है अकेला आदमी hai akelaa aadamee है अकेला आदमी
हरे
रिश्तों
की, हुई बंजर ज़मीं
स्नेह
वर्षा को तरसता आदमी।
माँ
पिता ने
बीज
सींचे स्वार्थ बिन।
सोच
थी देंगे सुफल,
ये एक दिन।
मगर
यह क्या? पर्ण पीले पड़ गए,
उड़
गई गहरी जड़ों से
भी
नमी।
बाँध
सपने
चले
अपने छोड़कर।
आशियाँ
से, तार हिय के तोड़कर।
यह
न सोचा, क्या मिलेगा शहर में?
सुख
की चादर त्याग,
ओढ़ी
खुद
गमी।
अब
तो घर
सुनसान, चेहरे म्लान
hare
rishton
kee, huee banjar zameen
sneh
warshaa ko tarasataa aadamee
maan
pitaa ne
beej
seenche svaarth bin
soch
thee denge suphal,
ye ek din
magar
yah kyaa? parn peele pad gae,
ud
gaee gaharee jadon se
bhee
namee
baandh
sapane
chale
apane chodakar
aashiyaan
se, taar hiy ke todakar
yah
n sochaa, kyaa milegaa shahar men?
sukh
kee chaadar tyaag,
oढ़ee
khud
gamee
ab
to ghar
sunasaan, chehare mlaan
हरे
रिश्तों
की, हुई बंजर ज़मीं
स्नेह
वर्षा को तरसता आदमी।
माँ
पिता ने
बीज
सींचे स्वार्थ बिन।
सोच
थी देंगे सुफल,
ये एक दिन।
मगर
यह क्या? पर्ण पीले पड़ गए,
उड़
गई गहरी जड़ों से
भी
नमी।
बाँध
सपने
चले
अपने छोड़कर।
आशियाँ
से, तार हिय के तोड़कर।
यह
न सोचा, क्या मिलेगा शहर में?
सुख
की चादर त्याग,
ओढ़ी
खुद
गमी।
अब
तो घर
सुनसान, चेहरे म्लान