कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११९ / २०५ № 119 of 205 रचना ११९ / २०५
२४ मार्च २०१६ 24 March 2016 २४ मार्च २०१६

भीगा हुआ फागुन सखी bheegaa huaa phaagun sakhee भीगा हुआ फागुन सखी

रंग

लाए व्योम से भीगा हुआ फागुन सखी।

॥

भूमि

पर हर जीव से हँसकर मिला फागुन सखी।

॥

ऋतु

रँगीली,

मन

नशीला,

भंग

का प्याला लिए

॥

पाँव

घुँघरू बाँधकर,

बहका

रहा फागुन सखी।

॥

वन-पलाशों

में रचाईं धूप ने रंगोलियाँ

॥

विहग

वृंदों,

चौपदों

का मन हुआ फागुन सखी।

॥

उर

उमंगें हैं उमंगित, जी जनों का झूम उठा

॥

छप्परों-छानों-छतों

पर,

छा

गया फागुन सखी।

॥

आम

रस चखने चली अमराइयों में कोकिला

॥

कूक

की उसकी अदा पर,

है

फिदा फागुन सखी

॥

हो

रही घर घर में पूजा होलिका की रीत से

॥

“कल्पना” संदेश देता जीत का फागुन सखी

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

rang

laae wyom se bheegaa huaa phaagun sakhee

·

bhoomi

par har jeew se hansakar milaa phaagun sakhee

·

riitu

rangeelee,

man

nasheelaa,

bhang

kaa pyaalaa lie

·

paanv

ghungharoo baandhakar,

bahakaa

rahaa phaagun sakhee

·

wan-palaashon

men rachaaeen dhoop ne rangoliyaan

·

wihag

wriindon,

chaupadon

kaa man huaa phaagun sakhee

·

ur

umangen hain umangit, jee janon kaa jhoom uthaa

·

chapparon-chaanon-chaton

par,

chaa

gayaa phaagun sakhee

·

aam

ras chakhane chalee amaraaiyon men kokilaa

·

kook

kee usakee adaa par,

hai

phidaa phaagun sakhee

·

ho

rahee ghar ghar men poojaa holikaa kee reet se

·

“kalpanaa” sandesh detaa jeet kaa phaagun sakhee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

रंग

लाए व्योम से भीगा हुआ फागुन सखी।

॥

भूमि

पर हर जीव से हँसकर मिला फागुन सखी।

॥

ऋतु

रँगीली,

मन

नशीला,

भंग

का प्याला लिए

॥

पाँव

घुँघरू बाँधकर,

बहका

रहा फागुन सखी।

॥

वन-पलाशों

में रचाईं धूप ने रंगोलियाँ

॥

विहग

वृंदों,

चौपदों

का मन हुआ फागुन सखी।

॥

उर

उमंगें हैं उमंगित, जी जनों का झूम उठा

॥

छप्परों-छानों-छतों

पर,

छा

गया फागुन सखी।

॥

आम

रस चखने चली अमराइयों में कोकिला

॥

कूक

की उसकी अदा पर,

है

फिदा फागुन सखी

॥

हो

रही घर घर में पूजा होलिका की रीत से

॥

“कल्पना” संदेश देता जीत का फागुन सखी

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗