कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४० / २०४ № 140 of 204 रचना १४० / २०४
१९ अक्तूबर २०१६ 19 October 2016 १९ अक्तूबर २०१६

आशाओं के दीप aashaaon ke deep आशाओं के दीप

आँगन-आँगन

आशाओं के दीप जलाती

मन

रोशन हो जाते, जब दीवाली आती

छोड़

रंज-गम हो जाता ब्रह्मांड राममय

दिशा-दिशा

दुनिया की, मंगल-गान सुनाती

सपनों

का नव-सूर्य, उदित होता अंबर

में

और

बाँचती प्रात नवल, अपनों की पाती

देख-देख

कर दिव्य-ज्योत्सना, फैली जग में

प्राण-प्राण

के नेह-दियों की, लौ बढ़ जाती

तोरण

सजते द्वार, अल्पना

देहरी-देहरी

घर-घर

को हर घरणी पावन-धाम बनाती

जब

करता आह्वान जगत तब स्वर्ग-लोक से

सुख-समृद्धि

के ले चिराग, लक्ष्मी उतर आती

पर्वों

के अमृत से बनता जीवन उत्सव

दिल

मिलते इस तरह कि जैसे दीपक-बाती

मावस

को दे मात, कालिमा काट, ‘कल्पना’

दीपमालिका

तीन लोक तक रजत बिछाती

- कल्पना रामानीप्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

aangan-aangan

aashaaon ke deep jalaatee

·

man

roshan ho jaate, jab deewaalee aatee

·

chod

ranj-gam ho jaataa brahmaand raamamay

·

dishaa-dishaa

duniyaa kee, mangal-gaan sunaatee

·

sapanon

kaa naw-soory, udit hotaa anbar

men

·

aur

baanchatee praat nawal, apanon kee paatee

·

dekh-dekh

kar divy-jyotsanaa, phailee jag men

·

praan-praan

ke neh-diyon kee, lau bढ़ jaatee

·

toran

sajate dvaar, alpanaa

deharee-deharee

·

ghar-ghar

ko har gharanee paawan-dhaam banaatee

·

jab

karataa aahvaan jagat tab svarg-lok se

·

sukh-samriiddhi

ke le chiraag, lakshmee utar aatee

·

parvon

ke amriit se banataa jeewan utsaw

·

dil

milate is tarah ki jaise deepak-baatee

·

maawas

ko de maat, kaalimaa kaat, ‘kalpanaa’

·

deepamaalikaa

teen lok tak rajat bichaatee

·

- kalpanaa raamaaneeprotsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

आँगन-आँगन

आशाओं के दीप जलाती

मन

रोशन हो जाते, जब दीवाली आती

छोड़

रंज-गम हो जाता ब्रह्मांड राममय

दिशा-दिशा

दुनिया की, मंगल-गान सुनाती

सपनों

का नव-सूर्य, उदित होता अंबर

में

और

बाँचती प्रात नवल, अपनों की पाती

देख-देख

कर दिव्य-ज्योत्सना, फैली जग में

प्राण-प्राण

के नेह-दियों की, लौ बढ़ जाती

तोरण

सजते द्वार, अल्पना

देहरी-देहरी

घर-घर

को हर घरणी पावन-धाम बनाती

जब

करता आह्वान जगत तब स्वर्ग-लोक से

सुख-समृद्धि

के ले चिराग, लक्ष्मी उतर आती

पर्वों

के अमृत से बनता जीवन उत्सव

दिल

मिलते इस तरह कि जैसे दीपक-बाती

मावस

को दे मात, कालिमा काट, ‘कल्पना’

दीपमालिका

तीन लोक तक रजत बिछाती

- कल्पना रामानीप्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗