कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ५३ / ११४ № 53 of 114 रचना ५३ / ११४
९ जून २०१७ 9 June 2017 ९ जून २०१७

तीसरा रंग teesaraa rang तीसरा रंग

अनाथालय में पली बढ़ी साँवली-सलोनी कजली के तन का रंग जितना काला था, गुणों का रंग उतना ही उजला. ईश्वर ने उसमें गुण कूट-कूट कर भरे थे. इन्हीं गुणों के कारण ही उसके सास-ससुर ने उसे अपने बेटे विनोद के लिए पसंद किया था. उसकी आवारगी और उच्चश्रंखलता के कारण कोई भला इंसान अपनी बेटी उसके साथ ब्याहना पसंद नहीं करता था। विनोद कजली को बेहद प्यार करता था लेकिन केवल रात के समय, दिन में वो उससे बात करना तो दूर, नज़र उठाकर देखता तक न था। कजली को उसका यह व्यवहार किसी दोमुँहे साँप जैसा महसूस होता और वो तिलमिला कर रह जाती थी।

“विनोद, अभी हमारे विवाह को केवल ६ महीने ही हुए हैं और मैं देख रही हूँ कि तुम्हारा रंग आजकल बदलने लगा है। रात में तो तुम्हारा रंग और ही होता है, मैं तुम्हारी रानी, परी, हुस्न की मलिका और वगैरा, वगैरा होती हूँ...तुम मेरे बिना रह नहीं सकते...लेकिन दिन में... ”

विनोद की महिला मित्र के जाते ही कजली बिफरकर बोली। वो आए दिन उसकी महिला मित्रों को घर लाकर अपने सामने ही चुहलबाजी और छेड़छाड़ से खुद को अपमानित महसूस करने लगी थी।

“वो क्या है डियर कि, रात में तुम्हारा काला रंग नहीं दिखता न...लेकिन अब यह जान लो कि अगर मेरे साथ रहना है तो तुम्हें मेरे दोनों रंग स्वीकार करने होंगे। मैंने तुमसे विवाह केवल अपने माँ-पिता की सेवा करने के उद्देश्य से किया है, वे ही तुम्हारे गुणों पर रीझे थे।” विनोद ढिठाई के साथ बोला।

“कदापि नहीं, अगर ऐसा है तो मैं यहाँ से जा रही हूँ हमेशा के लिए... एक तीसरे रंग की तलाश में, जो मुझे अपने निश्छल प्रेम से सराबोर कर सके। मैं अनाथ, अबल ज़रूर हूँ लेकिन आत्मबल से वंचित नहीं...” कहते हुए कजली अपने सामान सहेजने लगी।

तभी अचानक कमरे का दरवाजा एक धक्के के साथ खुल गया और माँ ने अंदर आकर गरजते हुए कहा-

“मैंने तुम दोनों की सारी बातें सुन ली हैं। बहू, तुम कहीं नहीं जाओगी, तुम्हें वो तीसरा रंग भी विनोद में ही मिलेगा, मैं उसे जानती हूँ...। आज के बाद इस घर में उसके साथ कोई महिला मित्र नहीं आएगी...”

कहते हुए उसने विनोद की तरफ आशा भरी नज़रों से देखा, विनोद ने कजली की तरफ और कजली ने अपनी नज़रें झुका लीं.

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anaathaalay men palee bढ़ee saanvalee-salonee kajalee ke tan kaa rang jitanaa kaalaa thaa, gunon kaa rang utanaa hee ujalaa eeshvar ne usamen gun koot-koot kar bhare the inheen gunon ke kaaran hee usake saas-sasur ne use apane bete winod ke lie pasand kiyaa thaa usakee aawaaragee aur uchchashrankhalataa ke kaaran koee bhalaa insaan apanee betee usake saath byaahanaa pasand naheen karataa thaa winod kajalee ko behad pyaar karataa thaa lekin kewal raat ke samay, din men wo usase baat karanaa to door, nazar uthaakar dekhataa tak n thaa kajalee ko usakaa yah wyawahaar kisee domunhe saanp jaisaa mahasoos hotaa aur wo tilamilaa kar rah jaatee thee

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“winod, abhee hamaare wiwaah ko kewal 6 maheene hee hue hain aur main dekh rahee hoon ki tumhaaraa rang aajakal badalane lagaa hai raat men to tumhaaraa rang aur hee hotaa hai, main tumhaaree raanee, paree, husn kee malikaa aur wagairaa, wagairaa hotee hoontum mere binaa rah naheen sakatelekin din men ”

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winod kee mahilaa mitr ke jaate hee kajalee bipharakar bolee wo aae din usakee mahilaa mitron ko ghar laakar apane saamane hee chuhalabaajee aur chedachaad se khud ko apamaanit mahasoos karane lagee thee

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“wo kyaa hai diyar ki, raat men tumhaaraa kaalaa rang naheen dikhataa nlekin ab yah jaan lo ki agar mere saath rahanaa hai to tumhen mere donon rang sveekaar karane honge mainne tumase wiwaah kewal apane maan-pitaa kee sewaa karane ke uddeshy se kiyaa hai, we hee tumhaare gunon par reejhe the” winod dhithaaee ke saath bolaa

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“kadaapi naheen, agar aisaa hai to main yahaan se jaa rahee hoon hameshaa ke lie ek teesare rang kee talaash men, jo mujhe apane nishchal prem se saraabor kar sake main anaath, abal zaroor hoon lekin aatmabal se wanchit naheen” kahate hue kajalee apane saamaan sahejane lagee

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tabhee achaanak kamare kaa darawaajaa ek dhakke ke saath khul gayaa aur maan ne andar aakar garajate hue kahaa-

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“mainne tum donon kee saaree baaten sun lee hain bahoo, tum kaheen naheen jaaogee, tumhen wo teesaraa rang bhee winod men hee milegaa, main use jaanatee hoon aaj ke baad is ghar men usake saath koee mahilaa mitr naheen aaegee”

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kahate hue usane winod kee taraph aashaa bharee nazaron se dekhaa, winod ne kajalee kee taraph aur kajalee ne apanee nazaren jhukaa leen

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अनाथालय में पली बढ़ी साँवली-सलोनी कजली के तन का रंग जितना काला था, गुणों का रंग उतना ही उजला. ईश्वर ने उसमें गुण कूट-कूट कर भरे थे. इन्हीं गुणों के कारण ही उसके सास-ससुर ने उसे अपने बेटे विनोद के लिए पसंद किया था. उसकी आवारगी और उच्चश्रंखलता के कारण कोई भला इंसान अपनी बेटी उसके साथ ब्याहना पसंद नहीं करता था। विनोद कजली को बेहद प्यार करता था लेकिन केवल रात के समय, दिन में वो उससे बात करना तो दूर, नज़र उठाकर देखता तक न था। कजली को उसका यह व्यवहार किसी दोमुँहे साँप जैसा महसूस होता और वो तिलमिला कर रह जाती थी।

“विनोद, अभी हमारे विवाह को केवल ६ महीने ही हुए हैं और मैं देख रही हूँ कि तुम्हारा रंग आजकल बदलने लगा है। रात में तो तुम्हारा रंग और ही होता है, मैं तुम्हारी रानी, परी, हुस्न की मलिका और वगैरा, वगैरा होती हूँ...तुम मेरे बिना रह नहीं सकते...लेकिन दिन में... ”

विनोद की महिला मित्र के जाते ही कजली बिफरकर बोली। वो आए दिन उसकी महिला मित्रों को घर लाकर अपने सामने ही चुहलबाजी और छेड़छाड़ से खुद को अपमानित महसूस करने लगी थी।

“वो क्या है डियर कि, रात में तुम्हारा काला रंग नहीं दिखता न...लेकिन अब यह जान लो कि अगर मेरे साथ रहना है तो तुम्हें मेरे दोनों रंग स्वीकार करने होंगे। मैंने तुमसे विवाह केवल अपने माँ-पिता की सेवा करने के उद्देश्य से किया है, वे ही तुम्हारे गुणों पर रीझे थे।” विनोद ढिठाई के साथ बोला।

“कदापि नहीं, अगर ऐसा है तो मैं यहाँ से जा रही हूँ हमेशा के लिए... एक तीसरे रंग की तलाश में, जो मुझे अपने निश्छल प्रेम से सराबोर कर सके। मैं अनाथ, अबल ज़रूर हूँ लेकिन आत्मबल से वंचित नहीं...” कहते हुए कजली अपने सामान सहेजने लगी।

तभी अचानक कमरे का दरवाजा एक धक्के के साथ खुल गया और माँ ने अंदर आकर गरजते हुए कहा-

“मैंने तुम दोनों की सारी बातें सुन ली हैं। बहू, तुम कहीं नहीं जाओगी, तुम्हें वो तीसरा रंग भी विनोद में ही मिलेगा, मैं उसे जानती हूँ...। आज के बाद इस घर में उसके साथ कोई महिला मित्र नहीं आएगी...”

कहते हुए उसने विनोद की तरफ आशा भरी नज़रों से देखा, विनोद ने कजली की तरफ और कजली ने अपनी नज़रें झुका लीं.

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗