कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ४ / ६३ № 4 of 63 रचना ४ / ६३
२० अगस्त २०१२ 20 August 2012 २० अगस्त २०१२

जनसंख्या की वृद्धि का janasankhyaa kee wriiddhi kaa जनसंख्या की वृद्धि का

जनसंख्या

की वृद्धि का, शहर

झेलते दंश।

॥

नाममात्र

ही रह गया,

प्राणवायु

का अंश।

॥

प्राणवायु

का अंश, सिलसिला हर

दिन जारी

॥

गाँव

शहर की ओर,

बढ़

रहे बारी बारी।

॥

पनपें यदि ग्रामीण, रहे ना दुविधा बाकी।

॥

शहरों

से हो दूर,

वृद्धि

यह जनसंख्या की।

॥

शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।

॥

रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।

॥

कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई

॥

मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।

janasankhyaa

kee wriiddhi kaa, shahar

jhelate dansh

·

naamamaatr

hee rah gayaa,

praanawaayu

kaa ansh

·

praanawaayu

kaa ansh, silasilaa har

din jaaree

·

gaanv

shahar kee or,

bढ़

rahe baaree baaree

·

panapen yadi graameen, rahe naa duwidhaa baakee

·

shaharon

se ho door,

wriiddhi

yah janasankhyaa kee

·

shuddh hawaa ko khaa rahee, imaaraton kee phauj

·

rahawaasee majaboor hain, kartaaon kee mauj

·

kartaaon kee mauj, kar rahe khoob kamaaee

·

machee huee hai loot, naheen hotee sunawaaee

जनसंख्या

की वृद्धि का, शहर

झेलते दंश।

॥

नाममात्र

ही रह गया,

प्राणवायु

का अंश।

॥

प्राणवायु

का अंश, सिलसिला हर

दिन जारी

॥

गाँव

शहर की ओर,

बढ़

रहे बारी बारी।

॥

पनपें यदि ग्रामीण, रहे ना दुविधा बाकी।

॥

शहरों

से हो दूर,

वृद्धि

यह जनसंख्या की।

॥

शुद्ध हवा को खा रही, इमारतों की फौज।

॥

रहवासी मजबूर हैं, कर्ताओं की मौज।

॥

कर्ताओं की मौज, कर रहे खूब कमाई

॥

मची हुई है लूट, नहीं होती सुनवाई।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗