कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १२० / २०४ № 120 of 204 रचना १२० / २०४
२६ मार्च २०१६ 26 March 2016 २६ मार्च २०१६

शान से फिर आई होली shaan se phir aaee holee शान से फिर आई होली

सात

रंगी ओढ़ चुनरी, शान से फिर आई होली।

प्रेम

रस की गागरी ले, द्वार पर मुस्काई होली।

फागुनी

मौसम के धरती से हुए अनुबंध भीगे

सृष्टि

का कण-कण भिगोकर, भर रही तरुणाई होली।

आँगनों

में, शुभ-शगुन के, मनहरण

सतिया सजे हैं

खेत-खलिहानों,

वनों, छत-छप्परों पर छाई होली।

खिल

उठे तरु, पुष्प, पल्लव,

खुशबू से गुलज़ार गुलशन

जलचरों

को, थलचरों को, नभचरों को, भाई होली।

पिहु-पिहू

रटते पपीहे, कुहु-कुहू कोकिल पुकारे

क्यारियों,

फुलवारियों, अमराइयों में गाई होली।

जलधि

जल में, निर्झरों पर, पर्वतों

पर, खाइयों में

पूर्णिमा

की चंद्र किरणें, रच रहीं सुखदाई होली।

चार

दिन की चाँदनी सब, सौंपकर उपहार हमको

‘कल्पना’ आएगी फिर से, चार दिन हरजाई होली।

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

saat

rangee oढ़ chunaree, shaan se phir aaee holee

·

prem

ras kee gaagaree le, dvaar par muskaaee holee

·

phaagunee

mausam ke dharatee se hue anubandh bheege

·

sriishti

kaa kan-kan bhigokar, bhar rahee tarunaaee holee

·

aanganon

men, shubh-shagun ke, manaharan

satiyaa saje hain

·

khet-khalihaanon,

wanon, chat-chapparon par chaaee holee

·

khil

uthe taru, pushp, pallaw,

khushaboo se gulazaar gulashan

·

jalacharon

ko, thalacharon ko, nabhacharon ko, bhaaee holee

·

pihu-pihoo

ratate papeehe, kuhu-kuhoo kokil pukaare

·

kyaariyon,

phulawaariyon, amaraaiyon men gaaee holee

·

jaladhi

jal men, nirjharon par, parvaton

par, khaaiyon men

·

poornimaa

kee chandr kiranen, rach raheen sukhadaaee holee

·

chaar

din kee chaandanee sab, saunpakar upahaar hamako

·

‘kalpanaa’ aaegee phir se, chaar din harajaaee holee

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सात

रंगी ओढ़ चुनरी, शान से फिर आई होली।

प्रेम

रस की गागरी ले, द्वार पर मुस्काई होली।

फागुनी

मौसम के धरती से हुए अनुबंध भीगे

सृष्टि

का कण-कण भिगोकर, भर रही तरुणाई होली।

आँगनों

में, शुभ-शगुन के, मनहरण

सतिया सजे हैं

खेत-खलिहानों,

वनों, छत-छप्परों पर छाई होली।

खिल

उठे तरु, पुष्प, पल्लव,

खुशबू से गुलज़ार गुलशन

जलचरों

को, थलचरों को, नभचरों को, भाई होली।

पिहु-पिहू

रटते पपीहे, कुहु-कुहू कोकिल पुकारे

क्यारियों,

फुलवारियों, अमराइयों में गाई होली।

जलधि

जल में, निर्झरों पर, पर्वतों

पर, खाइयों में

पूर्णिमा

की चंद्र किरणें, रच रहीं सुखदाई होली।

चार

दिन की चाँदनी सब, सौंपकर उपहार हमको

‘कल्पना’ आएगी फिर से, चार दिन हरजाई होली।

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗