कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ५० / ६५ № 50 of 65 रचना ५० / ६५
१० जुलाई २०१४ 10 July 2014 १० जुलाई २०१४

मंगल-वर्षा ज्यों गिरी mangal-warshaa jyon giree मंगल-वर्षा ज्यों गिरी

मंगल-वर्षा ज्यों गिरी, मुदित हुआ

संसार।

जन-जन मन की तल्खियाँ, बहा ले गई

धार।

भीगी भीगी शाम से, हर्षित तन,मन,रोम।

इन्द्र धनुष सहसा दिखा, सजा रंग से

व्योम।

आँख मिचौनी सूर्य की, देख बादलों

संग।

खेल रचाकर हो रही, कुदरत खुद

ही दंग।

बौछारों की बाढ़ से, जल-थल हुए

समान।

जल स्रोतों ने पग बढ़ा, छुए नए

सोपान।

शिखरों को छूने बढ़े, बादल बाँह

पसार।

mangal-warshaa jyon giree, mudit huaa

sansaar

·

jan-jan man kee talkhiyaan, bahaa le gaee

dhaar

·

bheegee bheegee shaam se, harshit tan,man,rom

·

indr dhanush sahasaa dikhaa, sajaa rang se

wyom

·

aankh michaunee soory kee, dekh baadalon

sang

·

khel rachaakar ho rahee, kudarat khud

hee dang

·

bauchaaron kee baaढ़ se, jal-thal hue

samaan

·

jal sroton ne pag bढ़aa, chue nae

sopaan

·

shikharon ko choone bढ़e, baadal baanh

pasaar

मंगल-वर्षा ज्यों गिरी, मुदित हुआ

संसार।

जन-जन मन की तल्खियाँ, बहा ले गई

धार।

भीगी भीगी शाम से, हर्षित तन,मन,रोम।

इन्द्र धनुष सहसा दिखा, सजा रंग से

व्योम।

आँख मिचौनी सूर्य की, देख बादलों

संग।

खेल रचाकर हो रही, कुदरत खुद

ही दंग।

बौछारों की बाढ़ से, जल-थल हुए

समान।

जल स्रोतों ने पग बढ़ा, छुए नए

सोपान।

शिखरों को छूने बढ़े, बादल बाँह

पसार।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗