ससुराल नहीं जाऊँगी -1 sasuraal naheen jaaoongee -1 ससुराल नहीं जाऊँगी -1
ट्राय दो दिन बाद ही शुभदा का विवाह है, आज मेहंदी की रस्म के लिए आमंत्रित की हुई सखियाँ ढोलक की थाप पर झूम रही थीं, मंगल गीत गाए जा रहे थे. उसके सपनों का राजकुमार प्रभात बारात लेकर आएगा और शुभदा सात फेरों के बंधन में बंधकर हमेशा के लिए उसकी हो जाएगी. सखियों से घिरी शुभदा के हाथों व पैरों में मेहंदी रचाई जा रही थी. हाल में धीमा सा मधुर संगीत गूँज रहा था. खुशनुमा वातावरण में चाय-नाश्ता, सखियों का थिरकना मेहंदी रचवाना आदि सारे कार्य संपन्न हो रहे थे. शुभदा एक तरफ तो प्रिय-मिलन के सतरंगी सपनों में खोई हुई थी दूसरी तरफ इस शुभ अवसर पर अपनी प्रिय सखी लीना की अनुपस्थिति से उसके मन के एक कोने में उदासी की बदली सी छाई हुई थी. रह रहकर विचारों का सैलाब सा उठ रहा था कि आखिर क्या कारण है जो लीना उसकी शादी के महत्वपूर्ण आयोजन में भी शामिल न हो सकी. शुभदा ने उसे निमंत्रण पत्र भेजने के साथ ही एक सप्ताह पहले आने का अनुरोध किया था. फोन पर तो उसने उत्साहपूर्वक अपनी सहमति भी दी थी मगर जब दूसरी बार बात की तो उसने इतना ही कहा था-
“शुभि, अगर मैं न आ सकूँ तो बुरा न मानना, तुम तो जानती ही हो कि मैं यहाँ कितनी विपरीत परिस्थितियों में घिरी हुई जी रही हूँ...हो सकेगा तो सुमेर के साथ एक दिन के लिए आ जाऊँगी. मेरी अनंत शुभकामनाएँ सदैव तुम्हारे साथ हैं, ईश्वर से प्रार्थना है की वो तुम्हारी झोली खुशियों से भर दे.”
लीना के इस तरह बोलने के अंदाज़ से ही शुभदा के मन को शंकाओं ने घेर लिया था. एक गहरी साँस लेकर शुभदा ने अपने मेहंदी भरे उस हाथ को निहारा जिसके बीचों-बीच मेहंदी से “प्रभात” का नाम लिखा हुआ था. उसे लगा जैसे वो मुस्कुराकर कह रहा हो-
“शुभि डियर, क्या सोच रही हो, आज के दिन भी कोई उदास होता है क्या?”
शुभदा ने चौंक कर आसपास देखा तो उसे कोई नज़र नहीं आया. उसकी सहेलियों की हँसी ठिठोली अचानक न जाने क्यों खुसुर-पुसुर में बदल गई थी. वे उससे काफी दूर झुण्ड बनाकर किसी चर्चा में लगी हुई थीं. शुभदा को उनकी बातें सुनाई नहीं दे रही थीं तो उसे थोड़ी झल्लाहट सी हुई कि आखिर वे सब उसे नज़रंदाज़ क्यों कर रही हैं? ज़रूर कुछ बात उससे छिपाई जा रही है.
उसने बेसब्र होकर अपनी मुँह लगी सहेली चित्रा को आवाज़ देकर बुलाया और पूछा तो वो टालमटोल करने लगी. अब तो शुभदा को यकीन हो गया कि अवश्य कुछ अप्रिय घटना हुई है. उसने चित्रा को अपनी कसम खिलाकर सच बात बताने को कहा तो वो रो पड़ी और सुबकते हुए खुलासा किया कि लीना ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है. यह बात उसे नम्रता ने बताई जो उसे इधर आते हुए रास्ते में पड़ने वाली लीना की बिल्डिंग के बाहर मिली थी. नम्रता को वहाँ भीड़ देखकर लोगों से पूछने पर मालूम हुआ.
हम तुम्हें यह बात नहीं बताना चाहती थीं... तुमने अपनी कसम क्यों खिलाई शुभि...तुम्हारा विवाह होने वाला है. अब तुम्हें स्वयं पर नियंत्रण रखना ही होगा. ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का बस भी तो नहीं चलता...”
चित्रा की बातें सुनकर शुभदा की तो जैसे साँसें ही थम गईं. उसकी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा. फिर रोते सुबकते हुए बोली-
“यह तुम क्या कह रही हो चित्रा, लीना जैसी दिलेर लड़की आत्महत्या कैसे कर सकती है?”
“मैं भी यही सोचती थी शुभि, मगर...” कहते हुए चित्रा की आँखों में आँसू आ गए
शुभदा की दुःख के अतिरेक से आँखें मुंदती चली गईं और उस अँधेरे में बीते दिनों के चित्र प्रतिबिंबित होने लगे.
शुभदा और लीना मुम्बई महानगर की एक ही टाउनशिप में रहती थीं। उनके फ्लैट अलग अलग बिल्डिंग में आसपास ही थे. बचपन से एक ही विद्यालय में पढ़ने के कारण उनकी आपस मे गहरी दोस्ती हो गई थी। स्कूली शिक्षा के बाद वे एक ही कालेज में दाखिला लेकर कॉलेज के ही लड़कियों के हॉस्टल में रहने लगी थीं। ग्रेजुएशन के बाद दोनों सखियों को अलग-अलग कंपनियों में जॉब भी मिल गया था।
आधुनिक परिवेश में पली बढ़ी लड़कियाँ अपने अधिकारों के प्रति सजग होती ही हैं. ऊपर से महानगर की हवनको और अधिक पंख फैलाना सिखा देती है. लेकिन लीना और शुभदा आधुनिकता की हवा से कोसों दूर अपनी पढ़ाई में ही व्यस्त रहती थीं. हाँ, अपने अधिकारों के प्रति सजग अवश्य थीं. उनमें अक्सर चर्चा हुआ करती थी कि वे विवाह अपने माँ-पिता की पसंद के लड़के से और मुंबई में ही करेंगी ताकि आड़े समय में अपने माता-पिता की देखभाल भी कर सकें, मगर ससुराल की बंदिशों के बोझ से अपनी ज़िंदगी को कभी बोझिल नहीं बनने देंगी।
लेकिन जब मन की कोरी किताब पर किसी का प्रेम अपने हस्ताक्षर कर देता है तो किताब के बाकी कोरे पन्ने खुद ब खुद कथा लिखते चले जाते हैं। जॉब के दौरान लीना के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उसका परिचय कार्यालय के ही एक हमउम्र सहकर्मी सुमेर से हुआ और उनका मित्रवत मेलजोल आगे बढ़कर नए रिश्ते में परिवर्तित होने लगा और उन्होंने हमेशा के लिए एक बंधन में बंधने का निर्णय ले लिया था।
सुमेर के पिता का कुछ समय पूर्व ही देहांत हो चुका था. मुंबई की ही एक सोसायटी में उनका अपना फ़्लैट था. उसकी माँ ने पति की मृत्यु के बाद उनके बीमे की रकम से फ़्लैट के एक कमरे में ही ब्यूटी पार्लर खोलकर सुमेर की शिक्षा पूरी करवाई. अब चूँकि सुमेर की नौकरी लग गई थी तो उसके विवाह के रिश्ते भी आने लग गए थे. सुमेर ने जब माँ को लीना के बारे में विस्तार से बताया तो उसने लड़की की पारिवारिक पृष्ठभूमि से संतुष्ट होकर सहमति दे दी और लीना के घर वालों से मिलकर बात पक्की कर ली. नौकरी की व्यस्तता और अचानक यह सब घटित होने के कारण लीना यह बात शुभदा को नहीं बता सकी थी, अतः छुट्टी के दिन उसके घर जाकर मोबाइल में सुमेर के ढेर सारे चित्र दिखाए और सारी बातें विस्तार से बताकर विवाह तय होने की जानकारी दी.
लीना का चयन निश्चित ही श्रेष्ठ था, शुभदा ने उसे गले से लगा लिया और नए सुखमय जीवन के लिए दिल से बधाई तथा शुभकामनाएँ दीं.
इस तरह शीघ्र ही लीना विवाह करके ससुराल चली गई. उसका ससुराल अलग इलाके में होते हुए भी अधिक दूर नहीं था, अतः वो हर सप्ताह अपने मम्मी पापा से मिलने अवश्य आती थी और शुभदा से मिले बिना वापस नहीं जाती थी. शादी के बाद उसके सौंदर्य में खूब निखार आ गया था. वो शुभदा को सुमेर के साथ आपसी प्यार से परिपूर्ण किस्से खूब चाव से सुनाती थी।
मगर यह सब चार दिन की चाँदनी थी. अब लीना जब भी आती, शुभदा को गुमसुम ही नज़र आती थी. शुभदा उसे कुरेदकर पूछती तो वो यह सोचकर टाल देती थी कि यह बात कहीं उसके माँ-पिता के कान में न पड़ जाए.
इस तरह दो वर्ष बीत गए. लीना का आना भी धीरे-धीरे कम होने लगा था इस बीच शुभदा का रिश्ता भी मुंबई के ही एक उपनगर में रहने वाले प्रभात सिन्हा से तय हो गया और शीघ्र ही विवाह की तिथि भी पक्की कर ली गई. शुभदा लीना को यह शुभ समाचार देने को व्याकुल थी.
इस बार लीना लम्बे समय बाद मायके आई थी. वो जब शुभदा से मिली तो शुभदा उसे देखकर हैरान रह गई थी. हमेशा चहकने और खिली-खिली रहने वाली लीना गुमसुम और काफी कमज़ोर नज़र आ रही थी. पूछने पर रो पड़ी थी और शुभदा के दबाव बनाने पर रोते-रोते बताया था कि तीन महीने हुए, उसके गर्भवती होने से उसका स्वास्थ्य गड़बड़ रहने लगा है जिससे घर के हालात काफी बिगड़ गए हैं. मायके भी इसी वजह से आना नहीं हुआ. वो इस उम्र में माँ-पिता को मानसिक कष्ट नहीं देना चाहती.
शादी के बाद उसने आरम्भ में ही रसोई के लिए एक महिला बावर्ची राधा तथा अन्य कार्यों के लिए अलग महरी नियुक्त कर ली थी. राधा के आते ही सास सुभद्रा देवी से पूछकर वो अपनी देखरेख में भोजन तैयार करवाती और फिर रात के भोजन के लिए शाम को ही उसे आने की हिदायत देकर अपना तथा सुमेर का भोजन टिफिन-पैक करके सुमेर के साथ ही कार्यालय के लिए निकल जाती थी.
शाम को घर आते ही थकी होने के बावजूद सबके लिए भोजन परोसती और रसोई सहेजकर सुबह की तैयारी करके ही सोने के लिए जाती थी. लेकिन अब सास वसुधा देवी राधा के हर कार्य में मीन मेख निकालने लगी थी और सुमेर से शिकायत करती. वो चाहती थी कि खाना लीना को ही बनाना चाहिए. उसने भी आज तक कामकाजी होने के बावजूद रसोई स्वयं सँभाली है, तो बहू क्यों नहीं कर सकती...? सुमेर पहले तो माँ को समझाता रहता था कि घर से काम करने और दफ्तर में पूरा दिन कार्य करने में बहुत अंतर है लेकिन माँ के जिद पकड़ लेने पर जब एक दिन अकेले में सुमेर ने लीना से कहा-
“लीना डियर तुम ही समायोजन करने का प्रयास करो, मैं माँ की शिकायत से परेशान रहने लगा हूँ.”
“यह तुम कैसे कह रहे हो सुमेर, क्या मैं इंसान नहीं हूँ जो दोहरा बोझ लादकर चलूँ? माँ जी को अगर राधा का काम पसंद नहीं है तो वे अपने लिए स्वयं भी तैयार कर सकती हैं...!”
“मैं ऐसा जवाब माँ को नहीं दे सकता लीना, तुमसे नहीं बने तो नौकरी छोड़ दो. वैसे भी मेरी आमदनी परिवार के लिए बहुत काफी है. ”
फिर जब सुमेर ने ही साथ नहीं दिया तो लीना का दिल टूट गया. उसके संस्कार ऐसे नहीं थे कि पति का विरोध करके रिश्ते में दरार पैदा कर ले. इससे उसके मम्मी पापा भी व्यर्थ परेशान होंगे अतः उसने नौकरी के साथ-साथ दोनों समय का खाना बनाना भी आरम्भ कर दिया.
इस तरह कुछ समय सरक गया और लीना गर्भवती हो गई. अब उससे नौकरी के साथ ही घर के कार्य नहीं हो पाते थे अतः उसका स्वास्थ्य कमज़ोर रहने लगा था. आखिर मन मारकर उसने नौकरी से इस्तीफा दे दिया. लेकिन पूरा दिन घर में रहकर भी उसे आराम तो नसीब नहीं हुआ, बल्कि सास की फरमाइशें बढ़ने लगीं. सुमेर के दफ्तर जाते ही उसका तानाशाही रुख शुरू हो जाता था और वो उसे ताने-तुनकों से छलनी किया करती. आराम करने के लिए कमरे में जाते ही उसकी पार्लर में आने वाली महिलाओं के चाय-नाश्ते के लिए पुकार आरम्भ हो जाती थी.
लीना पति को बिना बताए सब कुछ चुपचाप झेलती रहती और सास के ऊपर कभी गुस्सा नहीं करती थी. सुमेर की माँ के आगे बिल्कुल नहीं चलती थी. वो सुमेर को छोड़ नहीं सकती थी और सुमेर माँ को अकेली कैसे छोड़ दे...? सुमेर के साथ यह उसका प्रेम विवाह था, उसने लीना को माँ के शुष्क स्वभाव के बारे में पहले ही बता दिया था मगर लीना को विश्वास था कि अपने मृदु व्यवहार से उनका दिल जीत लेगी लेकिन अब उसे अहसास होने लगा था कि परिस्थितियों को बदलना इतना आसान नहीं. उसका शांत रहना भी सास को चुभता था और वो लीना को झगड़ने के लिए उकसाती थी ताकि सुमेर के सामने उसे नीचा दिखा सके.
वो लीना को एक पल भी बैठने न देती और कुछ न कुछ आदेश दिया करती. सुमेर के ध्यान न देने और अपने अधिकारों का हनन होते देखकर विवश होकर उसने पारिवारिक अदालत में अपनी समस्या के समाधान के लिए सास से अलग रहने कि के लिए अर्जी दे दी. उसके बाद उन तीनों को न्यायालय के परामर्श केंद्र में बुलाकर काउंसलिंग द्वारा समझाइश देकर वापस भेज दिया गया था. घर पहुँचकर तो सास और भी बिफरी शेरनी की तरह ऊल-जुलूल व्यवहार करने लगी थी. सुमेर ने भी माँ के खिलाफ कुछ सुनने से इनकार कर दिया था.
उसकी दास्तान सुनकर शुभदा चिंतित हो गई और उसने लीना को एक बार फिर अर्जी देकर अपनी अपनी माँग दोहराने की सलाह दी लेकिन लीना ने बताया था कि सुमेर ऐसा नहीं चाहता था. अब वो बच्चे के जन्म तक सब्र करके समय निकाल लेगी फिर हो सकता है परिस्थितियों में कुछ सुधार आ जाए।
शुभदा ने उसे फोन पर बात करते रहने की हिदायत देकर विदा किया था। शुभदा को यह आभास तक नहीं था कि उनका यह मिलना और विदाई अंतिम थी।
शुभदा को संदेह ही नहीं पूरा विश्वास था, कि लीना ने सास की प्रताड़नाओं से परेशान होकर ही यह कदम उठाया होगा. किसी तरह रुलाई रोककर शुभदा सहसा माँ को जोर से आवाजें लगाने लगी. बेटी की ऊँची आवाज़ से माँ-पिता दोनों ही तुरंत वहाँ आ गए.
विनीता देवी ने बेटी को रोते हुए देखा तो समझ गई कि उसे लीना वाली घटना का पता चल चुका है. उसने बेटी को गले से लगाकर धैर्य बँधाते हुए कहा-
“मन भारी न करो बेटी, हम सबको लीना के दुखद अंत पर बहुत अफ़सोस है, लेकिन
ईश्वर की इच्छा के आगे किसी की नहीं चलती.”
“नहीं माँ, यह ईश्वर की इच्छा नहीं शैतान सास की सोची समझी चाल है.
मेरी सखी इतनी कमज़ोर दिल नहीं थी... लेकिन जो कुछ हुआ है, उसने मुझे सोचने पर विवश कर दिया है. मैंने तय किया है कि मैं ससुराल नहीं जाऊँगी.”
क्रमशः...
traay do din baad hee shubhadaa kaa wiwaah hai, aaj mehandee kee rasm ke lie aamantrit kee huee sakhiyaan dholak kee thaap par jhoom rahee theen, mangal geet gaae jaa rahe the usake sapanon kaa raajakumaar prabhaat baaraat lekar aaegaa aur shubhadaa saat pheron ke bandhan men bandhakar hameshaa ke lie usakee ho jaaegee sakhiyon se ghiree shubhadaa ke haathon w pairon men mehandee rachaaee jaa rahee thee haal men dheemaa saa madhur sangeet goonj rahaa thaa khushanumaa waataawaran men chaay-naashtaa, sakhiyon kaa thirakanaa mehandee rachawaanaa aadi saare kaary sanpann ho rahe the shubhadaa ek taraph to priy-milan ke satarangee sapanon men khoee huee thee doosaree taraph is shubh awasar par apanee priy sakhee leenaa kee anupasthiti se usake man ke ek kone men udaasee kee badalee see chaaee huee thee rah rahakar wichaaron kaa sailaab saa uth rahaa thaa ki aakhir kyaa kaaran hai jo leenaa usakee shaadee ke mahatvapoorn aayojan men bhee shaamil n ho sakee shubhadaa ne use nimantran patr bhejane ke saath hee ek saptaah pahale aane kaa anurodh kiyaa thaa phon par to usane utsaahapoorvak apanee sahamati bhee dee thee magar jab doosaree baar baat kee to usane itanaa hee kahaa thaa-
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“naheen maan, yah eeshvar kee ichchaa naheen shaitaan saas kee sochee samajhee chaal hai
meree sakhee itanee kamazor dil naheen thee lekin jo kuch huaa hai, usane mujhe sochane par wiwash kar diyaa hai mainne tay kiyaa hai ki main sasuraal naheen jaaoongee”
kramashah
ट्राय दो दिन बाद ही शुभदा का विवाह है, आज मेहंदी की रस्म के लिए आमंत्रित की हुई सखियाँ ढोलक की थाप पर झूम रही थीं, मंगल गीत गाए जा रहे थे. उसके सपनों का राजकुमार प्रभात बारात लेकर आएगा और शुभदा सात फेरों के बंधन में बंधकर हमेशा के लिए उसकी हो जाएगी. सखियों से घिरी शुभदा के हाथों व पैरों में मेहंदी रचाई जा रही थी. हाल में धीमा सा मधुर संगीत गूँज रहा था. खुशनुमा वातावरण में चाय-नाश्ता, सखियों का थिरकना मेहंदी रचवाना आदि सारे कार्य संपन्न हो रहे थे. शुभदा एक तरफ तो प्रिय-मिलन के सतरंगी सपनों में खोई हुई थी दूसरी तरफ इस शुभ अवसर पर अपनी प्रिय सखी लीना की अनुपस्थिति से उसके मन के एक कोने में उदासी की बदली सी छाई हुई थी. रह रहकर विचारों का सैलाब सा उठ रहा था कि आखिर क्या कारण है जो लीना उसकी शादी के महत्वपूर्ण आयोजन में भी शामिल न हो सकी. शुभदा ने उसे निमंत्रण पत्र भेजने के साथ ही एक सप्ताह पहले आने का अनुरोध किया था. फोन पर तो उसने उत्साहपूर्वक अपनी सहमति भी दी थी मगर जब दूसरी बार बात की तो उसने इतना ही कहा था-
“शुभि, अगर मैं न आ सकूँ तो बुरा न मानना, तुम तो जानती ही हो कि मैं यहाँ कितनी विपरीत परिस्थितियों में घिरी हुई जी रही हूँ...हो सकेगा तो सुमेर के साथ एक दिन के लिए आ जाऊँगी. मेरी अनंत शुभकामनाएँ सदैव तुम्हारे साथ हैं, ईश्वर से प्रार्थना है की वो तुम्हारी झोली खुशियों से भर दे.”
लीना के इस तरह बोलने के अंदाज़ से ही शुभदा के मन को शंकाओं ने घेर लिया था. एक गहरी साँस लेकर शुभदा ने अपने मेहंदी भरे उस हाथ को निहारा जिसके बीचों-बीच मेहंदी से “प्रभात” का नाम लिखा हुआ था. उसे लगा जैसे वो मुस्कुराकर कह रहा हो-
“शुभि डियर, क्या सोच रही हो, आज के दिन भी कोई उदास होता है क्या?”
शुभदा ने चौंक कर आसपास देखा तो उसे कोई नज़र नहीं आया. उसकी सहेलियों की हँसी ठिठोली अचानक न जाने क्यों खुसुर-पुसुर में बदल गई थी. वे उससे काफी दूर झुण्ड बनाकर किसी चर्चा में लगी हुई थीं. शुभदा को उनकी बातें सुनाई नहीं दे रही थीं तो उसे थोड़ी झल्लाहट सी हुई कि आखिर वे सब उसे नज़रंदाज़ क्यों कर रही हैं? ज़रूर कुछ बात उससे छिपाई जा रही है.
उसने बेसब्र होकर अपनी मुँह लगी सहेली चित्रा को आवाज़ देकर बुलाया और पूछा तो वो टालमटोल करने लगी. अब तो शुभदा को यकीन हो गया कि अवश्य कुछ अप्रिय घटना हुई है. उसने चित्रा को अपनी कसम खिलाकर सच बात बताने को कहा तो वो रो पड़ी और सुबकते हुए खुलासा किया कि लीना ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है. यह बात उसे नम्रता ने बताई जो उसे इधर आते हुए रास्ते में पड़ने वाली लीना की बिल्डिंग के बाहर मिली थी. नम्रता को वहाँ भीड़ देखकर लोगों से पूछने पर मालूम हुआ.
हम तुम्हें यह बात नहीं बताना चाहती थीं... तुमने अपनी कसम क्यों खिलाई शुभि...तुम्हारा विवाह होने वाला है. अब तुम्हें स्वयं पर नियंत्रण रखना ही होगा. ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का बस भी तो नहीं चलता...”
चित्रा की बातें सुनकर शुभदा की तो जैसे साँसें ही थम गईं. उसकी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा. फिर रोते सुबकते हुए बोली-
“यह तुम क्या कह रही हो चित्रा, लीना जैसी दिलेर लड़की आत्महत्या कैसे कर सकती है?”
“मैं भी यही सोचती थी शुभि, मगर...” कहते हुए चित्रा की आँखों में आँसू आ गए
शुभदा की दुःख के अतिरेक से आँखें मुंदती चली गईं और उस अँधेरे में बीते दिनों के चित्र प्रतिबिंबित होने लगे.
शुभदा और लीना मुम्बई महानगर की एक ही टाउनशिप में रहती थीं। उनके फ्लैट अलग अलग बिल्डिंग में आसपास ही थे. बचपन से एक ही विद्यालय में पढ़ने के कारण उनकी आपस मे गहरी दोस्ती हो गई थी। स्कूली शिक्षा के बाद वे एक ही कालेज में दाखिला लेकर कॉलेज के ही लड़कियों के हॉस्टल में रहने लगी थीं। ग्रेजुएशन के बाद दोनों सखियों को अलग-अलग कंपनियों में जॉब भी मिल गया था।
आधुनिक परिवेश में पली बढ़ी लड़कियाँ अपने अधिकारों के प्रति सजग होती ही हैं. ऊपर से महानगर की हवनको और अधिक पंख फैलाना सिखा देती है. लेकिन लीना और शुभदा आधुनिकता की हवा से कोसों दूर अपनी पढ़ाई में ही व्यस्त रहती थीं. हाँ, अपने अधिकारों के प्रति सजग अवश्य थीं. उनमें अक्सर चर्चा हुआ करती थी कि वे विवाह अपने माँ-पिता की पसंद के लड़के से और मुंबई में ही करेंगी ताकि आड़े समय में अपने माता-पिता की देखभाल भी कर सकें, मगर ससुराल की बंदिशों के बोझ से अपनी ज़िंदगी को कभी बोझिल नहीं बनने देंगी।
लेकिन जब मन की कोरी किताब पर किसी का प्रेम अपने हस्ताक्षर कर देता है तो किताब के बाकी कोरे पन्ने खुद ब खुद कथा लिखते चले जाते हैं। जॉब के दौरान लीना के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उसका परिचय कार्यालय के ही एक हमउम्र सहकर्मी सुमेर से हुआ और उनका मित्रवत मेलजोल आगे बढ़कर नए रिश्ते में परिवर्तित होने लगा और उन्होंने हमेशा के लिए एक बंधन में बंधने का निर्णय ले लिया था।
सुमेर के पिता का कुछ समय पूर्व ही देहांत हो चुका था. मुंबई की ही एक सोसायटी में उनका अपना फ़्लैट था. उसकी माँ ने पति की मृत्यु के बाद उनके बीमे की रकम से फ़्लैट के एक कमरे में ही ब्यूटी पार्लर खोलकर सुमेर की शिक्षा पूरी करवाई. अब चूँकि सुमेर की नौकरी लग गई थी तो उसके विवाह के रिश्ते भी आने लग गए थे. सुमेर ने जब माँ को लीना के बारे में विस्तार से बताया तो उसने लड़की की पारिवारिक पृष्ठभूमि से संतुष्ट होकर सहमति दे दी और लीना के घर वालों से मिलकर बात पक्की कर ली. नौकरी की व्यस्तता और अचानक यह सब घटित होने के कारण लीना यह बात शुभदा को नहीं बता सकी थी, अतः छुट्टी के दिन उसके घर जाकर मोबाइल में सुमेर के ढेर सारे चित्र दिखाए और सारी बातें विस्तार से बताकर विवाह तय होने की जानकारी दी.
लीना का चयन निश्चित ही श्रेष्ठ था, शुभदा ने उसे गले से लगा लिया और नए सुखमय जीवन के लिए दिल से बधाई तथा शुभकामनाएँ दीं.
इस तरह शीघ्र ही लीना विवाह करके ससुराल चली गई. उसका ससुराल अलग इलाके में होते हुए भी अधिक दूर नहीं था, अतः वो हर सप्ताह अपने मम्मी पापा से मिलने अवश्य आती थी और शुभदा से मिले बिना वापस नहीं जाती थी. शादी के बाद उसके सौंदर्य में खूब निखार आ गया था. वो शुभदा को सुमेर के साथ आपसी प्यार से परिपूर्ण किस्से खूब चाव से सुनाती थी।
मगर यह सब चार दिन की चाँदनी थी. अब लीना जब भी आती, शुभदा को गुमसुम ही नज़र आती थी. शुभदा उसे कुरेदकर पूछती तो वो यह सोचकर टाल देती थी कि यह बात कहीं उसके माँ-पिता के कान में न पड़ जाए.
इस तरह दो वर्ष बीत गए. लीना का आना भी धीरे-धीरे कम होने लगा था इस बीच शुभदा का रिश्ता भी मुंबई के ही एक उपनगर में रहने वाले प्रभात सिन्हा से तय हो गया और शीघ्र ही विवाह की तिथि भी पक्की कर ली गई. शुभदा लीना को यह शुभ समाचार देने को व्याकुल थी.
इस बार लीना लम्बे समय बाद मायके आई थी. वो जब शुभदा से मिली तो शुभदा उसे देखकर हैरान रह गई थी. हमेशा चहकने और खिली-खिली रहने वाली लीना गुमसुम और काफी कमज़ोर नज़र आ रही थी. पूछने पर रो पड़ी थी और शुभदा के दबाव बनाने पर रोते-रोते बताया था कि तीन महीने हुए, उसके गर्भवती होने से उसका स्वास्थ्य गड़बड़ रहने लगा है जिससे घर के हालात काफी बिगड़ गए हैं. मायके भी इसी वजह से आना नहीं हुआ. वो इस उम्र में माँ-पिता को मानसिक कष्ट नहीं देना चाहती.
शादी के बाद उसने आरम्भ में ही रसोई के लिए एक महिला बावर्ची राधा तथा अन्य कार्यों के लिए अलग महरी नियुक्त कर ली थी. राधा के आते ही सास सुभद्रा देवी से पूछकर वो अपनी देखरेख में भोजन तैयार करवाती और फिर रात के भोजन के लिए शाम को ही उसे आने की हिदायत देकर अपना तथा सुमेर का भोजन टिफिन-पैक करके सुमेर के साथ ही कार्यालय के लिए निकल जाती थी.
शाम को घर आते ही थकी होने के बावजूद सबके लिए भोजन परोसती और रसोई सहेजकर सुबह की तैयारी करके ही सोने के लिए जाती थी. लेकिन अब सास वसुधा देवी राधा के हर कार्य में मीन मेख निकालने लगी थी और सुमेर से शिकायत करती. वो चाहती थी कि खाना लीना को ही बनाना चाहिए. उसने भी आज तक कामकाजी होने के बावजूद रसोई स्वयं सँभाली है, तो बहू क्यों नहीं कर सकती...? सुमेर पहले तो माँ को समझाता रहता था कि घर से काम करने और दफ्तर में पूरा दिन कार्य करने में बहुत अंतर है लेकिन माँ के जिद पकड़ लेने पर जब एक दिन अकेले में सुमेर ने लीना से कहा-
“लीना डियर तुम ही समायोजन करने का प्रयास करो, मैं माँ की शिकायत से परेशान रहने लगा हूँ.”
“यह तुम कैसे कह रहे हो सुमेर, क्या मैं इंसान नहीं हूँ जो दोहरा बोझ लादकर चलूँ? माँ जी को अगर राधा का काम पसंद नहीं है तो वे अपने लिए स्वयं भी तैयार कर सकती हैं...!”
“मैं ऐसा जवाब माँ को नहीं दे सकता लीना, तुमसे नहीं बने तो नौकरी छोड़ दो. वैसे भी मेरी आमदनी परिवार के लिए बहुत काफी है. ”
फिर जब सुमेर ने ही साथ नहीं दिया तो लीना का दिल टूट गया. उसके संस्कार ऐसे नहीं थे कि पति का विरोध करके रिश्ते में दरार पैदा कर ले. इससे उसके मम्मी पापा भी व्यर्थ परेशान होंगे अतः उसने नौकरी के साथ-साथ दोनों समय का खाना बनाना भी आरम्भ कर दिया.
इस तरह कुछ समय सरक गया और लीना गर्भवती हो गई. अब उससे नौकरी के साथ ही घर के कार्य नहीं हो पाते थे अतः उसका स्वास्थ्य कमज़ोर रहने लगा था. आखिर मन मारकर उसने नौकरी से इस्तीफा दे दिया. लेकिन पूरा दिन घर में रहकर भी उसे आराम तो नसीब नहीं हुआ, बल्कि सास की फरमाइशें बढ़ने लगीं. सुमेर के दफ्तर जाते ही उसका तानाशाही रुख शुरू हो जाता था और वो उसे ताने-तुनकों से छलनी किया करती. आराम करने के लिए कमरे में जाते ही उसकी पार्लर में आने वाली महिलाओं के चाय-नाश्ते के लिए पुकार आरम्भ हो जाती थी.
लीना पति को बिना बताए सब कुछ चुपचाप झेलती रहती और सास के ऊपर कभी गुस्सा नहीं करती थी. सुमेर की माँ के आगे बिल्कुल नहीं चलती थी. वो सुमेर को छोड़ नहीं सकती थी और सुमेर माँ को अकेली कैसे छोड़ दे...? सुमेर के साथ यह उसका प्रेम विवाह था, उसने लीना को माँ के शुष्क स्वभाव के बारे में पहले ही बता दिया था मगर लीना को विश्वास था कि अपने मृदु व्यवहार से उनका दिल जीत लेगी लेकिन अब उसे अहसास होने लगा था कि परिस्थितियों को बदलना इतना आसान नहीं. उसका शांत रहना भी सास को चुभता था और वो लीना को झगड़ने के लिए उकसाती थी ताकि सुमेर के सामने उसे नीचा दिखा सके.
वो लीना को एक पल भी बैठने न देती और कुछ न कुछ आदेश दिया करती. सुमेर के ध्यान न देने और अपने अधिकारों का हनन होते देखकर विवश होकर उसने पारिवारिक अदालत में अपनी समस्या के समाधान के लिए सास से अलग रहने कि के लिए अर्जी दे दी. उसके बाद उन तीनों को न्यायालय के परामर्श केंद्र में बुलाकर काउंसलिंग द्वारा समझाइश देकर वापस भेज दिया गया था. घर पहुँचकर तो सास और भी बिफरी शेरनी की तरह ऊल-जुलूल व्यवहार करने लगी थी. सुमेर ने भी माँ के खिलाफ कुछ सुनने से इनकार कर दिया था.
उसकी दास्तान सुनकर शुभदा चिंतित हो गई और उसने लीना को एक बार फिर अर्जी देकर अपनी अपनी माँग दोहराने की सलाह दी लेकिन लीना ने बताया था कि सुमेर ऐसा नहीं चाहता था. अब वो बच्चे के जन्म तक सब्र करके समय निकाल लेगी फिर हो सकता है परिस्थितियों में कुछ सुधार आ जाए।
शुभदा ने उसे फोन पर बात करते रहने की हिदायत देकर विदा किया था। शुभदा को यह आभास तक नहीं था कि उनका यह मिलना और विदाई अंतिम थी।
शुभदा को संदेह ही नहीं पूरा विश्वास था, कि लीना ने सास की प्रताड़नाओं से परेशान होकर ही यह कदम उठाया होगा. किसी तरह रुलाई रोककर शुभदा सहसा माँ को जोर से आवाजें लगाने लगी. बेटी की ऊँची आवाज़ से माँ-पिता दोनों ही तुरंत वहाँ आ गए.
विनीता देवी ने बेटी को रोते हुए देखा तो समझ गई कि उसे लीना वाली घटना का पता चल चुका है. उसने बेटी को गले से लगाकर धैर्य बँधाते हुए कहा-
“मन भारी न करो बेटी, हम सबको लीना के दुखद अंत पर बहुत अफ़सोस है, लेकिन
ईश्वर की इच्छा के आगे किसी की नहीं चलती.”
“नहीं माँ, यह ईश्वर की इच्छा नहीं शैतान सास की सोची समझी चाल है.
मेरी सखी इतनी कमज़ोर दिल नहीं थी... लेकिन जो कुछ हुआ है, उसने मुझे सोचने पर विवश कर दिया है. मैंने तय किया है कि मैं ससुराल नहीं जाऊँगी.”
क्रमशः...