कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७० / २०५ № 70 of 205 रचना ७० / २०५
२४ फ़रवरी २०१५ 24 February 2015 २४ फ़रवरी २०१५

गुल खिले बसंती gul khile basantee गुल खिले बसंती

घटे

शीत के भाव-ताव, दिन बने बसंती

॥

गुलशन

हुए निहाल, और गुल खिले बसंती

॥

पेड़-पेड़

ने पूर्ण पुराने वस्त्र त्यागकर

॥

फिर

से हो तैयार, गात पर धरे बसंती

॥

अमराई

में जा पहुँची पट खोल कोकिला

॥

जी

भर चूसे आम, मधुर रस भरे बसंती

॥

पीत-सुनहरी

सरसों ने भी खूब सजाए

॥

खेत-खेत

में खिले-खिले, सिलसिले बसंती

॥

फुलवारी

की गोद भरी नन्हें मुन्नों से

॥

किलकारी

के बोल, हवा में घुले बसंती

॥

कलिकाओं

की सरस रागिनी, सुनकर सुर में

॥

भँवरों

ने दी ताल, तराने छिड़े बसंती

॥

जन-जन

से मन जोड़ मिला, कंचन-कुसुमाकर

॥

उगी

सुहानी भोर, उमंगें लिए बसंती

॥

कवियों

की भी रही न पीछे कलम “कल्पना”

॥

गज़लों

ने भी शेर, खूब कह दिये बसंती

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

ghate

sheet ke bhaaw-taaw, din bane basantee

·

gulashan

hue nihaal, aur gul khile basantee

·

ped-ped

ne poorn puraane wastr tyaagakar

·

phir

se ho taiyaar, gaat par dhare basantee

·

amaraaee

men jaa pahunchee pat khol kokilaa

·

jee

bhar choose aam, madhur ras bhare basantee

·

peet-sunaharee

sarason ne bhee khoob sajaae

·

khet-khet

men khile-khile, silasile basantee

·

phulawaaree

kee god bharee nanhen munnon se

·

kilakaaree

ke bol, hawaa men ghule basantee

·

kalikaaon

kee saras raaginee, sunakar sur men

·

bhanvaron

ne dee taal, taraane chide basantee

·

jan-jan

se man jod milaa, kanchan-kusumaakar

·

ugee

suhaanee bhor, umangen lie basantee

·

kawiyon

kee bhee rahee n peeche kalam “kalpanaa”

·

gazalon

ne bhee sher, khoob kah diye basantee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

घटे

शीत के भाव-ताव, दिन बने बसंती

॥

गुलशन

हुए निहाल, और गुल खिले बसंती

॥

पेड़-पेड़

ने पूर्ण पुराने वस्त्र त्यागकर

॥

फिर

से हो तैयार, गात पर धरे बसंती

॥

अमराई

में जा पहुँची पट खोल कोकिला

॥

जी

भर चूसे आम, मधुर रस भरे बसंती

॥

पीत-सुनहरी

सरसों ने भी खूब सजाए

॥

खेत-खेत

में खिले-खिले, सिलसिले बसंती

॥

फुलवारी

की गोद भरी नन्हें मुन्नों से

॥

किलकारी

के बोल, हवा में घुले बसंती

॥

कलिकाओं

की सरस रागिनी, सुनकर सुर में

॥

भँवरों

ने दी ताल, तराने छिड़े बसंती

॥

जन-जन

से मन जोड़ मिला, कंचन-कुसुमाकर

॥

उगी

सुहानी भोर, उमंगें लिए बसंती

॥

कवियों

की भी रही न पीछे कलम “कल्पना”

॥

गज़लों

ने भी शेर, खूब कह दिये बसंती

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗