कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कह-मुकरी Kah-Mukri कह-मुकरी · रचना ११ / ११ № 11 of 11 रचना ११ / ११
१२ जनवरी २०२१ 12 January 2021 १२ जनवरी २०२१

सार छंद, छन्न पकैया saar chand, chann pakaiyaa सार छंद, छन्न पकैया

सार छंद- छन्न पकैया

छन्न पकैया, छन्न पकैया

दिन कैसे ये आए।

देख आधुनिक कविताई को

छंद,गीत मुरझाए।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

गर्दिश में हैं तारे।

रचना में कुछ भाव हो न हो

वाह, वाह के नारे।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

घटी काव्य की कीमत।

विद्वानों को वोट न मिलते

मूढ़ों को है बहुमत।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

भ्रमित हुआ मन लखकर।

सुंदरतम की छाप लगी है

हर कविता संग्रह पर।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

कविता किसे पढ़ाएँ।

हर पाठक की सोच यही है

कुछ लिख, कवि कहलाएँ।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

रचें किसलिए कविता।

रचना चाहे ‘खास’ न छपती

छपते ‘खास’ रचयिता।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

अब जो ‘तुलसी’ होते।

भंग छंद की देख तपस्या

सौ-सौ आँसू रोते।

-कल्पना रामानी

saar chand- chann pakaiyaa

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

din kaise ye aae

dekh aadhunik kawitaaee ko

chand,geet murajhaae

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

gardish men hain taare

rachanaa men kuch bhaaw ho n ho

waah, waah ke naare

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

ghatee kaavy kee keemat

widvaanon ko wot n milate

mooढ़on ko hai bahumat

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

bhramit huaa man lakhakar

sundaratam kee chaap lagee hai

har kawitaa sangrah par

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

kawitaa kise pढ़aaen

har paathak kee soch yahee hai

kuch likh, kawi kahalaaen

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

rachen kisalie kawitaa

rachanaa chaahe ‘khaas’ n chapatee

chapate ‘khaas’ rachayitaa

·

chann pakaiyaa, chann pakaiyaa

ab jo ‘tulasee’ hote

bhang chand kee dekh tapasyaa

sau-sau aansoo rote

·

-kalpanaa raamaanee

सार छंद- छन्न पकैया

छन्न पकैया, छन्न पकैया

दिन कैसे ये आए।

देख आधुनिक कविताई को

छंद,गीत मुरझाए।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

गर्दिश में हैं तारे।

रचना में कुछ भाव हो न हो

वाह, वाह के नारे।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

घटी काव्य की कीमत।

विद्वानों को वोट न मिलते

मूढ़ों को है बहुमत।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

भ्रमित हुआ मन लखकर।

सुंदरतम की छाप लगी है

हर कविता संग्रह पर।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

कविता किसे पढ़ाएँ।

हर पाठक की सोच यही है

कुछ लिख, कवि कहलाएँ।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

रचें किसलिए कविता।

रचना चाहे ‘खास’ न छपती

छपते ‘खास’ रचयिता।

छन्न पकैया, छन्न पकैया

अब जो ‘तुलसी’ होते।

भंग छंद की देख तपस्या

सौ-सौ आँसू रोते।

-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗