कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ३० / १६३ № 30 of 163 रचना ३० / १६३
२२ अगस्त २०१३ 22 August 2013 २२ अगस्त २०१३

सावन सुखा दिया saawan sukhaa diyaa सावन सुखा दिया

कुदरत के कायदों कोपल में भुला दियाविष बीज बोके मानव!सावन सुखा दिया। क्या कुछ नहीं मिला था,पुरखों से आपको,अमृत कलश से सींचा,अपने विनाश को। जन्नत सी मेदिनी को,दोजख बना दिया। बूँदें बचा न पाये,बादल भी क्या करे?कब, क्यों, कहाँ वो बरसे,क्यों फिक्र वो करे? बल खाते निर्झरों को,निर्जल बना दिया। जग बन गया मशीनीमौसम धुआँ धुआँ,दम घोंटती हवाएँ,विष

kudarat ke kaayadon kopal men bhulaa diyaawish beej boke maanaw!saawan sukhaa diyaa kyaa kuch naheen milaa thaa,purakhon se aapako,amriit kalash se seenchaa,apane winaash ko jannat see medinee ko,dojakh banaa diyaa boonden bachaa n paaye,baadal bhee kyaa kare?kab, kyon, kahaan wo barase,kyon phikr wo kare? bal khaate nirjharon ko,nirjal banaa diyaa jag ban gayaa masheeneemausam dhuaan dhuaan,dam ghontatee hawaaen,wish

कुदरत के कायदों कोपल में भुला दियाविष बीज बोके मानव!सावन सुखा दिया। क्या कुछ नहीं मिला था,पुरखों से आपको,अमृत कलश से सींचा,अपने विनाश को। जन्नत सी मेदिनी को,दोजख बना दिया। बूँदें बचा न पाये,बादल भी क्या करे?कब, क्यों, कहाँ वो बरसे,क्यों फिक्र वो करे? बल खाते निर्झरों को,निर्जल बना दिया। जग बन गया मशीनीमौसम धुआँ धुआँ,दम घोंटती हवाएँ,विष

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗