मीत जागते रहो meet jaagate raho मीत जागते रहो
वसुंधरा
करे पुकार, मीत जागते रहो
कि
लौट जाए ना बहार, मीत जागते रहो
उमड़
रहे हैं उपवनों में, कंटकों के काफिले
करें
न कलियों पर प्रहार, मीत जागते रहो
समंदरों
की सैर को सँवर रहीं सुनामियाँ
निगल
न जाए तट को ज्वार, मीत जागते रहो
छलों-बलों को छोड़के, रखो दिलों
को जोड़के
न
टूट जाएँ नेह-तार, मीत जागते रहो
गला
ही घोंटते रहे, जो वोट करके वायदे
करें
न चोट बार-बार, मीत जागते रहो
चलो
न छाँह छीनकर,
छुड़ाके बाँह गाँव की
न
होगा कोई गमगुसार,
मीत जागते रहो
तरक्कियों
के दर कई, अखंड हो जो एकता
न
खंड-खंड हों विचार,
मीत जागते रहो
बनो
न खुद खुदा कि रूठ जाए रब-रसूल ही
न
बंद हों दुआ के द्वार, मीत जागते रहो
प्रलोभ-ज्वाल
देश को, न लील जाए “कल्पना”
जगो, उठो, तजो खुमार, मीत जागते रहो
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
wasundharaa
kare pukaar, meet jaagate raho
ki
laut jaae naa bahaar, meet jaagate raho
umad
rahe hain upawanon men, kantakon ke kaaphile
karen
n kaliyon par prahaar, meet jaagate raho
samandaron
kee sair ko sanvar raheen sunaamiyaan
nigal
n jaae tat ko jvaar, meet jaagate raho
chalon-balon ko chodake, rakho dilon
ko jodake
n
toot jaaen neh-taar, meet jaagate raho
galaa
hee ghontate rahe, jo wot karake waayade
karen
n chot baar-baar, meet jaagate raho
chalo
n chaanh cheenakar,
chudaake baanh gaanv kee
n
hogaa koee gamagusaar,
meet jaagate raho
tarakkiyon
ke dar kaee, akhand ho jo ekataa
n
khand-khand hon wichaar,
meet jaagate raho
bano
n khud khudaa ki rooth jaae rab-rasool hee
n
band hon duaa ke dvaar, meet jaagate raho
pralobh-jvaal
desh ko, n leel jaae “kalpanaa”
jago, utho, tajo khumaar, meet jaagate raho
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
वसुंधरा
करे पुकार, मीत जागते रहो
कि
लौट जाए ना बहार, मीत जागते रहो
उमड़
रहे हैं उपवनों में, कंटकों के काफिले
करें
न कलियों पर प्रहार, मीत जागते रहो
समंदरों
की सैर को सँवर रहीं सुनामियाँ
निगल
न जाए तट को ज्वार, मीत जागते रहो
छलों-बलों को छोड़के, रखो दिलों
को जोड़के
न
टूट जाएँ नेह-तार, मीत जागते रहो
गला
ही घोंटते रहे, जो वोट करके वायदे
करें
न चोट बार-बार, मीत जागते रहो
चलो
न छाँह छीनकर,
छुड़ाके बाँह गाँव की
न
होगा कोई गमगुसार,
मीत जागते रहो
तरक्कियों
के दर कई, अखंड हो जो एकता
न
खंड-खंड हों विचार,
मीत जागते रहो
बनो
न खुद खुदा कि रूठ जाए रब-रसूल ही
न
बंद हों दुआ के द्वार, मीत जागते रहो
प्रलोभ-ज्वाल
देश को, न लील जाए “कल्पना”
जगो, उठो, तजो खुमार, मीत जागते रहो
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी