कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ८६ / ११४ № 86 of 114 रचना ८६ / ११४
३० अक्तूबर २०१९ 30 October 2019 ३० अक्तूबर २०१९

विरासत wiraasat विरासत

“अरे कृपाराम तुम यहाँ?”

पुण्य लाभ की कामना से विद्याधर ने मंदिर की सीढ़ियों पर कतार में बैठे हुए भिखारियों के कटोरों में सिक्के डालते हुए जब अपने पुराने मित्र को वहाँ देखा तो उसके बढ़े हुए हाथ में अचानक ब्रेक लग गया।

प्रत्युत्तर में कृपाराम की आँखों से अविरल आँसुओं की धार बह निकली।

बताओ कृपाराम! तुम्हारी यह दशा कैसे हुई? परिवार के सब लोग कहाँ हैं?

आँसू पोंछते हुए कृपाराम बोला-

क्या बताऊँ विद्या, तुम्हारे लाख समझने के बावजूद मेरे स्वार्थी मन ने अपने पिता को वृद्धाश्रम में भर्ती करवा दिया था, लेकिन उन्होंने उस यातनागृह से जान बचाकर इन्हीं सीढ़ियों की शरण ली थी। एक बार देव दर्शन के विचार से मैं इस मंदिर की तरफ आया था तो दूर से ही पिताजी पर नज़र पड़ गई। उन्होंने मुझे नहीं देखा था, अतः मैं वहीं से वापस चला गया और फिर कभी इस तरफ नहीं आया। लेकिन अनजाने में वे मुझे यह विरासत सौंप गए।

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“are kriipaaraam tum yahaan?”

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puny laabh kee kaamanaa se widyaadhar ne mandir kee seeढ़iyon par kataar men baithe hue bhikhaariyon ke katoron men sikke daalate hue jab apane puraane mitr ko wahaan dekhaa to usake bढ़e hue haath men achaanak brek lag gayaa

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pratyuttar men kriipaaraam kee aankhon se awiral aansuon kee dhaar bah nikalee

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bataao kriipaaraam! tumhaaree yah dashaa kaise huee? pariwaar ke sab log kahaan hain?

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aansoo ponchate hue kriipaaraam bolaa-

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kyaa bataaoon widyaa, tumhaare laakh samajhane ke baawajood mere svaarthee man ne apane pitaa ko wriiddhaashram men bhartee karawaa diyaa thaa, lekin unhonne us yaatanaagriih se jaan bachaakar inheen seeढ़iyon kee sharan lee thee ek baar dew darshan ke wichaar se main is mandir kee taraph aayaa thaa to door se hee pitaajee par nazar pad gaee unhonne mujhe naheen dekhaa thaa, atah main waheen se waapas chalaa gayaa aur phir kabhee is taraph naheen aayaa lekin anajaane men we mujhe yah wiraasat saunp gae

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“अरे कृपाराम तुम यहाँ?”

पुण्य लाभ की कामना से विद्याधर ने मंदिर की सीढ़ियों पर कतार में बैठे हुए भिखारियों के कटोरों में सिक्के डालते हुए जब अपने पुराने मित्र को वहाँ देखा तो उसके बढ़े हुए हाथ में अचानक ब्रेक लग गया।

प्रत्युत्तर में कृपाराम की आँखों से अविरल आँसुओं की धार बह निकली।

बताओ कृपाराम! तुम्हारी यह दशा कैसे हुई? परिवार के सब लोग कहाँ हैं?

आँसू पोंछते हुए कृपाराम बोला-

क्या बताऊँ विद्या, तुम्हारे लाख समझने के बावजूद मेरे स्वार्थी मन ने अपने पिता को वृद्धाश्रम में भर्ती करवा दिया था, लेकिन उन्होंने उस यातनागृह से जान बचाकर इन्हीं सीढ़ियों की शरण ली थी। एक बार देव दर्शन के विचार से मैं इस मंदिर की तरफ आया था तो दूर से ही पिताजी पर नज़र पड़ गई। उन्होंने मुझे नहीं देखा था, अतः मैं वहीं से वापस चला गया और फिर कभी इस तरफ नहीं आया। लेकिन अनजाने में वे मुझे यह विरासत सौंप गए।

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कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗