कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११४ / २०५ № 114 of 205 रचना ११४ / २०५
२८ दिसम्बर २०१५ 28 December 2015 २८ दिसम्बर २०१५

नव उमंगों से सजाकर.. naw umangon se sajaakar नव उमंगों से सजाकर..

नव

उमंगों से सजाकर थाल नूतन

॥

फिर

जनम ले आ गया है साल नूतन

॥

कल

तलक तो थी क्षितिज की आब फीकी

॥

रंग

स्वर्णिम आज उसके भाल नूतन

॥

बाँवरी

बगिया खड़ी सत्कार करने

॥

गूँथकर

रस-गंध सित गुल-माल नूतन

॥

आस

के नव पुष्प-गुच्छों, पल्लवों संग

॥

तरुवरों

पर उग रही हर डाल नूतन

॥

बंधुओं!

मंज़िल वही, पथ भी वही है

॥

बस

पगों की चाप में हो चाल नूतन

॥

हाल

बीता भूलकर दुश्वारियों का

॥

लेख

लिक्खो,

भारती

के लाल! नूतन

॥

नोच

देना डंक सारे,

अब

डसें जो

॥

ओढ़कर

इंसानियत की खाल नूतन

॥

वास्ता

है देश का दृग खोल रखना

॥

बिछ

न जाए दिलजलों का जाल नूतन

॥

हाथ

अपने, हर्षमय हर वर्ष

होगा

॥

चाह

यदि हो ‘कल्पना’ चिरकाल नूतन

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

naw

umangon se sajaakar thaal nootan

·

phir

janam le aa gayaa hai saal nootan

·

kal

talak to thee kshitij kee aab pheekee

·

rang

svarnim aaj usake bhaal nootan

·

baanvaree

bagiyaa khadee satkaar karane

·

goonthakar

ras-gandh sit gul-maal nootan

·

aas

ke naw pushp-guchchon, pallawon sang

·

taruwaron

par ug rahee har daal nootan

·

bandhuon!

manzil wahee, path bhee wahee hai

·

bas

pagon kee chaap men ho chaal nootan

·

haal

beetaa bhoolakar dushvaariyon kaa

·

lekh

likkho,

bhaaratee

ke laal! nootan

·

noch

denaa dank saare,

ab

dasen jo

·

oढ़kar

insaaniyat kee khaal nootan

·

waastaa

hai desh kaa driig khol rakhanaa

·

bich

n jaae dilajalon kaa jaal nootan

·

haath

apane, harshamay har warsh

hogaa

·

chaah

yadi ho ‘kalpanaa’ chirakaal nootan

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

नव

उमंगों से सजाकर थाल नूतन

॥

फिर

जनम ले आ गया है साल नूतन

॥

कल

तलक तो थी क्षितिज की आब फीकी

॥

रंग

स्वर्णिम आज उसके भाल नूतन

॥

बाँवरी

बगिया खड़ी सत्कार करने

॥

गूँथकर

रस-गंध सित गुल-माल नूतन

॥

आस

के नव पुष्प-गुच्छों, पल्लवों संग

॥

तरुवरों

पर उग रही हर डाल नूतन

॥

बंधुओं!

मंज़िल वही, पथ भी वही है

॥

बस

पगों की चाप में हो चाल नूतन

॥

हाल

बीता भूलकर दुश्वारियों का

॥

लेख

लिक्खो,

भारती

के लाल! नूतन

॥

नोच

देना डंक सारे,

अब

डसें जो

॥

ओढ़कर

इंसानियत की खाल नूतन

॥

वास्ता

है देश का दृग खोल रखना

॥

बिछ

न जाए दिलजलों का जाल नूतन

॥

हाथ

अपने, हर्षमय हर वर्ष

होगा

॥

चाह

यदि हो ‘कल्पना’ चिरकाल नूतन

॥

-कल्पना रामानी

॥

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗