कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ५२ / १६३ № 52 of 163 रचना ५२ / १६३
८ जनवरी २०१४ 8 January 2014 ८ जनवरी २०१४

महका- महका mahakaa- mahakaa महका- महका

युग बीते,

कई सदियाँ गईं,

पर कुदरत के हैं नियम वही।

क्यों मनुष तुम्हारा मन बहका?

क्यों कर्म नहीं महका-महका।

बादल ने बाँधा बूँदों को,

जब बरसे जग को प्राण मिले।

है धूप धरोहर सूरज की,

झाँके कष्टों से त्राण मिले,

कुदरत से सब पाया तुमने,

अनगिनत तुम्हें वरदान मिले।

क्या तुमने मान किया उनका?

क्यों ज्ञान नहीं महका-महका।

तरुवर सब देते फल

yug beete,

kaee sadiyaan gaeen,

·

par kudarat ke hain niyam wahee

·

kyon manush tumhaaraa man bahakaa?

·

kyon karm naheen mahakaa-mahakaa

·

baadal ne baandhaa boondon ko,

·

jab barase jag ko praan mile

·

hai dhoop dharohar sooraj kee,

·

jhaanke kashton se traan mile,

·

kudarat se sab paayaa tumane,

·

anaginat tumhen waradaan mile

·

kyaa tumane maan kiyaa unakaa?

·

kyon jnaan naheen mahakaa-mahakaa

·

taruwar sab dete phal

युग बीते,

कई सदियाँ गईं,

पर कुदरत के हैं नियम वही।

क्यों मनुष तुम्हारा मन बहका?

क्यों कर्म नहीं महका-महका।

बादल ने बाँधा बूँदों को,

जब बरसे जग को प्राण मिले।

है धूप धरोहर सूरज की,

झाँके कष्टों से त्राण मिले,

कुदरत से सब पाया तुमने,

अनगिनत तुम्हें वरदान मिले।

क्या तुमने मान किया उनका?

क्यों ज्ञान नहीं महका-महका।

तरुवर सब देते फल

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗