कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ११० / ११४ № 110 of 114 रचना ११० / ११४
२९ मार्च २०२१ 29 March 2021 २९ मार्च २०२१

उसने छुआ था भाग 4 usane chuaa thaa bhaag 4 उसने छुआ था भाग 4

स्कूल छूट गया था. टिमोरा में कोलेज होता तो वो जैसे तैसे घर के सारे कार्य करने की शर्त पर माँ को मना लेती. मगर अब आगे पढ़ने की उम्मीद करना ही व्यर्थ था. वैसे भी उसकी बिरादरी की सभी लडकियाँ बड़े बुजुर्गों के पुराने विचारों के कारण प्रायमरी से आगे नहीं पढ़ सकी थीं.

यह तो सुप्रिया की खुशकिस्मती थी कि पिता के तबादले के कारण वो अपना गृह-नगर छोड़ चुकी थी. उसके पिता उसकी प्रतिभा से भली प्रकार वाकिफ थे और बेटी की रूचि देखकर उसे आगे पढने के लिए अपनी कम-पढ़ पत्नी को मना लेते थे.

मजबूर सुप्रिया अब स्कूली अध्याय को बंद करके पूरी तरह से घर के कार्यों को समर्पित हो चुकी थी. उसका पहला प्यार स्कूल और किताबें थीं तो दूसरे क्रम पर उसका संगीत प्रेम था. उसे रेडियो पर हर तरह के मधुर संगीत वाले फ़िल्मी गाने सुनना बेहद अच्छा लगता था.

नई दिनचर्या के तहत अब पौ फटते ही वो बिस्तर छोड़ उठ जाती और आंखें मलते हुए बैठक की खिड़की खोलकर ताजा हवा फेफड़ों में भरती हुई  स्टूल खींचकर सोफे के साथ सटाकर उसके सहारे उस ऊँचे स्टूल पर चढ़कर अपनी अभ्यस्त उंगलियों से  खिड़की के बगल में ही एक ताख पर रखे हुए रेडियो के बटन दबाकर अपने मनपसंद स्टेशन की सुई मिलाती और सुमधुर गीतों की स्वर लहरी अंदर बाहर गूँजने लगती। रेडियो फुल स्पीड पर ही चलता रहता और वो उसी टोन में गुनगुनाते हुए घर के छोटे बड़े सभी काम निपटाती रहती थी।

लता शहर की मुख्य बस्ती में रहती थी. वो उससे मिलने कभी-कभी आ जाया करती थी. कक्षा के अन्य विद्यार्थियों का परीक्षा परिणाम भी उसे उसी से ज्ञात हुआ. उसी ने बताया कि विनोद प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था. उसने सुप्रिया की द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर दुःख जताया मगर उसने सखी का मन रखने के लिए यह भी कहा कि प्रथम श्रेणी से क्या होता है, संभालना तो उसे भी अपने पिता की रेडियो शॉप ही है न,,,उसके खडूस पिता पढ़ाई के लिए कहीं नहीं भेजने वाले...वे बेटे के लिए रेडियो शॉप नए स्थान पर शिफ्ट करके उसे नया रूप देने का विचार रखते हैं.

विनोद का नाम सुनकर उसके मन में उथल-पुथल मच गई थी, उसने तो उस छुअन को दिल के दायरे में हमेशा के लिए कैद कर लिया था अतः वो चाहते हुए भी इस बारे में अधिक कुछ नहीं पूछ सकी थी.

कुछ समय बीतने पर एक दिन सुबह सुबह जैसे ही सुप्रिया ने खिड़की खोली तो उसे बाजू वाली बिल्डिंग में, जो उसकी बिल्डिंग से एक संकरी गली के फासले पर थी, खटर-पटर की आवाज़ सुनाई दी. उसने खिड़की पूरी खोलकर देखा तो उस खाली पड़ी बिल्डिंग की वो बंद खिड़की, जो उसकी बैठक के सामानांतर कुछ आगे के हिस्से में थी, खुली हुई थी और कुछ कामगार  सफाई आदि के कार्यों में लगे हुए थे. शायद वहाँ कोई रहने आ रहा है, यह सोचकर सुप्रिया ने ध्यान नहीं दिया. वो रेडियो पर मनपसंद गाने लगाकर अपने रोज़मर्रा के कार्यों में लग गई. मगर जब हर दिन उस खिड़की से दिन भर उठा-पटक की आवाजें आने लगीं तो वो रेडियो बंद करने के साथ खिड़की भी बंद कर देती थी, क्योंकि रसोई बैठक की सीध में ही थी और काम करते हुए उस तरफ के लोग उसकी खिड़की के ठीक सामने छत के खाली पड़े हिस्से में लगे नल तक आकर झाँकते नज़र आ जाते थे. वहाँ क्या काम चल रहा है, इसमें सुप्रिया को कोई रूचि नहीं थी. रसोई में वो अकेली ही होती थी और माँ सहित सभी बच्चे बैठक के साथ ही लगे हुए दो बड़े हालनुमा कमरों में या सामने की खुली छत पर होते थे.

दो तीन माह बीतने पर एक दिन नीचे कुछ आवश्यक सामान लेने के लिए गई हुई सुप्रिया को उस पडोसी बिल्डिंग के ऊपरी हिस्से की बालकनी पर एक बोर्ड लगा हुआ दिखाई दिया जिसपर बड़े-बड़े अक्षरों में “पालीवाल रेडियो शॉप” लिखा हुआ था. पालीवाल उपनाम तो विनोद का भी था और लता उसकी रेडियो शॉप का जिक्र भी उससे कर चुकी थी अतः उत्सुकता वश उसने ऊपर आकर खिड़की खोलकर देखा तो उस घर के आगे के हिस्से में एक कुर्सी पर कोई अधेड़ व्यक्ति सामने रखी हुई टेबल पर रेडियो सुनने में व्यस्त था और जहां तक उसकी नज़र जा रही थी, तरह तरह के पैकेट दिखाई दिए. सुप्रिया ने कुछ समझने में नाकामयाब होकर उस समय तो खिड़की वापस बंद कर दी. मगर उसकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई. वो जानना चाहती थी कि ये पालीवाल कौन हैं? और विनोद पालीवाल का उनसे कोई सम्बन्ध है या नहीं. मगर सुप्रिया के पास अधिक जानकारी जुटाने का कोई जरिया नहीं था. खिड़की से अक्सर वही व्यक्ति और आते जाते ग्राहक ही दिखाई देते थे. दिन में वो थकान उतारने के लिए आराम करती थी तो खिड़की बंद ही रहती थी.

एक दिन  दोपहर के समय लता उससे मिलने के लिए आई तो उसे बैठक में बिठाकर सुप्रिया ने खिड़की खोली तो उसने कुर्सी पर अधेड़ व्यक्ति के स्थान पर एक युवक को बैठे देखा जो हँस-हँस कर ग्राहकों को नए नए मॉडल के रेडियो दिखा रहा था. एक कर्मचारी पैकेट लाने और वापस रखने में व्यस्त था. युवक का मुँह सामने सड़क की तरफ था और खिड़की से उसका एक तरफ का हिस्सा ही दिख रहा था मगर सुप्रिया ने क्षण मात्र में उसे पहचान लिया. वो विनोद ही था. वही विनोद जिसने अनजाने में उसे अपना स्पर्श सुख देकर उसका सुख चैन लूट लिया था। वो घबराहट में जल्दी से वहाँ से हट गई और खिड़की का एक तरफ का पल्ला कुछ बंद कर दिया.

लता उसे अपने विवाह का निमंत्रण-पत्र देने आई थी और जल्दी में थी. उसने आग्रह करके सुप्रिया से विवाह समारोह में सपरिवार आने का वादा लिया और चाय पीकर खुद तो चली गई. मगर उस खुली खिड़की के साथ उसके मन के बंद कपाट भी खोल गई थी.

शायद विनोद के दुकान पर आने का समय दोपहर का ही होगा. क्योंकि सुबह शाम उसके पिताजी ही होते थे. अब तो सुप्रिया के मन को चैन ही नहीं आ रहा था. उस दुकान की खिड़की की कुर्सी ऊँची होने से वहाँ बैठा हुआ व्यक्ति साफ़ दिख जाता था मगर सुप्रिया की बैठक पिछले हिस्से में होने से उस तरफ बैठे हुए व्यक्ति का ध्यान इस तरफ बिलकुल नहीं जाता था.

मगर दोनों घर एक सीध में होते हुए कब तक वो भी अनजान रह सकता था...एक दिन शाम को वो बालकनी में बच्चों के साथ खड़ी थी कि वापस मुड़ते हुए अचानक विनोद की नज़र उसपर पड़ गई. नज़रें मिलीं तो विनोद अविश्वसनीय नज़रों से उसे ताकने लगा. फिर जल्दी से मुस्कुराकर हाथ हिलाकर अभिवादन किया. सुप्रिया ने सिहरकर किसी बच्चे  की नज़र पड़ने से पहले ही नज़रें झुका लीं और अन्दर चली गई.

क्रमशः

skool choot gayaa thaa timoraa men kolej hotaa to wo jaise taise ghar ke saare kaary karane kee shart par maan ko manaa letee magar ab aage pढ़ne kee ummeed karanaa hee wyarth thaa waise bhee usakee biraadaree kee sabhee ladakiyaan bade bujurgon ke puraane wichaaron ke kaaran praayamaree se aage naheen pढ़ sakee theen

yah to supriyaa kee khushakismatee thee ki pitaa ke tabaadale ke kaaran wo apanaa griih-nagar chod chukee thee usake pitaa usakee pratibhaa se bhalee prakaar waakiph the aur betee kee roochi dekhakar use aage padhane ke lie apanee kam-pढ़ patnee ko manaa lete the

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kramashah

स्कूल छूट गया था. टिमोरा में कोलेज होता तो वो जैसे तैसे घर के सारे कार्य करने की शर्त पर माँ को मना लेती. मगर अब आगे पढ़ने की उम्मीद करना ही व्यर्थ था. वैसे भी उसकी बिरादरी की सभी लडकियाँ बड़े बुजुर्गों के पुराने विचारों के कारण प्रायमरी से आगे नहीं पढ़ सकी थीं.

यह तो सुप्रिया की खुशकिस्मती थी कि पिता के तबादले के कारण वो अपना गृह-नगर छोड़ चुकी थी. उसके पिता उसकी प्रतिभा से भली प्रकार वाकिफ थे और बेटी की रूचि देखकर उसे आगे पढने के लिए अपनी कम-पढ़ पत्नी को मना लेते थे.

मजबूर सुप्रिया अब स्कूली अध्याय को बंद करके पूरी तरह से घर के कार्यों को समर्पित हो चुकी थी. उसका पहला प्यार स्कूल और किताबें थीं तो दूसरे क्रम पर उसका संगीत प्रेम था. उसे रेडियो पर हर तरह के मधुर संगीत वाले फ़िल्मी गाने सुनना बेहद अच्छा लगता था.

नई दिनचर्या के तहत अब पौ फटते ही वो बिस्तर छोड़ उठ जाती और आंखें मलते हुए बैठक की खिड़की खोलकर ताजा हवा फेफड़ों में भरती हुई  स्टूल खींचकर सोफे के साथ सटाकर उसके सहारे उस ऊँचे स्टूल पर चढ़कर अपनी अभ्यस्त उंगलियों से  खिड़की के बगल में ही एक ताख पर रखे हुए रेडियो के बटन दबाकर अपने मनपसंद स्टेशन की सुई मिलाती और सुमधुर गीतों की स्वर लहरी अंदर बाहर गूँजने लगती। रेडियो फुल स्पीड पर ही चलता रहता और वो उसी टोन में गुनगुनाते हुए घर के छोटे बड़े सभी काम निपटाती रहती थी।

लता शहर की मुख्य बस्ती में रहती थी. वो उससे मिलने कभी-कभी आ जाया करती थी. कक्षा के अन्य विद्यार्थियों का परीक्षा परिणाम भी उसे उसी से ज्ञात हुआ. उसी ने बताया कि विनोद प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था. उसने सुप्रिया की द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर दुःख जताया मगर उसने सखी का मन रखने के लिए यह भी कहा कि प्रथम श्रेणी से क्या होता है, संभालना तो उसे भी अपने पिता की रेडियो शॉप ही है न,,,उसके खडूस पिता पढ़ाई के लिए कहीं नहीं भेजने वाले...वे बेटे के लिए रेडियो शॉप नए स्थान पर शिफ्ट करके उसे नया रूप देने का विचार रखते हैं.

विनोद का नाम सुनकर उसके मन में उथल-पुथल मच गई थी, उसने तो उस छुअन को दिल के दायरे में हमेशा के लिए कैद कर लिया था अतः वो चाहते हुए भी इस बारे में अधिक कुछ नहीं पूछ सकी थी.

कुछ समय बीतने पर एक दिन सुबह सुबह जैसे ही सुप्रिया ने खिड़की खोली तो उसे बाजू वाली बिल्डिंग में, जो उसकी बिल्डिंग से एक संकरी गली के फासले पर थी, खटर-पटर की आवाज़ सुनाई दी. उसने खिड़की पूरी खोलकर देखा तो उस खाली पड़ी बिल्डिंग की वो बंद खिड़की, जो उसकी बैठक के सामानांतर कुछ आगे के हिस्से में थी, खुली हुई थी और कुछ कामगार  सफाई आदि के कार्यों में लगे हुए थे. शायद वहाँ कोई रहने आ रहा है, यह सोचकर सुप्रिया ने ध्यान नहीं दिया. वो रेडियो पर मनपसंद गाने लगाकर अपने रोज़मर्रा के कार्यों में लग गई. मगर जब हर दिन उस खिड़की से दिन भर उठा-पटक की आवाजें आने लगीं तो वो रेडियो बंद करने के साथ खिड़की भी बंद कर देती थी, क्योंकि रसोई बैठक की सीध में ही थी और काम करते हुए उस तरफ के लोग उसकी खिड़की के ठीक सामने छत के खाली पड़े हिस्से में लगे नल तक आकर झाँकते नज़र आ जाते थे. वहाँ क्या काम चल रहा है, इसमें सुप्रिया को कोई रूचि नहीं थी. रसोई में वो अकेली ही होती थी और माँ सहित सभी बच्चे बैठक के साथ ही लगे हुए दो बड़े हालनुमा कमरों में या सामने की खुली छत पर होते थे.

दो तीन माह बीतने पर एक दिन नीचे कुछ आवश्यक सामान लेने के लिए गई हुई सुप्रिया को उस पडोसी बिल्डिंग के ऊपरी हिस्से की बालकनी पर एक बोर्ड लगा हुआ दिखाई दिया जिसपर बड़े-बड़े अक्षरों में “पालीवाल रेडियो शॉप” लिखा हुआ था. पालीवाल उपनाम तो विनोद का भी था और लता उसकी रेडियो शॉप का जिक्र भी उससे कर चुकी थी अतः उत्सुकता वश उसने ऊपर आकर खिड़की खोलकर देखा तो उस घर के आगे के हिस्से में एक कुर्सी पर कोई अधेड़ व्यक्ति सामने रखी हुई टेबल पर रेडियो सुनने में व्यस्त था और जहां तक उसकी नज़र जा रही थी, तरह तरह के पैकेट दिखाई दिए. सुप्रिया ने कुछ समझने में नाकामयाब होकर उस समय तो खिड़की वापस बंद कर दी. मगर उसकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई. वो जानना चाहती थी कि ये पालीवाल कौन हैं? और विनोद पालीवाल का उनसे कोई सम्बन्ध है या नहीं. मगर सुप्रिया के पास अधिक जानकारी जुटाने का कोई जरिया नहीं था. खिड़की से अक्सर वही व्यक्ति और आते जाते ग्राहक ही दिखाई देते थे. दिन में वो थकान उतारने के लिए आराम करती थी तो खिड़की बंद ही रहती थी.

एक दिन  दोपहर के समय लता उससे मिलने के लिए आई तो उसे बैठक में बिठाकर सुप्रिया ने खिड़की खोली तो उसने कुर्सी पर अधेड़ व्यक्ति के स्थान पर एक युवक को बैठे देखा जो हँस-हँस कर ग्राहकों को नए नए मॉडल के रेडियो दिखा रहा था. एक कर्मचारी पैकेट लाने और वापस रखने में व्यस्त था. युवक का मुँह सामने सड़क की तरफ था और खिड़की से उसका एक तरफ का हिस्सा ही दिख रहा था मगर सुप्रिया ने क्षण मात्र में उसे पहचान लिया. वो विनोद ही था. वही विनोद जिसने अनजाने में उसे अपना स्पर्श सुख देकर उसका सुख चैन लूट लिया था। वो घबराहट में जल्दी से वहाँ से हट गई और खिड़की का एक तरफ का पल्ला कुछ बंद कर दिया.

लता उसे अपने विवाह का निमंत्रण-पत्र देने आई थी और जल्दी में थी. उसने आग्रह करके सुप्रिया से विवाह समारोह में सपरिवार आने का वादा लिया और चाय पीकर खुद तो चली गई. मगर उस खुली खिड़की के साथ उसके मन के बंद कपाट भी खोल गई थी.

शायद विनोद के दुकान पर आने का समय दोपहर का ही होगा. क्योंकि सुबह शाम उसके पिताजी ही होते थे. अब तो सुप्रिया के मन को चैन ही नहीं आ रहा था. उस दुकान की खिड़की की कुर्सी ऊँची होने से वहाँ बैठा हुआ व्यक्ति साफ़ दिख जाता था मगर सुप्रिया की बैठक पिछले हिस्से में होने से उस तरफ बैठे हुए व्यक्ति का ध्यान इस तरफ बिलकुल नहीं जाता था.

मगर दोनों घर एक सीध में होते हुए कब तक वो भी अनजान रह सकता था...एक दिन शाम को वो बालकनी में बच्चों के साथ खड़ी थी कि वापस मुड़ते हुए अचानक विनोद की नज़र उसपर पड़ गई. नज़रें मिलीं तो विनोद अविश्वसनीय नज़रों से उसे ताकने लगा. फिर जल्दी से मुस्कुराकर हाथ हिलाकर अभिवादन किया. सुप्रिया ने सिहरकर किसी बच्चे  की नज़र पड़ने से पहले ही नज़रें झुका लीं और अन्दर चली गई.

क्रमशः

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗