कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १९० / २०४ № 190 of 204 रचना १९० / २०४
१० मार्च २०२० 10 March 2020 १० मार्च २०२०

गुलाबी गुलाबी ज़मीं आसमां है gulaabee gulaabee zameen aasamaan hai गुलाबी गुलाबी ज़मीं आसमां है

उमंगों ने बाँधा कुछ ऐसा समाँ है

कि रंगों में डूबा ये सारा जहाँ है

जले होलिका  में कपट क्लेश सारे

महज मित्रता का ही आलम यहाँ है

हुई एकजुट है, अमीरी गरीबी

नहीं फर्क का कोई नामोनिशाँ हैं

गले प्यार से मिल रहे राम-रहमत

न अब दूरी उनके दिलों-दरमियाँ है

सँवरकर रँगीले पलाशों का वन से

शहर को चला झूमता कारवाँ है

उमर से शिकायत भी होगी तो होगी

मगर आज के दिन तो हर दिल जवाँ है

गली गाँव में गेर, के हैं नज़ारे

तो शहरों को होली-मिलन पर गुमाँ है

यों फागुन ने हर मन के दागों को धोया

गुलाबी-गुलाबी, ज़मीं-आसमाँ है

विदेशों में भी ‘कल्पना’ खेल होली

प्रवासी समझते कि भारत यहाँ है

umangon ne baandhaa kuch aisaa samaan hai

ki rangon men doobaa ye saaraa jahaan hai

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jale holikaa men kapat klesh saare

mahaj mitrataa kaa hee aalam yahaan hai

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huee ekajut hai, ameeree gareebee

naheen phark kaa koee naamonishaan hain

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gale pyaar se mil rahe raam-rahamat

n ab dooree unake dilon-daramiyaan hai

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sanvarakar rangeele palaashon kaa wan se

shahar ko chalaa jhoomataa kaarawaan hai

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umar se shikaayat bhee hogee to hogee

magar aaj ke din to har dil jawaan hai

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galee gaanv men ger, ke hain nazaare

to shaharon ko holee-milan par gumaan hai

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yon phaagun ne har man ke daagon ko dhoyaa

gulaabee-gulaabee, zameen-aasamaan hai

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wideshon men bhee ‘kalpanaa’ khel holee

prawaasee samajhate ki bhaarat yahaan hai

उमंगों ने बाँधा कुछ ऐसा समाँ है

कि रंगों में डूबा ये सारा जहाँ है

जले होलिका  में कपट क्लेश सारे

महज मित्रता का ही आलम यहाँ है

हुई एकजुट है, अमीरी गरीबी

नहीं फर्क का कोई नामोनिशाँ हैं

गले प्यार से मिल रहे राम-रहमत

न अब दूरी उनके दिलों-दरमियाँ है

सँवरकर रँगीले पलाशों का वन से

शहर को चला झूमता कारवाँ है

उमर से शिकायत भी होगी तो होगी

मगर आज के दिन तो हर दिल जवाँ है

गली गाँव में गेर, के हैं नज़ारे

तो शहरों को होली-मिलन पर गुमाँ है

यों फागुन ने हर मन के दागों को धोया

गुलाबी-गुलाबी, ज़मीं-आसमाँ है

विदेशों में भी ‘कल्पना’ खेल होली

प्रवासी समझते कि भारत यहाँ है

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗