कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०५ / ११४ № 105 of 114 रचना १०५ / ११४
२१ नवम्बर २०२० 21 November 2020 २१ नवम्बर २०२०

ससुराल नहीं जाऊँगी 8 sasuraal naheen jaaoongee 8 ससुराल नहीं जाऊँगी 8

दो दिन बाद प्रभात के मुंबई से बाहर जाने पर शुभदा ने कुछ दिन ससुराल होते हुए कुछ दिन मायके में बिताने का विचार किया. प्रवास पर जाने से पहले प्रभात को मम्मी-पापा से मिलने जाना ही था, अतः उसने अपनी भी जाने की तैयारी कर ली.

अभी वहाँ रहते दो दिन ही हुए थे कि अचानक उसकी प्रिय सखी चित्रा का फोन आ गया. वो शिकायत भरे लहजे में बोली-

“ऐसी भी क्या व्यस्तता शुभि, कि सहेलियों से ही दूरी बना ली...”

“अरे यार, सचमुच बहुत व्यस्त थी मगर अब कुछ दिन आराम से बिताने मायके ही आ रही हूँ, ढेर सारी बातें और साथ में घूमना खाना भी होगा. प्रभात जी को कंपनी की तरफ से एक सप्ताह के लिए मुंबई से बाहर दौरे पर भेजा गया है, मैं अभी ससुराल में हूँ.”

“फिर जीजू वापस कब आएँगे? मेरा अचानक विवाह तय हो गया है और अगले सप्ताह में ही लगन का मुहूर्त है.”

“अच्छा, तो इसलिए मेरी अचानक याद आई है...शुभदा ने हँसते हुए कहा.”

“नहीं डियर, ऐसा नहीं है. यादें तो मन के कोने में कुंडली मारकर बैठी रहती हैं, बस समय ही फिसलता जाता है. मैं भी इन दिनों बहुत व्यस्त रही हूँ. बहुत से बदलाव भी आए हैं.”

“पर विवाह अचानक कैसे तय हुआ? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी थी न... कैरियर का क्या हुआ, क्या कोई जॉब कर रही हो? और दूल्हे का शुभ नाम, काम धाम कुछ तो बताओ, निमंत्रण-पत्र भी नहीं छपवाए क्या?”

“निमंत्रण पत्र छप गए हैं शुभि, भेज भी दिए हैं सबको मगर तुम जब तक आ नहीं जाती, तुम्हारे लिए सब कुछ सरप्राइज़ है.”

“यानी मुझसे कुछ छिपाया जा रहा है, क्यों?”

“मैं तुम्हें सामने ही सब बताना चाहती हूँ डियर, कुछ विशेष कारण ही है, इसलिए...”

“अब तो मुझे भी चैन नहीं आएगा, मैं कल ही सास-ससुर जी से अनुमति लेकर आ जाती हूँ. प्रभात जी अगर आ गए तो उन्हें भी बुला लेंगे.”

“फिर तो मज़ा आ जाएगा यार, मुझे इंतज़ार रहेगा.”

अगले दिन ही शुभदा अपनी ही कार से मायके पहुँच गई. चूंकि दूरी अधिक नहीं थी, तो अकेले जाने में कोई समस्या भी नहीं थी, न ही सास ससुर को कोई ऐतराज़ था. वो शीघ्र ही चित्रा से मिलने के लिए उत्सुक थी. उसकी मम्मी ने बताया कि उन्हें और सिन्हा जी को भी दो दिन के लिए बुलाया गया है. शुभदा ने तुरंत पूछा-

“फिर तो मम्मी आपको निमंत्रण-पत्र आया होगा, मुझे दिखाओ ज़रा...”

“हाँ, आया तो था, मगर कामवाली ने सफाई करके जाने कहाँ रख दिया है, वो भी दो दिन की छुट्टी पर है, आ जाए तो ही पूछ लेंगे. मुझसे अब ये छोटे-छोटे काम नहीं होते बेटी...”

“कोई बात नहीं मम्मी, मैं चित्रा से आज ही मिलने चली जाती हूँ, सब मालूम हो जाएगा. वो मुझे अचंभित करना चाहती है तो यही सही...”

शुभदा ने पूरा दिन मम्मी-पापा के साथ बिताया फिर फोन करके चित्रा को अपने आने की सूचना दी तो चित्रा ने कहा-

“शुभि, मैं तुम्हारे घर आ जाती हूँ, यहाँ सब मेहमान हैं. मुझे तुमसे एकांत में बात करनी है.”

“ठीक है बहना, मैं इंतजार कर रही हूँ.”

शुभदा को अब यह एक उलझी हुई पहेली लगने लगी थी और उसकी उत्सुकता अब चरम पर पहुँच गई थी.

लगभग १० मिनिट बाद ही चित्रा सामने थी. शुभदा उसे अपने ही कमरे में ले गई और माँ से चाय बनाने का अनुरोध किया.

“अब तो प्लीज़ बता ही दो न, कौन है वो खुशनसीब, जिसने मेरी सखी को इतना हैरान किया हुआ है...”

“शुभि, मेरा   विवाह सुमेर से हो रहा है, वही लीना का पूर्व पति और उसकी मौत का भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार सुमेर...”

“यह तुम क्या कह रही हो चित्रा, तुम ऐसे नराधम से विवाह करोगी...मगर क्यों? क्या उसे उसकी करतूत की कोई सजा नहीं मिली? फिर कम से कम तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद तो बिलकुल नहीं थी...क्या लीना की मौत तुम्हारे लिए कोई छोटी-मोटी दुर्घटना ही थी या पहले से कुछ...”

“बस करो शुभि प्लीज़...पहले मेरी पूरी बात सुन लो...उसके मुँह पर हाथ रखकर चित्रा बोलते हुए रो पड़ी.”

“रो मत बहन, मेरा दिल इतना कमज़ोर नहीं, इतना सब्र तो मैं कर सकती हूँ...बोलो आखिर क्या विवशता थी तुम्हारी...”

तुम तो जानती हो शुभि, कि मैंने मनोविज्ञान में डिप्लोमा कोर्स किया था...प्रतियोगी परीक्षा भी मैंने अच्छे अंकों से पास कर ली थी. इंटरव्यू के बाद मुझे सरकारी अस्पताल में मनोरोग-विशेषज्ञ के तौर पर ६ माह पहले ही नौकरी मिल गई थी. एक दिन मेरे विभाग में अचानक सुमेर अपनी माँ के साथ  उपस्थित हुए. वो मुझे पहचान नहीं सके मगर मैं लीना की शादी में उसे अच्छी तरह देख चुकी थी अतः तुरंत पहचान गई.  मेरे मन में उसे देखते ही घृणा के भाव उत्पन्न हुए मगर शीघ्र ही सामान्य होना पड़ा क्योंकि उस समय मैं केवल एक डॉक्टर थी। फिर अपने भावों को एकदम छिपाकर अपनी आवाज़ को सामान्य रखते हुए उससे पूछा-

“कहिए महोदय, आपकी क्या समस्या है?”

“मैं अपनी माँ के लिए बहुत परेशान  हूँ डॉक्टर,  कुछ महीने पूर्व घटी एक दुर्घटना से इन्हें मानसिक आघात पहुँचा है, उसके बाद इनकी दशा लगातार बिगड़ती जा रही है.” सुमेर बोले

“कृपया आप दुर्घटना के बारे में विस्तार से सुनाइये तभी में समस्या की जड़ तक पहुँच सकूँगी.”मैंने कहा.

“मेरी शादी लगभग साढ़े तीन वर्ष पूर्व मुंबई की ही लीना नामक लड़की से हुई थी. यह प्रेम-विवाह था, विवाह के तीन साल बाद ही मेरी गर्भवती पत्नी ने घरेलू कलह से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसके माता-पिता ने हमारे खिलाफ उसे प्रताड़ित करने की रिपोर्ट पारिवारिक न्यायालय में लिखवा दी. उसी न्यायालय में पदस्थ वकील अभिजीत शर्मा जी ने ही लीना की सास द्वारा प्रताड़ित करने की रिपोर्ट पर लीना और मेरी माँ को समझाइश देकर दो बार वापस भेजा था। लीना ने मुझसे अलग गृहस्थी बसाने के लिए कहा था मगर मैं माँ को अकेली कैसे छोड़ देता, अतः उसको हर बार समझौता करने को कह देता था. मगर इसका परिणाम इतना भयानक होगा, यह मैंने सोचा भी न था. इस केस की पैरवी भी वर्मा जी को ही करनी थी, उन्होंने इस दुर्घटना के लिए पूरा दोष न्यायालय के नियमों को कमज़ोर बताकर स्वयं पर ले लिया था। लेकिन उन्होंने चूँकि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का ही पालन किया था. अतः कोई गवाह या सबूत न मिलने पर हमें दोषमुक्त करार देकर छोड़ दिया गया.

लेकिन उसके बाद मम्मी और मैं स्वयं को माफ नहीं कर पाए। मम्मी को सोते जागते लीना के डरावने सपने आने लगे, उनकी मानसिक हालत बिगड़ने लगी, खाना पीना छूट गया. वे एक ही बात कहतीं कि मेरी बहू मुझे जीवित नहीं छोड़ेगी।

लोगों ने हमसे मिलना जुलना छोड़ दिया. माँ का पार्लर बंद हो गया। वे बस अकेली विलाप करती रहतीं कि मुझे सज़ा दो में बहू की हत्यारी हूँ। मैंने वो फ़्लैट ही बेच दिया और एक दूरस्थ सोसायटी में रहने लगे. माँ को अनेक डॉक्टरों को दिखाने के बावजूद कोई लाभ नहीं हुआ.

मैं पूरी तरह निराश हो चुका था, फिर एक मित्र ने आपसे मिलने की सलाह दी. आपकी प्रशंसा सुनकर बड़ी दूर से उम्मीद लेकर आपके पास आया हूँ, प्लीज़ डॉक्टर, किसी तरह मेरी माँ को ठीक कर दीजिए”। कहते हुए सुमेर ने हाथ जोड़ दिए.

“मिस्टर सुमेर, मैं अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूँगी। लेकिन लम्बा समय लग सकता है अतः आप इन्हें यहीं भर्ती करवा दीजिए.” मैंने कहा.

उसके बाद लगातार उपचार और समझाइश द्वारा अथक प्रयास करने के बावजूद वे सामान्य अवस्था में नहीं आ सकीं और एक महीने बाद अस्पताल में ही वे स्वर्ग सिधार गईं। इस बीच मुझे सुमेर की दुर्दशा देखकर उनसे सहानुभूति होने लगी थी, क्योंकि वो पश्चाताप की पीड़ा से गुजर रहे थे।

मां की मृत्यु से वे और टूट गये और उसके शव से लिपटकर विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगे।

उनकी यह दशा देखकर उनकी माँ का अंतिम संस्कार अस्पताल द्वारा करवाकर उसे वहीँ अस्पताल में ही भर्ती कर दिया गया.

यह केस मेरे हाथ में था. उपचार के दौरान एक बार उन्होंने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगे-

“तुम कहाँ चली गई थी लीना, अब तो मुझे छोड़कर नहीं जाओगी न...” और फफक कर रो पड़े.”

मैं समझ गई कि दोहरे सदमे के कारण वे अपनी याददाश्त खो चुके हैं. मैं उन्हें समझाइश द्वारा विश्वास दिलाने और दवा खिलाने का प्रयास करती कि मैं लीना नहीं हूँ, तो वो रोकर कहते-

“मेरा विश्वास करो लीना, मैं तुम्हारे लिए नया घर बनवाऊँगा, जहाँ केवल हम दोनों ही होंगे.”

अब मुझे लगा कि इन्हें ठीक करना है तो मुझे लीना की भूमिका निभानी होगी और इस तरीके से वो ठीक भी होते गए. पूर्ण स्वस्थ होने पर मैंने उन्हें दूसरा विवाह करके गृहस्थी बसाने के लिए कहा तो वे बोले-

“नहीं डॉक्टर, अब मेरा मन दुनिया से भर चुका है और अब भला कौनसी लड़की इस पापी को अपनाएगी?”

“आप प्रयास तो कीजिये सुमेर जी, आत्महत्या की बात सोचकर एक दूसरा पाप अपने सिर पर मत लीजिये.”

“क्या आप मुझसे शादी कर सकती हैं?” मेरी बात सुनकर वे अचानक बोल पड़े.

“सच कहूँ शुभि, उनके उपचार के दौरान उनके स्पर्श से मेरे मन में भी उनके लिए एक प्रेममय कोमल कोना बन चुका था. मैंने तुरंत हाँ कह दिया और परिणाम तुम्हारे सामने है.” कहते-कहते चित्रा की आँखें नम होने लगीं.

शुभदा ने तुरंत उसे गले लगाते हुए उसकी आँखें पोंछी और बोली-

चित्रा, मेरी बहन, शुभ अवसर पर रोना ठीक नहीं, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं रही. मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं.

चित्रा का विवाह सानंद संपन्न हो गया. प्रभात को एक सप्ताह और वहीँ रहना था अतः वो विवाह समारोह में शामिल नहीं हो सके. इस बीच शुभदा लीना के माता-पिता से भी मिलकर उन्हें  सांत्वना देकर आई. कुछ दिन और मिलने से उसने अपनी सहेलियों को अपने विगत ६ महीनों के क्रियाकलाप से अवगत करवाया और लक्ष्य-प्राप्ति के लिए राजनीति में उतरने की बात की तो उन्होंने भी प्रसन्नचित शुभदा के इस नेक अभियान में शामिल होकर प्रचार कार्य में साथ देने का वादा किया.

प्रवास से वापसी पर प्रभात उसे लेने आ गया। घर पहुंचते ही  उसे राजनीतिक मंच  पर पग जमाकर अपने कर्मक्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ना था.

क्रमशः

do din baad prabhaat ke munbaee se baahar jaane par shubhadaa ne kuch din sasuraal hote hue kuch din maayake men bitaane kaa wichaar kiyaa prawaas par jaane se pahale prabhaat ko mammee-paapaa se milane jaanaa hee thaa, atah usane apanee bhee jaane kee taiyaaree kar lee

abhee wahaan rahate do din hee hue the ki achaanak usakee priy sakhee chitraa kaa phon aa gayaa wo shikaayat bhare lahaje men bolee-

“aisee bhee kyaa wyastataa shubhi, ki saheliyon se hee dooree banaa lee”

“are yaar, sachamuch bahut wyast thee magar ab kuch din aaraam se bitaane maayake hee aa rahee hoon, dher saaree baaten aur saath men ghoomanaa khaanaa bhee hogaa prabhaat jee ko kanpanee kee taraph se ek saptaah ke lie munbaee se baahar daure par bhejaa gayaa hai, main abhee sasuraal men hoon”

·

“phir jeejoo waapas kab aaenge? meraa achaanak wiwaah tay ho gayaa hai aur agale saptaah men hee lagan kaa muhoort hai”

“achchaa, to isalie meree achaanak yaad aaee haishhubhadaa ne hansate hue kahaa”

·

“naheen diyar, aisaa naheen hai yaaden to man ke kone men kundalee maarakar baithee rahatee hain, bas samay hee phisalataa jaataa hai main bhee in dinon bahut wyast rahee hoon bahut se badalaaw bhee aae hain”

“par wiwaah achaanak kaise tay huaa? pratiyogee pareekshaaon kee taiyaaree thee n kairiyar kaa kyaa huaa, kyaa koee jॉb kar rahee ho? aur doolhe kaa shubh naam, kaam dhaam kuch to bataao, nimantran-patr bhee naheen chapawaae kyaa?”

·

“nimantran patr chap gae hain shubhi, bhej bhee die hain sabako magar tum jab tak aa naheen jaatee, tumhaare lie sab kuch sarapraaiz hai”

“yaanee mujhase kuch chipaayaa jaa rahaa hai, kyon?”

·

“main tumhen saamane hee sab bataanaa chaahatee hoon diyar, kuch wishesh kaaran hee hai, isalie”

“ab to mujhe bhee chain naheen aaegaa, main kal hee saas-sasur jee se anumati lekar aa jaatee hoon prabhaat jee agar aa gae to unhen bhee bulaa lenge”

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“phir to mazaa aa jaaegaa yaar, mujhe intazaar rahegaa”

·

agale din hee shubhadaa apanee hee kaar se maayake pahunch gaee choonki dooree adhik naheen thee, to akele jaane men koee samasyaa bhee naheen thee, n hee saas sasur ko koee aitaraaz thaa wo sheeghr hee chitraa se milane ke lie utsuk thee usakee mammee ne bataayaa ki unhen aur sinhaa jee ko bhee do din ke lie bulaayaa gayaa hai shubhadaa ne turant poochaa-

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“phir to mammee aapako nimantran-patr aayaa hogaa, mujhe dikhaao zaraa”

“haan, aayaa to thaa, magar kaamawaalee ne saphaaee karake jaane kahaan rakh diyaa hai, wo bhee do din kee chuttee par hai, aa jaae to hee pooch lenge mujhase ab ye chote-chote kaam naheen hote betee”

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“koee baat naheen mammee, main chitraa se aaj hee milane chalee jaatee hoon, sab maaloom ho jaaegaa wo mujhe achanbhit karanaa chaahatee hai to yahee sahee”

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shubhadaa ne pooraa din mammee-paapaa ke saath bitaayaa phir phon karake chitraa ko apane aane kee soochanaa dee to chitraa ne kahaa-

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“shubhi, main tumhaare ghar aa jaatee hoon, yahaan sab mehamaan hain mujhe tumase ekaant men baat karanee hai”

“theek hai bahanaa, main intajaar kar rahee hoon”

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“फिर जीजू वापस कब आएँगे? मेरा अचानक विवाह तय हो गया है और अगले सप्ताह में ही लगन का मुहूर्त है.”

“अच्छा, तो इसलिए मेरी अचानक याद आई है...शुभदा ने हँसते हुए कहा.”

“नहीं डियर, ऐसा नहीं है. यादें तो मन के कोने में कुंडली मारकर बैठी रहती हैं, बस समय ही फिसलता जाता है. मैं भी इन दिनों बहुत व्यस्त रही हूँ. बहुत से बदलाव भी आए हैं.”

“पर विवाह अचानक कैसे तय हुआ? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी थी न... कैरियर का क्या हुआ, क्या कोई जॉब कर रही हो? और दूल्हे का शुभ नाम, काम धाम कुछ तो बताओ, निमंत्रण-पत्र भी नहीं छपवाए क्या?”

“निमंत्रण पत्र छप गए हैं शुभि, भेज भी दिए हैं सबको मगर तुम जब तक आ नहीं जाती, तुम्हारे लिए सब कुछ सरप्राइज़ है.”

“यानी मुझसे कुछ छिपाया जा रहा है, क्यों?”

“मैं तुम्हें सामने ही सब बताना चाहती हूँ डियर, कुछ विशेष कारण ही है, इसलिए...”

“अब तो मुझे भी चैन नहीं आएगा, मैं कल ही सास-ससुर जी से अनुमति लेकर आ जाती हूँ. प्रभात जी अगर आ गए तो उन्हें भी बुला लेंगे.”

“फिर तो मज़ा आ जाएगा यार, मुझे इंतज़ार रहेगा.”

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“फिर तो मम्मी आपको निमंत्रण-पत्र आया होगा, मुझे दिखाओ ज़रा...”

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“कोई बात नहीं मम्मी, मैं चित्रा से आज ही मिलने चली जाती हूँ, सब मालूम हो जाएगा. वो मुझे अचंभित करना चाहती है तो यही सही...”

शुभदा ने पूरा दिन मम्मी-पापा के साथ बिताया फिर फोन करके चित्रा को अपने आने की सूचना दी तो चित्रा ने कहा-

“शुभि, मैं तुम्हारे घर आ जाती हूँ, यहाँ सब मेहमान हैं. मुझे तुमसे एकांत में बात करनी है.”

“ठीक है बहना, मैं इंतजार कर रही हूँ.”

शुभदा को अब यह एक उलझी हुई पहेली लगने लगी थी और उसकी उत्सुकता अब चरम पर पहुँच गई थी.

लगभग १० मिनिट बाद ही चित्रा सामने थी. शुभदा उसे अपने ही कमरे में ले गई और माँ से चाय बनाने का अनुरोध किया.

“अब तो प्लीज़ बता ही दो न, कौन है वो खुशनसीब, जिसने मेरी सखी को इतना हैरान किया हुआ है...”

“शुभि, मेरा   विवाह सुमेर से हो रहा है, वही लीना का पूर्व पति और उसकी मौत का भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार सुमेर...”

“यह तुम क्या कह रही हो चित्रा, तुम ऐसे नराधम से विवाह करोगी...मगर क्यों? क्या उसे उसकी करतूत की कोई सजा नहीं मिली? फिर कम से कम तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद तो बिलकुल नहीं थी...क्या लीना की मौत तुम्हारे लिए कोई छोटी-मोटी दुर्घटना ही थी या पहले से कुछ...”

“बस करो शुभि प्लीज़...पहले मेरी पूरी बात सुन लो...उसके मुँह पर हाथ रखकर चित्रा बोलते हुए रो पड़ी.”

“रो मत बहन, मेरा दिल इतना कमज़ोर नहीं, इतना सब्र तो मैं कर सकती हूँ...बोलो आखिर क्या विवशता थी तुम्हारी...”

तुम तो जानती हो शुभि, कि मैंने मनोविज्ञान में डिप्लोमा कोर्स किया था...प्रतियोगी परीक्षा भी मैंने अच्छे अंकों से पास कर ली थी. इंटरव्यू के बाद मुझे सरकारी अस्पताल में मनोरोग-विशेषज्ञ के तौर पर ६ माह पहले ही नौकरी मिल गई थी. एक दिन मेरे विभाग में अचानक सुमेर अपनी माँ के साथ  उपस्थित हुए. वो मुझे पहचान नहीं सके मगर मैं लीना की शादी में उसे अच्छी तरह देख चुकी थी अतः तुरंत पहचान गई.  मेरे मन में उसे देखते ही घृणा के भाव उत्पन्न हुए मगर शीघ्र ही सामान्य होना पड़ा क्योंकि उस समय मैं केवल एक डॉक्टर थी। फिर अपने भावों को एकदम छिपाकर अपनी आवाज़ को सामान्य रखते हुए उससे पूछा-

“कहिए महोदय, आपकी क्या समस्या है?”

“मैं अपनी माँ के लिए बहुत परेशान  हूँ डॉक्टर,  कुछ महीने पूर्व घटी एक दुर्घटना से इन्हें मानसिक आघात पहुँचा है, उसके बाद इनकी दशा लगातार बिगड़ती जा रही है.” सुमेर बोले

“कृपया आप दुर्घटना के बारे में विस्तार से सुनाइये तभी में समस्या की जड़ तक पहुँच सकूँगी.”मैंने कहा.

“मेरी शादी लगभग साढ़े तीन वर्ष पूर्व मुंबई की ही लीना नामक लड़की से हुई थी. यह प्रेम-विवाह था, विवाह के तीन साल बाद ही मेरी गर्भवती पत्नी ने घरेलू कलह से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसके माता-पिता ने हमारे खिलाफ उसे प्रताड़ित करने की रिपोर्ट पारिवारिक न्यायालय में लिखवा दी. उसी न्यायालय में पदस्थ वकील अभिजीत शर्मा जी ने ही लीना की सास द्वारा प्रताड़ित करने की रिपोर्ट पर लीना और मेरी माँ को समझाइश देकर दो बार वापस भेजा था। लीना ने मुझसे अलग गृहस्थी बसाने के लिए कहा था मगर मैं माँ को अकेली कैसे छोड़ देता, अतः उसको हर बार समझौता करने को कह देता था. मगर इसका परिणाम इतना भयानक होगा, यह मैंने सोचा भी न था. इस केस की पैरवी भी वर्मा जी को ही करनी थी, उन्होंने इस दुर्घटना के लिए पूरा दोष न्यायालय के नियमों को कमज़ोर बताकर स्वयं पर ले लिया था। लेकिन उन्होंने चूँकि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का ही पालन किया था. अतः कोई गवाह या सबूत न मिलने पर हमें दोषमुक्त करार देकर छोड़ दिया गया.

लेकिन उसके बाद मम्मी और मैं स्वयं को माफ नहीं कर पाए। मम्मी को सोते जागते लीना के डरावने सपने आने लगे, उनकी मानसिक हालत बिगड़ने लगी, खाना पीना छूट गया. वे एक ही बात कहतीं कि मेरी बहू मुझे जीवित नहीं छोड़ेगी।

लोगों ने हमसे मिलना जुलना छोड़ दिया. माँ का पार्लर बंद हो गया। वे बस अकेली विलाप करती रहतीं कि मुझे सज़ा दो में बहू की हत्यारी हूँ। मैंने वो फ़्लैट ही बेच दिया और एक दूरस्थ सोसायटी में रहने लगे. माँ को अनेक डॉक्टरों को दिखाने के बावजूद कोई लाभ नहीं हुआ.

मैं पूरी तरह निराश हो चुका था, फिर एक मित्र ने आपसे मिलने की सलाह दी. आपकी प्रशंसा सुनकर बड़ी दूर से उम्मीद लेकर आपके पास आया हूँ, प्लीज़ डॉक्टर, किसी तरह मेरी माँ को ठीक कर दीजिए”। कहते हुए सुमेर ने हाथ जोड़ दिए.

“मिस्टर सुमेर, मैं अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूँगी। लेकिन लम्बा समय लग सकता है अतः आप इन्हें यहीं भर्ती करवा दीजिए.” मैंने कहा.

उसके बाद लगातार उपचार और समझाइश द्वारा अथक प्रयास करने के बावजूद वे सामान्य अवस्था में नहीं आ सकीं और एक महीने बाद अस्पताल में ही वे स्वर्ग सिधार गईं। इस बीच मुझे सुमेर की दुर्दशा देखकर उनसे सहानुभूति होने लगी थी, क्योंकि वो पश्चाताप की पीड़ा से गुजर रहे थे।

मां की मृत्यु से वे और टूट गये और उसके शव से लिपटकर विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगे।

उनकी यह दशा देखकर उनकी माँ का अंतिम संस्कार अस्पताल द्वारा करवाकर उसे वहीँ अस्पताल में ही भर्ती कर दिया गया.

यह केस मेरे हाथ में था. उपचार के दौरान एक बार उन्होंने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगे-

“तुम कहाँ चली गई थी लीना, अब तो मुझे छोड़कर नहीं जाओगी न...” और फफक कर रो पड़े.”

मैं समझ गई कि दोहरे सदमे के कारण वे अपनी याददाश्त खो चुके हैं. मैं उन्हें समझाइश द्वारा विश्वास दिलाने और दवा खिलाने का प्रयास करती कि मैं लीना नहीं हूँ, तो वो रोकर कहते-

“मेरा विश्वास करो लीना, मैं तुम्हारे लिए नया घर बनवाऊँगा, जहाँ केवल हम दोनों ही होंगे.”

अब मुझे लगा कि इन्हें ठीक करना है तो मुझे लीना की भूमिका निभानी होगी और इस तरीके से वो ठीक भी होते गए. पूर्ण स्वस्थ होने पर मैंने उन्हें दूसरा विवाह करके गृहस्थी बसाने के लिए कहा तो वे बोले-

“नहीं डॉक्टर, अब मेरा मन दुनिया से भर चुका है और अब भला कौनसी लड़की इस पापी को अपनाएगी?”

“आप प्रयास तो कीजिये सुमेर जी, आत्महत्या की बात सोचकर एक दूसरा पाप अपने सिर पर मत लीजिये.”

“क्या आप मुझसे शादी कर सकती हैं?” मेरी बात सुनकर वे अचानक बोल पड़े.

“सच कहूँ शुभि, उनके उपचार के दौरान उनके स्पर्श से मेरे मन में भी उनके लिए एक प्रेममय कोमल कोना बन चुका था. मैंने तुरंत हाँ कह दिया और परिणाम तुम्हारे सामने है.” कहते-कहते चित्रा की आँखें नम होने लगीं.

शुभदा ने तुरंत उसे गले लगाते हुए उसकी आँखें पोंछी और बोली-

चित्रा, मेरी बहन, शुभ अवसर पर रोना ठीक नहीं, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं रही. मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं.

चित्रा का विवाह सानंद संपन्न हो गया. प्रभात को एक सप्ताह और वहीँ रहना था अतः वो विवाह समारोह में शामिल नहीं हो सके. इस बीच शुभदा लीना के माता-पिता से भी मिलकर उन्हें  सांत्वना देकर आई. कुछ दिन और मिलने से उसने अपनी सहेलियों को अपने विगत ६ महीनों के क्रियाकलाप से अवगत करवाया और लक्ष्य-प्राप्ति के लिए राजनीति में उतरने की बात की तो उन्होंने भी प्रसन्नचित शुभदा के इस नेक अभियान में शामिल होकर प्रचार कार्य में साथ देने का वादा किया.

प्रवास से वापसी पर प्रभात उसे लेने आ गया। घर पहुंचते ही  उसे राजनीतिक मंच  पर पग जमाकर अपने कर्मक्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ना था.

क्रमशः

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗