee aur maan ko n dekhakar rone lagee daadee use bahalaane men jut gaee

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“chup ho jaa bitiyaa, mamaa aapake lie tॉphee lene gaee hai, aatee hee hogee” lekin chup hone ke bajaay wo aur zor se rone lagee

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haddiyon ke dard ke kaaran achalaa use god men naheen uthaa sakatee thee, waheen nepakin geelee karake aaee aur paas hee baithakar usakaa munh ponchaa aur pyaar se sahalaane lagee usake khilaune laakar saamane rakh diye to dheere-dheere gudiyaa chup ho gaee usake chup hote hee achalaa jhat se uthakar doodh garam karake le aaee aur use pilaane lagee lekin gudiyaa machalate hue bolee- daadee banaanaa

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“kyaa banaanaa betaa, pahale doodh pee lo phir aap jo kahogee ham banaaenge”

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-dood naeen… banaanaa

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achalaa ek katoree men daliyaa le aaee aur chammach dekar bolee-

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“lo betee daliyaa banaao aur khaao”

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gudiyaa ne machalate hue katoree door thel dee aur phir ‘banaanaa’ kee rat lagaane lagee

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achalaa pareshaan ho gaee, n jaane ise kyaa banaanaa hai, phir kuch sochakar thodaa aataa goonthakar loee aur khilaunaa belan-chakalaa laakar neeche daree bichaa dee aur gudiyaa ko bistar se utaarakar kahaa-

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“lo betee aap rotee banaaoaisephir ham khaaenge”

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gudiyaa khush hokar wyast ho gaee to achalaa phir se doodh laakar use peene ke lie manaane lagee

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lekin gudiyaa ne doodh n lete hue belan-chakalaa, bhee pare dhakel diyaa aur phir se ‘banaanaa’ kee rat lagaane lagee

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achalaa ne hairaan hokar bete ko phon karanaa chaahaa lekin usakee mobaail kaa svich ऑph thaa kyaa kare, bachchee ko kaise chup karaae…kapadon kee kataran laakar dee ki wo gudiyaa banaae, kaagaz laakar diye ki wo naaw banaae lekin gudiyaa ne ‘banaanaa’ kee rat naheen chodee achalaa kaa pahalee baar baal-hath se saamanaa huaa thaa sochaa, neeche bageeche men le jaaoon, bachchon ko dekhakar shaayad zid bhool jaae bolee- “betaa chalo ham jhoolaa jhoolenge”

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gudiyaa khush ho gaee, neeche jaate hee wo bachchon ke saath mastee karane lagee, phir jhoole men baith gaee samay kaaphee ho chukaa thaa, gudiyaa ne n doodh piyaa thaa n hee kuch khaayaa thaa, achalaa ko chintaa sataane lagee, bete-bahoo ko lautane men der ho sakatee hai, kyaa kare andheraa hone lagaa to gudiyaa ko waapas oopar le aaee phir se daliyaa parosakar le aaee ki shaayad bachchee mere saath kuch khaa le lekin naheen, daliyaa dekhate hee gudiyaa phir ‘banaanaa’ kee rat lagaate hue rone lagee phir rote rote hee use neend aa gaee achalaa se bhee kuch naheen khaayaa gayaa wo bete bahoo kaa intazaar karane lagee kuch der baad we laute to achalaa ne ek aparaadhinee kee tarah pooraa kissaa bayaan kiyaa

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sunate hee betaa to hansee se lotapot ho gayaa lekin bahoo ne daudakar gudiyaa ko bhookhee jaanakar uthaa diyaa aur betahaashaa choomane lagee, gudiyaa neend men hee banaanaabanaanaateratee rahee bete ne patnee kee or mukhaatib hokar kahaa-

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“reenaa, kal tum phal sabjiyon ke naamon waalee hindee-angrezee kee sachitr kitaab maan ke lie le aanaa, unako kuch to angrejee kaa jnaan honaa chaahie n”

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reenaa tunakakar bolee- kitaab aaegee lekin maan jee ke lie naheen, gudiyaa ke lie- mujhe apanee bachchee par is umr men angrezee naheen laadaneewo sabase pahale hindee seekhegee

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kalpanaa raamaanee

nawee munbaee

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लघुकथा

“माँ, हम मूवी देखने जा रहे हैं, रात का खाना भी बाहर ही खाकर आएँगे, गुड़िया सो रही है, जाग जाए तो उसे ज़रा बहला देना”

कहते हुए अतुल ने अचला की ओर देखा। अचला ने मुस्कुराकर हामी भर दी। बेटे की कल छुट्टी है तो एक दिन बहू के साथ घूमना फिरना हो जाता है। अचला को बाहर का खाना नहीं रुचता और बढ़ती उम्र में घूमने या मूवी देखने का भी कोई शौक नहीं तो वो कहीं बेटे-बहू के साथ नहीं जाती। वैसे तो वे अपनी तीन वर्षीया पुत्री गुड़िया को साथ ही ले जाते हैं, अचला को परेशान नहीं करना चाहते, लेकिन वो अभी तक उठी नहीं थी तो सोचा माँ बहला लेगी।

उसने गुड़िया के जागने से पहले ही अपने लिए दलिया बना लिया और बालकनी में टहलने लगी। कुछ देर में ही गुड़िया जाग गई और माँ को न देखकर रोने लगी। दादी उसे बहलाने में जुट गई।

“चुप हो जा बिटिया, ममा आपके लिए टॉफी लेने गई है, आती ही होगी” लेकिन चुप होने के बजाय वो और ज़ोर से रोने लगी।

हड्डियों के दर्द के कारण अचला उसे गोद में नहीं उठा सकती थी, वहीं नेपकिन गीली करके आई और पास ही बैठकर उसका मुँह पोंछा और प्यार से सहलाने लगी। उसके खिलौने लाकर सामने रख दिये तो धीरे-धीरे गुड़िया चुप हो गई। उसके चुप होते ही अचला झट से उठकर दूध गरम करके ले आई और उसे पिलाने लगी। लेकिन गुड़िया मचलते हुए बोली- दादी बनाना...

“क्या बनाना बेटा, पहले दूध पी लो फिर आप जो कहोगी हम बनाएँगे।”

-दूद नईं… बनाना...

अचला एक कटोरी में दलिया ले आई और चम्मच देकर बोली-

“लो बेटी दलिया बनाओ और खाओ”।

गुड़िया ने मचलते हुए कटोरी दूर ठेल दी और फिर ‘बनाना’ की रट लगाने लगी

अचला परेशान हो गई, न जाने इसे क्या बनाना है, फिर कुछ सोचकर थोड़ा आटा गूँथकर लोई और खिलौना बेलन-चकला लाकर नीचे दरी बिछा दी और गुड़िया को बिस्तर से उतारकर कहा-

“लो बेटी आप रोटी बनाओ...ऐसे...फिर हम खाएँगे”

गुड़िया खुश होकर व्यस्त हो गई तो अचला फिर से दूध लाकर उसे पीने के लिए मनाने लगी।

लेकिन गुड़िया ने दूध न लेते हुए बेलन-चकला, भी परे धकेल दिया और फिर से ‘बनाना...’ की रट लगाने लगी

अचला ने हैरान होकर बेटे को फोन करना चाहा लेकिन उसकी मोबाइल का स्विच ऑफ था। क्या करे, बच्ची को कैसे चुप कराए…कपड़ों की कतरन लाकर दी कि वो गुड़िया बनाए, कागज़ लाकर दिये कि वो नाव बनाए लेकिन गुड़िया ने ‘बनाना’ की रट नहीं छोड़ी। अचला का पहली बार बाल-हठ से सामना हुआ था। सोचा, नीचे बगीचे में ले जाऊँ, बच्चों को देखकर शायद ज़िद भूल जाए। बोली- “बेटा चलो हम झूला झूलेंगे”।

गुड़िया खुश हो गई, नीचे जाते ही वो बच्चों के साथ मस्ती करने लगी, फिर झूले में बैठ गई। समय काफी हो चुका था, गुड़िया ने न दूध पिया था न ही कुछ खाया था, अचला को चिंता सताने लगी, बेटे-बहू को लौटने में देर हो सकती है, क्या करे। अँधेरा होने लगा तो गुड़िया को वापस ऊपर ले आई। फिर से दलिया परोसकर ले आई कि शायद बच्ची मेरे साथ कुछ खा ले लेकिन नहीं, दलिया देखते ही गुड़िया फिर ‘बनाना’ की रट लगाते हुए रोने लगी। फिर रोते रोते ही उसे नींद आ गई। अचला से भी कुछ नहीं खाया गया वो बेटे बहू का इंतज़ार करने लगी। कुछ देर बाद वे लौटे तो अचला ने एक अपराधिनी की तरह पूरा किस्सा बयान किया।

सुनते ही बेटा तो हँसी से लोटपोट हो गया लेकिन बहू ने दौड़कर गुड़िया को भूखी जानकर उठा दिया और बेतहाशा चूमने लगी, गुड़िया नींद में ही बनाना...बनाना...टेरती रही। बेटे ने पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा-

“रीना, कल तुम फल सब्जियों के नामों वाली हिन्दी-अंग्रेज़ी की सचित्र किताब माँ के लिए ले आना, उनको कुछ तो अँग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए न...”

रीना तुनककर बोली- किताब आएगी लेकिन माँ जी के लिए नहीं, गुड़िया के लिए- मुझे अपनी बच्ची पर इस उम्र में अंग्रेज़ी नहीं लादनी...वो सबसे पहले हिन्दी सीखेगी।

कल्पना रामानी

नवी मुंबई

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗