कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १ / २०५ № 1 of 205 रचना १ / २०५
४ फ़रवरी २०१३ 4 February 2013 ४ फ़रवरी २०१३

वतन को जान हम जानें watan ko jaan ham jaanen वतन को जान हम जानें

वतन को जान हम जानें, हमारी जाँ वतन में हो।

जुड़ा है जन्म से नाता, निभाना भी जीवन में हो।

कुटिल सैय्याद बन बैठे, विधाता भव्य भारत के।

बदल दे तख्त ज़ुल्मों का, वो जज़्बा, जोश जन में हो।

करम ऐसे न हों अपने, शरम से नयन झुक जाएँ।

हया के अश्क हों बाकी, दया का भाव मन में हो।

गुलों को अगर रौंदेंगे, बनेगा बाग ही बंजर।

सदय जो हाथ सहलाएँ, सदा खुशबू चमन में हो।

बुनें ऐसे सरस नगमें, गुने दिल से जिन्हें दुनिया।

सुनाएँ गजल कुछ ऐसी, कि चर्चा अंजुमन में हो।

सजग साहित्य सेवी हों, सबल हो देश की भाषा।

लुभाए विश्व को हिन्दी, वो ताक़त अब सृजन में हो।

न लांघे शत्रु सरहद को, भले ही शीश कट जाएँ।

मिले माटी में जब तन ये, तिरंगे के कफ़न में हो।

watan ko jaan ham jaanen, hamaaree jaan watan men ho

judaa hai janm se naataa, nibhaanaa bhee jeewan men ho

·

kutil saiyyaad ban baithe, widhaataa bhavy bhaarat ke

badal de takht zulmon kaa, wo jazbaa, josh jan men ho

·

karam aise n hon apane, sharam se nayan jhuk jaaen

hayaa ke ashk hon baakee, dayaa kaa bhaav man men ho

·

gulon ko agar raundenge, banegaa baag hee banjar

saday jo haath sahalaaen, sadaa khushaboo chaman men ho

·

bunen aise saras nagamen, gune dil se jinhen duniyaa

sunaaen gajal kuch aisee, ki charchaa anjuman men ho

·

sajag saahity sewee hon, sabal ho desh kee bhaashaa

lubhaae wishv ko hindee, wo taakat ab sriijan men ho

·

n laanghe shatru sarahad ko, bhale hee sheesh kat jaaen

mile maatee men jab tan ye, tirange ke kafan men ho

वतन को जान हम जानें, हमारी जाँ वतन में हो।

जुड़ा है जन्म से नाता, निभाना भी जीवन में हो।

कुटिल सैय्याद बन बैठे, विधाता भव्य भारत के।

बदल दे तख्त ज़ुल्मों का, वो जज़्बा, जोश जन में हो।

करम ऐसे न हों अपने, शरम से नयन झुक जाएँ।

हया के अश्क हों बाकी, दया का भाव मन में हो।

गुलों को अगर रौंदेंगे, बनेगा बाग ही बंजर।

सदय जो हाथ सहलाएँ, सदा खुशबू चमन में हो।

बुनें ऐसे सरस नगमें, गुने दिल से जिन्हें दुनिया।

सुनाएँ गजल कुछ ऐसी, कि चर्चा अंजुमन में हो।

सजग साहित्य सेवी हों, सबल हो देश की भाषा।

लुभाए विश्व को हिन्दी, वो ताक़त अब सृजन में हो।

न लांघे शत्रु सरहद को, भले ही शीश कट जाएँ।

मिले माटी में जब तन ये, तिरंगे के कफ़न में हो।

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗