कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११३ / २०४ № 113 of 204 रचना ११३ / २०४
२८ दिसम्बर २०१५ 28 December 2015 २८ दिसम्बर २०१५

नव उमंगों से सजाकर.. naw umangon se sajaakar नव उमंगों से सजाकर..

नव

उमंगों से सजाकर थाल नूतन

फिर

जनम ले आ गया है साल नूतन

कल

तलक तो थी क्षितिज की आब फीकी

रंग

स्वर्णिम आज उसके भाल नूतन

बाँवरी

बगिया खड़ी सत्कार करने

गूँथकर

रस-गंध सित गुल-माल नूतन

आस

के नव पुष्प-गुच्छों, पल्लवों संग

तरुवरों

पर उग रही हर डाल नूतन

बंधुओं!

मंज़िल वही, पथ भी वही है

बस

पगों की चाप में हो चाल नूतन

हाल

बीता भूलकर दुश्वारियों का

लेख

लिक्खो,

भारती

के लाल! नूतन

नोच

देना डंक सारे,

अब

डसें जो

ओढ़कर

इंसानियत की खाल नूतन

वास्ता

है देश का दृग खोल रखना

बिछ

न जाए दिलजलों का जाल नूतन

हाथ

अपने, हर्षमय हर वर्ष

होगा

चाह

यदि हो ‘कल्पना’ चिरकाल नूतन

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

naw

umangon se sajaakar thaal nootan

·

phir

janam le aa gayaa hai saal nootan

·

kal

talak to thee kshitij kee aab pheekee

·

rang

svarnim aaj usake bhaal nootan

·

baanvaree

bagiyaa khadee satkaar karane

·

goonthakar

ras-gandh sit gul-maal nootan

·

aas

ke naw pushp-guchchon, pallawon sang

·

taruwaron

par ug rahee har daal nootan

·

bandhuon!

manzil wahee, path bhee wahee hai

·

bas

pagon kee chaap men ho chaal nootan

·

haal

beetaa bhoolakar dushvaariyon kaa

·

lekh

likkho,

bhaaratee

ke laal! nootan

·

noch

denaa dank saare,

ab

dasen jo

·

oढ़kar

insaaniyat kee khaal nootan

·

waastaa

hai desh kaa driig khol rakhanaa

·

bich

n jaae dilajalon kaa jaal nootan

·

haath

apane, harshamay har warsh

hogaa

·

chaah

yadi ho ‘kalpanaa’ chirakaal nootan

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

नव

उमंगों से सजाकर थाल नूतन

फिर

जनम ले आ गया है साल नूतन

कल

तलक तो थी क्षितिज की आब फीकी

रंग

स्वर्णिम आज उसके भाल नूतन

बाँवरी

बगिया खड़ी सत्कार करने

गूँथकर

रस-गंध सित गुल-माल नूतन

आस

के नव पुष्प-गुच्छों, पल्लवों संग

तरुवरों

पर उग रही हर डाल नूतन

बंधुओं!

मंज़िल वही, पथ भी वही है

बस

पगों की चाप में हो चाल नूतन

हाल

बीता भूलकर दुश्वारियों का

लेख

लिक्खो,

भारती

के लाल! नूतन

नोच

देना डंक सारे,

अब

डसें जो

ओढ़कर

इंसानियत की खाल नूतन

वास्ता

है देश का दृग खोल रखना

बिछ

न जाए दिलजलों का जाल नूतन

हाथ

अपने, हर्षमय हर वर्ष

होगा

चाह

यदि हो ‘कल्पना’ चिरकाल नूतन

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗