नेताजी कुछ कहो तुम्हारे... netaajee kuch kaho tumhaare नेताजी कुछ कहो तुम्हारे...
हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।
नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।
तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे
तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।
रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं
चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।
नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब
तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।
कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली
लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?
वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर
कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल
के चाम हुए।
आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब
मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
har din doone raat chaugune, bhookh-pyaas ke daam hue
netaajee! kuch kaho tumhaare, naare kyon naakaam hue
til-til dard bढ़aakar jan kaa, jan se maraham maang rahe
tane hue the kal khajoor ban, kaise namate aam hue
rang badalate dekh tumhen ab, hote hain ham dang naheen
chal paidal galiyon men aae, kyon bhikshuk he raam! hue
naam tumhaaraa jaap rahe hain, ghoos aur ghotaale sab
tijoriyon men chaanv chipaakar, janataa ke hit ghaam hue
kal usakee thee ab isakee hai, baar-baar topee badalee
lekin namak halaalee ke din, kis topee ke naam hue?
wot maangane not bane ho, ban jaaoge chot magar
kasamen saaree bhool-bhulaakar, agar dhol
ke chaam hue
aashvaasan kee phent malaaee, waadon kaa ghriit baantaa khoob
magar hamaare netaajee! ab ham bhee sajag tamaam hue
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
हर दिन दूने रात चौगुने, भूख-प्यास के दाम हुए।
नेताजी! कुछ कहो तुम्हारे, नारे क्यों नाकाम हुए।
तिल-तिल दर्द बढ़ाकर जन का, जन से मरहम माँग रहे
तने हुए थे कल खजूर बन, कैसे नमते आम हुए।
रंग बदलते देख तुम्हें अब, होते हैं हम दंग नहीं
चल पैदल गलियों में आए, क्यों भिक्षुक हे राम! हुए।
नाम तुम्हारा जाप रहे हैं, घूस और घोटाले सब
तिजोरियों में छाँव छिपाकर, जनता के हित घाम हुए।
कल उसकी थी अब इसकी है, बार-बार टोपी बदली
लेकिन नमक हलाली के दिन, किस टोपी के नाम हुए?
वोट माँगने नोट बने हो, बन जाओगे चोट मगर
कसमें सारी भूल-भुलाकर, अगर ढोल
के चाम हुए।
आश्वासन की फेंट मलाई, वादों का घृत बाँटा खूब
मगर हमारे नेताजी! अब हम भी सजग तमाम हुए।
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी