कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४७ / २०५ № 147 of 205 रचना १४७ / २०५
५ जून २०१७ 5 June 2017 ५ जून २०१७

धरती हुई निहाल dharatee huee nihaal धरती हुई निहाल

धरती हुई निहाल, बधाई दी अंबर

ने।

॥

जब हर नारी लगी गोद बेटी से भरने।

॥

कन्या भ्रूण विसर्जित होने कभी न देगी

॥

कृत संकल्प हुई जननी, अब रक्षित करने।

॥

क्रूर-काल ने भी ठाना है, आएगा वो

॥

प्राण पुत्रियों के न जन्म से पहले हरने।

॥

गज़लें करने लगीं बेटियों पर ही शायरी

॥

कलम चली बिटिया को कविता अर्पित करने

॥

किया समर्थन समंदरों ने, ज्वार बढ़ाकर

॥

नदियों ने दी ताल, गा उठे पर्वत-झरने

॥

देख हवा के बदले रुख को, विस्मित होकर

॥

झुका लिया है सिर नारी के, आगे नर ने

॥

मानो रे इंसान! बाँझ है भू, बेटी बिन

॥

रची ‘कल्पना’ सृष्टि सोचकर ही ईश्वर ने

॥

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

dharatee huee nihaal, badhaaee dee anbar

ne

·

jab har naaree lagee god betee se bharane

·

kanyaa bhroon wisarjit hone kabhee n degee

·

kriit sankalp huee jananee, ab rakshit karane

·

kroor-kaal ne bhee thaanaa hai, aaegaa wo

·

praan putriyon ke n janm se pahale harane

·

gazalen karane lageen betiyon par hee shaayaree

·

kalam chalee bitiyaa ko kawitaa arpit karane

·

kiyaa samarthan samandaron ne, jvaar bढ़aakar

·

nadiyon ne dee taal, gaa uthe parvat-jharane

·

dekh hawaa ke badale rukh ko, wismit hokar

·

jhukaa liyaa hai sir naaree ke, aage nar ne

·

maano re insaan! baanjh hai bhoo, betee bin

·

rachee ‘kalpanaa’ sriishti sochakar hee eeshvar ne

·

- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

धरती हुई निहाल, बधाई दी अंबर

ने।

॥

जब हर नारी लगी गोद बेटी से भरने।

॥

कन्या भ्रूण विसर्जित होने कभी न देगी

॥

कृत संकल्प हुई जननी, अब रक्षित करने।

॥

क्रूर-काल ने भी ठाना है, आएगा वो

॥

प्राण पुत्रियों के न जन्म से पहले हरने।

॥

गज़लें करने लगीं बेटियों पर ही शायरी

॥

कलम चली बिटिया को कविता अर्पित करने

॥

किया समर्थन समंदरों ने, ज्वार बढ़ाकर

॥

नदियों ने दी ताल, गा उठे पर्वत-झरने

॥

देख हवा के बदले रुख को, विस्मित होकर

॥

झुका लिया है सिर नारी के, आगे नर ने

॥

मानो रे इंसान! बाँझ है भू, बेटी बिन

॥

रची ‘कल्पना’ सृष्टि सोचकर ही ईश्वर ने

॥

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗