कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २८ / २०५ № 28 of 205 रचना २८ / २०५
६ जनवरी २०१४ 6 January 2014 ६ जनवरी २०१४

तेरा मेरा प्यार सखी teraa meraa pyaar sakhee तेरा मेरा प्यार सखी

इक

बंधन ने बाँध लिया है,

तेरा मेरा प्यार सखी।

॥

जाने

कैसी डोर कहाँ से,

जोड़ गई हिय तर सखी।

॥

इक दूजे को कब जाना है,

फिर भी कितने पास हुए

॥

जो

दिखती तस्वीर सामने,

मन में भी आकार सखी।

॥

जाने

किस कोने से आतीं,

मंत्र-मुग्ध सी आवाज़ें

॥

सम्मोहित

सी आ जाती हूँ, पुनः यहीं हर बार सखी।

॥

सावन

सूखा देख-देख कर,

पतझड़ को सच माना था

॥

तन-मन

को कर गई तरंगित,

स्नेह की एक फुहार सखी।

॥

सन्नाटों

की दुनिया में बस,

साँसों का ही साज़ सुना

॥

मौन

हुआ मुखरित जब बरसी, रस-छंदों

की धार सखी।

॥

जन्म

लिया गीतों ने जब इस मन में तेरा प्रेम बसा

॥

और

‘कल्पना’ मिला वेब का, यह सुंदर

संसार सखी।

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

ik

bandhan ne baandh liyaa hai,

teraa meraa pyaar sakhee

·

jaane

kaisee dor kahaan se,

jod gaee hiy tar sakhee

·

ik dooje ko kab jaanaa hai,

phir bhee kitane paas hue

·

jo

dikhatee tasveer saamane,

man men bhee aakaar sakhee

·

jaane

kis kone se aateen,

mantr-mugdh see aawaazen

·

sammohit

see aa jaatee hoon, punah yaheen har baar sakhee

·

saawan

sookhaa dekh-dekh kar,

patajhad ko sach maanaa thaa

·

tan-man

ko kar gaee tarangit,

sneh kee ek phuhaar sakhee

·

sannaaton

kee duniyaa men bas,

saanson kaa hee saaz sunaa

·

maun

huaa mukharit jab barasee, ras-chandon

kee dhaar sakhee

·

janm

liyaa geeton ne jab is man men teraa prem basaa

·

aur

‘kalpanaa’ milaa web kaa, yah sundar

sansaar sakhee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

इक

बंधन ने बाँध लिया है,

तेरा मेरा प्यार सखी।

॥

जाने

कैसी डोर कहाँ से,

जोड़ गई हिय तर सखी।

॥

इक दूजे को कब जाना है,

फिर भी कितने पास हुए

॥

जो

दिखती तस्वीर सामने,

मन में भी आकार सखी।

॥

जाने

किस कोने से आतीं,

मंत्र-मुग्ध सी आवाज़ें

॥

सम्मोहित

सी आ जाती हूँ, पुनः यहीं हर बार सखी।

॥

सावन

सूखा देख-देख कर,

पतझड़ को सच माना था

॥

तन-मन

को कर गई तरंगित,

स्नेह की एक फुहार सखी।

॥

सन्नाटों

की दुनिया में बस,

साँसों का ही साज़ सुना

॥

मौन

हुआ मुखरित जब बरसी, रस-छंदों

की धार सखी।

॥

जन्म

लिया गीतों ने जब इस मन में तेरा प्रेम बसा

॥

और

‘कल्पना’ मिला वेब का, यह सुंदर

संसार सखी।

॥

-कल्पना रामानी

॥

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗