कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ४३ / २०४ № 43 of 204 रचना ४३ / २०४
१० मई २०१४ 10 May 2014 १० मई २०१४

नेताजी कुछ कहो तुम्हारे... netaajee kuch kaho tumhaare नेताजी कुछ कहो तुम्हारे...

हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।

रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।

कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?

वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल

के चाम हुए।

आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

har din doone raat chaugune, bhookh-pyaas ke daam hue

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netaajee! kuch kaho tumhaare, naare kyon naakaam hue

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til-til dard bढ़aakar jan kaa, jan se maraham maang rahe

·

tane hue the kal khajoor ban, kaise namate aam hue

·

rang badalate dekh tumhen ab, hote hain ham dang naheen

·

chal paidal galiyon men aae, kyon bhikshuk he raam! hue

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naam tumhaaraa jaap rahe hain, ghoos aur ghotaale sab

·

tijoriyon men chaanv chipaakar, janataa ke hit ghaam hue

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kal usakee thee ab isakee hai, baar-baar topee badalee

·

lekin namak halaalee ke din, kis topee ke naam hue?

·

wot maangane not bane ho, ban jaaoge chot magar

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kasamen saaree bhool-bhulaakar, agar dhol

ke chaam hue

·

aashvaasan kee phent malaaee, waadon kaa ghriit baantaa khoob

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magar hamaare netaajee! ab ham bhee sajag tamaam hue

·

-kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।

नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।

तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे

तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।

रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं

चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।

नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब

तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।

कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली

लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?

वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर

कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल

के चाम हुए।

आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब

मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗