कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ७ / ६७ № 7 of 67 रचना ७ / ६७
४ सितम्बर २०१२ 4 September 2012 ४ सितम्बर २०१२

खोए खोए लोग khoe khoe log खोए खोए लोग

जब से आए शहर में,लेकर धन का रोग

यहाँ अकेले हो गए, खोए खोए लोग।

॥

ना तो कोई मित्र है, ना ही रिश्तेदार

और न मिल पाया यहाँ, अपनों का वो प्यार।

॥

सुबह निकलते काम पर, दिन भर बने मशीन

रात गए घर लौटते, थके हुए गमगीन।

॥

सपने तो देखे बड़े, मद में थे तब चूर

रहे हाथ खाली, हुए, स्वजनों से भी दूर।

॥

हालत शहरों की दिखी, गाँवों से बदहाल

घर ऐसे ज्यों घोंसले, सड़कें

jab se aae shahar men,lekar dhan kaa rog

yahaan akele ho gae, khoe khoe log

·

naa to koee mitr hai, naa hee rishtedaar

aur n mil paayaa yahaan, apanon kaa wo pyaar

·

subah nikalate kaam par, din bhar bane masheen

raat gae ghar lautate, thake hue gamageen

·

sapane to dekhe bade, mad men the tab choor

rahe haath khaalee, hue, svajanon se bhee door

·

haalat shaharon kee dikhee, gaanvon se badahaal

ghar aise jyon ghonsale, sadaken

जब से आए शहर में,लेकर धन का रोग

यहाँ अकेले हो गए, खोए खोए लोग।

॥

ना तो कोई मित्र है, ना ही रिश्तेदार

और न मिल पाया यहाँ, अपनों का वो प्यार।

॥

सुबह निकलते काम पर, दिन भर बने मशीन

रात गए घर लौटते, थके हुए गमगीन।

॥

सपने तो देखे बड़े, मद में थे तब चूर

रहे हाथ खाली, हुए, स्वजनों से भी दूर।

॥

हालत शहरों की दिखी, गाँवों से बदहाल

घर ऐसे ज्यों घोंसले, सड़कें

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗