कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २७ / २०४ № 27 of 204 रचना २७ / २०४
६ जनवरी २०१४ 6 January 2014 ६ जनवरी २०१४

तेरा मेरा प्यार सखी teraa meraa pyaar sakhee तेरा मेरा प्यार सखी

इक

बंधन ने बाँध लिया है,

तेरा मेरा प्यार सखी।

जाने

कैसी डोर कहाँ से,

जोड़ गई हिय तर सखी।

इक दूजे को कब जाना है,

फिर भी कितने पास हुए

जो

दिखती तस्वीर सामने,

मन में भी आकार सखी।

जाने

किस कोने से आतीं,

मंत्र-मुग्ध सी आवाज़ें

सम्मोहित

सी आ जाती हूँ, पुनः यहीं हर बार सखी।

सावन

सूखा देख-देख कर,

पतझड़ को सच माना था

तन-मन

को कर गई तरंगित,

स्नेह की एक फुहार सखी।

सन्नाटों

की दुनिया में बस,

साँसों का ही साज़ सुना

मौन

हुआ मुखरित जब बरसी, रस-छंदों

की धार सखी।

जन्म

लिया गीतों ने जब इस मन में तेरा प्रेम बसा

और

‘कल्पना’ मिला वेब का, यह सुंदर

संसार सखी।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

ik

bandhan ne baandh liyaa hai,

teraa meraa pyaar sakhee

·

jaane

kaisee dor kahaan se,

jod gaee hiy tar sakhee

·

ik dooje ko kab jaanaa hai,

phir bhee kitane paas hue

·

jo

dikhatee tasveer saamane,

man men bhee aakaar sakhee

·

jaane

kis kone se aateen,

mantr-mugdh see aawaazen

·

sammohit

see aa jaatee hoon, punah yaheen har baar sakhee

·

saawan

sookhaa dekh-dekh kar,

patajhad ko sach maanaa thaa

·

tan-man

ko kar gaee tarangit,

sneh kee ek phuhaar sakhee

·

sannaaton

kee duniyaa men bas,

saanson kaa hee saaz sunaa

·

maun

huaa mukharit jab barasee, ras-chandon

kee dhaar sakhee

·

janm

liyaa geeton ne jab is man men teraa prem basaa

·

aur

‘kalpanaa’ milaa web kaa, yah sundar

sansaar sakhee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

इक

बंधन ने बाँध लिया है,

तेरा मेरा प्यार सखी।

जाने

कैसी डोर कहाँ से,

जोड़ गई हिय तर सखी।

इक दूजे को कब जाना है,

फिर भी कितने पास हुए

जो

दिखती तस्वीर सामने,

मन में भी आकार सखी।

जाने

किस कोने से आतीं,

मंत्र-मुग्ध सी आवाज़ें

सम्मोहित

सी आ जाती हूँ, पुनः यहीं हर बार सखी।

सावन

सूखा देख-देख कर,

पतझड़ को सच माना था

तन-मन

को कर गई तरंगित,

स्नेह की एक फुहार सखी।

सन्नाटों

की दुनिया में बस,

साँसों का ही साज़ सुना

मौन

हुआ मुखरित जब बरसी, रस-छंदों

की धार सखी।

जन्म

लिया गीतों ने जब इस मन में तेरा प्रेम बसा

और

‘कल्पना’ मिला वेब का, यह सुंदर

संसार सखी।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗