कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना १०९ / ११४ № 109 of 114 रचना १०९ / ११४
२९ मार्च २०२१ 29 March 2021 २९ मार्च २०२१

उसने छुआ था भाग 3 usane chuaa thaa bhaag 3 उसने छुआ था भाग 3

चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ था, धुआँधार बारिश से नदी नाले उफान पर थे। बादल और बिजली के  गरजने-चमकने में होड़ लगी हुई थी। लगता था जैसे आज ही अपने सारे अरमान पूरे करने को उद्यत हों। सुप्रिया ने एक हाथ पर किताबों से भरा हुआ पोलीथिन का बैग जमाया और एक हाथ में छाता लिया फिर जल्दी जल्दी पग बढ़ाती हुई चल दी।

कच्ची मिट्टी और ऊपर से बारिश का ज़ोर, कदम जैसे बढ़ते ही न थे। जूते मिट्टी से लथपथ होकर मनों भारी हो चुके थे, उसे अपने निर्णय पर पश्चाताप हुआ लेकिन अब क्या हो? सामने  विद्यालय को जाने वाली पक्की सड़क अब साफ नज़र आ रही थी। ज्यों ही वह सड़क पर जाने के लिए वर्षा से पूर बहती हुई नाली जो पानी के कारण नाला बन चुकी थी, पार करने लगी, तेज़ हवा से छाता उलट गया और हाथ से छूटकर पानी में नाव जैसा तैरकर दूर जाने लगा। घबराकर सुप्रिया उसे पकड़ने लपकी तो एक किताब खिसककर पानी में गिर गई. उसने छाता छोड़ जल्दी ही झुककर किताब उठा ली मगर अब वो पानी में पूरी तरह भीग चुकी थी और असहाय सी सामने देखकर सहायता के लिए चिल्लाने लगी.

सामने ही सड़क पर एक चाय की गुमटी थी. वहां से आते-जाते लोग वहाँ भोला भैया की चाय पीने अवश्य रुकते थे. उसकी चीख सुनकर भोला की नज़र सुप्रिया पर पड़ गई. उसने तुरंत वहाँ चाय सुड़कते हुए एकमात्र युवा ग्राहक को उस तरफ इशारा करके वहाँ जाने का अनुरोध किया. युवक ने सुप्रिया को देखते ही पहचान लिया और चाय का कप छोड़कर उस तरफ दौड़ पड़ा.

सुप्रिया होश हवास खोकर उसी स्थान पर जडवत खड़ी रह गई थी. युवक को आते देखकर  उसकी जान में जान आई. मगर जब उसने गौर से देखा कि वो युवक उसी की कक्षा का सबसे होनहार छात्र विनोद था, जो सुप्रिया के आने के बाद से गणित के शिक्षक अग्रवाल सर की प्रताड़ना का शिकार बना हुआ था, क्योंकि सर कक्षा में जो भी सवाल हल करने को कहते, वो उनके राउंड पूरा करते ही सुप्रिया हल कर लेती थी जबकि उससे पहले इस उपलब्धि पर विनोद का ही एकाधिकार था.

अग्रवाल सर बहुत गुस्सैल थे. विनोद को पिछड़ते देखकर सीधे उसे बेंच पर यह कहकर कान पकड़वाकर खड़ा कर देते  कि जब एक लड़की इतनी जल्दी सवाल हल कर लेती है तो वो क्यों नहीं कर सकता...

इस समय संकट की स्थिति में उसी विनोद को सामने देखकर सुप्रिया की सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई. वो यह समझ नहीं पाई कि विनोद स्कूल में न होकर यहाँ क्यों है. सोचने लगी कि पता नहीं वो उसके साथ कैसा बर्ताव करेगा.

विनोद बिना एक पल भी गँवाए छलाँग लगाकर नाली पार करके सुप्रिया के पास पहुँच गया और उसके काँपते हाथ से किताबों का बैग लेकर दूसरे हाथ से उसका हाथ पकड़कर धीरे-धीरे सुरक्षित नाली पार करवा दी और सड़क पार करके उसे गुमटी की बेंच पर बिठाकर भोला को दो कड़क चाय बनाने के लिए कहा.

भोला समझदार था, विनोद की चाय ठंडी हो चुकी देखकर उसने पहले ही चाय बनने को रख दी थी. अब विनोद पुनः दौड़कर सड़क पार जाकर सुप्रिया के बहते हुए छाते को भी सुरक्षित निकाल लाया और सीधा करके खोलकर सूखने के लिए एक तरफ रख दिया.

इस क्रम में सुप्रिया और वो पूरे भीग चुके थे. सुप्रिया के मुँह पर तो मानो ताला ही लग गया था, दो बोल धन्यवाद के भी विनोद के लिए न निकाल सकी. एक तो पहली बार किसी युवक ने उसे  छुआ था, ऊपर से अब उसके मन में विनोद के प्रति एक अपराध बोध भी जड़ जमा चुका था. जैसे तैसे चाय सुड़ककर जाने के लिए उठकर खडी हो गई.

यह देखकर विनोद ने कहा-

‘सुप्रिया जी, आज भारी वर्षा के कारण स्कूल बंद है. मैं वहाँ सूचना पढ़कर वापस जा रहा था, शायद आपकी सहायता हेतु ही भोला भैया की चाय ने मुझे यहाँ बुला लिया. आपको गीले वस्त्रों में चलने में परेशानी होगी, लाइए किताबें और छाता मुझे दीजिये, बारिश तो रुक ही चुकी है, आपको घर के निकट छोड़ दूँगा’.

सुप्रिया माँ की दी हुई हिदायतें कैसे भूल सकती थी कि लड़कों के स्कूल में पढ़ने की इजाज़त तो ले ली, मगर खबरदार जो किसी लड़के की तरफ आँख  उठाकर भी देखा.

-कि फलाँ  ने बहन को जाट लड़के से छिपकर मिलते, हँसकर बोलते देख लिया तो चुपचाप उसे खाने में ज़हर देकर मार डाला, किसी को कानोंकान खबर भी न हुई।

सुप्रिया के लिए तो पढ़ाई की छूट मिलना ही मनचाही मुराद हासिल करने जैसा था। वो क्यों भला किसी लड़के की तरफ देखकर अपना सुख चैन नष्ट करती। किताबों में उसके प्राण बसते थे। पढ़ाई के अलावा कुछ सोचने की भी उसे फुरसत नहीं थी.

माँ वैसे ही पूरा दिन उसे घर के कामों में उलझाकर रखती थी। आखिर आधा दर्जन भाई-बहनों में सबसे बड़ी जो थी... रात में बड़ी मुश्किल से अपना होम वर्क पूरा कर पाती थी।

वो तो उसकी प्रतिभा थी, जिससे उसे कक्षा में पढ़ाया हुआ तुरंत याद हो जाता था

वो तुरंत मुँह पर पड़ा ताला खोलकर बोल पड़ी-

नहीं, नहीं आप कष्ट मत कीजिये, मैं धीरे-धीरे चली जाऊँगी.

मगर चलते हुए उसके कदम डगमगा रहे थे। उसके दिल दिमाग पर विनोद के हाथ की छुअन हावी होती जा रही थी। यह क्या और क्यों हो रहा है, वो यह भी नहीं समझ पा रही थी.

क्या उसे भी  वैसा ही अहसास हो रहा होगा...!

अब सुप्रिया स्कूल जाती तो विनोद को देखते ही नज़रें झुका लेती थी, जबकि वो उसका कोई नोटिस ही नहीं लेता था।

उस दिन के बाद गणित के सवाल तुरंत हल कर लेने वाली सुप्रिया धीरे धीरे गणित में ही पिछड़ने लगी।

विनोद अब सबसे पहले सवाल हल करके  विजयी भाव से कनखियों से उसकी तरफ देखता तो वो हारे हुए जुआरी की तरह तुरंत सिर झुका लेती।

गणित के सर भी आश्चर्य करने लगे थे।

चूँकि स्कूल में लड़कियों को बेंच पर खड़ा करना नियम-विरुद्ध था अतः एक बार उसने कड़क आवाज़ में उससे पिछड़ने का कारण पूछा तो सुप्रिया ने घर के कार्यों में व्यस्तता के बहाना बनाकर छुटकारा पा लिया.

परीक्षाएँ होती रहीं। मासिक, तिमाही, और छमाही में भी वो विनोद से पीछे थी।

विनोद अपनी पोज़िशन वापस हासिल करके बहुत प्रसन्न था। मगर शायद उसे भी शक हो गया था कि सुप्रिया जानबूझकर ऐसा कर रही है।

उसकी नज़रें सुप्रिया का मन टटोलने को मचल उठतीं मगर स्कूल के कठोर  अनुशासन के कारण कभी उससे पूछने का अवसर ही नहीं मिला।

वो स्कूल का अंतिम वर्ष था. ११ वीं की वार्षिक परीक्षा के बाद स्कूल छूटने के अहसास मात्र से सुप्रिया की आस का दिया तो पहले ही  बुझ चुका था, ऊपर से विनोद को भी अब कभी न देख पाने के दुःख ने रही सही कसर भी पूरी कर दी. घर के कामों का बोझ अलग था. ऐसे में परीक्षा की तैयारी ठीक से कैसे होती...परिणाम स्पष्ट था. इस बार वो द्वितीय श्रेणी में ही उत्तीर्ण हुई थी.

क्रमशः

chaaron taraph andheraa chaayaa huaa thaa, dhuaandhaar baarish se nadee naale uphaan par the baadal aur bijalee ke garajane-chamakane men hod lagee huee thee lagataa thaa jaise aaj hee apane saare aramaan poore karane ko udyat hon supriyaa ne ek haath par kitaabon se bharaa huaa poleethin kaa baig jamaayaa aur ek haath men chaataa liyaa phir jaldee jaldee pag bढ़aatee huee chal dee

·

kachchee mittee aur oopar se baarish kaa zor, kadam jaise bढ़te hee n the joote mittee se lathapath hokar manon bhaaree ho chuke the, use apane nirnay par pashchaataap huaa lekin ab kyaa ho? saamane widyaalay ko jaane waalee pakkee sadak ab saaph nazar aa rahee thee jyon hee wah sadak par jaane ke lie warshaa se poor bahatee huee naalee jo paanee ke kaaran naalaa ban chukee thee, paar karane lagee, tez hawaa se chaataa ulat gayaa aur haath se chootakar paanee men naaw jaisaa tairakar door jaane lagaa ghabaraakar supriyaa use pakadane lapakee to ek kitaab khisakakar paanee men gir gaee usane chaataa chod jaldee hee jhukakar kitaab uthaa lee magar ab wo paanee men pooree tarah bheeg chukee thee aur asahaay see saamane dekhakar sahaayataa ke lie chillaane lagee

·

saamane hee sadak par ek chaay kee gumatee thee wahaan se aate-jaate log wahaan bholaa bhaiyaa kee chaay peene awashy rukate the usakee cheekh sunakar bholaa kee nazar supriyaa par pad gaee usane turant wahaan chaay sudakate hue ekamaatr yuwaa graahak ko us taraph ishaaraa karake wahaan jaane kaa anurodh kiyaa yuwak ne supriyaa ko dekhate hee pahachaan liyaa aur chaay kaa kap chodakar us taraph daud padaa

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supriyaa hosh hawaas khokar usee sthaan par jadawat khadee rah gaee thee yuwak ko aate dekhakar usakee jaan men jaan aaee magar jab usane gaur se dekhaa ki wo yuwak usee kee kakshaa kaa sabase honahaar chaatr winod thaa, jo supriyaa ke aane ke baad se ganit ke shikshak agrawaal sar kee prataadanaa kaa shikaar banaa huaa thaa, kyonki sar kakshaa men jo bhee sawaal hal karane ko kahate, wo unake raaund pooraa karate hee supriyaa hal kar letee thee jabaki usase pahale is upalabdhi par winod kaa hee ekaadhikaar thaa

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is samay sankat kee sthiti men usee winod ko saamane dekhakar supriyaa kee sittee-pittee hee gum ho gaee wo yah samajh naheen paaee ki winod skool men n hokar yahaan kyon hai sochane lagee ki pataa naheen wo usake saath kaisaa bartaaw karegaa

·

winod binaa ek pal bhee ganvaae chalaang lagaakar naalee paar karake supriyaa ke paas pahunch gayaa aur usake kaanpate haath se kitaabon kaa baig lekar doosare haath se usakaa haath pakadakar dheere-dheere surakshit naalee paar karawaa dee aur sadak paar karake use gumatee kee bench par bithaakar bholaa ko do kadak chaay banaane ke lie kahaa

bholaa samajhadaar thaa, winod kee chaay thandee ho chukee dekhakar usane pahale hee chaay banane ko rakh dee thee ab winod punah daudakar sadak paar jaakar supriyaa ke bahate hue chaate ko bhee surakshit nikaal laayaa aur seedhaa karake kholakar sookhane ke lie ek taraph rakh diyaa

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yah dekhakar winod ne kahaa-

‘supriyaa jee, aaj bhaaree warshaa ke kaaran skool band hai main wahaan soochanaa pढ़kar waapas jaa rahaa thaa, shaayad aapakee sahaayataa hetu hee bholaa bhaiyaa kee chaay ne mujhe yahaan bulaa liyaa aapako geele wastron men chalane men pareshaanee hogee, laaie kitaaben aur chaataa mujhe deejiye, baarish to ruk hee chukee hai, aapako ghar ke nikat chod doongaa’

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supriyaa maan kee dee huee hidaayaten kaise bhool sakatee thee ki ladakon ke skool men pढ़ne kee ijaazat to le lee, magar khabaradaar jo kisee ladake kee taraph aankh uthaakar bhee dekhaa

-ki phalaan ne bahan ko jaat ladake se chipakar milate, hansakar bolate dekh liyaa to chupachaap use khaane men zahar dekar maar daalaa, kisee ko kaanonkaan khabar bhee n huee

supriyaa ke lie to pढ़aaee kee choot milanaa hee manachaahee muraad haasil karane jaisaa thaa wo kyon bhalaa kisee ladake kee taraph dekhakar apanaa sukh chain nasht karatee kitaabon men usake praan basate the pढ़aaee ke alaawaa kuch sochane kee bhee use phurasat naheen thee

maan waise hee pooraa din use ghar ke kaamon men ulajhaakar rakhatee thee aakhir aadhaa darjan bhaaee-bahanon men sabase badee jo thee raat men badee mushkil se apanaa hom wark pooraa kar paatee thee

wo to usakee pratibhaa thee, jisase use kakshaa men pढ़aayaa huaa turant yaad ho jaataa thaa

wo turant munh par padaa taalaa kholakar bol padee-

naheen, naheen aap kasht mat keejiye, main dheere-dheere chalee jaaoongee

magar chalate hue usake kadam dagamagaa rahe the usake dil dimaag par winod ke haath kee chuan haawee hotee jaa rahee thee yah kyaa aur kyon ho rahaa hai, wo yah bhee naheen samajh paa rahee thee

kyaa use bhee waisaa hee ahasaas ho rahaa hogaa!

·

ab supriyaa skool jaatee to winod ko dekhate hee nazaren jhukaa letee thee, jabaki wo usakaa koee notis hee naheen letaa thaa

us din ke baad ganit ke sawaal turant hal kar lene waalee supriyaa dheere dheere ganit men hee pichadane lagee

·

winod ab sabase pahale sawaal hal karake wijayee bhaaw se kanakhiyon se usakee taraph dekhataa to wo haare hue juaaree kee tarah turant sir jhukaa letee

ganit ke sar bhee aashchary karane lage the

choonki skool men ladakiyon ko bench par khadaa karanaa niyam-wiruddh thaa atah ek baar usane kadak aawaaz men usase pichadane kaa kaaran poochaa to supriyaa ne ghar ke kaaryon men wyastataa ke bahaanaa banaakar chutakaaraa paa liyaa

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pareekshaaen hotee raheen maasik, timaahee, aur chamaahee men bhee wo winod se peeche thee

winod apanee pozishan waapas haasil karake bahut prasann thaa magar shaayad use bhee shak ho gayaa thaa ki supriyaa jaanaboojhakar aisaa kar rahee hai

usakee nazaren supriyaa kaa man tatolane ko machal uthateen magar skool ke kathor anushaasan ke kaaran kabhee usase poochane kaa awasar hee naheen milaa

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wo skool kaa antim warsh thaa 11 ween kee waarshik pareekshaa ke baad skool chootane ke ahasaas maatr se supriyaa kee aas kaa diyaa to pahale hee bujh chukaa thaa, oopar se winod ko bhee ab kabhee n dekh paane ke duhkh ne rahee sahee kasar bhee pooree kar dee ghar ke kaamon kaa bojh alag thaa aise men pareekshaa kee taiyaaree theek se kaise hoteeparinaam spasht thaa is baar wo dviteey shrenee men hee utteern huee thee

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kramashah

चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ था, धुआँधार बारिश से नदी नाले उफान पर थे। बादल और बिजली के  गरजने-चमकने में होड़ लगी हुई थी। लगता था जैसे आज ही अपने सारे अरमान पूरे करने को उद्यत हों। सुप्रिया ने एक हाथ पर किताबों से भरा हुआ पोलीथिन का बैग जमाया और एक हाथ में छाता लिया फिर जल्दी जल्दी पग बढ़ाती हुई चल दी।

कच्ची मिट्टी और ऊपर से बारिश का ज़ोर, कदम जैसे बढ़ते ही न थे। जूते मिट्टी से लथपथ होकर मनों भारी हो चुके थे, उसे अपने निर्णय पर पश्चाताप हुआ लेकिन अब क्या हो? सामने  विद्यालय को जाने वाली पक्की सड़क अब साफ नज़र आ रही थी। ज्यों ही वह सड़क पर जाने के लिए वर्षा से पूर बहती हुई नाली जो पानी के कारण नाला बन चुकी थी, पार करने लगी, तेज़ हवा से छाता उलट गया और हाथ से छूटकर पानी में नाव जैसा तैरकर दूर जाने लगा। घबराकर सुप्रिया उसे पकड़ने लपकी तो एक किताब खिसककर पानी में गिर गई. उसने छाता छोड़ जल्दी ही झुककर किताब उठा ली मगर अब वो पानी में पूरी तरह भीग चुकी थी और असहाय सी सामने देखकर सहायता के लिए चिल्लाने लगी.

सामने ही सड़क पर एक चाय की गुमटी थी. वहां से आते-जाते लोग वहाँ भोला भैया की चाय पीने अवश्य रुकते थे. उसकी चीख सुनकर भोला की नज़र सुप्रिया पर पड़ गई. उसने तुरंत वहाँ चाय सुड़कते हुए एकमात्र युवा ग्राहक को उस तरफ इशारा करके वहाँ जाने का अनुरोध किया. युवक ने सुप्रिया को देखते ही पहचान लिया और चाय का कप छोड़कर उस तरफ दौड़ पड़ा.

सुप्रिया होश हवास खोकर उसी स्थान पर जडवत खड़ी रह गई थी. युवक को आते देखकर  उसकी जान में जान आई. मगर जब उसने गौर से देखा कि वो युवक उसी की कक्षा का सबसे होनहार छात्र विनोद था, जो सुप्रिया के आने के बाद से गणित के शिक्षक अग्रवाल सर की प्रताड़ना का शिकार बना हुआ था, क्योंकि सर कक्षा में जो भी सवाल हल करने को कहते, वो उनके राउंड पूरा करते ही सुप्रिया हल कर लेती थी जबकि उससे पहले इस उपलब्धि पर विनोद का ही एकाधिकार था.

अग्रवाल सर बहुत गुस्सैल थे. विनोद को पिछड़ते देखकर सीधे उसे बेंच पर यह कहकर कान पकड़वाकर खड़ा कर देते  कि जब एक लड़की इतनी जल्दी सवाल हल कर लेती है तो वो क्यों नहीं कर सकता...

इस समय संकट की स्थिति में उसी विनोद को सामने देखकर सुप्रिया की सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई. वो यह समझ नहीं पाई कि विनोद स्कूल में न होकर यहाँ क्यों है. सोचने लगी कि पता नहीं वो उसके साथ कैसा बर्ताव करेगा.

विनोद बिना एक पल भी गँवाए छलाँग लगाकर नाली पार करके सुप्रिया के पास पहुँच गया और उसके काँपते हाथ से किताबों का बैग लेकर दूसरे हाथ से उसका हाथ पकड़कर धीरे-धीरे सुरक्षित नाली पार करवा दी और सड़क पार करके उसे गुमटी की बेंच पर बिठाकर भोला को दो कड़क चाय बनाने के लिए कहा.

भोला समझदार था, विनोद की चाय ठंडी हो चुकी देखकर उसने पहले ही चाय बनने को रख दी थी. अब विनोद पुनः दौड़कर सड़क पार जाकर सुप्रिया के बहते हुए छाते को भी सुरक्षित निकाल लाया और सीधा करके खोलकर सूखने के लिए एक तरफ रख दिया.

इस क्रम में सुप्रिया और वो पूरे भीग चुके थे. सुप्रिया के मुँह पर तो मानो ताला ही लग गया था, दो बोल धन्यवाद के भी विनोद के लिए न निकाल सकी. एक तो पहली बार किसी युवक ने उसे  छुआ था, ऊपर से अब उसके मन में विनोद के प्रति एक अपराध बोध भी जड़ जमा चुका था. जैसे तैसे चाय सुड़ककर जाने के लिए उठकर खडी हो गई.

यह देखकर विनोद ने कहा-

‘सुप्रिया जी, आज भारी वर्षा के कारण स्कूल बंद है. मैं वहाँ सूचना पढ़कर वापस जा रहा था, शायद आपकी सहायता हेतु ही भोला भैया की चाय ने मुझे यहाँ बुला लिया. आपको गीले वस्त्रों में चलने में परेशानी होगी, लाइए किताबें और छाता मुझे दीजिये, बारिश तो रुक ही चुकी है, आपको घर के निकट छोड़ दूँगा’.

सुप्रिया माँ की दी हुई हिदायतें कैसे भूल सकती थी कि लड़कों के स्कूल में पढ़ने की इजाज़त तो ले ली, मगर खबरदार जो किसी लड़के की तरफ आँख  उठाकर भी देखा.

-कि फलाँ  ने बहन को जाट लड़के से छिपकर मिलते, हँसकर बोलते देख लिया तो चुपचाप उसे खाने में ज़हर देकर मार डाला, किसी को कानोंकान खबर भी न हुई।

सुप्रिया के लिए तो पढ़ाई की छूट मिलना ही मनचाही मुराद हासिल करने जैसा था। वो क्यों भला किसी लड़के की तरफ देखकर अपना सुख चैन नष्ट करती। किताबों में उसके प्राण बसते थे। पढ़ाई के अलावा कुछ सोचने की भी उसे फुरसत नहीं थी.

माँ वैसे ही पूरा दिन उसे घर के कामों में उलझाकर रखती थी। आखिर आधा दर्जन भाई-बहनों में सबसे बड़ी जो थी... रात में बड़ी मुश्किल से अपना होम वर्क पूरा कर पाती थी।

वो तो उसकी प्रतिभा थी, जिससे उसे कक्षा में पढ़ाया हुआ तुरंत याद हो जाता था

वो तुरंत मुँह पर पड़ा ताला खोलकर बोल पड़ी-

नहीं, नहीं आप कष्ट मत कीजिये, मैं धीरे-धीरे चली जाऊँगी.

मगर चलते हुए उसके कदम डगमगा रहे थे। उसके दिल दिमाग पर विनोद के हाथ की छुअन हावी होती जा रही थी। यह क्या और क्यों हो रहा है, वो यह भी नहीं समझ पा रही थी.

क्या उसे भी  वैसा ही अहसास हो रहा होगा...!

अब सुप्रिया स्कूल जाती तो विनोद को देखते ही नज़रें झुका लेती थी, जबकि वो उसका कोई नोटिस ही नहीं लेता था।

उस दिन के बाद गणित के सवाल तुरंत हल कर लेने वाली सुप्रिया धीरे धीरे गणित में ही पिछड़ने लगी।

विनोद अब सबसे पहले सवाल हल करके  विजयी भाव से कनखियों से उसकी तरफ देखता तो वो हारे हुए जुआरी की तरह तुरंत सिर झुका लेती।

गणित के सर भी आश्चर्य करने लगे थे।

चूँकि स्कूल में लड़कियों को बेंच पर खड़ा करना नियम-विरुद्ध था अतः एक बार उसने कड़क आवाज़ में उससे पिछड़ने का कारण पूछा तो सुप्रिया ने घर के कार्यों में व्यस्तता के बहाना बनाकर छुटकारा पा लिया.

परीक्षाएँ होती रहीं। मासिक, तिमाही, और छमाही में भी वो विनोद से पीछे थी।

विनोद अपनी पोज़िशन वापस हासिल करके बहुत प्रसन्न था। मगर शायद उसे भी शक हो गया था कि सुप्रिया जानबूझकर ऐसा कर रही है।

उसकी नज़रें सुप्रिया का मन टटोलने को मचल उठतीं मगर स्कूल के कठोर  अनुशासन के कारण कभी उससे पूछने का अवसर ही नहीं मिला।

वो स्कूल का अंतिम वर्ष था. ११ वीं की वार्षिक परीक्षा के बाद स्कूल छूटने के अहसास मात्र से सुप्रिया की आस का दिया तो पहले ही  बुझ चुका था, ऊपर से विनोद को भी अब कभी न देख पाने के दुःख ने रही सही कसर भी पूरी कर दी. घर के कामों का बोझ अलग था. ऐसे में परीक्षा की तैयारी ठीक से कैसे होती...परिणाम स्पष्ट था. इस बार वो द्वितीय श्रेणी में ही उत्तीर्ण हुई थी.

क्रमशः

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗