कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २८ / २०४ № 28 of 204 रचना २८ / २०४
७ जनवरी २०१४ 7 January 2014 ७ जनवरी २०१४

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है man patangon sang udanaa chaahataa hai मन पतंगों संग उड़ना चाहता है

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम।

हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

- कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

man patangon sang udanaa chaahataa hai

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lag rahaa mausam badalanaa chaahataa hai

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bढ़ chale din, kad huaa kam, sheet riitu kaa

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dheere-dheere tan pighalanaa chaahataa hai

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chalate-chalate rukh badal uttar dishaa ko

·

soory ban-than kar tahalanaa chaahataa hai

·

kaanpataa thaa barph baarish men jo shab bhar

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bhor ko wo gul nirakhanaa chaahataa hai

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need men dubakaa pakheroo mukt hokar

·

daalee-daalee par wicharanaa chaahataa hai

·

ho chalaa shonit taral, jeewan saralatam

·

har kadam aage ko bढ़naa chaahataa hai

·

jyon ghule gud-til, mile dil, mugdh jan-jan

prem-ras kaa svaad chakhanaa chaahataa hai

·

- kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम।

हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗