कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १४६ / २०४ № 146 of 204 रचना १४६ / २०४
५ जून २०१७ 5 June 2017 ५ जून २०१७

धरती हुई निहाल dharatee huee nihaal धरती हुई निहाल

धरती हुई निहाल, बधाई दी अंबर

ने।

जब हर नारी लगी गोद बेटी से भरने।

कन्या भ्रूण विसर्जित होने कभी न देगी

कृत संकल्प हुई जननी, अब रक्षित करने।

क्रूर-काल ने भी ठाना है, आएगा वो

प्राण पुत्रियों के न जन्म से पहले हरने।

गज़लें करने लगीं बेटियों पर ही शायरी

कलम चली बिटिया को कविता अर्पित करने

किया समर्थन समंदरों ने, ज्वार बढ़ाकर

नदियों ने दी ताल, गा उठे पर्वत-झरने

देख हवा के बदले रुख को, विस्मित होकर

झुका लिया है सिर नारी के, आगे नर ने

मानो रे इंसान! बाँझ है भू, बेटी बिन

रची ‘कल्पना’ सृष्टि सोचकर ही ईश्वर ने

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

dharatee huee nihaal, badhaaee dee anbar

ne

·

jab har naaree lagee god betee se bharane

·

kanyaa bhroon wisarjit hone kabhee n degee

·

kriit sankalp huee jananee, ab rakshit karane

·

kroor-kaal ne bhee thaanaa hai, aaegaa wo

·

praan putriyon ke n janm se pahale harane

·

gazalen karane lageen betiyon par hee shaayaree

·

kalam chalee bitiyaa ko kawitaa arpit karane

·

kiyaa samarthan samandaron ne, jvaar bढ़aakar

·

nadiyon ne dee taal, gaa uthe parvat-jharane

·

dekh hawaa ke badale rukh ko, wismit hokar

·

jhukaa liyaa hai sir naaree ke, aage nar ne

·

maano re insaan! baanjh hai bhoo, betee bin

·

rachee ‘kalpanaa’ sriishti sochakar hee eeshvar ne

·

- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

धरती हुई निहाल, बधाई दी अंबर

ने।

जब हर नारी लगी गोद बेटी से भरने।

कन्या भ्रूण विसर्जित होने कभी न देगी

कृत संकल्प हुई जननी, अब रक्षित करने।

क्रूर-काल ने भी ठाना है, आएगा वो

प्राण पुत्रियों के न जन्म से पहले हरने।

गज़लें करने लगीं बेटियों पर ही शायरी

कलम चली बिटिया को कविता अर्पित करने

किया समर्थन समंदरों ने, ज्वार बढ़ाकर

नदियों ने दी ताल, गा उठे पर्वत-झरने

देख हवा के बदले रुख को, विस्मित होकर

झुका लिया है सिर नारी के, आगे नर ने

मानो रे इंसान! बाँझ है भू, बेटी बिन

रची ‘कल्पना’ सृष्टि सोचकर ही ईश्वर ने

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗