उसने छुआ था- भाग 1 (पुरस्कृत प्रेम कहानी) usane chuaa thaa- bhaag 1 (puraskriit prem kahaanee) उसने छुआ था- भाग 1 (पुरस्कृत प्रेम कहानी)
मध्यप्रदेश के एक औसत जनसंख्या वाले शहर शानपुर की पाश कॉलोनी के शांत वातावरण में बने एक सुंदर से घर की चारदीवारी के अंदर आंगन में रसोई की तैयारी करती हुई सुप्रिया को उसके पति देवराज ने घर की बैठक से ही आवाज़ देकर बुलाया तो सुप्रिया कुछ झल्लाती बुदबुदाती हुई काम छोड़कर बैठक में आते हुए बोली,
‘क्या काम है जल्दी कहो जी, घर के सभी काम आज मुझे ही करने हैं, कामवाली दो दिन की छुट्टी पर चली गई है.”
“अरे, तो इसमें परेशान होने की क्या बात है, कौनसे जहाज़ डूबे जा रहे हैं, घर में दो ही तो प्राणी हैं, मिलकर कर लेंगे, ज़रा देर बैठो, देखो यह अभी अभी मित्र का निमंत्रण पत्र मिला है।
तुम्हें बताया था न कि उनके पुत्र का रिश्ता टिमोरा गाँव की लड़की से तय हुआ है.”
‘अच्छा, फिर?” सुप्रिया उत्साह पूर्वक बोली. टिमोरा का नाम सुनते ही सुप्रिया के बीते हुए अहसास छलाँग मारकर यादों के दायरे से बाहर आ गए. कुछ दिन पहले जब सुप्रिया ने मध्यप्रदेश के नामी समाचार पत्र में टिमोरा के 35 वर्ष पुराने रेडियो शॉप, जो अब एक संग्रहालय का रूप ले चुका है, के मालिक विनोद पालीवाल का समाचार-पत्र के मुख्य पृष्ठ पर संवाददाता के साथ सचित्र साक्षात्कार पढ़ा था. तब से ही उसने अपने पुराने अहसासों के हर लम्हे से छुटकारा पाने का प्रण कर लिया था और देवराज से वो संग्रहालय देखने चलने की बात की थी.
“दो दिन बाद ही उनके पुत्र की बारात टिमोरा गाँव के लिए प्रस्थान करने वाली है।
वे चाहते हैं कि हम दोनों को भी बारात के साथ ही विवाह समारोह में शिरकत करनी है। वैसे तो मुझे अब इन समारोहों में कोई रुचि नहीं, अगर हमारे बेटे यहॉँ होते तो उनसे ही शामिल होने को भेज देता मगर अब तो हमें ही रिश्ते दोस्ती आदि निभाने पड़ेंगे न...
फिर तुम्हारा मन भी तो वहाँ का संग्रहालय देखने का था न...आखिर टिमोरा में तीन साल रह चुकी हो और ९ वीं से ११ वीं कक्षाएं वहीँ के स्कूल से उत्तीर्ण की हैं...वैसे तो मेरे लिए वो हर स्थल दर्शनीय है जहाँ तुम्हारी यादें जुड़ी हुई हैं लेकिन अब तो संग्रहालय बन जाने से वह छोटा सा शहर और भी महत्वपूर्ण हो गया है.”
“हम अवश्य जाएँगे और साथ ही मैं अपना पुराना टेप-रिकार्डर उस संग्रहालय को सौंपकर तुम्हें उस खटारा बेसुरे भोंपू से हमेशा के लिए मुक्त कर दूंगी.”
“ऐसा न कहो प्रिये, वो केवल एक मजाक होता है.”
“जानती हूँ, मगर देव, मैं सचमुच उससे मुक्त होना चाहती हूँ, मनोरंजन के लिए तरह तरह के आधुनिक संसाधनों के आगे उसका क्या काम...! फिर हमारे बाद पता नहीं उसका क्या हश्र हो, अतः मैं उसे स्वयं उसके सही स्थान तक पहुंचाना चाहती हूँ.” सुप्रिया गंभीर स्वर में बोली.
“फिर ठीक है, तुम तैयारी कर लेना.”
सुप्रिया का उस टेप रिकार्डर से ३५ वर्षों का नाता था. टिमोरा छोड़ने के बाद उसका एक दिन भी ऐसा न बीता था, जब उसने उन दिनों की चर्चित फिल्म “आराधना” की कैसेट के अपनी आत्मा में रचे बसे उस विशेष गीत को न सुना हो. यही नहीं, विवाह के बाद भी वो रेडियो-कम-टेप रिकार्डर उस कैसेट सहित दहेज़ के साथ अपने विशेष बैग में रखवाकर लाई थी.
ससुराल में जब भी वो अपने कमरे में अकेली होती तो वही गीत आवाज़ एकदम स्लो रखकर रिवर्स करके बार बार सुना करती. शाम को देवराज के घर से बाहर जाते ही उसने पैक करने से पहले रिकार्डर में वही कैसेट लगाकर अंतिम बार वो गीत लगा दिया...
कोरा कागज़ था ये मन मेरा...लिख लिया नाम इसपे तेरा...
इस गाने की वो इस कदर दीवानी थी कि जब भी उस कैसेट के शब्द घिसने पर ठीक से नहीं सुनाई देते, वो तुरंत अपनी जमा की हुई खाली कैसेट में उस फिल्म के गीत भरवा लाती और पुरानी कैसेट भी फेंकने के बजाय छिपाकर रख लेती.
इस तरह उसके पास एक जैसी लगभग ५० कैसेट जमा हो चुकी थीं जिन्हें आज तक देवराज सहित कोई कभी नहीं देख पाया था.
गाने के बोल फूटते ही उन मधुर स्वरलहरियों की तरंगों में कब वो डूबती-उतराती एक किश्ती की तरह समय की विपरीत धारा के साथ बहती चली गई, उसे पता ही नहीं चला
.
क्रमशः
madhyapradesh ke ek ausat janasankhyaa waale shahar shaanapur kee paash kॉlonee ke shaant waataawaran men bane ek sundar se ghar kee chaaradeewaaree ke andar aangan men rasoee kee taiyaaree karatee huee supriyaa ko usake pati dewaraaj ne ghar kee baithak se hee aawaaz dekar bulaayaa to supriyaa kuch jhallaatee budabudaatee huee kaam chodakar baithak men aate hue bolee,
‘kyaa kaam hai jaldee kaho jee, ghar ke sabhee kaam aaj mujhe hee karane hain, kaamawaalee do din kee chuttee par chalee gaee hai”
“are, to isamen pareshaan hone kee kyaa baat hai, kaunase jahaaz doobe jaa rahe hain, ghar men do hee to praanee hain, milakar kar lenge, zaraa der baitho, dekho yah abhee abhee mitr kaa nimantran patr milaa hai
tumhen bataayaa thaa n ki unake putr kaa rishtaa timoraa gaanv kee ladakee se tay huaa hai”
‘achchaa, phir?” supriyaa utsaah poorvak bolee timoraa kaa naam sunate hee supriyaa ke beete hue ahasaas chalaang maarakar yaadon ke daayare se baahar aa gae kuch din pahale jab supriyaa ne madhyapradesh ke naamee samaachaar patr men timoraa ke 35 warsh puraane rediyo shॉp, jo ab ek sangrahaalay kaa roop le chukaa hai, ke maalik winod paaleewaal kaa samaachaar-patr ke mukhy priishth par sanvaadadaataa ke saath sachitr saakshaatkaar pढ़aa thaa tab se hee usane apane puraane ahasaason ke har lamhe se chutakaaraa paane kaa pran kar liyaa thaa aur dewaraaj se wo sangrahaalay dekhane chalane kee baat kee thee
“do din baad hee unake putr kee baaraat timoraa gaanv ke lie prasthaan karane waalee hai
we chaahate hain ki ham donon ko bhee baaraat ke saath hee wiwaah samaaroh men shirakat karanee hai waise to mujhe ab in samaarohon men koee ruchi naheen, agar hamaare bete yahॉn hote to unase hee shaamil hone ko bhej detaa magar ab to hamen hee rishte dostee aadi nibhaane padenge n
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“aisaa n kaho priye, wo kewal ek majaak hotaa hai”
“jaanatee hoon, magar dew, main sachamuch usase mukt honaa chaahatee hoon, manoranjan ke lie tarah tarah ke aadhunik sansaadhanon ke aage usakaa kyaa kaam! phir hamaare baad pataa naheen usakaa kyaa hashr ho, atah main use svayan usake sahee sthaan tak pahunchaanaa chaahatee hoon” supriyaa ganbheer svar men bolee
“phir theek hai, tum taiyaaree kar lenaa”
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koraa kaagaz thaa ye man meraalikh liyaa naam isape teraa
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gaane ke bol phootate hee un madhur svaralahariyon kee tarangon men kab wo doobatee-utaraatee ek kishtee kee tarah samay kee wipareet dhaaraa ke saath bahatee chalee gaee, use pataa hee naheen chalaa
kramashah
मध्यप्रदेश के एक औसत जनसंख्या वाले शहर शानपुर की पाश कॉलोनी के शांत वातावरण में बने एक सुंदर से घर की चारदीवारी के अंदर आंगन में रसोई की तैयारी करती हुई सुप्रिया को उसके पति देवराज ने घर की बैठक से ही आवाज़ देकर बुलाया तो सुप्रिया कुछ झल्लाती बुदबुदाती हुई काम छोड़कर बैठक में आते हुए बोली,
‘क्या काम है जल्दी कहो जी, घर के सभी काम आज मुझे ही करने हैं, कामवाली दो दिन की छुट्टी पर चली गई है.”
“अरे, तो इसमें परेशान होने की क्या बात है, कौनसे जहाज़ डूबे जा रहे हैं, घर में दो ही तो प्राणी हैं, मिलकर कर लेंगे, ज़रा देर बैठो, देखो यह अभी अभी मित्र का निमंत्रण पत्र मिला है।
तुम्हें बताया था न कि उनके पुत्र का रिश्ता टिमोरा गाँव की लड़की से तय हुआ है.”
‘अच्छा, फिर?” सुप्रिया उत्साह पूर्वक बोली. टिमोरा का नाम सुनते ही सुप्रिया के बीते हुए अहसास छलाँग मारकर यादों के दायरे से बाहर आ गए. कुछ दिन पहले जब सुप्रिया ने मध्यप्रदेश के नामी समाचार पत्र में टिमोरा के 35 वर्ष पुराने रेडियो शॉप, जो अब एक संग्रहालय का रूप ले चुका है, के मालिक विनोद पालीवाल का समाचार-पत्र के मुख्य पृष्ठ पर संवाददाता के साथ सचित्र साक्षात्कार पढ़ा था. तब से ही उसने अपने पुराने अहसासों के हर लम्हे से छुटकारा पाने का प्रण कर लिया था और देवराज से वो संग्रहालय देखने चलने की बात की थी.
“दो दिन बाद ही उनके पुत्र की बारात टिमोरा गाँव के लिए प्रस्थान करने वाली है।
वे चाहते हैं कि हम दोनों को भी बारात के साथ ही विवाह समारोह में शिरकत करनी है। वैसे तो मुझे अब इन समारोहों में कोई रुचि नहीं, अगर हमारे बेटे यहॉँ होते तो उनसे ही शामिल होने को भेज देता मगर अब तो हमें ही रिश्ते दोस्ती आदि निभाने पड़ेंगे न...
फिर तुम्हारा मन भी तो वहाँ का संग्रहालय देखने का था न...आखिर टिमोरा में तीन साल रह चुकी हो और ९ वीं से ११ वीं कक्षाएं वहीँ के स्कूल से उत्तीर्ण की हैं...वैसे तो मेरे लिए वो हर स्थल दर्शनीय है जहाँ तुम्हारी यादें जुड़ी हुई हैं लेकिन अब तो संग्रहालय बन जाने से वह छोटा सा शहर और भी महत्वपूर्ण हो गया है.”
“हम अवश्य जाएँगे और साथ ही मैं अपना पुराना टेप-रिकार्डर उस संग्रहालय को सौंपकर तुम्हें उस खटारा बेसुरे भोंपू से हमेशा के लिए मुक्त कर दूंगी.”
“ऐसा न कहो प्रिये, वो केवल एक मजाक होता है.”
“जानती हूँ, मगर देव, मैं सचमुच उससे मुक्त होना चाहती हूँ, मनोरंजन के लिए तरह तरह के आधुनिक संसाधनों के आगे उसका क्या काम...! फिर हमारे बाद पता नहीं उसका क्या हश्र हो, अतः मैं उसे स्वयं उसके सही स्थान तक पहुंचाना चाहती हूँ.” सुप्रिया गंभीर स्वर में बोली.
“फिर ठीक है, तुम तैयारी कर लेना.”
सुप्रिया का उस टेप रिकार्डर से ३५ वर्षों का नाता था. टिमोरा छोड़ने के बाद उसका एक दिन भी ऐसा न बीता था, जब उसने उन दिनों की चर्चित फिल्म “आराधना” की कैसेट के अपनी आत्मा में रचे बसे उस विशेष गीत को न सुना हो. यही नहीं, विवाह के बाद भी वो रेडियो-कम-टेप रिकार्डर उस कैसेट सहित दहेज़ के साथ अपने विशेष बैग में रखवाकर लाई थी.
ससुराल में जब भी वो अपने कमरे में अकेली होती तो वही गीत आवाज़ एकदम स्लो रखकर रिवर्स करके बार बार सुना करती. शाम को देवराज के घर से बाहर जाते ही उसने पैक करने से पहले रिकार्डर में वही कैसेट लगाकर अंतिम बार वो गीत लगा दिया...
कोरा कागज़ था ये मन मेरा...लिख लिया नाम इसपे तेरा...
इस गाने की वो इस कदर दीवानी थी कि जब भी उस कैसेट के शब्द घिसने पर ठीक से नहीं सुनाई देते, वो तुरंत अपनी जमा की हुई खाली कैसेट में उस फिल्म के गीत भरवा लाती और पुरानी कैसेट भी फेंकने के बजाय छिपाकर रख लेती.
इस तरह उसके पास एक जैसी लगभग ५० कैसेट जमा हो चुकी थीं जिन्हें आज तक देवराज सहित कोई कभी नहीं देख पाया था.
गाने के बोल फूटते ही उन मधुर स्वरलहरियों की तरंगों में कब वो डूबती-उतराती एक किश्ती की तरह समय की विपरीत धारा के साथ बहती चली गई, उसे पता ही नहीं चला
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क्रमशः