कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ३५ / ५२ № 35 of 52 रचना ३५ / ५२
२३ अगस्त २०१६ 23 August 2016 २३ अगस्त २०१६

हू ज़मानों घुराँ थी hoo zamaanon ghuraan thee हू ज़मानों घुराँ थी

खुदा

खाँ सदा मींहु सुख जो घुराँ थी

॥

सभिनि

लाइ बेखौफु घरिड़ो घुराँ थी

॥

अँधेरनि

में जेके रहनि प्या हमेशा

॥

उन्हनि

लाइ टुकिरो उजालो घुराँ थी

॥

करे

जेको आतंक जो अंतु जड़ खाँ

॥

हुकूमत

खाँ कानूनु अहिड़ो घुराँ थी

॥

भला

गोठ रोटी छो गोल्हिनि शहर में

॥

शहरु, गोठ हरहिक में साओ

घुराँ थी

॥

पखीयड़ा

रही जाते आज़ादु चहकनि

॥

वतन

में उहो बागु हिकिड़ो घुराँ थी

॥

जिते

माण्हूँ हिक बे खे दिलि में वसाइनि

khudaa

khaan sadaa meenhu sukh jo ghuraan thee

·

sabhini

laai bekhauphu gharido ghuraan thee

·

andherani

men jeke rahani pyaa hameshaa

·

unhani

laai tukiro ujaalo ghuraan thee

·

kare

jeko aatank jo antu jad khaan

·

hukoomat

khaan kaanoonu ahido ghuraan thee

·

bhalaa

goth rotee cho golhini shahar men

·

shaharu, goth harahik men saao

ghuraan thee

·

pakheeyadaa

rahee jaate aazaadu chahakani

·

watan

men uho baagu hikido ghuraan thee

·

jite

maanhoon hik be khe dili men wasaaini

खुदा

खाँ सदा मींहु सुख जो घुराँ थी

॥

सभिनि

लाइ बेखौफु घरिड़ो घुराँ थी

॥

अँधेरनि

में जेके रहनि प्या हमेशा

॥

उन्हनि

लाइ टुकिरो उजालो घुराँ थी

॥

करे

जेको आतंक जो अंतु जड़ खाँ

॥

हुकूमत

खाँ कानूनु अहिड़ो घुराँ थी

॥

भला

गोठ रोटी छो गोल्हिनि शहर में

॥

शहरु, गोठ हरहिक में साओ

घुराँ थी

॥

पखीयड़ा

रही जाते आज़ादु चहकनि

॥

वतन

में उहो बागु हिकिड़ो घुराँ थी

॥

जिते

माण्हूँ हिक बे खे दिलि में वसाइनि

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗