सार छंद, छन्न पकैया saar chand, chann pakaiyaa सार छंद, छन्न पकैया
सार छंद- छन्न पकैया
छन्न पकैया, छन्न पकैया
दिन कैसे ये आए।
देख आधुनिक कविताई को
छंद,गीत मुरझाए।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
गर्दिश में हैं तारे।
रचना में कुछ भाव हो न हो
वाह, वाह के नारे।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
घटी काव्य की कीमत।
विद्वानों को वोट न मिलते
मूढ़ों को है बहुमत।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
भ्रमित हुआ मन लखकर।
सुंदरतम की छाप लगी है
हर कविता संग्रह पर।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
कविता किसे पढ़ाएँ।
हर पाठक की सोच यही है
कुछ लिख, कवि कहलाएँ।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
रचें किसलिए कविता।
रचना चाहे ‘खास’ न छपती
छपते ‘खास’ रचयिता।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
अब जो ‘तुलसी’ होते।
भंग छंद की देख तपस्या
सौ-सौ आँसू रोते।
-कल्पना रामानी
saar chand- chann pakaiyaa
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
din kaise ye aae
dekh aadhunik kawitaaee ko
chand,geet murajhaae
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
gardish men hain taare
rachanaa men kuch bhaaw ho n ho
waah, waah ke naare
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
ghatee kaavy kee keemat
widvaanon ko wot n milate
mooढ़on ko hai bahumat
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
bhramit huaa man lakhakar
sundaratam kee chaap lagee hai
har kawitaa sangrah par
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
kawitaa kise pढ़aaen
har paathak kee soch yahee hai
kuch likh, kawi kahalaaen
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
rachen kisalie kawitaa
rachanaa chaahe ‘khaas’ n chapatee
chapate ‘khaas’ rachayitaa
chann pakaiyaa, chann pakaiyaa
ab jo ‘tulasee’ hote
bhang chand kee dekh tapasyaa
sau-sau aansoo rote
-kalpanaa raamaanee
सार छंद- छन्न पकैया
छन्न पकैया, छन्न पकैया
दिन कैसे ये आए।
देख आधुनिक कविताई को
छंद,गीत मुरझाए।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
गर्दिश में हैं तारे।
रचना में कुछ भाव हो न हो
वाह, वाह के नारे।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
घटी काव्य की कीमत।
विद्वानों को वोट न मिलते
मूढ़ों को है बहुमत।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
भ्रमित हुआ मन लखकर।
सुंदरतम की छाप लगी है
हर कविता संग्रह पर।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
कविता किसे पढ़ाएँ।
हर पाठक की सोच यही है
कुछ लिख, कवि कहलाएँ।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
रचें किसलिए कविता।
रचना चाहे ‘खास’ न छपती
छपते ‘खास’ रचयिता।
छन्न पकैया, छन्न पकैया
अब जो ‘तुलसी’ होते।
भंग छंद की देख तपस्या
सौ-सौ आँसू रोते।
-कल्पना रामानी