कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ४४ / २०५ № 44 of 205 रचना ४४ / २०५
१० मई २०१४ 10 May 2014 १० मई २०१४

नेताजी कुछ कहो तुम्हारे... netaajee kuch kaho tumhaare नेताजी कुछ कहो तुम्हारे...

हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।

॥

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।

॥

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे

॥

तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।

॥

रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं

॥

चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।

॥

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब

॥

तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।

॥

कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली

॥

लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?

॥

वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर

॥

कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल

के चाम हुए।

॥

आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब

॥

मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

har din doone raat chaugune, bhookh-pyaas ke daam hue

·

netaajee! kuch kaho tumhaare, naare kyon naakaam hue

·

til-til dard bढ़aakar jan kaa, jan se maraham maang rahe

·

tane hue the kal khajoor ban, kaise namate aam hue

·

rang badalate dekh tumhen ab, hote hain ham dang naheen

·

chal paidal galiyon men aae, kyon bhikshuk he raam! hue

·

naam tumhaaraa jaap rahe hain, ghoos aur ghotaale sab

·

tijoriyon men chaanv chipaakar, janataa ke hit ghaam hue

·

kal usakee thee ab isakee hai, baar-baar topee badalee

·

lekin namak halaalee ke din, kis topee ke naam hue?

·

wot maangane not bane ho, ban jaaoge chot magar

·

kasamen saaree bhool-bhulaakar, agar dhol

ke chaam hue

·

aashvaasan kee phent malaaee, waadon kaa ghriit baantaa khoob

·

magar hamaare netaajee! ab ham bhee sajag tamaam hue

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।

॥

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।

॥

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे

॥

तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।

॥

रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं

॥

चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।

॥

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब

॥

तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।

॥

कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली

॥

लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?

॥

वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर

॥

कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल

के चाम हुए।

॥

आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब

॥

मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।

॥

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗