कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना २४ / १६३ № 24 of 163 रचना २४ / १६३
९ अगस्त २०१३ 9 August 2013 ९ अगस्त २०१३

है अकेला आदमी hai akelaa aadamee है अकेला आदमी

हरे

रिश्तों

की, हुई बंजर ज़मीं

स्नेह

वर्षा को तरसता आदमी।

माँ

पिता ने

बीज

सींचे स्वार्थ बिन।

सोच

थी देंगे सुफल,

ये एक दिन।

मगर

यह क्या? पर्ण पीले पड़ गए,

उड़

गई गहरी जड़ों से

भी

नमी।

बाँध

सपने

चले

अपने छोड़कर।

आशियाँ

से, तार हिय के तोड़कर।

यह

न सोचा, क्या मिलेगा शहर में?

सुख

की चादर त्याग,

ओढ़ी

खुद

गमी।

अब

तो घर

सुनसान, चेहरे म्लान

hare

rishton

·

kee, huee banjar zameen

·

sneh

warshaa ko tarasataa aadamee

·

maan

pitaa ne

·

beej

seenche svaarth bin

·

soch

thee denge suphal,

ye ek din

·

magar

yah kyaa? parn peele pad gae,

·

ud

gaee gaharee jadon se

·

bhee

namee

·

baandh

sapane

·

chale

apane chodakar

·

aashiyaan

se, taar hiy ke todakar

·

yah

n sochaa, kyaa milegaa shahar men?

·

sukh

kee chaadar tyaag,

oढ़ee

·

khud

gamee

·

ab

to ghar

·

sunasaan, chehare mlaan

हरे

रिश्तों

की, हुई बंजर ज़मीं

स्नेह

वर्षा को तरसता आदमी।

माँ

पिता ने

बीज

सींचे स्वार्थ बिन।

सोच

थी देंगे सुफल,

ये एक दिन।

मगर

यह क्या? पर्ण पीले पड़ गए,

उड़

गई गहरी जड़ों से

भी

नमी।

बाँध

सपने

चले

अपने छोड़कर।

आशियाँ

से, तार हिय के तोड़कर।

यह

न सोचा, क्या मिलेगा शहर में?

सुख

की चादर त्याग,

ओढ़ी

खुद

गमी।

अब

तो घर

सुनसान, चेहरे म्लान

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗