कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना २९ / २०५ № 29 of 205 रचना २९ / २०५
७ जनवरी २०१४ 7 January 2014 ७ जनवरी २०१४

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है man patangon sang udanaa chaahataa hai मन पतंगों संग उड़ना चाहता है

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

॥

लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

॥

बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

॥

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

॥

चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को

॥

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

॥

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

॥

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

॥

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

॥

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

॥

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम।

॥

हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

॥

ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

॥

- कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

man patangon sang udanaa chaahataa hai

·

lag rahaa mausam badalanaa chaahataa hai

·

bढ़ chale din, kad huaa kam, sheet riitu kaa

·

dheere-dheere tan pighalanaa chaahataa hai

·

chalate-chalate rukh badal uttar dishaa ko

·

soory ban-than kar tahalanaa chaahataa hai

·

kaanpataa thaa barph baarish men jo shab bhar

·

bhor ko wo gul nirakhanaa chaahataa hai

·

need men dubakaa pakheroo mukt hokar

·

daalee-daalee par wicharanaa chaahataa hai

·

ho chalaa shonit taral, jeewan saralatam

·

har kadam aage ko bढ़naa chaahataa hai

·

jyon ghule gud-til, mile dil, mugdh jan-jan

prem-ras kaa svaad chakhanaa chaahataa hai

·

- kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

मन पतंगों संग उड़ना चाहता है।

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लग रहा मौसम बदलना चाहता है।

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बढ़ चले दिन, कद हुआ कम, शीत ऋतु का

॥

धीरे-धीरे तन पिघलना चाहता है।

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चलते-चलते रुख बदल उत्तर दिशा को

॥

सूर्य बन-ठन कर टहलना चाहता है।

॥

काँपता था बर्फ बारिश में जो शब भर

॥

भोर को वो गुल निरखना चाहता है।

॥

नीड़ में दुबका पखेरू मुक्त होकर

॥

डाली-डाली पर विचरना चाहता है।

॥

हो चला शोणित तरल, जीवन सरलतम।

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हर कदम आगे को बढ़ना चाहता है।

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ज्यों घुले गुड़-तिल, मिले दिल, मुग्ध जन-जन

प्रेम-रस का स्वाद चखना चाहता है।

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- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗