कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ६९ / ११४ № 69 of 114 रचना ६९ / ११४
१८ जून २०१८ 18 June 2018 १८ जून २०१८

संकल्पिता /कहानी sankalpitaa /kahaanee संकल्पिता /कहानी

"माँ, देखो न! जीतू ने फिर से गुलाब का फूल तोड़ लिया, आप उसे मना क्यों नहीं करतीं”

“अरे बेटी, वो भगवान् को ही तो चढ़ाता है न...फिर घर में भी कितनी सुगंध बनी रहती है”!

“मगर माँ, जब चमेली और मोगरे में ढेर सारे फूल लगे हैं तो गुलाब के फूल क्यों तोड़ना...?उसमें तो फूल बहुत कम आते हैं वैसे भी मुझे तो सारे फूल पौधों पर ही लगे हुए अच्छे लगते हैं. कितने दिन तक खिले-खिले रहते हैं माँ! मगर तोड़ते ही एक दिन

"maan, dekho n! jeetoo ne phir se gulaab kaa phool tod liyaa, aap use manaa kyon naheen karateen”

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“are betee, wo bhagawaan ko hee to chढ़aataa hai nphir ghar men bhee kitanee sugandh banee rahatee hai”!

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“magar maan, jab chamelee aur mogare men dher saare phool lage hain to gulaab ke phool kyon todanaa?usamen to phool bahut kam aate hain waise bhee mujhe to saare phool paudhon par hee lage hue achche lagate hain kitane din tak khile-khile rahate hain maan! magar todate hee ek din

"माँ, देखो न! जीतू ने फिर से गुलाब का फूल तोड़ लिया, आप उसे मना क्यों नहीं करतीं”

“अरे बेटी, वो भगवान् को ही तो चढ़ाता है न...फिर घर में भी कितनी सुगंध बनी रहती है”!

“मगर माँ, जब चमेली और मोगरे में ढेर सारे फूल लगे हैं तो गुलाब के फूल क्यों तोड़ना...?उसमें तो फूल बहुत कम आते हैं वैसे भी मुझे तो सारे फूल पौधों पर ही लगे हुए अच्छे लगते हैं. कितने दिन तक खिले-खिले रहते हैं माँ! मगर तोड़ते ही एक दिन

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗