कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १३७ / १६३ № 137 of 163 रचना १३७ / १६३
११ नवम्बर २०१९ 11 November 2019 ११ नवम्बर २०१९

तुम पथिक आए कहाँ से tum pathik aae kahaan se तुम पथिक आए कहाँ से

तुम पथिक, आए कहाँ से

ठौर किस तुमको ठहरना?

इस शहर के रास्तों पर

कुछ सँभलकर पाँव धरना।

बात कल की है, यहाँ पर

कत्ल जीवित वन हुआ था।

जड़ मशीनें जी उठी थीं

और जड़ जीवन हुआ था।

देख थी हैरान कुदरत

रात का दिन में उतरना।

जो युगों से थे खड़े

वे पेड़ धरती पर पड़े थे।

उस कुटिल तूफान से

तुम पूछना कैसे लड़े थे।

याद होगा हर दिशा को

डालियों का वो सिहरना।

घर बसे हैं अब जहाँ

लाखों वहीं बेघर हुए थे।

बेरहम भूकम्प से तब

बेवतन वनचर हुए थे।

खिलखिलाहट आज है, कल

था यहीं पर अश्रु-झरना।

हो सके, उनको चढ़ाना

कुछ सुमन संकल्प करके।

कुछ वचन देकर निभाना

बंधु, परवर, धीर धरके।

याद में उनकी पथिक! तुम

एक वन आबाद करना।

tum pathik, aae kahaan se

thaur kis tumako thaharanaa?

is shahar ke raaston par

kuch sanbhalakar paanv dharanaa

·

baat kal kee hai, yahaan par

katl jeewit wan huaa thaa

jad masheenen jee uthee theen

aur jad jeewan huaa thaa

·

dekh thee hairaan kudarat

raat kaa din men utaranaa

·

jo yugon se the khade

we ped dharatee par pade the

us kutil toophaan se

tum poochanaa kaise lade the

·

yaad hogaa har dishaa ko

daaliyon kaa wo siharanaa

·

ghar base hain ab jahaan

laakhon waheen beghar hue the

beraham bhookamp se tab

bewatan wanachar hue the

·

khilakhilaahat aaj hai, kal

thaa yaheen par ashru-jharanaa

·

ho sake, unako chढ़aanaa

kuch suman sankalp karake

kuch wachan dekar nibhaanaa

bandhu, parawar, dheer dharake

·

yaad men unakee pathik! tum

ek wan aabaad karanaa

तुम पथिक, आए कहाँ से

ठौर किस तुमको ठहरना?

इस शहर के रास्तों पर

कुछ सँभलकर पाँव धरना।

बात कल की है, यहाँ पर

कत्ल जीवित वन हुआ था।

जड़ मशीनें जी उठी थीं

और जड़ जीवन हुआ था।

देख थी हैरान कुदरत

रात का दिन में उतरना।

जो युगों से थे खड़े

वे पेड़ धरती पर पड़े थे।

उस कुटिल तूफान से

तुम पूछना कैसे लड़े थे।

याद होगा हर दिशा को

डालियों का वो सिहरना।

घर बसे हैं अब जहाँ

लाखों वहीं बेघर हुए थे।

बेरहम भूकम्प से तब

बेवतन वनचर हुए थे।

खिलखिलाहट आज है, कल

था यहीं पर अश्रु-झरना।

हो सके, उनको चढ़ाना

कुछ सुमन संकल्प करके।

कुछ वचन देकर निभाना

बंधु, परवर, धीर धरके।

याद में उनकी पथिक! तुम

एक वन आबाद करना।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗