कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कह-मुकरी Kah-Mukri कह-मुकरी · रचना ४ / ११ № 4 of 11 रचना ४ / ११
१० नवम्बर २०१९ 10 November 2019 १० नवम्बर २०१९
इस श्रृंखला में in this series इन श्रृंखलाअ में भाग ०१ / १० part 01 of 10 भाग ०१ / १०

कह-मुकरियाँ 1से 5 kah-mukariyaan 1se 5 कह-मुकरियाँ 1से 5

1)

रखता मुझको अंग लगाकर।

चलती उसके संग लजाकर।

लगे सहज उसका अपनापन।

क्या सखि, साजन?

ना सखि, दामन!

॥

2)

दिन में तो वो खूब तपाए।

रात कभी भी पास न आए।

फिर भी खुशियाँ देता जी भर।

क्या सखि साजन?

ना सखि, दिनकर!

॥

3)

वो अपनी मनमानी करता।

कुछ माँगूँ तो कान न धरता।

कठपुतली सा नाच नचाता।

क्या सखि साजन?

नहीं, विधाता!

॥

४)

भरी भीड़ में पास बुलाया।

गोद उठाकर चाँद दिखाया।

मन पाखी बन सुध-बुध भूला।

क्या सखि साजन?

ना री झूला!

॥

५)

दूर-दूर के नवल नज़ारे।

उसकी आँखों देखूँ सारे।

कभी न देता मुझको धोखा।

क्या सखि साजन?

नहीं, झरोखा!

1)

rakhataa mujhako ang lagaakar

chalatee usake sang lajaakar

lage sahaj usakaa apanaapan

kyaa sakhi, saajan?

naa sakhi, daaman!

·

2)

din men to wo khoob tapaae

raat kabhee bhee paas n aae

phir bhee khushiyaan detaa jee bhar

kyaa sakhi saajan?

naa sakhi, dinakar!

·

3)

wo apanee manamaanee karataa

kuch maangoon to kaan n dharataa

kathaputalee saa naach nachaataa

kyaa sakhi saajan?

naheen, widhaataa!

·

4)

bharee bheed men paas bulaayaa

god uthaakar chaand dikhaayaa

man paakhee ban sudh-budh bhoolaa

kyaa sakhi saajan?

naa ree jhoolaa!

·

5)

door-door ke nawal nazaare

usakee aankhon dekhoon saare

kabhee n detaa mujhako dhokhaa

kyaa sakhi saajan?

naheen, jharokhaa!

1)

रखता मुझको अंग लगाकर।

चलती उसके संग लजाकर।

लगे सहज उसका अपनापन।

क्या सखि, साजन?

ना सखि, दामन!

॥

2)

दिन में तो वो खूब तपाए।

रात कभी भी पास न आए।

फिर भी खुशियाँ देता जी भर।

क्या सखि साजन?

ना सखि, दिनकर!

॥

3)

वो अपनी मनमानी करता।

कुछ माँगूँ तो कान न धरता।

कठपुतली सा नाच नचाता।

क्या सखि साजन?

नहीं, विधाता!

॥

४)

भरी भीड़ में पास बुलाया।

गोद उठाकर चाँद दिखाया।

मन पाखी बन सुध-बुध भूला।

क्या सखि साजन?

ना री झूला!

॥

५)

दूर-दूर के नवल नज़ारे।

उसकी आँखों देखूँ सारे।

कभी न देता मुझको धोखा।

क्या सखि साजन?

नहीं, झरोखा!

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗