कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ७४ / १६३ № 74 of 163 रचना ७४ / १६३
२४ जुलाई २०१४ 24 July 2014 २४ जुलाई २०१४

मन जोगी मत बन man jogee mat ban मन जोगी मत बन

कर्म बोध से नज़र

चुराकर।

मन जोगी मत बन।

जिस अनंत से

हुआ आगमन।

पुनः वहीं

जाना।

जो कुछ लिया, चुकाना भी है

तभी मोक्ष

पाना।

रहना है इस

मर्त्य-लोक में

जब तक है

जीवन।

अगर पंक है, कमल खिला दे

काँटों में कलियाँ।

सार ढूँढ निस्सार जगत से

ज्ञान असीम यहाँ।

धूप-छाँव के

अटल सत्य से

क्यों इतनी

उलझन।

स्वर्ग असीम,

karm bodh se nazar

churaakar

·

man jogee mat ban

·

jis anant se

huaa aagaman

·

punah waheen

jaanaa

·

jo kuch liyaa, chukaanaa bhee hai

·

tabhee moksh

paanaa

·

rahanaa hai is

marty-lok men

·

jab tak hai

jeewan

·

agar pank hai, kamal khilaa de

·

kaanton men kaliyaan

·

saar dhoondh nissaar jagat se

·

jnaan aseem yahaan

·

dhoop-chaanv ke

atal saty se

·

kyon itanee

ulajhan

·

svarg aseem,

कर्म बोध से नज़र

चुराकर।

मन जोगी मत बन।

जिस अनंत से

हुआ आगमन।

पुनः वहीं

जाना।

जो कुछ लिया, चुकाना भी है

तभी मोक्ष

पाना।

रहना है इस

मर्त्य-लोक में

जब तक है

जीवन।

अगर पंक है, कमल खिला दे

काँटों में कलियाँ।

सार ढूँढ निस्सार जगत से

ज्ञान असीम यहाँ।

धूप-छाँव के

अटल सत्य से

क्यों इतनी

उलझन।

स्वर्ग असीम,

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗