कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना २० / ६५ № 20 of 65 रचना २० / ६५
७ फ़रवरी २०१३ 7 February 2013 ७ फ़रवरी २०१३

बसंती दोहे basantee dohe बसंती दोहे

ऋतु बसंत की आ गई, उत्सव का है दौर।

कोयल सुर में गा उठी, लदे आम पर बौर।

गुलमोहर कचनार भी, खिले खिले हैं आज।

पुष्प पल्लवों से सजा,ऋतु बसंत का ताज।

जंगल में मेला लगा, पशु पक्षी थे साथ।

चर्चाओं में खास थी, ऋतु रानी की बात।

कमी न हो जब अन्न की, जल के स्रोत अनंत।

महके हरित वसुंधरा, होगा सदा बसंत।

सरसों फूली खेत में, स्वर्णलता सी

riitu basant kee aa gaee, utsaw kaa hai daur

koyal sur men gaa uthee, lade aam par baur

·

gulamohar kachanaar bhee, khile khile hain aaj

pushp pallawon se sajaa,riitu basant kaa taaj

·

jangal men melaa lagaa, pashu pakshee the saath

charchaaon men khaas thee, riitu raanee kee baat

·

kamee n ho jab ann kee, jal ke srot anant

mahake harit wasundharaa, hogaa sadaa basant

·

sarason phoolee khet men, svarnalataa see

ऋतु बसंत की आ गई, उत्सव का है दौर।

कोयल सुर में गा उठी, लदे आम पर बौर।

गुलमोहर कचनार भी, खिले खिले हैं आज।

पुष्प पल्लवों से सजा,ऋतु बसंत का ताज।

जंगल में मेला लगा, पशु पक्षी थे साथ।

चर्चाओं में खास थी, ऋतु रानी की बात।

कमी न हो जब अन्न की, जल के स्रोत अनंत।

महके हरित वसुंधरा, होगा सदा बसंत।

सरसों फूली खेत में, स्वर्णलता सी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗