कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ११५ / २०५ № 115 of 205 रचना ११५ / २०५
७ जनवरी २०१६ 7 January 2016 ७ जनवरी २०१६

जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी jab talak hai dam, kalam chalatee rahegee जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी

जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी

॥

दर्द

दुखियों का गज़ल कहती रहेगी

॥

साज़िशें

लाखों रचे चाहे समंदर

॥

सिर

उठा सरिता मगर बहती रहेगी

॥

जानती

अब नरपिशाचों से निपटना

॥

बेधड़क

बेटी सफर करती रहेगी

॥

बन्दिशों

की बाढ़ हो या सिर कलम हों

॥

प्रेम

की पुरवा सदा बहती रहेगी

॥

क्या

टिकेगी वो कभी सरकार, बोलो

॥

जन-हितों

पर लात जो धरती रहेगी?

॥

रोक

पाएगी क्या सूरज का निकलना

॥

रात

को ढलना ही है, ढलती रहेगी

॥

गम

के बाद आएँगे खुशियों के भी मौसम

॥

‘कल्पना’ यों ज़िन्दगी कटती रहेगी

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

jab talak hai dam, kalam chalatee rahegee

·

dard

dukhiyon kaa gazal kahatee rahegee

·

saazishen

laakhon rache chaahe samandar

·

sir

uthaa saritaa magar bahatee rahegee

·

jaanatee

ab narapishaachon se nipatanaa

·

bedhadak

betee saphar karatee rahegee

·

bandishon

kee baaढ़ ho yaa sir kalam hon

·

prem

kee purawaa sadaa bahatee rahegee

·

kyaa

tikegee wo kabhee sarakaar, bolo

·

jan-hiton

par laat jo dharatee rahegee?

·

rok

paaegee kyaa sooraj kaa nikalanaa

·

raat

ko dhalanaa hee hai, dhalatee rahegee

·

gam

ke baad aaenge khushiyon ke bhee mausam

·

‘kalpanaa’ yon zindagee katatee rahegee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी

॥

दर्द

दुखियों का गज़ल कहती रहेगी

॥

साज़िशें

लाखों रचे चाहे समंदर

॥

सिर

उठा सरिता मगर बहती रहेगी

॥

जानती

अब नरपिशाचों से निपटना

॥

बेधड़क

बेटी सफर करती रहेगी

॥

बन्दिशों

की बाढ़ हो या सिर कलम हों

॥

प्रेम

की पुरवा सदा बहती रहेगी

॥

क्या

टिकेगी वो कभी सरकार, बोलो

॥

जन-हितों

पर लात जो धरती रहेगी?

॥

रोक

पाएगी क्या सूरज का निकलना

॥

रात

को ढलना ही है, ढलती रहेगी

॥

गम

के बाद आएँगे खुशियों के भी मौसम

॥

‘कल्पना’ यों ज़िन्दगी कटती रहेगी

॥

-कल्पना रामानी

॥

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗