कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ७० / ११४ № 70 of 114 रचना ७० / ११४
१८ जून २०१८ 18 June 2018 १८ जून २०१८

संकल्पिता sankalpitaa संकल्पिता

“माँ, देखो न! जीतू ने फिर से गुलाब का फूल तोड़ लिया, आप उसे मना क्यों नहीं करतीं”

“अरे बेटी, वो भगवान् को ही तो चढ़ाता है न...फिर घर में भी कितनी सुगंध बनी रहती है”!

“मगर माँ, जब चमेली और मोगरे में ढेर सारे फूल लगे हैं तो गुलाब के फूल क्यों तोड़ना...?उसमें तो फूल बहुत कम आते हैं वैसे भी मुझे तो सारे फूल पौधों पर ही लगे हुए अच्छे लगते हैं. कितने दिन तक खिले-खिले रहते हैं माँ! मगर तोड़ते ही एक दिन में ही मुरझा जाते हैं और उन्हें कूड़े में फेंक दिया जाता है. यह तो उन्हें समय से पहले ही मृत्युदंड देना ही हुआ न! भगवान तो अगरबत्ती से भी राज़ी हो जाते हैं...भला अपनी ही रचना का यह अंत देखकर कैसे प्रसन्न होंगे?”

"इतना मोह मत रखो बेटी, अब तुम कुछ ही दिनों में ससुराल चली जाओगी तो इनकी देखरेख कौन करेगा?

अब अपने घर जाकर ही बगिया सजाना..."

"अच्छा! तो यह घर अभी से मेरे लिए पराया हो गया?"

"नहीं बेटी, मगर तुम इतनी मेहनत करती हो तो सोचती हूँ, तुम्हारे जाने के बाद यह सब कौन करेगा? न जाने कैसी लड़की इस घर में बहू बनकर आए..."

ससुराल और अपने घर की कल्पना से जयति के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. माँ सच ही तो कहती है...विवाह में अब दिन ही कितने रह गए हैं...और वो भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गई.

उस दिन के बाद उसने भाई को टोकना छोड़ दिया.

जयति अपने माँ-पिता और छोटे भाई के साथ पुणे शहर की एक कॉलोनी में रहती थी. उसके पिता एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य करते थे. घर की माली हालत कमज़ोर होने से वो नौकरी लगने के बाद ही शादी करना चाहती थी. अब तो नौकरी करते हुए भी ३-४ साल हो गए. देवराज और वो एक ही कम्पनी में कार्यरत हैं और यह विवाह उनके प्रेम का परिणाम ही है. अब वो विवाह के बाद ही अपने घर को खुशबुओं से सजाएगी...सोचते सोचते उसके होठों पर स्वतः सहज मुस्कराहट उभर आई.

कुछ ही समय बाद विवाह हो गया और जयति ससुराल यानी अपने घर आ गई. देवराज का घर उसका ही तो हुआ न!...दो बेडरूम, हाल, किचन वाले फ़्लैट में सास-ससुर के अलावा कालेज में पढ़ने वाली दो ननदें थीं. छोटी बी.ए प्रथम और बड़ी अंतिम वर्ष की छात्रा थी. घर की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, मगरआजकल बेटियाँ दहेज रूपी दानव से निपटने के लिए शिक्षा पूर्ण होने पर नौकरी करके आत्मनिर्भर होकर ही शादी करना पसंद करती हैं और माँ-पिता का भी उन्हें पूर्ण सहयोग तथा प्रोत्साहन मिलता है.

जयति को ससुराल में सब बहुत प्यार और सम्मान के साथ रखते थे. विजातीय होने के बावजूद सास-ससुर ने बेटे की पसंद को महत्व देते हुए बिना किसी दान दहेज के विवाह की स्वीकृति इसलिए दी थी कि चलो लड़की सुन्दर, शिक्षित और कमाऊ है और बेटे को पसंद है.सास लगभग ५५ वर्ष की थी मगर स्वस्थ और चुस्त थी. उसे बेटी... बेटी... कहते न थकती और घर के सारे काम महरी की सहायता से स्वयं ही निपटाती. वो बस छोटे मोटे काम करके अपने कार्यालय चली जाती थी. ससुर जी ने हाल ही में नौकरी से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर मिले हुए पैसों से यह दो बेडरूम का फ़्लैट खरीद लिया था. अब घर खर्च की सारी ज़िम्मेदारी देवराज पर थी. उसके कमरे की बालकनी काफी बड़ी और चौड़ी थी. यह देखकर जयति ख़ुशी से फूली नहीं समाई. एक दिन अवसर देखकर उसने पति से उस परिसर को फूलों की सुगंध बिखेरते गमलों से सजाने की अनुमति माँगी. लेकिन उन्होंने गंभीर मुद्रा बनाकर कहा-

“देखो जयति, इस कार्य में व्यर्थ ही काफी खर्च हो जाएगा, एक बार सजावट तो ठीक है लेकिन देखरेख के लिए माली भी लगाना पड़ेगा...घर खर्च ही खींचतान कर चल रहा है और अभी दो बहनों के विवाह भी करने हैं.

अभी कुछ समय के लिए यह विचार छोड़ दो.”

“लेकिन देव, मैं इस कार्य के लिए किसी से पैसे नहीं लूँगी. बगिया की देखरेख की सारी जवाबदारी मेरी होगी.” जयति ने आशा भरी निगाहों से उसे निहारते हुए कहा.

“तुम अब पराई तो नहीं जयति, अपना पैसा अभी बैंक में ही रखो, समय पर काम आएगा.”

देव की तंगदिली पर जयति सोच में पड़ गई. इस काम के लिए इतना भारी खर्च तो होता नहीं, फिर क्यों अपनी कमाई का पैसा वो अपनी इच्छा से खर्च नहीं कर सकती? उसका मन एक बारगी बुझ सा गया मगर अभी वो नई थी, अतः अपनी इच्छा को फिलहाल मन में ही दफ़न कर दिया.

दो वर्ष हँसी-खुशी बीत गए. बड़ी ननद अब पढ़ाई पूरी करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गई थी, तभी उसके लिए एक संपन्न घर से रिश्ता आया. पहले तो उसने अपना कैरियर बनाने से पहले विवाह से इनकार कर दिया मगर फिर माँ-पिता के दबाव और विवाह के बाद यह सब करने की छूट के आश्वासन पर अपनी स्वीकृति दे दी.

बड़ी धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी हुई और शीघ्र ही वर पक्ष की माँग के कारण विवाह की तैयारियाँ भी शुरू हो गईं.

आज रविवार यानी छुट्टी का दिन था. सबकी दिनचर्या भी छुट्टी के दिन देर से शुरू होती है, मगर पकृति-प्रेमी जयति इस दिन जल्दी उठकर नीचे सोसायटी के ही भ्रमण पथ पर सैर के लिए निकल जाती है. सुनहरी सुबह, खिली धूप, सुगन्धित शीतल हवा, इठलाते-लहराते पेड़ पौधे, फूल-कलियाँ, भ्रमर तितलियाँ उसका मुस्कुराकर स्वागत करते हैं. घूम फिर कर जैसे ही ऊपर आई, उसे सास-ससुर और पति को बैठक में देखकर आश्चर्य हुआ. कुछ शब्द कानों में पड़े तो लगा ननद के विवाह की ही चर्चा चल रही है. सास ने उसे प्यार से चाय नाश्ता तैयार करने के लिए कहा तो वो किचन में चली गई. छुट्टी के दिन वैसे तो शाम कोअक्सर वो देव के साथ कभी मूवी देखने तो कभी लम्बी सैर पर बाहर चली जाती है तो रात्रि-भोजन भी बाहर हो जाता है और उसे थकान उतारने का समय मिल जाता है. आज भी वे बाहर तो गए मगर देव की गंभीर मुद्रा देखकर जयति परेशान सी हो रही थी. घर आते ही जयति ने कारण पूछा-

“क्या बात है देव, आज इतने गंभीर क्यों हो? कोई समस्या हो तो मुझे भी बताओ, शायद कुछ सहायता कर सकूँ.”

“जयति, तुम तो जानती ही हो कि बहन के विवाह की तैयारियाँ चल रही हैं... आज सुबह उसी सिलसिले में माँ-पिता से चर्चा हुई. बड़े घर से रिश्ता जोड़ा है तो विवाह के लिए भी खासी रकम जुटानी होगी. पिताजी ने अपना सारा पैसा यह घर खरीदने में लगा दिया. अब गृहस्थी मेरी कमाई से किसी तरह चल रही है. इस समय हमें तुमसे आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है.”

“मगर देव, मैं क्या सहायता कर सकती हूँ भला? तुम तो जानते ही हो कि खाते की सारी जमा रकम जो विवाह के लिए जोड़ी थी, मैं हनीमून के समय तुम्हें सौंप चुकी हूँ.”

“जयति, तुम अपनी नौकरी के आधार पर बैंक से लोन ले सकती हो. अगर मैं लोन लूँगा तो किश्तें चुकाने के लिए घर के खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी जो संभव नहीं है.”

“यह तुम क्या कह रहे हो देव, मैं नौकरी आत्म-निर्भरता के लिए कर रही हूँ, लोन लेने के बाद तो लम्बे समय तक किश्तें चुकानी पड़ेंगी...फिर जब हमारा परिवार बढ़ेगा...तो मैं नौकरी छोड़ भी सकती हूँ, अतः मैं यह रिस्क नहीं ले सकती...बहनों का विवाह उनकी नौकरी लगने के बाद भी किया जा सकता है.”

“मगर जयति,तुम्हारा भविष्य मुझसे जुड़ा हुआ है न...और मैं जब तक अपनी पारिवारिक जवाबदारियों से मुक्त नहीं हो जाता, परिवार बढ़ाने के पक्ष में नहीं हूँ. क्या तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं है?”

“विश्वास न होता तो तुमसे विवाह ही क्यों करती देव, मगर कल किसने देखा है...”

“कल की चिंता मुझपर छोड़ दो जयति प्लीज़! मैंने तुम्हारे भरोसे पर ही माँ-पिता को बेफिक्र रहने का आश्वासन दिया है.मेरे माँ-पिता ने अंतरजातीय विवाह होते हुए भी बिना दहेज अपनी सहमति दी तो तुम्हें भी सहयोग करके उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए.”

जयति समझ गई कि सुबह की बैठक में उससे रकम हथियाने के लिए भावनात्मक जाल बुना गया है, मगर वो भी आजकल की हवा का रुख खूब पहचानती थी, उसने दो टूक उत्तर दिया-

“देखो देव, तुम अपनी पूरी कमाई घर खर्च के लिए दे देते हो, इसमें मुझे कोई ऐतराज नहीं और मैं अपने निजी खर्च के अलावा घर की छोटी-मोटी आवश्यकताओं के लिए भी यथासंभव सहयोग के लिए पीछे नहीं हटूँगी मगर लाखों का लोन लेकर मैं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकती...

मुझे अपनी कमाई अपनी इच्छा से खर्च करने का पूरा अधिकार है और मैं इस अधिकार में किसी को सेंध नहीं लगाने दूँगी...विवाह से पहले तुमने ऐसी कोई शर्त भी नहीं रखी थी कि मेरी कमाई पर मेरा हक़ नहीं रहेगा. अगर मैं समझ सकती कि मुझसे दहेज इस रूप में वसूला जाएगा तो मैं हरगिज़ तुमसे विवाह नहीं करती. नाक को सीधे पकड़ो या हाथ घुमाकर, एक ही बात है. मेरे माँ-पिता में मेरे लिए दहेज जुटाने की क्षमता नहीं थी, मगर उनके ही प्रोत्साहन और सहयोग से मैं इस मुकाम तक पहुँची हूँ.”

“मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी जयति, अगर तुम्हारा यही फैसला है तो इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं...” कहते हुए देव कमरे से बाहर निकल गया.

देव का जवाब सुनकर जयति जड़वत रह गई. अगर देव का प्यार और जीवन भर साथ निभाने की कसमें स्वार्थ सेतु पर ही टिकी हुई थीं तो वो भी हार नहीं मानेगी और ऐसे दहेज-लोभी को सबक सिखाकर रहेगी.यह सोचकर उसने हिम्मत से काम लेते हुए तुरंत टैक्सी के लिए फोन करके अपने गहने-कपड़े पैक किये और घर छोड़कर निकल पड़ी. सास-ससुर उसे जाते हुए देखते रहे मगर उसे रोकने का प्रयास किसी ने नहीं किया. शायद वे सारा मामला भाँप गए थे. आखिर यह सब उनकी मिली भगत का ही तो परिणाम था.

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जयति को सामान के साथ टैक्सी से अकेले उतरते देखकर माँ-पिता एक-दूसरे को सवालिया नज़रों से देखने लगे.

जयति ने अन्दर आकर उनको प्रणाम किया और सब एक साथ बैठक में आ गए. माँ-पिता के पूछने पर उसने भरे गले से सारी दास्तान कहकर सुनाई. उन्होंने उसे तुरंत सांत्वना देते हुए कहा-

"बेटी दुःख न करो, हम तुम्हारे साथ हैं. यह घर तुम्हारा भी है."

मगर जयति समझ गई थी कि बेटियों का कोई घर नहीं होता, चाहे इस बात को माँ-पिता को मजबूरी में ही कहना पड़ता होगा कि यह घर उनके लिए पराया है, क्योंकि उन्हें पति के घर जाना होता है...और पति का घर? वो भी सारे त्याग-तपस्या के बावजूद उनका नहीं हो सकता, जब चाहे उन्हें प्रताड़ित और अपमानित करके बाहर कर दिया जाता है.

इन दो वर्षों में भाई का विवाह हो चुका था. वो भाई के विवाह में सिर्फ चार दिन के लिए देवराज के साथ आई थी और उसके बाद पहली बार ही मायके आई थी. भाभी सुन्दर और नम्र व्यवहार वाली थी. जयति अपने पुराने दिनों को ढूँढती हुई घर के कोने कोने को अपनी व्यथा सुनाने लगी. आँगन में उसके पसीने से पाली-पोसी हुई बगिया का नामोनिशान तक नहीं था, जबकि पिछली बार सब कुछ यथावत था. जयति को दुःख तो हुआ मगर उसने लापरवाही से सिर झटक दिया. जब यह घर उसका है ही नहीं तो कैसा संताप! उसका कमरा अब भाई-भाभी का था. उसे विवाह से पहले, हाल में भाई के लिए नियत स्थान रहने-सोने के लिए दे दिया गया. उसने नियति को स्वीकार करते हुए मन-ही-मन सबसे पहले किसी सोसायटी में अपना घर खरीदने का संकल्प किया. अपना घर...जहाँ सुनहरी सुबह और सुरमई शाम का एक टुकड़ा सिर्फ उसका होगा. बालकनी में बैठकर वो सुगंध बिखेरते हुए फूल, उगता-डूबता सूरज, चमकते सितारे, चाँद की चाँदनी और रात की रागिनी महसूस कर सकेगी.

अगले ही दिन जयति ने अपने कार्यालय में फोन करके अपरिहार्य कारण बताकर कुछ दिन की छुट्टी के साथ ही उसी कंपनी की शहर की किसी अन्य शाखा में स्थानांतरण के लिए आवेदन भेज दिया. यह सब इतना आसान नहीं था मगर काफी जद्दोजहद और औपचारिकताओं के बाद उसे अपने मौजूदा कार्यालय से कुछ दूर उसी पद पर स्थानांतरित कर दिया गया. यह स्थान उसके माँ-पिता के घर से काफी दूर होने के कारण उसने उसी इलाके की एक सोसायटी में किराये का फ़्लैट लेकर रहना शुरू कर दिया.

कार्यालय जाना शुरू करते ही वो आसपास ही एक निर्माणाधीन सोसायटी में अपना फ़्लैट बुक करने के लिए बैक से लोन लेने की कवायद में जुट गई और अच्छी नौकरी के आधार पर उसका लोन शीघ्र ही स्वीकृत भी हो गया और उसने एक बेडरूम हाल किचन वाला फ़्लैट बुक करने के बाद ही चैन की साँस ली.

लगभग दो वर्षों में फ़्लैट पूरा हो गया और कुछ समय साज सज्जा में गुज़र गया. अकेली यह सब करते-करते जयति शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुकी थी मगर संतुष्ट थी कि उसका अपने घर का एक संकल्प पूरा हो चुका है. गृह प्रवेश की तिथि निर्धारित करके इस शुभ-अवसर पर उसने अपने परिजनों और नए कार्यालय के कुछ सहकर्मियों और अधिकारियों के अलावा स्थानीय फेसबुक मित्रों को आमंत्रित करने का मन बनाया. अपना फेसबुक खाता वो विवाह के बाद ही निष्क्रिय कर चुकी थी, अतः उसे फिर से सक्रिय करके उसने अपने विशेष मित्रों की सूची बनानी शुरू की.

इस प्रक्रिया में उसे अपने कालेज में साथ पढ़ने वाली प्रिय सखी विभारानी, जो उससे ६ महीने पहले ही विवाह करके पति के साथ अमेरिका चली गई थी, ऑनलाइन दिखाई दी.जयति ने तुरंत उसे मैसेज भेजा तो तत्काल उत्तर भी आ गया. हाय! हेलो! के साथ ही चैट पर बातें शुरू हो गईं.

“रानी, काफी लम्बे अरसे से हमारी बातचीत नहीं हुई, बताओ सखी, कैसी गुज़र रही है अमेरिका में...पतिदेव कैसे हैं और बाल बच्चे...?” जयति ने एक साथ प्रश्न दागते हुए पूछा.

“जयति, मेरा विनय से तलाक हो चुका है और मैं १५ दिन पहले ही भारत वापस आ गई हूँ...मुझे वहाँ की सभ्यता और संस्कृति बिल्कुल रास नहीं आई. विनय का नित्य नई औरतों के साथ खुलेआम घूमना-फिरना मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा था. अभी तक कोई बच्चा भी नहीं हुआ था, अतः काफी मानसिक यंत्रणा झेलने के बाद यह निर्णय लेना पड़ा. मैं इस समय पुणे में ही माँ-पिता के साथ हूँ.”

“ओह! सुनकर बहुत दुःख हुआ रानी, अब क्या करने का इरादा है?”

“कुछ दिन पहले पुणे के ही एक फेसबुक मित्र ने मेरी व्यथा-कथा सुनकर मेरे साथ विवाह की इच्छा प्रकट की और साथ ही अपनी कम्पनी के एक रिक्त पद पर नियुक्ति करवाने का वादा भी किया. उसकी पत्नी अमीर घराने से थी. कुछ समय पहले राजा की सीमित आय के कारण उसे छोड़कर चली गई थी. मैंने उससे अपने और उसके परिजनों के सामने ही मिलकर बातचीत की और सबकी साझा सहमति से हमारी सगाई हो गई.

१५ दिन बाद हमारी शादी भी होने वाली है. तुम तो ऐसी गुम हुई कि फिर ढूँढे नहीं मिली. फोन से भी संपर्क नहीं हो पाया.”

“वो क्या है रानी कि विवाह के बाद कुछ समय निजी ज़िन्दगी जीने की इच्छा से मैंने अपना मोबाईल नंबर बदलने के अलावा फेसबुक खाता भी निष्क्रिय कर दिया था. पर अब फिर वापस आ गई हूँ अपने मित्रों के बीच...”

“तो क्या अब निजी ज़िन्दगी से ऊब गई हो?” विभारानी ने परिहास के स्वर में पूछा.

“मेरी कहानी बहुत लम्बी है रानी, सामने मिलने पर सब विस्तार से बताऊँगी. मैंने नया फ़्लैट खरीदा है और अगले सप्ताह ही गृह-प्रवेश के अवसर पर कुछ पुराने विशेष स्थानीय मित्रों को आमंत्रित करने के लिए ही मैं फेसबुक पर सक्रिय हुई हूँ. अब तुम पुणे में ही हो तो तुम्हें इस अवसर पर आवश्यक रूप से आना है साथ ही अपने राजा को भी ले आना तो उनसे भी परिचय हो जाएगा.” जयति ने गंभीर स्वर में अपनी बात कही.

“अवश्य सखी, मुझे तुम्हें फिर से पाकर इतनी प्रसन्नता हो रही है कि शब्दों में बयान नहीं कर सकती और तुम्हारी कहानी सुनने के लिए भी उत्सुक हूँ.”

जयति ने उसे अपने फ़्लैट का पता और नया मोबाइल नंबर नोट करवाया और आने का वादा लेकर विदा ली.

नियत दिन-वार पर विभारानी जयति के बताए पते पर पहुँच गई. फ़्लैट का मुख्य द्वार वंदनवार से सजा हुआ था. उसपर सुन्दर सा नामपट्ट लगा हुआ था मगर उसकी इबारत पढ़ते ही विभारानी की आँखों में अनेक प्रश्न तैरने लगे. नामपट्ट पर ऊपर पतले शब्दों में लिखा था- “यह घर मेरा है” और नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था “संकल्पिता”. सोच में डूबी विभारानी ने घंटी का बटन दबा दिया. तुरंत द्वार खोलकर जयति उसके गले से लिपट गई और प्यार से हाथ थामकर अन्दर आमंत्रित मेहमानों के साथ बिठाया. उसने विभारानी से अकेली आने का कारण पूछा तो उसने कहा- राजा को कुछ निजी काम है, कार्यक्रम के बाद मैं उसे फोन करूँगी तो वो मुझे लेने आ जाएगा.

हाल में ही हवन कुण्ड सजा हुआ था और पंडितजी भी आ चुके थे लेकिन पूजा के समय जब जयति अकेली बैठी तो विभारानी को आशंकाओं ने घेर लिया. वो सबके सामने कुछ पूछ भी नहीं सकती थी अतः अभी चुप रहना ही ठीक समझा. हवन-पूजन के बाद मेहमानों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. धीरे-धीरे सभी मेहमान फिर कुछ देर में परिजन भी उसे उपहारों के साथ सौ हिदायतें और शुभकामनाएँ देते हुए विदा हुए. अब घर में केवल दोनों सखियाँ ही थीं.

एकांत पाते ही विभारानी जयति से मुखातिब हुई-

“जयति, तुम अकेली क्यों और घर के नाम-पट पर –“यह घर मेरा है-

“संकल्पिता”...??"

जयति ने विभारानी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए अपनी सारी बीती हुई दास्तान विस्तार से कह सुनाई. सुनकर विभारानी के तो रोंगटे ही खड़े हो गए. फिर कुछ संयत होकर पूछा-

“मगर जयति,अब यह पहाड़ सी ज़िन्दगी क्या अकेले काट सकोगी?”

“अकेले क्यों रानी, क्या यह धरती मानव रहित हो गई है? मैं एक दानव के पीछे अपनी ज़िन्दगी के सुखों का उत्सर्ग नहीं करने वाली...ऐसा करना तो इस सुन्दर सृष्टि और सृष्टिकर्ता का अपमान ही होगा बहन...मगर मेरा साथी एक संवेदन शील इंसान होगा.मेरी जंग मानवों में छुपी हुई दानवी प्रवृत्ति से है.आज जब बेटियों को आत्मनिर्भर होने और दहेज के दानव से बचाने के लिए उनके माँ-पिता उसे बेटों के सामान सुविधाएँ देकर पढ़ाते-लिखाते हैं तो इसलिए नहीं कि उनकी अर्जित कमाई पर ही भावनात्मक रूप से विवश करके डाका डाला जाए...यानी वही दहेज का दानव अपना रूप बदलकर बेटियों को निगलने के लिए जबड़े खोलकर बैठा है और रानी,मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूँगी.

जो पुरुष, नारी का सम्मान करना नहीं जानते, उन्हें चुन-चुनकर सजा देने के लिए मैं हर जनम में बेटी बनकर आना चाहूँगी. मेरा घर बनाने का संकल्प पूर्ण हो चुका है,अब अगला संकल्प उस धन-लोलुप नर पशु का चेहरा सार्वजनिक करने का है, इसी कारण नामपट पर “संकल्पिता” लिखवाया है.

अब फुर्सत मिलते ही फेसबुक पर अपने स्टेटस में सार्वजनिक रूप से उसकी असलियत का चिट्ठा खोलकर रख दूँगी और सभी बहन-बेटियों से आह्वान करूँगी कि ऐसे दुष्टों को पहचानें और अपने-अपने कार्य-क्षेत्रों में उन्हें एक जुट होकर धिक्कृत करें ताकि फिर कभी वे किसी नारी का किसी भी रूप में शोषण अथवा अपमान करने की हिम्मत न कर सकें. देखती हूँ कि मेरे अभियान में कौन-कौन मेरा साथ देता है...”

"मैं तुम्हारी हिम्मत की दाद देती हूँ सखी.. मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ.”

विभारानी ने कह तो दिया मगर सोच में डूब गई. क्या उसके साथ भी ऐसा हो सकता है? राजा ने उसे अपने ही कार्यालय में एक खाली पद पर नौकरी दिलाने का वादा किया है, कहीं यह भी उसी दहेज वसूली का हिस्सा तो नहीं? वो आज ही राजा से स्पष्ट बात करेगी ताकि आगे मनमुटाव न हो.

तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी और राजा का नाम देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. राजा उसे लेने आ गया था और बिल्डिंग के बाहर उसका इंतजार कर रहा था. विभारानी ने जयति से कहा वो नीचे से राजा को लेकर आ रही है. उसके जाते ही जयति किचन में नाश्ते की व्यवस्था करने चली गई.

घंटी बजी और द्वार खुलते ही राजा का हाथ थामे हुए विभारानी ने मुस्कुराते हुए अन्दर प्रवेश किया. मगर जयति पर नज़र पड़ते ही राजा की दशा ऐसी हो गई जैसे सैकड़ों बिच्छुओं ने उसे एक साथ डस लिया हो. उसके पसीने छूटने लगे और वो विभारानी से अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करने लगा. विभारानी दोनों के चेहरों के बदलते हावभाव देखकर हक्की बक्की मामला समझने का प्रयास करने लगी. उसे लगा कि वे दोनों शायद पूर्व परिचित हैं. फिर भी पूरी स्थिति को समझने के लिए राजा का हाथ लगभग खींचती हुई उसके साथ चलकर सोफे पर बैठ गई. अब तक जयति कुछ सँभल चुकी थी. वो भी सामने ही बैठ गई.

विभारानी ने जयति का परिचय करवाते हुए कहा-

“राजा, यह है मेरी प्रिय सखी जयति उर्फ़ “संकल्पिता” और जयति...”

“रुको रानी, मैं इनका परिचय करवाती हूँ...ये हैं मिस्टर देवराज उर्फ़ ‘देव’, मेरे पूर्व पति और तुम्हारे मंगेतर उर्फ़ रानी के ‘राजा’...” जयति ने आग उगलती हुई नज़रों से देवराज को घूरते हुए कहा.

“सुनकर विभा को सारा ब्रह्माण्ड घूमता हुआ नज़र आने लगा...अवसाद में डूबकर बुदबुदाने लगी- हा रे लोभी पुरुष! तुम्हारी स्वार्थी सोच के आगे सारे महिला विमर्श, कहानी-कविताएँ सब व्यर्थ हैं... फिर सहसा चीख पड़ी- नहीं... जयति मंगेतर नहीं...पूर्व मंगेतर...मैं तुम्हारे साथ हूँ सखी...” कहकर विभा ने बहते हुए आँसुओं को रोकने का प्रयास करते हुए अपनी अँगुली से सगाई की अँगूठी उतारकर देवराज की अँगुली में फँसा दी.

-कल्पना रामानी-नवी मुंबई

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“maan, dekho n! jeetoo ne phir se gulaab kaa phool tod liyaa, aap use manaa kyon naheen karateen”

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“are betee, wo bhagawaan ko hee to chढ़aataa hai nphir ghar men bhee kitanee sugandh banee rahatee hai”!

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“magar maan, jab chamelee aur mogare men dher saare phool lage hain to gulaab ke phool kyon todanaa?usamen to phool bahut kam aate hain waise bhee mujhe to saare phool paudhon par hee lage hue achche lagate hain kitane din tak khile-khile rahate hain maan! magar todate hee ek din men hee murajhaa jaate hain aur unhen koode men phenk diyaa jaataa hai yah to unhen samay se pahale hee mriityudand denaa hee huaa n! bhagawaan to agarabattee se bhee raazee ho jaate hainbhalaa apanee hee rachanaa kaa yah ant dekhakar kaise prasann honge?”

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"itanaa moh mat rakho betee, ab tum kuch hee dinon men sasuraal chalee jaaogee to inakee dekharekh kaun karegaa?

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ab apane ghar jaakar hee bagiyaa sajaanaa"

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"achchaa! to yah ghar abhee se mere lie paraayaa ho gayaa?"

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"naheen betee, magar tum itanee mehanat karatee ho to sochatee hoon, tumhaare jaane ke baad yah sab kaun karegaa? n jaane kaisee ladakee is ghar men bahoo banakar aae"

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sasuraal aur apane ghar kee kalpanaa se jayati ke chehare par muskaraahat aa gaee maan sach hee to kahatee haiwiwaah men ab din hee kitane rah gae hainaur wo bhawishy ke sunahare sapanon men kho gaee

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us din ke baad usane bhaaee ko tokanaa chod diyaa

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jayati apane maan-pitaa aur chote bhaaee ke saath pune shahar kee ek kॉlonee men rahatee thee usake pitaa ek sarakaaree widyaalay men adhyaapan kaary karate the ghar kee maalee haalat kamazor hone se wo naukaree lagane ke baad hee shaadee karanaa chaahatee thee ab to naukaree karate hue bhee 3-4 saal ho gae dewaraaj aur wo ek hee kampanee men kaaryarat hain aur yah wiwaah unake prem kaa parinaam hee hai ab wo wiwaah ke baad hee apane ghar ko khushabuon se sajaaegeeshochate sochate usake hothon par svatah sahaj muskaraahat ubhar aaee

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kuch hee samay baad wiwaah ho gayaa aur jayati sasuraal yaanee apane ghar aa gaee dewaraaj kaa ghar usakaa hee to huaa n!do bedaroom, haal, kichan waale flait men saas-sasur ke alaawaa kaalej men pढ़ne waalee do nanaden theen chotee beee pratham aur badee antim warsh kee chaatraa thee ghar kee aarthik sthiti kaisee bhee ho, magaraaajakal betiyaan dahej roopee daanaw se nipatane ke lie shikshaa poorn hone par naukaree karake aatmanirbhar hokar hee shaadee karanaa pasand karatee hain aur maan-pitaa kaa bhee unhen poorn sahayog tathaa protsaahan milataa hai

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jayati ko sasuraal men sab bahut pyaar aur sammaan ke saath rakhate the wijaateey hone ke baawajood saas-sasur ne bete kee pasand ko mahatv dete hue binaa kisee daan dahej ke wiwaah kee sveekriiti isalie dee thee ki chalo ladakee sundar, shikshit aur kamaaoo hai aur bete ko pasand haishaas lagabhag 55 warsh kee thee magar svasth aur chust thee use betee betee kahate n thakatee aur ghar ke saare kaam maharee kee sahaayataa se svayan hee nipataatee wo bas chote mote kaam karake apane kaaryaalay chalee jaatee thee sasur jee ne haal hee men naukaree se aichchik sewaanivriitti lekar mile hue paison se yah do bedaroom kaa flait khareed liyaa thaa ab ghar kharch kee saaree zimmedaaree dewaraaj par thee usake kamare kee baalakanee kaaphee badee aur chaudee thee yah dekhakar jayati kushee se phoolee naheen samaaee ek din awasar dekhakar usane pati se us parisar ko phoolon kee sugandh bikherate gamalon se sajaane kee anumati maangee lekin unhonne ganbheer mudraa banaakar kahaa-

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abhee kuch samay ke lie yah wichaar chod do”

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“lekin dew, main is kaary ke lie kisee se paise naheen loongee bagiyaa kee dekharekh kee saaree jawaabadaaree meree hogee” jayati ne aashaa bharee nigaahon se use nihaarate hue kahaa

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“tum ab paraaee to naheen jayati, apanaa paisaa abhee baink men hee rakho, samay par kaam aaegaa”

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dew kee tangadilee par jayati soch men pad gaee is kaam ke lie itanaa bhaaree kharch to hotaa naheen, phir kyon apanee kamaaee kaa paisaa wo apanee ichchaa se kharch naheen kar sakatee? usakaa man ek baaragee bujh saa gayaa magar abhee wo naee thee, atah apanee ichchaa ko philahaal man men hee dafan kar diyaa

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do warsh hansee-khushee beet gae badee nanad ab pढ़aaee pooree karake pratiyogee pareekshaaon kee taiyaaree men lag gaee thee, tabhee usake lie ek sanpann ghar se rishtaa aayaa pahale to usane apanaa kairiyar banaane se pahale wiwaah se inakaar kar diyaa magar phir maan-pitaa ke dabaaw aur wiwaah ke baad yah sab karane kee choot ke aashvaasan par apanee sveekriiti de dee

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badee dhoomadhaam se sagaaee kee rasm pooree huee aur sheeghr hee war paksh kee maang ke kaaran wiwaah kee taiyaariyaan bhee shuroo ho gaeen

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aaj rawivaar yaanee chuttee kaa din thaa sabakee dinacharyaa bhee chuttee ke din der se shuroo hotee hai, magar pakriiti-premee jayati is din jaldee uthakar neeche sosaayatee ke hee bhraman path par sair ke lie nikal jaatee hai sunaharee subah, khilee dhoop, sugandhit sheetal hawaa, ithalaate-laharaate ped paudhe, phool-kaliyaan, bhramar titaliyaan usakaa muskuraakar svaagat karate hain ghoom phir kar jaise hee oopar aaee, use saas-sasur aur pati ko baithak men dekhakar aashchary huaa kuch shabd kaanon men pade to lagaa nanad ke wiwaah kee hee charchaa chal rahee hai saas ne use pyaar se chaay naashtaa taiyaar karane ke lie kahaa to wo kichan men chalee gaee chuttee ke din waise to shaam koaksar wo dew ke saath kabhee moowee dekhane to kabhee lambee sair par baahar chalee jaatee hai to raatri-bhojan bhee baahar ho jaataa hai aur use thakaan utaarane kaa samay mil jaataa hai aaj bhee we baahar to gae magar dew kee ganbheer mudraa dekhakar jayati pareshaan see ho rahee thee ghar aate hee jayati ne kaaran poochaa-

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“kyaa baat hai dew, aaj itane ganbheer kyon ho? koee samasyaa ho to mujhe bhee bataao, shaayad kuch sahaayataa kar sakoon”

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“jayati, tum to jaanatee hee ho ki bahan ke wiwaah kee taiyaariyaan chal rahee hain aaj subah usee silasile men maan-pitaa se charchaa huee bade ghar se rishtaa jodaa hai to wiwaah ke lie bhee khaasee rakam jutaanee hogee pitaajee ne apanaa saaraa paisaa yah ghar khareedane men lagaa diyaa ab griihasthee meree kamaaee se kisee tarah chal rahee hai is samay hamen tumase aarthik sahayog kee apekshaa hai”

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“magar dew, main kyaa sahaayataa kar sakatee hoon bhalaa? tum to jaanate hee ho ki khaate kee saaree jamaa rakam jo wiwaah ke lie jodee thee, main haneemoon ke samay tumhen saunp chukee hoon”

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“jayati, tum apanee naukaree ke aadhaar par baink se lon le sakatee ho agar main lon loongaa to kishten chukaane ke lie ghar ke kharchon men katautee karanee padegee jo sanbhaw naheen hai”

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“yah tum kyaa kah rahe ho dew, main naukaree aatm-nirbharataa ke lie kar rahee hoon, lon lene ke baad to lambe samay tak kishten chukaanee padengeephir jab hamaaraa pariwaar bढ़egaato main naukaree chod bhee sakatee hoon, atah main yah risk naheen le sakateebahanon kaa wiwaah unakee naukaree lagane ke baad bhee kiyaa jaa sakataa hai”

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“magar jayati,tumhaaraa bhawishy mujhase judaa huaa hai naur main jab tak apanee paariwaarik jawaabadaariyon se mukt naheen ho jaataa, pariwaar bढ़aane ke paksh men naheen hoon kyaa tumhen mujhapar wishvaas naheen hai?”

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“wishvaas n hotaa to tumase wiwaah hee kyon karatee dew, magar kal kisane dekhaa hai”

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“kal kee chintaa mujhapar chod do jayati pleez! mainne tumhaare bharose par hee maan-pitaa ko bephikr rahane kaa aashvaasan diyaa haimere maan-pitaa ne antarajaateey wiwaah hote hue bhee binaa dahej apanee sahamati dee to tumhen bhee sahayog karake unakee bhaawanaaon kaa sammaan karanaa chaahie”

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jayati samajh gaee ki subah kee baithak men usase rakam hathiyaane ke lie bhaawanaatmak jaal bunaa gayaa hai, magar wo bhee aajakal kee hawaa kaa rukh khoob pahachaanatee thee, usane do took uttar diyaa-

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“dekho dew, tum apanee pooree kamaaee ghar kharch ke lie de dete ho, isamen mujhe koee aitaraaj naheen aur main apane nijee kharch ke alaawaa ghar kee chotee-motee aawashyakataaon ke lie bhee yathaasanbhaw sahayog ke lie peeche naheen hatoongee magar laakhon kaa lon lekar main apane pairon par kulhaadee naheen maar sakatee

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mujhe apanee kamaaee apanee ichchaa se kharch karane kaa pooraa adhikaar hai aur main is adhikaar men kisee ko sendh naheen lagaane doongeewiwaah se pahale tumane aisee koee shart bhee naheen rakhee thee ki meree kamaaee par meraa haq naheen rahegaa agar main samajh sakatee ki mujhase dahej is roop men wasoolaa jaaegaa to main haragiz tumase wiwaah naheen karatee naak ko seedhe pakado yaa haath ghumaakar, ek hee baat hai mere maan-pitaa men mere lie dahej jutaane kee kshamataa naheen thee, magar unake hee protsaahan aur sahayog se main is mukaam tak pahunchee hoon”

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“mujhe tumase aisee ummeed naheen thee jayati, agar tumhaaraa yahee phaisalaa hai to is ghar men tumhaare lie koee jagah naheen” kahate hue dew kamare se baahar nikal gayaa

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dew kaa jawaab sunakar jayati jadawat rah gaee agar dew kaa pyaar aur jeewan bhar saath nibhaane kee kasamen svaarth setu par hee tikee huee theen to wo bhee haar naheen maanegee aur aise dahej-lobhee ko sabak sikhaakar rahegeeyah sochakar usane himmat se kaam lete hue turant taiksee ke lie phon karake apane gahane-kapade paik kiye aur ghar chodakar nikal padee saas-sasur use jaate hue dekhate rahe magar use rokane kaa prayaas kisee ne naheen kiyaa shaayad we saaraa maamalaa bhaanp gae the aakhir yah sab unakee milee bhagat kaa hee to parinaam thaa

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jayati ko saamaan ke saath taiksee se akele utarate dekhakar maan-pitaa ek-doosare ko sawaaliyaa nazaron se dekhane lage

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jayati ne andar aakar unako pranaam kiyaa aur sab ek saath baithak men aa gae maan-pitaa ke poochane par usane bhare gale se saaree daastaan kahakar sunaaee unhonne use turant saantvanaa dete hue kahaa-

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"betee duhkh n karo, ham tumhaare saath hain yah ghar tumhaaraa bhee hai"

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magar jayati samajh gaee thee ki betiyon kaa koee ghar naheen hotaa, chaahe is baat ko maan-pitaa ko majabooree men hee kahanaa padataa hogaa ki yah ghar unake lie paraayaa hai, kyonki unhen pati ke ghar jaanaa hotaa haiaur pati kaa ghar? wo bhee saare tyaag-tapasyaa ke baawajood unakaa naheen ho sakataa, jab chaahe unhen prataadit aur apamaanit karake baahar kar diyaa jaataa hai

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agale hee din jayati ne apane kaaryaalay men phon karake aparihaary kaaran bataakar kuch din kee chuttee ke saath hee usee kanpanee kee shahar kee kisee any shaakhaa men sthaanaantaran ke lie aawedan bhej diyaa yah sab itanaa aasaan naheen thaa magar kaaphee jaddojahad aur aupachaarikataaon ke baad use apane maujoodaa kaaryaalay se kuch door usee pad par sthaanaantarit kar diyaa gayaa yah sthaan usake maan-pitaa ke ghar se kaaphee door hone ke kaaran usane usee ilaake kee ek sosaayatee men kiraaye kaa flait lekar rahanaa shuroo kar diyaa

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kaaryaalay jaanaa shuroo karate hee wo aasapaas hee ek nirmaanaadheen sosaayatee men apanaa flait buk karane ke lie baik se lon lene kee kawaayad men jut gaee aur achchee naukaree ke aadhaar par usakaa lon sheeghr hee sveekriit bhee ho gayaa aur usane ek bedaroom haal kichan waalaa flait buk karane ke baad hee chain kee saans lee

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lagabhag do warshon men flait pooraa ho gayaa aur kuch samay saaj sajjaa men guzar gayaa akelee yah sab karate-karate jayati shaareerik aur maanasik roop se thak chukee thee magar santusht thee ki usakaa apane ghar kaa ek sankalp pooraa ho chukaa hai griih prawesh kee tithi nirdhaarit karake is shubh-awasar par usane apane parijanon aur nae kaaryaalay ke kuch sahakarmiyon aur adhikaariyon ke alaawaa sthaaneey phesabuk mitron ko aamantrit karane kaa man banaayaa apanaa phesabuk khaataa wo wiwaah ke baad hee nishkriy kar chukee thee, atah use phir se sakriy karake usane apane wishesh mitron kee soochee banaanee shuroo kee

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is prakriyaa men use apane kaalej men saath pढ़ne waalee priy sakhee wibhaaraanee, jo usase 6 maheene pahale hee wiwaah karake pati ke saath amerikaa chalee gaee thee, ऑnalaain dikhaaee deejayati ne turant use maisej bhejaa to tatkaal uttar bhee aa gayaa haay! helo! ke saath hee chait par baaten shuroo ho gaeen

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“raanee, kaaphee lambe arase se hamaaree baatacheet naheen huee, bataao sakhee, kaisee guzar rahee hai amerikaa menpatidew kaise hain aur baal bachche?” jayati ne ek saath prashn daagate hue poochaa

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“jayati, meraa winay se talaak ho chukaa hai aur main 15 din pahale hee bhaarat waapas aa gaee hoonmujhe wahaan kee sabhyataa aur sanskriiti bilkul raas naheen aaee winay kaa nity naee auraton ke saath khuleaam ghoomanaa-phiranaa mujhe chain se jeene naheen de rahaa thaa abhee tak koee bachchaa bhee naheen huaa thaa, atah kaaphee maanasik yantranaa jhelane ke baad yah nirnay lenaa padaa main is samay pune men hee maan-pitaa ke saath hoon”

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“oh! sunakar bahut duhkh huaa raanee, ab kyaa karane kaa iraadaa hai?”

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“kuch din pahale pune ke hee ek phesabuk mitr ne meree wyathaa-kathaa sunakar mere saath wiwaah kee ichchaa prakat kee aur saath hee apanee kampanee ke ek rikt pad par niyukti karawaane kaa waadaa bhee kiyaa usakee patnee ameer gharaane se thee kuch samay pahale raajaa kee seemit aay ke kaaran use chodakar chalee gaee thee mainne usase apane aur usake parijanon ke saamane hee milakar baatacheet kee aur sabakee saajhaa sahamati se hamaaree sagaaee ho gaee

15 din baad hamaaree shaadee bhee hone waalee hai tum to aisee gum huee ki phir dhoondhe naheen milee phon se bhee sanpark naheen ho paayaa”

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“wo kyaa hai raanee ki wiwaah ke baad kuch samay nijee zindagee jeene kee ichchaa se mainne apanaa mobaaeel nanbar badalane ke alaawaa phesabuk khaataa bhee nishkriy kar diyaa thaa par ab phir waapas aa gaee hoon apane mitron ke beech”

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“to kyaa ab nijee zindagee se oob gaee ho?” wibhaaraanee ne parihaas ke svar men poochaa

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“meree kahaanee bahut lambee hai raanee, saamane milane par sab wistaar se bataaoongee mainne nayaa flait khareedaa hai aur agale saptaah hee griih-prawesh ke awasar par kuch puraane wishesh sthaaneey mitron ko aamantrit karane ke lie hee main phesabuk par sakriy huee hoon ab tum pune men hee ho to tumhen is awasar par aawashyak roop se aanaa hai saath hee apane raajaa ko bhee le aanaa to unase bhee parichay ho jaaegaa” jayati ne ganbheer svar men apanee baat kahee

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“awashy sakhee, mujhe tumhen phir se paakar itanee prasannataa ho rahee hai ki shabdon men bayaan naheen kar sakatee aur tumhaaree kahaanee sunane ke lie bhee utsuk hoon”

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jayati ne use apane flait kaa pataa aur nayaa mobaail nanbar not karawaayaa aur aane kaa waadaa lekar widaa lee

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niyat din-waar par wibhaaraanee jayati ke bataae pate par pahunch gaee flait kaa mukhy dvaar wandanawaar se sajaa huaa thaa usapar sundar saa naamapatt lagaa huaa thaa magar usakee ibaarat pढ़te hee wibhaaraanee kee aankhon men anek prashn tairane lage naamapatt par oopar patale shabdon men likhaa thaa- “yah ghar meraa hai” aur neeche mote aksharon men likhaa thaa “sankalpitaa” soch men doobee wibhaaraanee ne ghantee kaa batan dabaa diyaa turant dvaar kholakar jayati usake gale se lipat gaee aur pyaar se haath thaamakar andar aamantrit mehamaanon ke saath bithaayaa usane wibhaaraanee se akelee aane kaa kaaran poochaa to usane kahaa- raajaa ko kuch nijee kaam hai, kaaryakram ke baad main use phon karoongee to wo mujhe lene aa jaaegaa

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haal men hee hawan kund sajaa huaa thaa aur panditajee bhee aa chuke the lekin poojaa ke samay jab jayati akelee baithee to wibhaaraanee ko aashankaaon ne gher liyaa wo sabake saamane kuch pooch bhee naheen sakatee thee atah abhee chup rahanaa hee theek samajhaa hawan-poojan ke baad mehamaanon ke lie bhojan kee wyawasthaa thee dheere-dheere sabhee mehamaan phir kuch der men parijan bhee use upahaaron ke saath sau hidaayaten aur shubhakaamanaaen dete hue widaa hue ab ghar men kewal donon sakhiyaan hee theen

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ekaant paate hee wibhaaraanee jayati se mukhaatib huee-

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“jayati, tum akelee kyon aur ghar ke naam-pat par –“yah ghar meraa hai-

“sankalpitaa”??"

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jayati ne wibhaaraanee kee jijnaasaa ko shaant karane ke lie apanee saaree beetee huee daastaan wistaar se kah sunaaee sunakar wibhaaraanee ke to rongate hee khade ho gae phir kuch sanyat hokar poochaa-

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“magar jayati,ab yah pahaad see zindagee kyaa akele kaat sakogee?”

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“akele kyon raanee, kyaa yah dharatee maanaw rahit ho gaee hai? main ek daanaw ke peeche apanee zindagee ke sukhon kaa utsarg naheen karane waaleeaisaa karanaa to is sundar sriishti aur sriishtikartaa kaa apamaan hee hogaa bahanmagar meraa saathee ek sanvedan sheel insaan hogaameree jang maanawon men chupee huee daanawee pravriitti se haiaaj jab betiyon ko aatmanirbhar hone aur dahej ke daanaw se bachaane ke lie unake maan-pitaa use beton ke saamaan suwidhaaen dekar pढ़aate-likhaate hain to isalie naheen ki unakee arjit kamaaee par hee bhaawanaatmak roop se wiwash karake daakaa daalaa jaaeyaanee wahee dahej kaa daanaw apanaa roop badalakar betiyon ko nigalane ke lie jabade kholakar baithaa hai aur raanee,main aisaa haragiz naheen hone doongee

jo purush, naaree kaa sammaan karanaa naheen jaanate, unhen chun-chunakar sajaa dene ke lie main har janam men betee banakar aanaa chaahoongee meraa ghar banaane kaa sankalp poorn ho chukaa hai,ab agalaa sankalp us dhan-lolup nar pashu kaa cheharaa saarvajanik karane kaa hai, isee kaaran naamapat par “sankalpitaa” likhawaayaa hai

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"main tumhaaree himmat kee daad detee hoon sakhee main sadaiw tumhaare saath hoon”

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wibhaaraanee ne kah to diyaa magar soch men doob gaee kyaa usake saath bhee aisaa ho sakataa hai? raajaa ne use apane hee kaaryaalay men ek khaalee pad par naukaree dilaane kaa waadaa kiyaa hai, kaheen yah bhee usee dahej wasoolee kaa hissaa to naheen? wo aaj hee raajaa se spasht baat karegee taaki aage manamutaaw n ho

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tabhee usake mobaail kee ghantee bajee aur raajaa kaa naam dekhakar usake chehare par muskaan aa gaee raajaa use lene aa gayaa thaa aur bilding ke baahar usakaa intajaar kar rahaa thaa wibhaaraanee ne jayati se kahaa wo neeche se raajaa ko lekar aa rahee hai usake jaate hee jayati kichan men naashte kee wyawasthaa karane chalee gaee

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ghantee bajee aur dvaar khulate hee raajaa kaa haath thaame hue wibhaaraanee ne muskuraate hue andar prawesh kiyaa magar jayati par nazar padate hee raajaa kee dashaa aisee ho gaee jaise saikadon bichchuon ne use ek saath das liyaa ho usake paseene chootane lage aur wo wibhaaraanee se apanaa haath chudaane kaa prayaas karane lagaa wibhaaraanee donon ke cheharon ke badalate haawabhaaw dekhakar hakkee bakkee maamalaa samajhane kaa prayaas karane lagee use lagaa ki we donon shaayad poorv parichit hain phir bhee pooree sthiti ko samajhane ke lie raajaa kaa haath lagabhag kheenchatee huee usake saath chalakar sophe par baith gaee ab tak jayati kuch sanbhal chukee thee wo bhee saamane hee baith gaee

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wibhaaraanee ne jayati kaa parichay karawaate hue kahaa-

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“raajaa, yah hai meree priy sakhee jayati urf “sankalpitaa” aur jayati”

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“ruko raanee, main inakaa parichay karawaatee hoonye hain mistar dewaraaj urf ‘dew’, mere poorv pati aur tumhaare mangetar urf raanee ke ‘raajaa’” jayati ne aag ugalatee huee nazaron se dewaraaj ko ghoorate hue kahaa

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“sunakar wibhaa ko saaraa brahmaand ghoomataa huaa nazar aane lagaaawasaad men doobakar budabudaane lagee- haa re lobhee purush! tumhaaree svaarthee soch ke aage saare mahilaa wimarsh, kahaanee-kawitaaen sab wyarth hain phir sahasaa cheekh padee- naheen jayati mangetar naheenpoorv mangetarmain tumhaare saath hoon sakhee” kahakar wibhaa ne bahate hue aansuon ko rokane kaa prayaas karate hue apanee angulee se sagaaee kee angoothee utaarakar dewaraaj kee angulee men phansaa dee

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-kalpanaa raamaanee-nawee munbaee

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“माँ, देखो न! जीतू ने फिर से गुलाब का फूल तोड़ लिया, आप उसे मना क्यों नहीं करतीं”

“अरे बेटी, वो भगवान् को ही तो चढ़ाता है न...फिर घर में भी कितनी सुगंध बनी रहती है”!

“मगर माँ, जब चमेली और मोगरे में ढेर सारे फूल लगे हैं तो गुलाब के फूल क्यों तोड़ना...?उसमें तो फूल बहुत कम आते हैं वैसे भी मुझे तो सारे फूल पौधों पर ही लगे हुए अच्छे लगते हैं. कितने दिन तक खिले-खिले रहते हैं माँ! मगर तोड़ते ही एक दिन में ही मुरझा जाते हैं और उन्हें कूड़े में फेंक दिया जाता है. यह तो उन्हें समय से पहले ही मृत्युदंड देना ही हुआ न! भगवान तो अगरबत्ती से भी राज़ी हो जाते हैं...भला अपनी ही रचना का यह अंत देखकर कैसे प्रसन्न होंगे?”

"इतना मोह मत रखो बेटी, अब तुम कुछ ही दिनों में ससुराल चली जाओगी तो इनकी देखरेख कौन करेगा?

अब अपने घर जाकर ही बगिया सजाना..."

"अच्छा! तो यह घर अभी से मेरे लिए पराया हो गया?"

"नहीं बेटी, मगर तुम इतनी मेहनत करती हो तो सोचती हूँ, तुम्हारे जाने के बाद यह सब कौन करेगा? न जाने कैसी लड़की इस घर में बहू बनकर आए..."

ससुराल और अपने घर की कल्पना से जयति के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. माँ सच ही तो कहती है...विवाह में अब दिन ही कितने रह गए हैं...और वो भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गई.

उस दिन के बाद उसने भाई को टोकना छोड़ दिया.

जयति अपने माँ-पिता और छोटे भाई के साथ पुणे शहर की एक कॉलोनी में रहती थी. उसके पिता एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य करते थे. घर की माली हालत कमज़ोर होने से वो नौकरी लगने के बाद ही शादी करना चाहती थी. अब तो नौकरी करते हुए भी ३-४ साल हो गए. देवराज और वो एक ही कम्पनी में कार्यरत हैं और यह विवाह उनके प्रेम का परिणाम ही है. अब वो विवाह के बाद ही अपने घर को खुशबुओं से सजाएगी...सोचते सोचते उसके होठों पर स्वतः सहज मुस्कराहट उभर आई.

कुछ ही समय बाद विवाह हो गया और जयति ससुराल यानी अपने घर आ गई. देवराज का घर उसका ही तो हुआ न!...दो बेडरूम, हाल, किचन वाले फ़्लैट में सास-ससुर के अलावा कालेज में पढ़ने वाली दो ननदें थीं. छोटी बी.ए प्रथम और बड़ी अंतिम वर्ष की छात्रा थी. घर की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, मगरआजकल बेटियाँ दहेज रूपी दानव से निपटने के लिए शिक्षा पूर्ण होने पर नौकरी करके आत्मनिर्भर होकर ही शादी करना पसंद करती हैं और माँ-पिता का भी उन्हें पूर्ण सहयोग तथा प्रोत्साहन मिलता है.

जयति को ससुराल में सब बहुत प्यार और सम्मान के साथ रखते थे. विजातीय होने के बावजूद सास-ससुर ने बेटे की पसंद को महत्व देते हुए बिना किसी दान दहेज के विवाह की स्वीकृति इसलिए दी थी कि चलो लड़की सुन्दर, शिक्षित और कमाऊ है और बेटे को पसंद है.सास लगभग ५५ वर्ष की थी मगर स्वस्थ और चुस्त थी. उसे बेटी... बेटी... कहते न थकती और घर के सारे काम महरी की सहायता से स्वयं ही निपटाती. वो बस छोटे मोटे काम करके अपने कार्यालय चली जाती थी. ससुर जी ने हाल ही में नौकरी से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर मिले हुए पैसों से यह दो बेडरूम का फ़्लैट खरीद लिया था. अब घर खर्च की सारी ज़िम्मेदारी देवराज पर थी. उसके कमरे की बालकनी काफी बड़ी और चौड़ी थी. यह देखकर जयति ख़ुशी से फूली नहीं समाई. एक दिन अवसर देखकर उसने पति से उस परिसर को फूलों की सुगंध बिखेरते गमलों से सजाने की अनुमति माँगी. लेकिन उन्होंने गंभीर मुद्रा बनाकर कहा-

“देखो जयति, इस कार्य में व्यर्थ ही काफी खर्च हो जाएगा, एक बार सजावट तो ठीक है लेकिन देखरेख के लिए माली भी लगाना पड़ेगा...घर खर्च ही खींचतान कर चल रहा है और अभी दो बहनों के विवाह भी करने हैं.

अभी कुछ समय के लिए यह विचार छोड़ दो.”

“लेकिन देव, मैं इस कार्य के लिए किसी से पैसे नहीं लूँगी. बगिया की देखरेख की सारी जवाबदारी मेरी होगी.” जयति ने आशा भरी निगाहों से उसे निहारते हुए कहा.

“तुम अब पराई तो नहीं जयति, अपना पैसा अभी बैंक में ही रखो, समय पर काम आएगा.”

देव की तंगदिली पर जयति सोच में पड़ गई. इस काम के लिए इतना भारी खर्च तो होता नहीं, फिर क्यों अपनी कमाई का पैसा वो अपनी इच्छा से खर्च नहीं कर सकती? उसका मन एक बारगी बुझ सा गया मगर अभी वो नई थी, अतः अपनी इच्छा को फिलहाल मन में ही दफ़न कर दिया.

दो वर्ष हँसी-खुशी बीत गए. बड़ी ननद अब पढ़ाई पूरी करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गई थी, तभी उसके लिए एक संपन्न घर से रिश्ता आया. पहले तो उसने अपना कैरियर बनाने से पहले विवाह से इनकार कर दिया मगर फिर माँ-पिता के दबाव और विवाह के बाद यह सब करने की छूट के आश्वासन पर अपनी स्वीकृति दे दी.

बड़ी धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी हुई और शीघ्र ही वर पक्ष की माँग के कारण विवाह की तैयारियाँ भी शुरू हो गईं.

आज रविवार यानी छुट्टी का दिन था. सबकी दिनचर्या भी छुट्टी के दिन देर से शुरू होती है, मगर पकृति-प्रेमी जयति इस दिन जल्दी उठकर नीचे सोसायटी के ही भ्रमण पथ पर सैर के लिए निकल जाती है. सुनहरी सुबह, खिली धूप, सुगन्धित शीतल हवा, इठलाते-लहराते पेड़ पौधे, फूल-कलियाँ, भ्रमर तितलियाँ उसका मुस्कुराकर स्वागत करते हैं. घूम फिर कर जैसे ही ऊपर आई, उसे सास-ससुर और पति को बैठक में देखकर आश्चर्य हुआ. कुछ शब्द कानों में पड़े तो लगा ननद के विवाह की ही चर्चा चल रही है. सास ने उसे प्यार से चाय नाश्ता तैयार करने के लिए कहा तो वो किचन में चली गई. छुट्टी के दिन वैसे तो शाम कोअक्सर वो देव के साथ कभी मूवी देखने तो कभी लम्बी सैर पर बाहर चली जाती है तो रात्रि-भोजन भी बाहर हो जाता है और उसे थकान उतारने का समय मिल जाता है. आज भी वे बाहर तो गए मगर देव की गंभीर मुद्रा देखकर जयति परेशान सी हो रही थी. घर आते ही जयति ने कारण पूछा-

“क्या बात है देव, आज इतने गंभीर क्यों हो? कोई समस्या हो तो मुझे भी बताओ, शायद कुछ सहायता कर सकूँ.”

“जयति, तुम तो जानती ही हो कि बहन के विवाह की तैयारियाँ चल रही हैं... आज सुबह उसी सिलसिले में माँ-पिता से चर्चा हुई. बड़े घर से रिश्ता जोड़ा है तो विवाह के लिए भी खासी रकम जुटानी होगी. पिताजी ने अपना सारा पैसा यह घर खरीदने में लगा दिया. अब गृहस्थी मेरी कमाई से किसी तरह चल रही है. इस समय हमें तुमसे आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है.”

“मगर देव, मैं क्या सहायता कर सकती हूँ भला? तुम तो जानते ही हो कि खाते की सारी जमा रकम जो विवाह के लिए जोड़ी थी, मैं हनीमून के समय तुम्हें सौंप चुकी हूँ.”

“जयति, तुम अपनी नौकरी के आधार पर बैंक से लोन ले सकती हो. अगर मैं लोन लूँगा तो किश्तें चुकाने के लिए घर के खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी जो संभव नहीं है.”

“यह तुम क्या कह रहे हो देव, मैं नौकरी आत्म-निर्भरता के लिए कर रही हूँ, लोन लेने के बाद तो लम्बे समय तक किश्तें चुकानी पड़ेंगी...फिर जब हमारा परिवार बढ़ेगा...तो मैं नौकरी छोड़ भी सकती हूँ, अतः मैं यह रिस्क नहीं ले सकती...बहनों का विवाह उनकी नौकरी लगने के बाद भी किया जा सकता है.”

“मगर जयति,तुम्हारा भविष्य मुझसे जुड़ा हुआ है न...और मैं जब तक अपनी पारिवारिक जवाबदारियों से मुक्त नहीं हो जाता, परिवार बढ़ाने के पक्ष में नहीं हूँ. क्या तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं है?”

“विश्वास न होता तो तुमसे विवाह ही क्यों करती देव, मगर कल किसने देखा है...”

“कल की चिंता मुझपर छोड़ दो जयति प्लीज़! मैंने तुम्हारे भरोसे पर ही माँ-पिता को बेफिक्र रहने का आश्वासन दिया है.मेरे माँ-पिता ने अंतरजातीय विवाह होते हुए भी बिना दहेज अपनी सहमति दी तो तुम्हें भी सहयोग करके उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए.”

जयति समझ गई कि सुबह की बैठक में उससे रकम हथियाने के लिए भावनात्मक जाल बुना गया है, मगर वो भी आजकल की हवा का रुख खूब पहचानती थी, उसने दो टूक उत्तर दिया-

“देखो देव, तुम अपनी पूरी कमाई घर खर्च के लिए दे देते हो, इसमें मुझे कोई ऐतराज नहीं और मैं अपने निजी खर्च के अलावा घर की छोटी-मोटी आवश्यकताओं के लिए भी यथासंभव सहयोग के लिए पीछे नहीं हटूँगी मगर लाखों का लोन लेकर मैं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकती...

मुझे अपनी कमाई अपनी इच्छा से खर्च करने का पूरा अधिकार है और मैं इस अधिकार में किसी को सेंध नहीं लगाने दूँगी...विवाह से पहले तुमने ऐसी कोई शर्त भी नहीं रखी थी कि मेरी कमाई पर मेरा हक़ नहीं रहेगा. अगर मैं समझ सकती कि मुझसे दहेज इस रूप में वसूला जाएगा तो मैं हरगिज़ तुमसे विवाह नहीं करती. नाक को सीधे पकड़ो या हाथ घुमाकर, एक ही बात है. मेरे माँ-पिता में मेरे लिए दहेज जुटाने की क्षमता नहीं थी, मगर उनके ही प्रोत्साहन और सहयोग से मैं इस मुकाम तक पहुँची हूँ.”

“मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी जयति, अगर तुम्हारा यही फैसला है तो इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं...” कहते हुए देव कमरे से बाहर निकल गया.

देव का जवाब सुनकर जयति जड़वत रह गई. अगर देव का प्यार और जीवन भर साथ निभाने की कसमें स्वार्थ सेतु पर ही टिकी हुई थीं तो वो भी हार नहीं मानेगी और ऐसे दहेज-लोभी को सबक सिखाकर रहेगी.यह सोचकर उसने हिम्मत से काम लेते हुए तुरंत टैक्सी के लिए फोन करके अपने गहने-कपड़े पैक किये और घर छोड़कर निकल पड़ी. सास-ससुर उसे जाते हुए देखते रहे मगर उसे रोकने का प्रयास किसी ने नहीं किया. शायद वे सारा मामला भाँप गए थे. आखिर यह सब उनकी मिली भगत का ही तो परिणाम था.

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जयति को सामान के साथ टैक्सी से अकेले उतरते देखकर माँ-पिता एक-दूसरे को सवालिया नज़रों से देखने लगे.

जयति ने अन्दर आकर उनको प्रणाम किया और सब एक साथ बैठक में आ गए. माँ-पिता के पूछने पर उसने भरे गले से सारी दास्तान कहकर सुनाई. उन्होंने उसे तुरंत सांत्वना देते हुए कहा-

"बेटी दुःख न करो, हम तुम्हारे साथ हैं. यह घर तुम्हारा भी है."

मगर जयति समझ गई थी कि बेटियों का कोई घर नहीं होता, चाहे इस बात को माँ-पिता को मजबूरी में ही कहना पड़ता होगा कि यह घर उनके लिए पराया है, क्योंकि उन्हें पति के घर जाना होता है...और पति का घर? वो भी सारे त्याग-तपस्या के बावजूद उनका नहीं हो सकता, जब चाहे उन्हें प्रताड़ित और अपमानित करके बाहर कर दिया जाता है.

इन दो वर्षों में भाई का विवाह हो चुका था. वो भाई के विवाह में सिर्फ चार दिन के लिए देवराज के साथ आई थी और उसके बाद पहली बार ही मायके आई थी. भाभी सुन्दर और नम्र व्यवहार वाली थी. जयति अपने पुराने दिनों को ढूँढती हुई घर के कोने कोने को अपनी व्यथा सुनाने लगी. आँगन में उसके पसीने से पाली-पोसी हुई बगिया का नामोनिशान तक नहीं था, जबकि पिछली बार सब कुछ यथावत था. जयति को दुःख तो हुआ मगर उसने लापरवाही से सिर झटक दिया. जब यह घर उसका है ही नहीं तो कैसा संताप! उसका कमरा अब भाई-भाभी का था. उसे विवाह से पहले, हाल में भाई के लिए नियत स्थान रहने-सोने के लिए दे दिया गया. उसने नियति को स्वीकार करते हुए मन-ही-मन सबसे पहले किसी सोसायटी में अपना घर खरीदने का संकल्प किया. अपना घर...जहाँ सुनहरी सुबह और सुरमई शाम का एक टुकड़ा सिर्फ उसका होगा. बालकनी में बैठकर वो सुगंध बिखेरते हुए फूल, उगता-डूबता सूरज, चमकते सितारे, चाँद की चाँदनी और रात की रागिनी महसूस कर सकेगी.

अगले ही दिन जयति ने अपने कार्यालय में फोन करके अपरिहार्य कारण बताकर कुछ दिन की छुट्टी के साथ ही उसी कंपनी की शहर की किसी अन्य शाखा में स्थानांतरण के लिए आवेदन भेज दिया. यह सब इतना आसान नहीं था मगर काफी जद्दोजहद और औपचारिकताओं के बाद उसे अपने मौजूदा कार्यालय से कुछ दूर उसी पद पर स्थानांतरित कर दिया गया. यह स्थान उसके माँ-पिता के घर से काफी दूर होने के कारण उसने उसी इलाके की एक सोसायटी में किराये का फ़्लैट लेकर रहना शुरू कर दिया.

कार्यालय जाना शुरू करते ही वो आसपास ही एक निर्माणाधीन सोसायटी में अपना फ़्लैट बुक करने के लिए बैक से लोन लेने की कवायद में जुट गई और अच्छी नौकरी के आधार पर उसका लोन शीघ्र ही स्वीकृत भी हो गया और उसने एक बेडरूम हाल किचन वाला फ़्लैट बुक करने के बाद ही चैन की साँस ली.

लगभग दो वर्षों में फ़्लैट पूरा हो गया और कुछ समय साज सज्जा में गुज़र गया. अकेली यह सब करते-करते जयति शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुकी थी मगर संतुष्ट थी कि उसका अपने घर का एक संकल्प पूरा हो चुका है. गृह प्रवेश की तिथि निर्धारित करके इस शुभ-अवसर पर उसने अपने परिजनों और नए कार्यालय के कुछ सहकर्मियों और अधिकारियों के अलावा स्थानीय फेसबुक मित्रों को आमंत्रित करने का मन बनाया. अपना फेसबुक खाता वो विवाह के बाद ही निष्क्रिय कर चुकी थी, अतः उसे फिर से सक्रिय करके उसने अपने विशेष मित्रों की सूची बनानी शुरू की.

इस प्रक्रिया में उसे अपने कालेज में साथ पढ़ने वाली प्रिय सखी विभारानी, जो उससे ६ महीने पहले ही विवाह करके पति के साथ अमेरिका चली गई थी, ऑनलाइन दिखाई दी.जयति ने तुरंत उसे मैसेज भेजा तो तत्काल उत्तर भी आ गया. हाय! हेलो! के साथ ही चैट पर बातें शुरू हो गईं.

“रानी, काफी लम्बे अरसे से हमारी बातचीत नहीं हुई, बताओ सखी, कैसी गुज़र रही है अमेरिका में...पतिदेव कैसे हैं और बाल बच्चे...?” जयति ने एक साथ प्रश्न दागते हुए पूछा.

“जयति, मेरा विनय से तलाक हो चुका है और मैं १५ दिन पहले ही भारत वापस आ गई हूँ...मुझे वहाँ की सभ्यता और संस्कृति बिल्कुल रास नहीं आई. विनय का नित्य नई औरतों के साथ खुलेआम घूमना-फिरना मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा था. अभी तक कोई बच्चा भी नहीं हुआ था, अतः काफी मानसिक यंत्रणा झेलने के बाद यह निर्णय लेना पड़ा. मैं इस समय पुणे में ही माँ-पिता के साथ हूँ.”

“ओह! सुनकर बहुत दुःख हुआ रानी, अब क्या करने का इरादा है?”

“कुछ दिन पहले पुणे के ही एक फेसबुक मित्र ने मेरी व्यथा-कथा सुनकर मेरे साथ विवाह की इच्छा प्रकट की और साथ ही अपनी कम्पनी के एक रिक्त पद पर नियुक्ति करवाने का वादा भी किया. उसकी पत्नी अमीर घराने से थी. कुछ समय पहले राजा की सीमित आय के कारण उसे छोड़कर चली गई थी. मैंने उससे अपने और उसके परिजनों के सामने ही मिलकर बातचीत की और सबकी साझा सहमति से हमारी सगाई हो गई.

१५ दिन बाद हमारी शादी भी होने वाली है. तुम तो ऐसी गुम हुई कि फिर ढूँढे नहीं मिली. फोन से भी संपर्क नहीं हो पाया.”

“वो क्या है रानी कि विवाह के बाद कुछ समय निजी ज़िन्दगी जीने की इच्छा से मैंने अपना मोबाईल नंबर बदलने के अलावा फेसबुक खाता भी निष्क्रिय कर दिया था. पर अब फिर वापस आ गई हूँ अपने मित्रों के बीच...”

“तो क्या अब निजी ज़िन्दगी से ऊब गई हो?” विभारानी ने परिहास के स्वर में पूछा.

“मेरी कहानी बहुत लम्बी है रानी, सामने मिलने पर सब विस्तार से बताऊँगी. मैंने नया फ़्लैट खरीदा है और अगले सप्ताह ही गृह-प्रवेश के अवसर पर कुछ पुराने विशेष स्थानीय मित्रों को आमंत्रित करने के लिए ही मैं फेसबुक पर सक्रिय हुई हूँ. अब तुम पुणे में ही हो तो तुम्हें इस अवसर पर आवश्यक रूप से आना है साथ ही अपने राजा को भी ले आना तो उनसे भी परिचय हो जाएगा.” जयति ने गंभीर स्वर में अपनी बात कही.

“अवश्य सखी, मुझे तुम्हें फिर से पाकर इतनी प्रसन्नता हो रही है कि शब्दों में बयान नहीं कर सकती और तुम्हारी कहानी सुनने के लिए भी उत्सुक हूँ.”

जयति ने उसे अपने फ़्लैट का पता और नया मोबाइल नंबर नोट करवाया और आने का वादा लेकर विदा ली.

नियत दिन-वार पर विभारानी जयति के बताए पते पर पहुँच गई. फ़्लैट का मुख्य द्वार वंदनवार से सजा हुआ था. उसपर सुन्दर सा नामपट्ट लगा हुआ था मगर उसकी इबारत पढ़ते ही विभारानी की आँखों में अनेक प्रश्न तैरने लगे. नामपट्ट पर ऊपर पतले शब्दों में लिखा था- “यह घर मेरा है” और नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था “संकल्पिता”. सोच में डूबी विभारानी ने घंटी का बटन दबा दिया. तुरंत द्वार खोलकर जयति उसके गले से लिपट गई और प्यार से हाथ थामकर अन्दर आमंत्रित मेहमानों के साथ बिठाया. उसने विभारानी से अकेली आने का कारण पूछा तो उसने कहा- राजा को कुछ निजी काम है, कार्यक्रम के बाद मैं उसे फोन करूँगी तो वो मुझे लेने आ जाएगा.

हाल में ही हवन कुण्ड सजा हुआ था और पंडितजी भी आ चुके थे लेकिन पूजा के समय जब जयति अकेली बैठी तो विभारानी को आशंकाओं ने घेर लिया. वो सबके सामने कुछ पूछ भी नहीं सकती थी अतः अभी चुप रहना ही ठीक समझा. हवन-पूजन के बाद मेहमानों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. धीरे-धीरे सभी मेहमान फिर कुछ देर में परिजन भी उसे उपहारों के साथ सौ हिदायतें और शुभकामनाएँ देते हुए विदा हुए. अब घर में केवल दोनों सखियाँ ही थीं.

एकांत पाते ही विभारानी जयति से मुखातिब हुई-

“जयति, तुम अकेली क्यों और घर के नाम-पट पर –“यह घर मेरा है-

“संकल्पिता”...??"

जयति ने विभारानी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए अपनी सारी बीती हुई दास्तान विस्तार से कह सुनाई. सुनकर विभारानी के तो रोंगटे ही खड़े हो गए. फिर कुछ संयत होकर पूछा-

“मगर जयति,अब यह पहाड़ सी ज़िन्दगी क्या अकेले काट सकोगी?”

“अकेले क्यों रानी, क्या यह धरती मानव रहित हो गई है? मैं एक दानव के पीछे अपनी ज़िन्दगी के सुखों का उत्सर्ग नहीं करने वाली...ऐसा करना तो इस सुन्दर सृष्टि और सृष्टिकर्ता का अपमान ही होगा बहन...मगर मेरा साथी एक संवेदन शील इंसान होगा.मेरी जंग मानवों में छुपी हुई दानवी प्रवृत्ति से है.आज जब बेटियों को आत्मनिर्भर होने और दहेज के दानव से बचाने के लिए उनके माँ-पिता उसे बेटों के सामान सुविधाएँ देकर पढ़ाते-लिखाते हैं तो इसलिए नहीं कि उनकी अर्जित कमाई पर ही भावनात्मक रूप से विवश करके डाका डाला जाए...यानी वही दहेज का दानव अपना रूप बदलकर बेटियों को निगलने के लिए जबड़े खोलकर बैठा है और रानी,मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूँगी.

जो पुरुष, नारी का सम्मान करना नहीं जानते, उन्हें चुन-चुनकर सजा देने के लिए मैं हर जनम में बेटी बनकर आना चाहूँगी. मेरा घर बनाने का संकल्प पूर्ण हो चुका है,अब अगला संकल्प उस धन-लोलुप नर पशु का चेहरा सार्वजनिक करने का है, इसी कारण नामपट पर “संकल्पिता” लिखवाया है.

अब फुर्सत मिलते ही फेसबुक पर अपने स्टेटस में सार्वजनिक रूप से उसकी असलियत का चिट्ठा खोलकर रख दूँगी और सभी बहन-बेटियों से आह्वान करूँगी कि ऐसे दुष्टों को पहचानें और अपने-अपने कार्य-क्षेत्रों में उन्हें एक जुट होकर धिक्कृत करें ताकि फिर कभी वे किसी नारी का किसी भी रूप में शोषण अथवा अपमान करने की हिम्मत न कर सकें. देखती हूँ कि मेरे अभियान में कौन-कौन मेरा साथ देता है...”

"मैं तुम्हारी हिम्मत की दाद देती हूँ सखी.. मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ.”

विभारानी ने कह तो दिया मगर सोच में डूब गई. क्या उसके साथ भी ऐसा हो सकता है? राजा ने उसे अपने ही कार्यालय में एक खाली पद पर नौकरी दिलाने का वादा किया है, कहीं यह भी उसी दहेज वसूली का हिस्सा तो नहीं? वो आज ही राजा से स्पष्ट बात करेगी ताकि आगे मनमुटाव न हो.

तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी और राजा का नाम देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. राजा उसे लेने आ गया था और बिल्डिंग के बाहर उसका इंतजार कर रहा था. विभारानी ने जयति से कहा वो नीचे से राजा को लेकर आ रही है. उसके जाते ही जयति किचन में नाश्ते की व्यवस्था करने चली गई.

घंटी बजी और द्वार खुलते ही राजा का हाथ थामे हुए विभारानी ने मुस्कुराते हुए अन्दर प्रवेश किया. मगर जयति पर नज़र पड़ते ही राजा की दशा ऐसी हो गई जैसे सैकड़ों बिच्छुओं ने उसे एक साथ डस लिया हो. उसके पसीने छूटने लगे और वो विभारानी से अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करने लगा. विभारानी दोनों के चेहरों के बदलते हावभाव देखकर हक्की बक्की मामला समझने का प्रयास करने लगी. उसे लगा कि वे दोनों शायद पूर्व परिचित हैं. फिर भी पूरी स्थिति को समझने के लिए राजा का हाथ लगभग खींचती हुई उसके साथ चलकर सोफे पर बैठ गई. अब तक जयति कुछ सँभल चुकी थी. वो भी सामने ही बैठ गई.

विभारानी ने जयति का परिचय करवाते हुए कहा-

“राजा, यह है मेरी प्रिय सखी जयति उर्फ़ “संकल्पिता” और जयति...”

“रुको रानी, मैं इनका परिचय करवाती हूँ...ये हैं मिस्टर देवराज उर्फ़ ‘देव’, मेरे पूर्व पति और तुम्हारे मंगेतर उर्फ़ रानी के ‘राजा’...” जयति ने आग उगलती हुई नज़रों से देवराज को घूरते हुए कहा.

“सुनकर विभा को सारा ब्रह्माण्ड घूमता हुआ नज़र आने लगा...अवसाद में डूबकर बुदबुदाने लगी- हा रे लोभी पुरुष! तुम्हारी स्वार्थी सोच के आगे सारे महिला विमर्श, कहानी-कविताएँ सब व्यर्थ हैं... फिर सहसा चीख पड़ी- नहीं... जयति मंगेतर नहीं...पूर्व मंगेतर...मैं तुम्हारे साथ हूँ सखी...” कहकर विभा ने बहते हुए आँसुओं को रोकने का प्रयास करते हुए अपनी अँगुली से सगाई की अँगूठी उतारकर देवराज की अँगुली में फँसा दी.

-कल्पना रामानी-नवी मुंबई

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗